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Monday, 18 February 2019

नमाज़े क़ज़ा करने का वबाल*

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بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ

اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     फरमाने मुस्तफा ﷺ: जिसकी नमाज़ क़ज़ा हो गई समझो उसके अहल व माल जाते रहे यानी उसके घर वाले और उसकी दौलत सब बर्बाद हो गए।

*✍🏼सहीह इब्ने हिब्बान* 1468

     फरमाने मुस्तफा ﷺ: 3 आदमी ऐसे है जिनकी अल्लाह नमाज़ और ज़िक्र कुबूल नहीं करता। उसमें से एक वो है जो वक़्त गुज़र जाने के बाद नमाज़ पढ़ता है।

*✍🏼मकाशफतुल क़ुलूब* 391

*✍🏼नमाज़ की अहमियत* 41

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से, 

गर होजाए यक़ीन के.....

*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*

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सूरतुल बक़रह, रुकुअ-33, आयत, ②⑤③*

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بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْـمٰـنِ الرَّحِـيْـمِ

اَلصَّــلٰـوةُ وَالسَّــلَامُ  عَــلَـيْـكَ يَا رَسُــوْلَ اللّٰه ﷺ

ये रसूल है की हमने इन में एक को दुसरे पर अफ़जल किया (10) इन में किसी से अल्लाह ने कलाम फरमाया (11) और कोई वह है जिसे सब पर दर्जों बलन्द किया (12) और हमने मरयम के बेटे ईसा को खुली निशानियाँ दी (13) और पाकीज़ा रूह से उसकी मदद की (14) और अल्लाह चाहता तो उनके बाद वाले आपस में न लड़ते बाद इसके की उनके पास खुली निशानियाँ आचुकी (15) लेकिन वो मख्तलिफ़ हो गए उनमें कोई ईमान पर रहा और कोई काफ़िर होगया (16) और अल्लाह चाहता तो वो न लड़ते मगर अल्लाह जो चाहे करे (17)


*तफ़सीर*

(10) इससे मालूम हुआ कि नबियों के दर्जे अलग अलग हैं. कुछ हज़रात से कुछ अफ़ज़ल हैं. अगरचे नबुव्वत में कोई फ़र्क़ नहीं, नबुव्वत की ख़ूबी में सब शरीक हैं, मगर अपनी अपनी विशेषताओं, गुणों और कमाल में अलग अलग दर्जे हैं. यही आयत का मज़मून है और इसी पर सारी उम्मत की सहमति है. (ख़ाज़िन व जुमल)

(11) यानी बिला वास्ता या बिना माध्यम के, जैसे कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को तूर पहाड़ पर संबोधित किया और नबियों के सरदार सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को मेराज में. (जुमल).

(12) वह हुज़ूर पुरनूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम हैं कि आपको कई दर्जों के साथ सारे नबियों पर अफ़ज़ल किया. इस पर सारी उम्मत की सहमति है. और कई हदीसों से साबित है. आयत में हुज़ूर के इस बलन्द दर्जे का बयान फ़रमाया गया और नामे मुबारक की तसरीह यानी विवरण न किया गया. इससे भी हुज़ूर अलैहिस्सलातो वस्सलाम की शान की बड़ाई मक़ूसद है, कि हुज़ूर की मुबारक ज़ात की यह शान है कि जब सारे नबियों पर फ़ज़ीलत या बुजुर्गी का बयान किया जाए तो आपकी पाक ज़ात के सिवा किसी और का ख़याल ही न आए और कोई शक न पैदा हो सके. हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की वो विशेषताएं और गुण जिनमें आप सारे नबियों से फ़ायक़ और अफ़ज़ल हैं और आपका कोई शरीक नहीं, बैशुमार हैं कि क़ुरआने पाक में यह इरशाद हुआ “दर्जों बलन्द किया” इन दर्जों की कोई गिनती क़ुरआन शरीफ़ में ज़िक्र नहीं फरमाई, तो अब कौन हद लगा सकता है. इन बेशुमार विशेषताओं में से कुछ का इजमाली और संक्षिप्त बयान यह है कि आपकी रिसालत आम है, तमाम सृष्टि आपकी उम्मत है. अल्लाह तआला ने फ़रमाया “वमा अरसलनाका इल्ला काफ्फ़तल लिन्नासे बशीरौं व नज़ीरा” (यानी ऐ मेहबूब हमने तुमको न भेजा मगर ऐसी रिसालत से जो तमाम आदमियों को घेरने वाली है, खुशख़बरी देता और डर सुनाता) (34 :28). दूसरी आयत में फ़रमाया : “लियकूना लिलआलमीना नज़ीरा” (यानी जो सारे जहान को डर सुनाने वाला हो) (25:1). मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में इरशाद हुआ “उरसिलतो इलल ख़लाइक़े काफ्फ़तन” (और आप पर नबुव्वत ख़त्म की गई). क़ुरआने पाक में आपको ख़ातिमुन्नबीय्यीन फ़रमाया हदीस शरीफ़ में इरशाद हुआ “ख़ुतिमा बियन नबिय्यूना”. आयतों और मोजिज़ात में आपको तमाम नबियों पर अफ़ज़ल फ़रमाया गया. आपकी उम्मत को तमाम उम्मतों पर अफ़ज़ल किया गया. शफ़ाअते कुबरा आपको अता फ़रमाई गई. मेराज में ख़ास क़ुर्ब आपको मिला. इल्मी और अमली कमालात में आपको सबसे ऊंचा किया और इसके अलावा बे इन्तिहा विशेषताएं आपको अता हुई. (मदारिक, जुमल, ख़ाज़िन, बैज़ावी वग़ैरह).

