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Saturday, 13 August 2016

फुतूह अल ग़ैब

*सब्रो-शुक्रकी फज़िलत:*
(हिस्सा 2)

 *بِسْــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ*

       ये इनआम सिर्फ सब्र-व्-शुक्रके बदलेमें तुम्हे मिलेगा जो हर तरह इत्मिनान बक्ष होगा और तुम्हें गुनाहसे बचनेकी सलाहीयत-व-कुव्वत अता की जाएगी। अगर वो शैअ तुम्हारी किस्मतमे होगी तो तुम्हें बा बरकत और किफायत करनेवाला हिस्सा मिलेगा और तुम्हारे सब्र को शुक्रकी हैसियत मेँ बदल दिया जाएगा। क्यों के अल्लाह करीम ने शाकिरों को (शुक्र करनेवालों को) ज़ियादा अता फरमाने का वादा कर रख्खा है।

बाक़ी कल की पोस्ट में... इंसा अल्लाह

*✍🏽फुतूहल ग़ैब*  पेज 27
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खादिमे दिने नबी ﷺ
 *फ़ैयाज़ सैय्यिद*
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Friday, 12 August 2016

फुतूह अल ग़ैब

*सब्रो-शुक्रकी फज़िलत:*

 *بِسْــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ*

      हज़रत कुत्बे रब्बानी गौसुस्समदानी رضي الله تعالي عنه ने फरमाया: जब उसरत (मुफलिसी,दुस्वारी) व नादानीकी कैफियत में तुम्हारे दिलमें निकाहकी ख्वाहीश पैदा हो और तुम इस बोज़को बरदाश्त करनेके काबिल भी न हो तो खुदावन्द करीमसे खुशहालीकी दुआ करो। उसीकी कुदरतने इन्सान के अंदर ये ख्वाहीश पैदा की है, वही रब्बे तआला या तो  उसके अस्बाब पैदा करेगा या तुम्हारी ख्वहिश को खत्म कर देगा। उसीकी तरफ तवज्जो मबजूल (मसरूफ) रखोगे तो तुम्हें उसके लिये न दुनियामें मुशक्कत उठानी पडेगी, न आखेरतमें तकलीफ होगी।
बाक़ी कल की पोस्ट में... इंसा अल्लाह

*✍🏽फुतूहल ग़ैब*  पेज 27
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खादिमे दिने नबी ﷺ
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मदनी पंजसुरह

*नमाज़ के बाद पढ़े जाने वाले अवराद*
#03
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     नबीए करीमﷺ ने फ़रमाया : जिसने नमाज़ के बाद ये कहा,
*سُبْحَانَ اللّٰهِ الْعَظِيْمِ وَبِحَمْدِهِ لَا حَوْلَ وَلَا قُوَّةَ اِلَّا بِاللّٰهِ*
*तर्जुमह :* पाक है अज़मत वाला रब और उसी की तारीफ़ हैंऔर उसी की अता से नेकी की तौफ़ीक़ और गुनाह से बचने की कुव्वत मिलती है।
तो वो मग्फिरत याफ्ता हो कर उठेगा।

     हुज़ूरﷺ ने फ़रमाया : जो हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद 10 मर्तबा *कुलहुवल्लाहु अहद* (पूरी सूरत) पढ़ेगा अल्लाह उसके लिये अपनी रिज़ा और मग्फिरत लाज़िम फरमा देगा।
*✍🏽तफ़सीरे दुर्रेमंसूर, 8/678*

     आक़ाﷺ ने फ़रमाया : जो शख्स हर नमाज़ के बाद
*سُبْحَانَ رَبِّكَ رَبِّ الْعِزَّةِ عَمَّا يَصِفُوْنَ o وَسَلٰمٌ عَلى الْمُرْسَلِيْنَ o وَالْحَمْدُ لِلّٰهِ رَبِّ الْعٰلَمِيْنَ o*
*तर्जुमह :* पाकी है तुम्हारे रब को इज़्ज़त वाले रब को उनकी बातो से और सलाम है पैगम्बरो पर और सब खुबिया अल्लाह को जो सारे जहान का रब है।
3 बार पढ़ेगा गोया उसने अज्र का बहुत बड़ा पैमाना भर लिया।
*✍🏽तफ़सीरे दुर्रेमन्सूर, 7/141*
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 160*
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खादिमे दिने नबी ﷺ, *मुहम्मद मोईन*
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Thursday, 11 August 2016

क़ब्र में आनेवाला दोस्त

*क़यामत के दिन अहलो अयाल का दावा*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     मारवी है के "मुर्दे से तअल्लुक़ रखने वालो में पहले उसकी ज़ौजा और उसकी औलाद है, मगर ये सब क़यामत में अल्लाह की बारगाह में अर्ज़ करेंगे : ऐ हमारे रब ! हमे इस शख्स से हमारा हक़ ले कर दे, क्यू के इसने कभी हमे दीनी उमूर नही सिखाए और ये हमे हराम खिलाता था जिसका हमे इल्म नही था। चुनांचे उस शख्स से उनका बदला लिया जाएगा।
     एक और रिवायत में है के, बन्दे को मीज़ान के पास लाया जाएगा, फ़रिश्ते पहाड़ के बराबर उसकी नेकिया लाएंगे तो उस से उस के अयाल की खबर गिरी और खिदमत के बारे में सुवाल होगा और माल के बारे में पूछा जाएगा के कहा से हासिल किया ? और कहा खर्च किया ? हत्ता के उस के तमाम आमाल उनके मुतालबात में खर्च हो जाएगे और उसके लिये कोई नेकी बाकी नही रहेगी, उस वक़्त फ़रिश्ते आवाज़ देंगे : ये वो शख्स है जिस की नेकिया उस के अहलो अयाल ले गए और वो अपने आमाल के साथ गिरवी है।
*✍🏽क़ब्र में आनेवाला दोस्त, 15*
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खादिमे दिने नबी ﷺ, *मुहम्मद मोईन*
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सिरते मुस्तफा


*_गज़्वाए बनू नज़ीर_*
हिस्सा-05
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     उन दरख्तो को काट देना ही बेहतर है इस मौके पर सूरए हशर की ये आयत उतरी :
*जो दरख्त तुम ने काटे या जिन को उन की जड़ो पर क़ाइम छोड़ दिये ये सब अल्लाह के हुक्म से था ताकि खुदा फासिक़ो को रुस्वा करे*
     मतलब ये है कि मुसलमानो में जो दरखत काटने वाले है उन का अमल भी दुरस्त है और जो काटना नहीं चाहते वो भी ठीक कहते है क्यू कि कुछ दरख्तो को काटना और कुछ को छोड़ देना ये दोनों अल्लाह के हिक्म और उस की इजाज़त से है।
     बहर हाल आखीरे कार मुहासरे से तंग आ कर बनू नज़ीर के यहूदी इस बात पर तैयार हो गए कि वो अपना अपना मकान और किला छोड़ कर इस शर्त पर मदीने से बाहर चले जाएंगे कि जिस क़दर माल व अस्बाब वो ऊंटो पर ले जा सके ले जाए।
     हुज़ूरﷺ ने यहूदियो की इस शर्त को मंज़ूर फरमा लिया और बनू नज़ीर के सब यहूदी 600 ऊंटो पर अपना माल व सामान लाद कर एक जुलुस की शक्ल में गाते बजाते हुए मदीना से निकले कुछ तो "खैबर" चले गए और ज़्यादा तादाद में मुल्क शाम जा कर "अज़रआत" और "उरैहा" में आबाद हो गए।
     इन लोगो के चले जाने के बाद इन के घरो की मुसलमानो ने जब तलाशी ली तो 50 लिहे की टोपिया, 50 ज़ीरहे, 340 तलवारे निकली, जो हुज़ूरﷺ के क़ब्ज़े में आई।
     अल्लाह ने बनू नज़ीर के यहूदियो की इस जिला वतनी का ज़िक्र सूरए हशर में इस तरह फ़रमाया कि :
*अल्लाह वोही है जिस ने काफ़िर किताबियो को उन के घरो से निकाला उन के पहले हशर के लिये, ऐ मुसलमान ! तुम्हे ये गुमान न था कि वो निकलेंगे और वो अमझते थे कि उन के किले उन्हें अल्लाह से बचा लेंगे तो अल्लाह का हुक्म उनके पास आ गया जहा से उन को गुमान भी न था और उस ने उन के दिलो में खौफ डाल दिया कि वो अपने घरो को खुद अपने हाथो से और मुसलमानो के हाथो से वीरान करते है तो इब्रत पकड़ो ऐ निगाह वालो !*
*✍🏽सिरते मुस्तफा, 300*
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खादिमे दिने नबी ﷺ, *मुहम्मद मोईन*
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तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान


हिस्सा-03
*_सूरए फातिहा_*
हिस्सा-03
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*इस्तिआजा*
     क़ुरआन शरीफ़ पढ़ने से पहले “अऊज़ो बिल्लाहे मिनश शैतानिर रजीम” (अल्लाह की पनाह मांगता हूँ भगाए हुए शैतान से) पढ़ना प्यारे नबी का तरीक़ा यानी सुन्नत है. (ख़ाज़िन) लेकिन शागिर्द अगर उस्ताद से पढ़ता हो तो उसके लिए सुन्नत नहीं है. (शामी) नमाज़ में इमाम और अकेले नमाज़ी के लिये सना यानी सुब्हानकल्लाहुम्मा पढ़ने के बाद आहिस्ता से “अऊज़ो बिल्लाहे मिनश शैतानिर रजीम” पढ़ना सुन्नत हैं.