(13) जैसे मुर्दे को ज़िन्दा करना, बीमारों को तन्दुरूस्त करना, मिट्टी से चिड़ियाँ बनाना, ग़ैब की ख़बरें देना वग़ैरह.

(14) यानी जिब्रील अलैहिस्सलाम से जो हमेशा आपके साथ रहते थे.

(15) यानी नबियों के चमत्कार.

(16) यानी पिछले नबियों की उम्मतें भी ईमान और कुफ़्र में विभिन्न रहीं, यह न हुआ कि तमाम उम्मत मुतीअ हो जाती.

(17) उसके मुल्क में उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ कुछ नहीं हो सकता और यही ख़ुदा की शान है.

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से, 

गर होजाए यक़ीन के.....

*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*

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सहाबए किराम से मुतअल्लिक़ कुफ़्रिय्या कलिमात*

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     *सुवाल* - हज़रते अबू बक्र सिद्दीक व हज़रते उमर फारूके आजम رضي الله عنه की ख़िलाफ़त के इन्कार का क्या हुक्म है ? 

     *जवाब* - हज़राते शैखैन की शाने पाक में सब्बो शितम करना, तबर्रा कहना या हज़रते सिद्दीके अक्बर رضي الله عنه की सोहबत या इमामत व खिलाफ़त से इन्कार करना कुफ्र है। हज़रते उम्मुल मोमिनीन सिद्दीका رضي الله عنها की शाने पाक में क़ज़फ़ जैसी नपाक तोहमत लगाना यकीनन कतअन कुफ्र है।

*✍️बुन्यादी अक़ाइद और मामुलाते अहले सुन्नत* 70

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से, 

गर होजाए यक़ीन के.....

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फ़र्ज़ नमाज़ के बाद की दुआ* #03

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اَللّٰهُمَّ اَنْتَ السَّلَامُ وَمِنْكَ السَّلَامُ تَبَارَكْتَ يَاذَاالْجَلَالِ وَالْاِكْرَامِ

*तर्जमा* - ऐ अल्लाह ! तू सलामती देने वाला है और तेरी ही तरफ से सलामती है तू बरकत वाला है ऐ जलाल व बुज़ुर्गी वाले।

*✍🏽सहीह मुस्लिम, 298*

*✍🏽मदनी पंजसुरह, 225*


*नॉट :* जिन हजरात को अरबी नही आती वो तर्जुमा याद करले और उसे पढ़े। और जो अरबी जानते है वो तर्जुमे को जहन में रखे ताकि पता चले की हम क्या पढ़ रहे है, ये दुआ में क्या है। अपनी मादरी ज़बान में दुआ पढ़ना बेहतर है।

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,

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*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*

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तज़किरतुल अम्बिया* #395

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*क़ौमे मूसा अलैहिस्सलाम में क़ारून* #01

     क़ारून (हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम) का करीबी रिश्तेदार था ज्यादा मशहूर यह है कि आप का चचाजाद भाई था बाज़ हज़रात ने आपका खलाजाद भाई कहा है। उसने मूसा अलैहिस्सलाम और हारून अलैहिस्सताम की नबुव्वत पर हसद करते हुए मुनाफकत इख्तयार कर ली थी आपकी फौम में सामरी मुनाफिक था। कारून खूबसूरत होने की वजह से मुनव्वर कहलाता था और तौरात का भी बहुत बड़ा कारी था। लेकिन नबी का गुस्ताख होने की वजह से जलील हुआ। वह बहुत बड़ा मालदार था दस आदमियों की जमाअत उसके माल को शुमार नहीं कर सकती थी या यह लोग उसके ख़ज़ानों को उठा नहीं सकते थे। 

     हजरत इब्ने अब्बास और हसन रज़ियल्लाहु अन्हुम के मुख्तार मसलक यह है कि मफातेह से मुराद  माल लिया जाये यानी उसके माल को दस आदमी नहीं उठा सकते थे। 

     जिस रिवायत में ये ज़िक्र है कि क़ारून के ख़ज़ानो की चाबियां साठ सवारियों का बोझ था इसका ज़िक्र क़ुरआन पाक में नहीं लिहाजा इस रिवायत को क़बूल नहीं किया जायेगा।