*तस्मियह*
     बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम क़ुरआने पाक की आयत है मगर सूरए फ़ातिहा या किसी और सूरत का हिस्सा नहीं है, इसीलिये नमाज़ में ज़ोर के साथ् न पढ़ी जाए.
     बुखारी और मुस्लिम शरीफ़ में लिखा है कि प्यारे नबी हुजू़र और हज़रत सिद्दीक़ और फ़ारूक़ (अल्लाह उनसे राज़ी) अपनी नमाज़ “अलहम्दोलिल्लाहेरब्बिलआलमीन“ यानी सूरए फ़ातिहा की पहली आयत से शुरू करते थे. तरावीह (रमज़ान में रात की ख़ास नमाज़) में जो ख़त्म किया जाता है उसमें कहीं एक बार पूरी बिस्मिल्लाह ज़ोर से ज़रूर पढ़ी जाए ताकि एक आयत बाक़ी न रह जाए.
     क़ुरआन शरीफ़ की हर सूरत बिस्मिल्लाह से शुरू की जाए, सिवाय सूरए बराअत या सूरए तौबह के. सूरए नम्ल में सज्दे की आयत के बाद जो बिस्मिल्लाह आई है वह मुस्तक़िल आयत नहीं है बल्कि आयत का टुकड़ा है. इस आयत के साथ ज़रूर पढ़ी जाएगी,
     आवाज़ से पढ़ी जाने वाली नमाज़ों में आवाज़ के साथ और खा़मोशी से पढ़ी जाने वाली नमाज़ों में ख़ामोशी से.
     हर अच्छे काम की शुरूआत बिस्मिल्लाह पढ़कर करना अच्छी बात है. बुरे काम पर बिस्मिल्लाह पढ़ना मना है.
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अब्लाक़ घोड़े सुवार

*क़ुरबानी के मसाइल*
*_गोश्त के आज्ज़ा जो नही खाए जाते_*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     आला हज़रत अलैरहमा फरमाते है : हलाल जानवर के सब आज्ज़ा हलाल है मगर बाज़ कि हराम या ममनुअ या मकरूह है,
रगो का खून
पित्ता
फुकना (यानी मसाना)
अलामाते मादा व नर
बैज़े (यानी कपुरे)
गुदुद
हराम मग्ज़
गर्दन के दो पठ्ठे कि शानो तक खिचे होते है
जिगर (यानी कलेजी) का खून
तिल्ली का खून
गोश्त का खून की बादे ज़बह गोश्त में से निकलता है
दिल का खून
पित यानि वो ज़र्द पानी कि पित्ते में होता है
नाक की रतुबत, कि भेड़ में अक्सर होती है
पाखाने का मक़ाम
ओझड़ी
आंते
नुत्फा (मनी), वो नुत्फा कि खून हो गया, वो नुत्फा कि गोश्त का लोथड़ा हो गया, वो नुत्फा की पूरा जानवर बन गया और मुर्दा निकला या बे ज़बह मर गया।
     समझदार कस्साब बाज़ ममनुआ चीज़े निकल दिया करते है मगर बाज़ में इन को भी मालूमात नही होती या बे एहतियाती बरतते है।
*✍🏽अब्लाक़ घोड़े सुवार, 37*
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मदनी पंजसुरह

*नमाज़ के बाद पढ़े जाने वाले अवराद*
हिस्सा-02
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     हर नमाज़ के बाद पेशानी के अगले हिस्से पर हाथ रख कर पढ़े :
*بِسْمِ اَللّٰهِ الَّذِىْ لَا اِلٰهَ اِلَّا هُوَ الرَّحْمٰنُ الرَّحْيْمُ، اَللّٰهُمَّ اذْهِبْ عَنِّى الْهَمَّ وَالْحُزْنَ*
*तर्जुमह :* अल्लाह के नाम से शुरू जिसके सिवा कोई मअबूद नही वो रहमान व रहीम है। ऐ अल्लाह मुझ से गम व मलालत दूर फरमा।
(पड़ने के बाद हाथ खीच कर पेशानी तक लाए) तो हर गम व परेशानी से बचे। आला हज़रत ने इस दुआ के आखिर में मज़ीद इन अलफ़ाज़ का इज़ाफ़ा फ़रमाया है, *وَعَنْ اَهْلِ السَّبَّة*  यानी और अहले सुन्नत से।

     असर व फज्र के बाद बगैर पाउ बदले, बगैर कलाम किये
*لَا اِلٰهَ اِلَّا اللّٰهُ وَحْدَهُ لَاشَرِيْكَ لَهُ لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الَحَمْدُ بِيَدِهِ الْخَيْرُ يُحْيِىْ وَيُمِيْتَ وَهُوَ عَلٰى كُلِّ شَىْءٍ قَدِيْرٌ*
*तर्जुमह :* अल्लाह के सिवा कोई मअबूद नही, वो तन्हा है, उसका कोई शरीक नही, उसके लिये मुल्क व हम्द है, उसी के हाथ में खैर है, वो ज़िन्दा करता है और मौत देता है और वो हर शै पर क़ादिर है।
10 बार पढ़िये
*✍🏽बहारे शरीअत, 3/107*
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 159*
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खादिमे दिने नबी ﷺ, *मुहम्मद मोईन*
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फुतूह अल ग़ैब