बाक़ी अगली पोस्ट में..أن شاء الله

*✍️तज़किरतुल अम्बिया* 327

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से, 

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अव्वल वक़्त नमाज़ पढ़ने की फ़ज़ीलत*

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     हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद رضي الله عنه फ़रमाते है कि मेने हुज़ूर ﷺ से दरयाफ़्त किया: या रसूलल्लाह ﷺ! कौन सा अमल अल्लाह को सबसे ज़्यादा पसन्द है? फ़रमाया: वक़्त पर नमाज़ पढ़ना।

*✍🏼सहीह बुखारी* 504

     फरमाने मुस्तफा ﷺ: अव्वल वक़्त नमाज़ पढ़ना अल्लाह की ख़ुशनूदी का सबब है और आखिर वक़्त नमाज़ पढ़ना अल्लाह की तरफ से अफ्वो दरगुज़र का सबब है।

*✍🏼सुनने तिर्मिज़ी* 172

     फरमाने मुस्तफा ﷺ: अल्लाह ने 5 नमाज़े फ़र्ज़ की है, जिसने अच्छी तरह वुज़ू किया, वक़्त पर नमाज़ पढ़ी और दिल जमाकर अच्छी तरह रूकू और सज्दा किया तो अल्लाह ने ये वादा फ़रमाया है कि वो ऐसे आदमी को बख्श देगा और जो ऐसा न करे उसके लिये कोई वादा नहीं है।

*✍🏼अत्तरगिब् वत्तरहिब*

     फरमाने मुस्तफा ﷺ: जब बन्दा अव्वल वक़्त में नमाज़ पढ़ता है तो उसकी नमाज़ आसमानों की तरफ जाती है और वो नूरानी शक्ल में होती है यहाँ तक कि अर्शे इलाही तक जा पहुंचती है और नमाज़ी के लिये क़यामत तक दुआ करती रहती है कि अल्लाह तेरी हिफाज़त फरमाए जैसे तूने मेरी हिफाज़त की है और जब आदमी बे वक़्त नमाज़ पढ़ता है तो उसकी नमाज़ काली शक्ल में आसमानों की तरफ चढ़ती है जब वो आसमान तक पहुँचती है तो उसे पुराने कपड़े की तरह लपेटकर पढ़ने वाले के मुह पर मार दिया जाता है।

*✍🏼मकासफतुल क़ुलूब* 391

*✍🏼नमाज़ की अहमियत* 40

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सूरतुल बक़रह, रुकुअ-33, आयत, ②⑤②*

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ये अल्लाह की आयतें हैं कि हम ऐ मेहबूब तुमपर ठीक ठीक पढ़ते हैं और तुम बेशक रसूलों में हो (9)


*तफ़सीर*

(9) ये हज़रात जिनका ज़िक्र पिछली आयतों में और ख़ास कर आयत “इन्नका लमिनल मुरसलीन” (और तुम बेशक रसूलों में हो) में फ़रमाया गया.

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अम्बियाए किराम से मुतअल्लिक़ कुफ़्रिय्या कलिमात*

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     *सुवाल* - अम्बियाए किराम عليه السلام की तरफ बे हयाई की निस्बत करने का क्या हुक्म है ?

     *जवाब* - अम्बिया عليه السلام की तौहीन करना, उन की जनाब में गुस्ताखी करना या उन को फ़वाहिश व बे हया की तरफ़ मन्सूब करना कुफ़ है, मसलन معاذ الله यूसुफ़ عليه السلام की ज़िना की तरफ़ निस्बत करना। 


     *सुवाल* - नबिय्ये अकरम ﷺ को खातमुन्नबिय्यीन न जानने वाले नीज़ आप ﷺ से मन्सूब अश्या की तौहीन करने वाले के बारे में क्या हुक्म है ? 

     *जवाब* - जो शख्स हुजूरे अक्दस ﷺ को तमाम अम्बिया में आखिरी नबी न जाने या हुजूर ﷺ की किसी चीज़ की तौहीन करे या ऐब लगाए, आप के मूए मुबारक को तहकीर से याद करे, आप के लिबास मुबारक को गन्दा और मैला बताए, हुजुर ﷺ के नाखुन बड़े बड़े कहे येह सब कुफ्र हैं, बल्कि अगर किसी के इस कहने पर कि । हुजूर ﷺ को कद्दु पसन्द था कोई यह कहे मुझे पसन्द नहीं तो बाज़ उलमा के नज़दीक काफिर हैं और हकीकत येह कि अगर इस हैसिय्यत से उसे ना पसन्द हैं कि हुजूर ﷺ को पसन्द था तो काफ़िर है। यूहीं किसी ने ये कहा कि हुजूरे अक्दस ﷺ खाना तनावुल फ़रमाने के बाद तीन बार अंगुश्तहाए मुबारका चाट लिया करते थे, उस पर किसी ने कहा : ये अदब के खिलाफ हैं या किसी सुन्नत की तहकिर करे, मसलन दाढ़ी बढ़ाना, मूंछे कम करना, इमामा बांधना या शिम्ला लटकाना, इन की इहानत कुफ्र है जब कि सुन्नत की तौहीन मक्सूद हो। 


     *सुवाल* - अपने आप को पैगम्बर कहने वाले का क्या हुक्म है ? 