*ज़ातकी नफी मुखालिफते नफ्स:*
(हिस्सा 10)
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

        खलकतके निगेहबान और खुदा के नाइब और दोस्त है अलयहिमुस्सलम ।
इसी हालतमे अमरकी इत्तेबा यही है के बंदा खुद अपनी ज़ातकी नफी (किसी चीज़के वजूद से इन्कार ) कर दे, अपने हौल-व-कुव्वतसे बेज़ार हो जए और दुनिया-व-आखेरतकी किसी चिज़का ख्वाहिशमंद न रहे।                                                                                                                        
     फिर तुम मुल्कके गुलाम नही, मलिकुल मुल्क के बंदे बन जओगे। ख्वाहिशातके नहि, अमर हकके गुलाम होगे और हर तरह तुम्हारा मआमला इस तरह खुदावंदे तआला के सुपुर्द हो जाएगा , जेसे शीरख्वार बच्चा दायाके हाथो मे , नेहलाया हुआ मुरदा गुस्सलके हाथो मे, या बेहोश मरीज़ तबीबके रुबरु होता है। इस तरह तुम अव अमरो नवाही की पैरवी के अलावा दिगर तमाम उमूर से हर तरह बे तआल्लुक हो जाओगे
                                                                                                                                               बाक़ी कल की पोस्ट में... इंसा अल्लाह
*✍🏽फुतूहल ग़ैब  पेज 26*
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खादिमे दिने नबी ﷺ, *फ़ैयाज़ सैय्यिद*
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Wednesday, 10 August 2016

क़ब्र में आनेवाला दोस्त

*अपने आप को हलाकत में डालने वाला बद नसीब*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     हुज़ूरﷺ ने इरशाद फ़रमाया : लोगो पर एक ज़माना ऐसा आएगा के मोमिन को अपना दीन बचाने के लिये एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ और एक गार से दूसरे गार की तरफ भागना पड़ेगा तो उस वक़्त रोज़ी अल्लाह की नाराज़ी ही से हासिल की जाएगी फिर जब ऐसा ज़माना आ जाएगा तो आदमी अपने बीवी बच्चों के हाथो हलाक होगा, अगर उस के बीवी बच्चे न हो तो वो अपने वालिदैन के हाथो हलाक होगा, अगर उस के वालिदैन न हुए तो वो रिश्तेदारो और पडोसियो के हाथो हलाक होगा।
     सहाबए किराम ने अर्ज़ की : या रसूलल्लाहﷺ ! वो कैसे ? फ़रमाया : वो उसे माल की कमी का ताना देंगे तो आदमी अपने आप को हलाकत में डालने वाले कामो में मसरूफ़ कर देगा। (तो गोया उन्ही के हाथो हलाक हुआ)
*✍🏽अल तरगिब् वल तरहिब 3/299*

     अपने घर वालो को हराम कमा कर खिलाने वालो को संभल जाना चाहिए के मैदाने महशर, के जहा एक नेकी की सख्त हाजत होगी, यही अपने उस से क्या सुलूक करेंगे ?
ये इन्शा अल्लाह कल की पोस्ट में....
*✍🏽क़ब्र में आनेवाला दोस्त, 15*
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सिरते मुस्तफा ﷺ


_गज़्वाए बनू नज़ीर_*
        हिस्सा-04
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

चुनांचे अल्लाह ने इन दगाबाज़ो के बारे में क़ुरआन में इरशाद फ़रमाया :
*इन लोगो की मिषाल शैतान जेसी है जब इस ने आदमी से कहा कि तू कुफ़्र कर फिर जब उस ने कुफ़्र किया तो बोला कि में तुझ से अलग हु में अल्लाह से डरता हु जो सारे जहान का पालनेवाला है।*
पारह 28, सूरतुल हशर, 16

     यानी जिस तरह शैतान आदमी को कुफ़्र पर उभारता है लेकिन जब आदमी शैतान के वर-गलाने से कुफ़्र में मुब्तला हो जाता है तो शैतान चुपके से खिसक कर पीछे हट जाता है इसी तरह मुनाफ़ीक़ो ने बनू नज़ीर के यहूदियो को शह दे कर दिलेर बना दिया और अल्लाह के हबीबﷺ से लड़ा दिया लेकिन जब बनू नज़ीर के यहूदियो को जंग का सामना हुवा तो मुनाफ़िक़ चुप कर अपने घरो में बैठ रहे।
     हुज़ूरﷺ ने किल्ले के मुहसरे के साथ किल्ले के आस पास खजूरो के कुछ दरख्तो को भी कटवा दिया क्यू कि मुमकिन था कि दरख्तो के झुंड में यहूदी छुप कर इस्लामी काशकर पर छापा मारते और जंग में मुसलमानो को दुश्वारी हो जाती।
     इन दरख्तो को काटने के बारे में मुसलमानो के दो गुरौह हो गए, कुछ लोगो का ये ख्याल था कि ये दरख्त न काटे जाए क्यू कि फ़त्ह के बाद ये सब दरख्त माले गनीमत बन जाएंगे और मुसलमान इन से नफा उठाएंगे और कुछ लोगो का ये कहना था कि दरख्तो के झुंड को काट कर साफ़ कर देने से यहूदियो की कमीन गाहों को बर्बाद करना और इन को नुक़सान पबुचा का गैज़ो गज़ब में डालना मक़सूद है, लिहाज़ा इन दरख्तो को काट देना ही बेहतर है।

     इस मौके पर सूरए हशर की एक आयत उतरी जो इन्शा अल्लाह अगली पोस्ट में हम देखेंगे....
*✍🏽सिरते मुस्तफा, 299*
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*नमाज़ का तरीका*
हिस्सा-04
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
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     सज्दे से इस तरह उठिये की पहले पेशानी फिर नाक फिर हाथ उठे।
     *मर्द :* फिर सीधा कदम खड़ा करके उसकी उंगलिया किब्ला रुख कर दीजिये और उल्टा क़दम बिछा कर उस पर खूब सीधे बेथ जाइये, और हथेलिया बिछा कर रानो पर घुटनो के पास रखिये की दोनों हाथो की उंगलिया किब्ले की जानिब और उंगलियो के सिरे घुटनो के पास हो।
     *औरत :* दोनों पाउ सीधी तरफ निकाल दीजिये और उलटी सुरीन पर बैठिये और सीधा हाथ सीधी रान के बिच में और उल्टा हाथ उलटी रान रान के बिच में रखिये।

     दोनों सजदों के दरमियान बैठने को जल्सा कहते है।
     फिर कम अज़ कम एक बार सुब्हान अल्लाह कहने की मिक़दार ठहरिये
     यहा "अल्लाहुमग-फिरलि" (यानि ए अल्लाह मेरी मगफिरत फरमा) पढ़ना मुस्तहब है
     फिर अल्लाहु अकबर कहते हुए पहले सज्दे की तरह दूसरा सज्दा कीजिये।
*नमाज़ के अहकाम, 151*
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तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान


हिस्सा-02
*_सूरए फातिहा_*
हिस्सा-02
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_सूरए फातिहा के नाम_*
     इस सूरत के कई नाम हैं – फा़तिहा, फा़तिहतुल किताब, उम्मुल कु़रआन, सूरतुल कन्ज़, काफि़या, वाफ़िया, शाफ़िया, शिफ़ा, सबए मसानी, नूर, रुकै़या, सूरतुल हम्द, सूरतुल दुआ़ तअलीमुल मसअला, सूरतुल मनाजात सूरतुल तफ़वीद, सूरतुल सवाल, उम्मुल किताब, फा़तिहतुल क़ुरआन, सूरतुस सलात.

*_सूरतुल फ़ातिहा की खूबियाँ_*
    हदीस की किताबों में इस सूरत की बहुत सी ख़ूबियाँ बयान की गई है. हुजू़रﷺ ने फरमाया तौरात व इंजील व जु़बूर में इस जैसी सूरत नहीं उतरी.
*✍🏽तिरमिज़ी*
     एक फ़रिश्ते ने आसमान से उतर कर हुजू़रﷺ पर सलाम अर्ज़ किया और दो ऐसे नूरों की ख़ूशख़बरी सुनाई जो हुज़ूरﷺ से पहले किसी नबी को नहीं दिये गए. एक सूरए फ़ातिहा दूसरे सुरए बक्र की आख़िरी आयतें.
*✍🏽मुस्लिम शरीफ़*
     सूरए फा़तिहा हर बीमारी के लिए दवा है.
     सूरए फ़ातिहा सौ बार पढ़ने के बाद जो दुआ मांगी जाए, अल्लाह तआला उसे क़ुबूल फ़रमाता है.
*✍🏽दारमी*

*_सूरए फ़ातिहा में क्या क्या है?_*
     इस सूरत में अल्लाह तआला की तारीफ़, उसकी बड़ाई, उसकी रहमत, उसका मालिक होना, उससे इबादत, अच्छाई, हिदायत, हर तरह की मदद तलब करना, दुआ मांगने का तरीक़ा, अच्छे लोगों की तरह रहने और बुरे लोगों से दूर रहने, दुनिया की ज़िन्दगी का ख़ातिमा, अच्छाई और बुराई के हिसाब के दिन का साफ़ साफ़ बयान है.
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अब्लाक़ घोड़े सुवार

*क़ुरबानी के मसाइल*
*_अपनी क़ुरबानी की खाल बेच दी तो ?_*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

सुवाल :
किसी ने अपनी क़ुरबानी की खाल बेच कर रक़म हासिल कर ली अब वो मस्जिद में दे सकता है या नही ?