     *जवाब* - अब जो अपने को कहे मैं पैगम्बर हूं और उस का मतलब येह बताए कि मैं पैगाम पहुंचाता हूं वह काफ़िर है यानी येह तावील मसमूअ नहीं कि उर्फ में येह लफ्ज़ रसूल व नबी के माना में है। 

*✍️बुन्यादी अक़ाइद और मामुलाते अहले सुन्नत* 68

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से, 

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फ़र्ज़ नमाज़ के बाद की दुआ* #02

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اَللّٰهُمَّ اَعِنِّى عَلٰى ذِكْرِكَ وَشُكْرِكَ وَحُسْنِ عِبَادَتِكَ

*तर्जमा* - ऐ अल्लाह तू अपने ज़िक्र व शुक्र और हुस्ने इबादत पर मेरी मदद फरमा।

*✍🏽सुनन इब्नइ दाऊद, 2/123*

*✍🏽मदनी पंजसुरह, 225*


*नॉट :* जिन हजरात को अरबी नही आती वो तर्जुमा याद करले और उसे पढ़े। और जो अरबी जानते है वो तर्जुमे को जहन में रखे ताकि पता चले की हम क्या पढ़ रहे है, ये दुआ में क्या है। अपनी मादरी ज़बान में दुआ पढ़ना बेहतर है।

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तज़किरतुल अम्बिया* #394

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*गाए के जिबह करने में हिकमत*

     एक वजह तो यही थी कि नेक आदम के यतीम बच्चे और उस की बेवा को कसीर माल अता करन था इसलिए गाय जिबह करने का हुक्म दिया और बनी इस्राईल के ज़हनों में यह बात डाल दी कि वह सवाल करते हैं इस तरह वह गाय कहीं और न मिल सकी। दूसरी वजह यह थी कि गाय की कुरबानी का तरीका पहले से चला आ रहा था और वह लोग गाय की कुरबानी को अज़ीम समझते थे इसलिए उन्हें गाय जिबह करने का हुक्म दिया ताकि उनके जेहन उसे कुबूल करले की गाय की कुरबानी में यह असर होगा मक़तूल को ज़िन्दा करने का यह अजीब अंदाज बयान करके वाजेह किया कि अल्लाह तआला जैसे चाहे मुर्दा को ज़िन्दा करता है नीज़ यह काम उनके अपने हाथों से कराया ताकि मूसा अलैहिस्सलाम पर वह जादूगरी का इल्ज़ाम आयद न कर सकें।

*✍️ताज़किरतुल अम्बिया* 325

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जमाअत छोड़ने पर वईदें*

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     फरमाने मुस्तफा ﷺ: जो शख्स दिन को रोज़े रखता है, रात को इबादत करता है मगर जुमुआ और जमाअत में नहीं आता तो वो दोज़ख में जाएगा।

     फरमाने मुस्तफा ﷺ: मोमिन की बदबख्ति और नामुरादी के लिये यही काफी है कि मुअज्ज़िन को अज़ान कहते हुए सुने और जमाअत में हाज़िर न हो।

*✍🏼अल-मोजमुल कबीर लित्तिबरानी* 3/16805

     फरमाने मुस्तफा ﷺ:लोग जमाअत छोड़ने से बाज़ आ जाएं वरना में ज़रूर उनके घरों को आग लगा दूंगा।

*✍🏼सुनने इब्ने माजा* 795

     हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद رضي الله عنه फ़रमाते है कि अगर तुमने जमाअत छोड़ने वाले इस शख्स की तरह नमाज़ पढ़ी तो तुम अपने नबी ﷺ की सुन्नत के छोड़ने वाले हो जाओगे और अगर तुमने अपने नबी की सुन्नत को छोड़ दिया तो तुम गुमराह हो जाओगे।

*✍🏼मुस्लिम शरीफ* 1520

     फरमाने मुस्तफा ﷺ: ये सरासर ज़ुल्म व ज़्यादती, कुफ़्र व निफ़ाक़ की बात है कि आदमी अल्लाह के मुनादी की आवाज़ सुने जो उसे नमाज़ के लिये पुकार रहा हो लेकिन वो नमाज़ को न जाए।

*✍🏼मुसन्दे अहमद* 16032

*✍🏼नमाज़ की अहमियत* 38

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सूरतुल बक़रह, रुकुअ-33, आयत, ②⑤ⓞ*

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اَلصَّــلٰـوةُ وَالسَّــلَامُ  عَــلَـيْـكَ يَا رَسُــوْلَ اللّٰه ﷺ

फिर जब सामने आए जालूत और उसके लश्करों के, अर्ज़ की ऐ रब हमारे हम पर सब्र उंडेल और हमारे पाँव जमे रख काफ़िर लोगों पर हमारी मदद कर .