जवाब :
यहाँ निय्यत का एतिबार है। अगर अपनी क़ुरबानी की खाल अपनी ज़ात के लिये रक़म के एवज़ बेची तो यु बेचना भी नाजाइज़ है और ये रक़म इस शख्स के हक़ में माले खबीस है और इस का सदक़ा करना वाजिब है लिहाज़ा किसी शरई फ़क़ीर को दे दे। और तौबा भी करे।
     और अगर किसी कारे खैर के लिये मसलन मस्जिद में देने ही की निय्यत से बेचीं तो बेचना भी जाइज़ है और अब मस्जिद में देने में कोई हर्ज नही।
*✍🏽अब्लाक़ घोड़े सुवार, 28*
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मदनी पंजसुरह

*नमाज़ के बाद पढ़े जाने वाले अवराद*
हिस्सा-01
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     पाचो वक़्त की नमाज़ों के बाद ये अवराद पढ़ लीजिये। हर विर्द के अव्वल आंखिर दुरिद शरीफ पढ़ लीजिये।

       (1) *आयतुल कुर्सी* एक बार पढ़ने वाला मरते ही दाखिले जन्नत हो।
*✍🏽मिश्कात, 1/197*

21) *اَللّٰهُمَّ اَعِنِّى عَلٰى ذِكْرِكَ وَشُكْرِكَ وَحُسْنِ عِبَادَتِكَ*
*तर्जुमह :* ऐ अल्लाह ! तू अपने ज़िक्र, अपने शुक्र और और अपनी इबादत करने पर मेरी मदद फरमा।
*✍🏽सुनन इब्ने दाऊद, 2/123*

(3) *اَسْتَغْفِرُ اللّٰهَ الَّذِىْ لَا اِلٰهَ اِلَّا هُوَ الْحَىُّ الْقَيُّوْمُ وَاَتُوْبُ اِلَيْهِ*
*तर्जुमह :* में अल्लाह से मुआफ़ी मांगता (मांगती) हु जिस के सिवा कोई मअबूद नही वो ज़िन्दा है क़ाइम रखने वाला है और उस की बारगाह में तौबा करता (करती) हु।
इसे 3-3 बार पढे उसके गुनाह मुआफ़ हो अगर्चे वो मैदाने जिहाद से भागा हुवा हो।
*✍🏽तिर्मिज़ी, 5/336*

     (4) तस्बिहे फातिमा :
*سُبْحَانَ اللّٰهِ* 33 बार
*الْحَمْدُ لِلّٰهِ* 33 बार
*اَللّٰهُ اَكْبَرُ* 33
बार ये 99 हुए, आखिर में
*لَا اِلٰهَ اِلَّا اللّٰهُ وَحْدَهُ لَاشَرِيْكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الَحَمْدُ وَهُوَ عَلٰى كُلِّ شَىْءٍ قَدِيْرٌ*
एक बार पढ़ कर 100 का अदद पूरा करले, तो पढ़ने वाले के गुनाह बख्श दिये जाएंगे अगर्चे समुन्दर के झाग के बराबर हो।
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 158*
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फुतूह अल ग़ैब

*ज़ातकी नफी मुखालिफते नफ्स:*
(हिस्सा 9)

 *بِسْــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ*

      यही वो अमर(फरमान) है जिससे शरीयतने न तो मना किया है न उसे करने का हुकम दिया है। यही अमर(काम) उस मुबाह (हलाल, दुरुस्त,पाक) में भी है जिसकी न सख्त मुमानेअत (मना करना) है, न वो वाजिब है। बल्के महमिलात (बेकार) में से है। इसमे बंदे को इख्तियार दिया गया है। इस तरह उसे मुबाह केहते हैं। लेकिन इसमें कोइ सखश तरमीम (इस्लाह, दुरुस्त) व-तन्सीख(मन्सूख करना) का इख्तियार नहीं रखता।
      जब आदमी के सब काम अल्लाहकी तरफ से होंगे। जिस कामका हुकम शरआमें है वो इसके मुताबिक और जिसका हुकम शरियतमें नहीं वो बातिनी अमर से अंजाम देगा,वो आदमी एहले हकीकत में से हो जाएगा और जिस काम में अमर बातिन नहीं वो खालिस फेअले इलाहीए तकदीर महेज़ और हालत तसलीम है।
      अगर बन्दा “हक्कुल हक” की मंजिलमें है जो मिट जाने और फना हो जाने की हालतमें है, तो वो अब्दाल है। अब्दालोंके दिल खुदा तआला के लिये  शिकसता हो चुके हैं। यही लोग मोहिद( खुदा को एक जाननेवाले) हैं। आरिफ (वली, खुदा सनास) हैं, इल्मो अमल के मालिक हैं, उमरा (दोलतमंद) के सरखील (सरदार) हैं।
बाक़ी कल की पोस्ट में... इंसा अल्लाह

*✍🏽फुतूहल ग़ैब*  पेज 25,26
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खादिमे दिने नबी ﷺ
 *फ़ैयाज़ सैय्यिद*
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Tuesday, 9 August 2016