*सूरतुल बक़रह, रुकुअ-33, आयत, ②⑤①*

     तो उन्होंने उनको भगा दिया अल्लाह के हुक्म से और क़त्ल किया दाऊद ने जालूत को (5) और अल्लाह ने उसे सल्तनत और हिकमत (बोध) (6) अता फ़रमाई और उसे जो चाहा सिखाया  (7) और अगर अल्लाह लोगों में कुछ से कुछ को दफ़ा (निवारण)  न करे (8) तो ज़रूर तबाह हो जाए मगर अल्लाह सारे जहान पर फ़ज़्ल (कृपा) करने वाला है.


*तफ़सीर*

(5) हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम के वालिद ऐशा तालूत के लश्कर में थे और उनके साथ उनके सारे बेटे भी. हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम उन सब में सबसे छोटे थे, बीमार थे, रंग पीला पड़ा हुआ था, बकरियाँ चराते थे. जब जालूत ने बनी इस्राइल को मुक़ाबले के लिये ललकारा, वो उसकी जसामत देख कर घबराए, क्योंकि वह लम्बा चौड़ा ताक़तवार था. तालूत ने अपने लश्कर में ऐलान किया कि जो शख़्स जालूत को क़त्ल करे, मैं अपनी बेटी उसके निकाह में दूंगा और आधी जायदाद उसको दूंगा. मगर किसी ने उसका जवाब न दिया तो तालूत ने अपने नबी शमवील अलैहिस्सलाम से अर्ज़ किया कि अल्लाह के सामने दुआ करें. आपने दुआ कि तो बताया गया कि हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम जालूत को क़त्ल करेंगे. तालूत ने आपसे अर्ज़ की कि अगर आप जालूत को क़त्ल करें तो मैं अपनी लड़की आपके निकाह में दूँ और आधी जायदाद पेश करूँ. आपने क़ुबूल फ़रमाया और जालूत की तरफ़ रवाना हो गए. मुक़ाबले की सफ़ क़ायम हुई. हज़रत दाऊद  अलैहिस्सलाम अपने मुबारक हाथों में ग़ुलेल या गोफन लेकर सामने आए. जालूत के दिल में आपको देखकर दहशत पैदा हुई मगर उसने बड़े घमण्ड की बातें कीं और आपको अपनी ताक़त के रोब में लाना चाहा. आपने गोफन में पत्थर रखकर मारा वह उसकी पेशानी को तोड़कर पीछे से निकल गया और जालूत गिर कर मर गया. हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम ने उसको लाकर तालूत के सामने डाल दिया. सारे बनी इस्राइल बहुत ख़ुश हुए और तालूत ने वादे के मुताबिक़ आधी जायदाद दी और अपनी बेटी का आपके साथ निकाह कर दिया. सारे मुल्क पर हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम की सल्तनत हुई. (जुमल वग़ैरह)

(6) हिकमत से नबुव्वत मुराद है.

(7) जैसे कि ज़िरह बनाना और जानवरों की बोली समझना.

(8) यानी अल्लाह तआला नेकों के सदक़े में दूसरों की बलाएं भी दूर फ़रमाता है. हज़रत इब्ने उमर रदियल्लाहो तआला अन्हो से रिवायत है कि रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि अल्लाह तआला एक नेक मुसलमान की बरकत से उसके पड़ोस के सौ घर वालों की बला दूर करता है. सुब्हानल्लाह ! नेकों के साथ रहना भी फ़ायदा पहुंचाता है. (ख़ाज़िन)

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से, 

गर होजाए यक़ीन के.....

*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*

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अल्लाह की जाते मुबारका के मुतअल्लिक कुफ्रीय्या कलिमात* #04

*

بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْـمٰـنِ الرَّحِـيْـمِ

اَلصَّــلٰـوةُ وَالسَّــلَامُ  عَــلَـيْـكَ يَا رَسُــوْلَ اللّٰه ﷺ

     *सुवाल* - अल्लाह के नाम की तसगीर करना कैसा है ? 

     *जवाब* - अल्लाह के नाम की तसगीर करन कुफ्र है, जैसे किसी का नाम अब्दुल्लाह या अब्दुल खालिक या अब्दुर्रहमान हो उसे पुकारने में आखिर में अलिफ वगैरा ऐसे हुरूफ़ मिला दे जिस से तसगिर समझी जाती है।


     *सुवाल* - तेरा बाप अल्लाह अल्लाह करता है ये कहना

कैसा ?

     *जवाब* - एक शख्स नमाज़ पढ़ रहा है उसका लड़का बाप को तलाश कर रहा था और रोता था किसी ने कहा : चुप रह तेरा बाप अल्लाह अल्लाह करता है ये कहना कुफ्र नहीं क्योंकि इसके मन ये है कि खुदा की याद करता है। और ब्ज़ जाहिल ये कहते है कि लाइलाह पड़ता है ये बहुत क़बीह है  कि ये नफ़ी महज़ है, जिस का मतलब ये हुवा की कोई खुदा नही और ये माना कुफ्र है।

*✍️बुन्यादी अक़ाइद और मामुलाते अहले सुन्नत* 65

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से, 

गर होजाए यक़ीन के.....

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फ़र्ज़ नमाज़ के बाद की दुआ* #01

*

بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْـمٰـنِ الرَّحِـيْـمِ

اَلصَّــلٰـوةُ وَالسَّــلَامُ  عَــلَـيْـكَ يَا رَسُــوْلَ اللّٰه ﷺ

हर नमाज़ के बाद पेशानी यानी सर के अगले हिस्से पर हाथ रख कर पढ़े :

بِسْمِ اللّٰهِ الَّذِىْ لَآاِلٰهَ اِلَّاهُوَ الرَّحْمٰنُ الرَّحِيْمُ اَللّٰهُمَّ اَذْهِبْ عَنِّى الْهَمَّ وَالْحُزْنَ

*तर्जमा* - अल्लाह के नाम से जिस के सिवा कोई मअबूद नही, वो रहमान व रहीम है, ऐ अल्लाह मिझ से गम व रन्ज को दूर कर दे।


और हाथ खीच कर माथे तक ले जाए।

*✍🏽मजमउ ज़्ज़वाइद, 10/144*

*✍🏽बहारे शरीअत, जी। अव्वल, हिस्सा सीवुम, 539*

*✍🏽मदनी पंजसुरह, 225*


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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,

गर होजाए यक़ीन के.....

*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*

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तज़किरतुल अम्बिया* #393

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بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْـمٰـنِ الرَّحِـيْـمِ

اَلصَّــلٰـوةُ وَالسَّــلَامُ  عَــلَـيْـكَ يَا رَسُــوْلَ اللّٰه ﷺ

*बहुत भारी कीमत से गाय हासिल की* 

     उस वक्त आम तौर पर गाय की कीमत तीन दीनार तक होती थी लेकिन उन्होंने सवाल करके अपने लिए इतनी मुश्किल पैदा कर दी की  तमाम औसाफ़ किसी गाय में बयक वक़्त पाया जाना दुश्वार नजर आया। आखिरकार तलाश करते करते उन्हें एक बेवा और यतीम बच्चे के पास ऐसी गाय नज़र आई जिसमें बयान करदा सभी औसाफ़ मौजूद थे। बढ़ी नहीं थी और बछड़ी नहीं थी बल्कि दर्मियान उम्र की थी ज़र्द रंग था देखने वालों को खुश करता था जमीन में उराने हल नहीं चलया था और न ही खेती को सैराब किया था और इसमें कोई ऐब और दाग धब्बा नहीं था क्योंकि उस यतीम के बूढ़े, नैक परहेज़गार बाप ने अपनी एक बछड़ी को जंगल में छोड़कर अल्लाह तआला की हिफाज़त मैं दे दिया था की मेरा बच्चा कुछ बड़ा और समझदार होकर उसे ले जायेग। यह बच्चा भी वालीदेन का फरमां बरदार था अपने बाप की वफ़ात के कुछ अर्से बाद वह अपनी गाय जंगल से ले आया था उसी गाय में तमाम औसाफ मौजूद थे। मोटी ताज़ी थी, खूबसूरत थी बनी इस्राइल को उसके चमड़े में जितनी मिकदार में सोना आ सकता था उतनी मिकदार में सोना बतौर क़ीमत अदा करना पड़ा।

     शुबहानल्लाह ! मालिकुल मुल्क ने अपने बंदे की गाय की जंगल में हिफ़ाज़त फ़रमाई और उस नेक बंदे की बेवा और उसके यतीम बच्चे को कसीर मिकदार में माल व दौलत अता फरमाया। 

     बनी इस्राईल अगरचे गाय की भारी कीमत अदा करने पर खुशी से रजामंद नहीं थे और यह भी जानते थे कि अगर हमारा मकतूल जिन्दा हो गया तो हमारा अपना ही ऐब ज़ाहिर होगा लेकिन उन्हें फिर भी गाय जिबह करनी पड़ी क्योंकि अब उनके पास कोई उज़्र बाकी नहीं रह गया था अगरचे वह ज़िबह नहीं करना चाहते थे। 

*✍️तज़किरतुल अम्बिया* 325

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जमाअत की फ़ज़ीलत*

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بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ

اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     हुज़ूर ﷺ ने इर्शाद फ़रमाया: जमाअत की नमाज़ तन्हा नमाज़ से षवाब में 27 दर्जा बढ़कर है।

*✍🏼सहीह मुस्लिम* 1509

     हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया: जिसने मुकम्मल वुज़ू किया फिर फ़र्ज़ नमाज़ के लिये चला और इमाम के साथ नमाज़ पढ़ी तो उसके गुनाह बख्श दिये जाएंगे।