क़ब्र में आनेवाला दोस्त

*पीछे क्या छोड़ा ?*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

हज़रते अबू हुरैराرضي الله تعالي عنه से मारवी है :
जब कोई शख्स मर जाता है तो फ़रिश्ते कहते है के इस ने आगे क्या भेजाब ?
और लोग पूछते है : इसने पीछे क्या छोड़ा ?
*✍🏽शोएबुल ईमान 7/328*

     हज़रते मुफ़्ती अहमद यार खान अलैरहमा इस हदीस क तहत फरमाते है : यानी मरते वक़्त उसके वारिसिन तो छोड़े हुए माल की फ़िक्र में होते है के क्या छोडे जा रहा है ? और फ़रिश्ते उसकी क़ब्ज़े रूह वगैरा के लिये आते है वो उसके आमाल व अक़ायद का हिसाब लगाते है।
*✍🏽मीरआतुल मनाजिह 7/84*
*✍🏽क़ब्र में आनेवाला दोस्त 13*
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खादिमे दिने नबी ﷺ, *मुहम्मद मोईन*
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*अहलो अयाल को अपना सबकुछ समझने वाले*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     हम दुन्या में तन्हा आए थे और तन्हा ही लौट जाएंगे, लेकिन इस दुन्या में हम तन्हा नही रहते बल्कि बहुत से अफ़राद मसलन माँ बाप, भाई बहन, बीवी बच्चे, अज़ीज़ों अक़ारिब क्र दोस्त अहबाब वगैरा हमारी ज़िन्दगी का हिस्सा होते है, वो हमारा और हम उनका ख़याल रखते है और रखना भी चाहिये क्यू के शरीअत ने भी इनके हुक़ूक़ बयान किये है।
     फित्रि तोर पर हमे इन से महब्बत होती है मगर अक्सर लोग अपने अहलो अयाल की महब्बत में ऐसा ग़ुम हो जाते है के फिर उन्हें क़ब्र याद रहती है न मैदाने महशर, जिसका नतीजा ये निकलता है के मुअज्ज़िन नमाज़ के लिये बुला रहा होता है मगर ये घर वालो से खुश गप्पियों में ऐसे मगन होते है के भरी महफ़िल छोड़ कर मस्जिद का रुख करने को इनका जी नही चाहता, इनके बच्चों का किसी के बच्चों से झगड़ा हो जाए तो अपनी औलाद का कुसूर होने के बा वुजूद मुआफ़ी मांगने के बजाए तू तुकार बल्कि मार धाड़ पर उतर आते है,
     शरीअत औरत से पर्दे का तकाज़ा करती है मगर ये अपने शोहर को राज़ी रखने के लिये बे पर्दगी का ईशतिहार बन कर रह जाती है, इसी तरह बाज़ नादान अपने घरवालो की फरमाइशें और ज़रूरतें पूरी करने के लिये माले हराम का वबाल भी अपने सर ले लेते है जो के सरासर क्षार का सौदा है।

*अपने आप को हलाकत में डालने वाला बद नसीब*
इन्शा अल्लाह अगली पोस्ट में....
*✍🏽क़ब्र में आनेवाला दोस्त 14*
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खादिमे दिने नबी ﷺ, *मुहम्मद मोईन*
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सिरते मुस्तफाﷺ


*_गज़्वए बनू नज़ीर_*
हिस्सा-02
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     हुज़ूरﷺ के साथ हज़रते अबू बक्र व हज़रते उमर व हज़रते अलीرضي الله تعالي عنهم भी थे। यहूदियो ने इन सब हज़रात को एक दिवार के निचे बड़े एहतिराम के साथ बिठाया और आपस में ये मशवरा किया कि छत पर से एक बहुत ही बड़ा और वज़्नी पथ्थर इन हज़रात पर गिरा दे ताकि ये सब लोग दब कर हलाक हो जाए।
     चुनांचे अम्र बिन जहाश इस मक़सद के लिये छत के ऊपर चढ़ गया, मुहाफ़िज़े हक़ीक़ी परवर दगारे आलम ने अपने हबीब को यहूदियो की इस नापाक साज़िश से बी ज़रीअए वही मुत्तलअ फरमा दिया इस लिये फौरन ही आपﷺ वहा से उठ कर चुपचाप अपने हमराहियों के साथ चले आए और मदीना तशरीफ़ ला कर सहाबए किराम को यहूदियो की इस साज़िश से आगाह फ़रमाया और अन्सार व मुहजीरिन से मशवरे के बाद उन यहूदियो के पास क़ासिद भेज दिया।
     तुम लोगो ने अपनी इस दसिसा कारी और क़ातिलाना साज़िश से मुआह्दा तोड़ दिया इस लिये अब तुम लोगो को दस दिन की मोहलत दी जाती है कि तुम इस मुद्दत में मदीने से निकल जाओ, इसके बाद जो शख्स भी तुम में का यहाँ पाया जाएगा क़त्ल कर दिया जाएगा।

बाक़ी कल की पोस्ट में..इन्शा अल्लाह
*✍🏽सिरते मुस्तफा, 297*
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*सिरते मुस्तफाﷺ*
*_गज़्वाए बनू नज़ीर_*
हिस्सा-03
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