*✍🏼सहीह इब्ने खुज़ैम* 1489

     हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया: जो अल्लाह की रिज़ा के लिये 40 दिन नमाज़ जमाअत के साथ पढ़े और तकबीर उला पाए उसके लिये दो आज़ादियाँ लिख दी जाएंगी: (1) जहन्नम से (2) निफ़ाक़ से।

*✍🏼तिर्मिज़ी शरीफ* 241

     हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया: जिसने जमाअत से ईशा की नमाज़ पढ़ी समझो आधी रात उसने क़याम किया (यानी इबादत की) और जिसने फजर की नमाज़ जमाअत से पढ़ी समझो पूरी रात उसने क़याम किया।

*✍🏼सहीह मुस्लिम* 1523

     हज़रत उमर बिन खत्ताब رضي الله عنه फ़रमाते है मेने नबीए करीम ﷺ को ये फ़रमाते हुए सुना: बेशक अल्लाह जमाअत की नमाज़ को पसन्द फ़रमाता है।

*✍🏼मुसन्दे अहमद बिन हम्बल* 5112

*✍🏼नमाज़ की अहमियत* 37

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सूरतुल बक़रह, रुकुअ-33, आयत, ②④⑨*

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بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْـمٰـنِ الرَّحِـيْـمِ

اَلصَّــلٰـوةُ وَالسَّــلَامُ  عَــلَـيْـكَ يَا رَسُــوْلَ اللّٰه ﷺ

फिर जब तालूत लश्करों को लेकर शहर से जुदा हुआ (1) बोला बेशक अल्लाह तुम्हें एक नहर से आज़माने वाला है तो जो उसका पानी पिये वह मेरा नहीं और जो न पिये वह मेरा है मगर वह जो एक चुल्लू अपने हाथ से ले ले (2) सब ने उससे पिया मगर थोड़ों ने (3) फिर जब तालूत और उसके साथ के मुसलमान नहर के पार गए बोले हम में आज ताक़त नहीं जालूत और उसके लश्करों को बोले वो जिन्हें अल्लाह से मिलने का यक़ीन था कि अकसर कम जमाअत ग़ालिब आई है ज़्यादा गिरोह पर अल्लाह के हुक्म से और अल्लाह सब्र करने वालों के साथ है  (4)


*तफ़सीर*

(1) यानी बैतुल मक़दिस से दुश्मन की तरफ़ रवाना हुआ. वह वक़्त निहायत सख़्त गर्मी का था. लश्करियों ने तालूत से इसकी शिकायत की और पानी की मांग की.

(2) यह इम्तिहान मुक़र्रर फ़रमाया गया था कि सख़्त प्यास के वक़्त जो फ़रमाँबरदारी पर क़ायम रहा वह आगे भी क़ायम रहेगा और सख़्तियों का मुक़ाबला कर सकेगा और जो इस वक़्त अपनी इच्छा के दबाव में आए और नाफ़रमानी करे वह आगे की सख़्तियों को क्या बर्दाश्त करेगा.

(3) जिनकी तादाद तीन सौ तेरह थी, उन्होंने सब्र किया और एक चूल्लू उनके और उनके जानवरों के लिये काफ़ी हो गया और उनके दिल और ईमान को क़ुव्वत हुई और नहर से सलामत गुज़र गए और जिन्होंने ख़ूब पिया था उनके होंट काले हो गए, प्यास और बढ़ गई और हिम्मत टूट गई.

(4) उनकी मदद फ़रमाता है और उसी की मदद काम आती है.

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अल्लाह की जाते मुबारका के मुतअल्लिक कुफ्रीय्या कलिमात* #03

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بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْـمٰـنِ الرَّحِـيْـمِ

اَلصَّــلٰـوةُ وَالسَّــلَامُ  عَــلَـيْـكَ يَا رَسُــوْلَ اللّٰه ﷺ

     *सुवाल* - अगर कोई यह कहे मैं ان شاء الله के बिगैर काम करूंगा तो क्या हुक्म हैं ?  

     *जवाब* - किसी ने कहा : ان شاء الله तुम इस काम को करोगे, उस ने कहा : मैं बिगैर ان شاء الله करूंगा या एक ने दूसरे पर जुल्म किया, मज़लूम ने कहा : खुदा ने येही मुकद्दर किया था, ज़ालिम ने कहा : मैं बिगैर अल्लाह  के मुकद्दर किये करता हूं, येह कुफ़ हैं।


     *सुवाल* - क्या मोहताजी कुफ़ है ? 

     *जवाब* - किसी मिस्कीन ने अपनी मोहताजी को देख कर यह कहा : ऐ खुदा ! फुलां भी तेरा बन्दा है उस को तू ने कितनी नेमतें दे रखी हैं और मैं भी तेरा बन्दा हूं मुझे किस कदर रंजो तक्लीफ़ देता है आखिर येह क्या इन्साफ़ है ऐसा कहना कुफ्र है। हदीस में ऐसे ही के लिये फ़रमाया : मोहताजी कुफ्र के करीब हैं कि जब मोहताजी के सबब ऐसे ना मुलाइम कलिमात सादिर हों जो कुफ्र हैं तो गोया खुद मोहताजी करीब ब कुक्र है। 

*✍️बुन्यादी अक़ाइद और मामुलाते अहले सुन्नत* 67

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तज़किरतुल अम्बिया* #392

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بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْـمٰـنِ الرَّحِـيْـمِ

اَلصَّــلٰـوةُ وَالسَّــلَامُ  عَــلَـيْـكَ يَا رَسُــوْلَ اللّٰه ﷺ

*गाय के गोश्त से मक़तूल को ज़िंदा करने का वाकिया*

     बनी इस्राइल में से एक शख्स ने अपने एक रिश्तेदार को क़त्ल कर दिया ताकि उसका वारिस बन जाये। कत्ल करके उसकी लाश को चौराहे में फेंक देया फिर मूसा अलैहिस्सलाम के पास शिकायत लेकर आ गया मूसा अलैहिस्सलाम ने कोशिश की कातिल का पता लगाने की लेकिन पता न चल सका वह लोग कहने लगे अपने रब तआला से दुआ कजिये ताकि वह बताये कि इसका कातिल कौन है आपने अपने रब तआला से दुआ की तो अल्लाह तआला ने आपको वही की आपने अपनी क़ौम को बता दिया कि अल्लाह तआला हुक्म देता है कि गाय जिबह करके उसका गोश्त मुर्दा को मारो वह जिन्दा होकर बताएगा कि मेर क़ातिल कौन है ? उन्हें ने ताज्जुब किया कि जिबह शुदा गाय का गश्त मुर्दा को कैसा ज़िन्दा करेगा यह तो एक मज़ाह नजर आ रहा है। आपने फ़रमाया अल्लाह तआला की पनाह मैं जाहिलों से हो जाऊं । 

     यानी मजाह उडाना जाहिलो और नादनों का काम है नबी की शान के लायक नहीं कि वह किसी से मजाह उड़ाए और खुसूसन दीनी मामलात में मज़ाह उड़ाना शदीद अज़ाब और वईद का सबब है कि अल्लाह तआला के नबी के मुतअल्लिक़ यह तसव्वुर करना भी मुहाल है कि वह ऐसा इक़दाम कर सकता है जो अज़ाब का सबब बने। 

     हज़रत इब्ने अबास रज़ियल्लाहु अन्हुमा फरमाते है : अगर वह कोई गाय भी ज़िबह करते तो उनको किफ़ायत करती लेकिन उन्होंने खुद बार बार सवाल करके अपने आप पर सख्ती की तो अल्लाह तआला ने उन पर सख्ती की। 

     हज़रत हसन रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते है के आप सल्लल्लाहु अलैहि सल्लम ने फ़रमायाः उस ज़ात की कसम जिसके क़ब्ज़े में मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की जान है अगर वह इंशाअल्लाह न कहते तो हमेशा उनके और गाय के हुसूल में सवालात हाइल रहते। यानी जब उन्होंने कहा कि अगर अल्लाह तआला ने चाहा तो हम हिदायत पायेंगे तो उसी वक्त उनको सवालात खत्म करने की तौफीक हासिल हुई।

*✍️तज़किरतुल अम्बिया* 324

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Thursday, 14 February 2019

जुमुआ छोड़ने पर वईदे*

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بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ

اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     हुज़ूर ﷺ ने उन लोगों के बारे में फ़रमाया जो जुमुआ की नमाज़ में नहीं आते: जी चाहता है कि अपने पीछे एक शख्स को इमाम बनाऊँ जो लोगों को नमाज़ पढ़ाए और में खुद नमाज़े जुमुआ छोड़ने वालों के घरों को आग लगाकर फूंक दूँ।

*✍🏼मुस्लिम शरीफ* 1517

     हुज़ूर ﷺ का इर्शाद है: नमाज़े जुमुआ तर्क करने से बाज़ आ जाओ वरना तुम्हारे दिलों पर मुहर कर दी जाएगी और तुम गाफिलिन में कर दिये जाओगे।

*✍🏼मुस्लिम शरीफ*

     हुज़ूरे अक़दस ﷺ ने इर्शाद फ़रमाया: जो बिला उज़्र 3 जुमुआ छोड़ दे उसे अल्लाह के यहाँ मुनाफ़िक़ लिख दिया जाता है।

*✍🏼अल-मोजमुल कबीर लित्तिबरानी* 1/425

     एक और रिवायत में है कि जो पै दर पै मुसलसल 3 जुमुआ चजोड़ दे उसने इस्लाम को अपनी पीठ के पीछे फेंक दिया है।

*✍🏼इहयाउल उलूम*

*✍🏼नमाज़ की अहमियत* 36

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