    शनहशाहे मदीनाﷺ का ये फरमान सुन कर बनू नज़ीर के यहूदी जिला वतन होने के लिये तैयार हो गए थे मगर मुनाफ़िक़ों का सरदार अब्दुल्लाह इब्ने उब्य्य उन  यहूदियो का हामी बन गया और इस ने कहला भेजा कि तुम लोग हरगिज़ हरगिज़ मदीने से न निकलो हम दो हज़ार आदमियो से तुम्हारी मदद करने को तैयार है इसके इलावा बनू क़रिज़ा और बनू गतफन यहूदियो के दो ताक़त वर क़बिले भी तुम्हारी मदद करेंगे।
     बनू नज़ीर के यहूदियो को जब इतना बड़ा सहारा मिल गया तो वो शेर हो गए और उन्हों ने हुज़ूरﷺ के पास कहला भेजा कि हम मदीना छोड़ कर नही जा सकते आप के जो दिल में आए कर लीजिये।
     यहूदियो के इस जवाब के बाद हुज़ूरﷺ ने मस्जिदें नबवी की इमामत हज़रते इब्ने उम्मे मक्तूमرضي الله تعالي عنه के सिपुर्द फरमा कर खुद बनू नज़ीर का क़स्द फ़रमाया और उन यहूदियो के किल्ले का मुहासरा कर लिया ये मुहासरा 15 दिन तक क़ाइम रहा किला में बाहर से हर किस्म के सामानों का आना जाना बन्द हो गया और यहूदी बिलकुल ही महसूर व मजबूर हो कर रह गए मगर इन मौक़ा पर न तो मुनाफ़ीक़ो का सरदार अब्दुल्लाह बिन उब्य्य यहूदियो की मदद के लिये आया न बनू क़रिज़ा और बनू गतफान ने कोई मदद की।
   
चुनांचे इन दगाबाज़ों के बारे में क्या इरशाद फ़रमाया ये इन्शा अल्लाह कल की पोस्ट में...
*✍🏽सिरते मुस्तफा, 298*
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तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान


*_सूरए फातेहा_*
हिस्सा-01
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_शानें नज़ूल_*
     ये सूरत मक्कए मुकर्रमा या मदीनए मुनव्वरा या दोनों जगह उतरी.
     अम्र बिन शर्जील का कहना है कि नबीये करीम (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम – उन पर अल्लाह तआला के दुरुद और सलाम हों) ने हज़रत ख़दीजा(रदियल्लाहो तआला अन्हा – उनसे अल्लाह राज़ी) से फ़रमाया : मैं एक पुकार सुना करता हूँ जिसमें इक़रा यानी ‘पढ़ों’ कहा जाता है. वरक़ा बिन नोफि़ल को खबर दी गई, उन्होंने अर्ज़ किया : जब यह पुकार आए, आप इत्मीनान से सुनें.
     इसके बाद हज़रत जिब्रील ने खि़दमत में हाजि़र होकर अर्ज़ किया, फरमाइये: बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम. अल्हम्दु लिल्लाहे रब्बिल आलमीन- यानी अल्लाह के नाम से शुरु जो बहुत मेहरबान, रहमत वाला, सब खूबियाँ अल्लाह को जो मालिक सारे जहान वालों का.
     इससे मालूम होता है कि उतरने के हिसाब से ये पहली सूरत है मगर दूसरी रिवायत से मालूम होता है कि पहले सूरए इक़रा उतरी. इस सूरत में सिखाने के तौर पर बन्दों की ज़बान में कलाम किया गया है.    
     नमाज़ में इस सूरत का पढ़ना वाजिब यानी ज़रुरी है. इमाम और अकेले नमाज़ी के लिये तो हक़ीक़त में अपनी ज़बान से, और मुक्तदी के लिये इमाम की ज़बान से.
     सही हदीस में है इमाम का पढ़ना ही उसके पीछे नमाज़ पढ़ने वाले का पढ़ना है. कुरआन शरीफ़ में इमाम के पीछे पढ़ने वाले को ख़ामोश रहने और इमाम जो पढ़े उसे सुनेने का हुक्म दिया गया है.
     अल्लाह तआला फ़रमाता है कि जब क़ुरआन पढ़ा जाए तो उसे सुनो और खा़मोश रहो.
     मुस्लिम शरीफ़ की हदीस है कि जब इमाम क़ुरआन पढ़े, तुम ख़ामोश रहो. और बहुत सी हदीसों में भी इसी तरह की बात कही गई है.
     जनाजे़ की नमाज़ में दुआ याद न हो तो दुआ की नियत से सूरए फ़ातिहा पढ़ने की इजाज़त है. क़ुरआन पढ़ने की नियत से यह सूरत नहीं पढ़ी जा सकती.
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अब्लाक़ घोड़े सुवार

*क़ुरबानी के मसाइल*
*_गरीब को खाले लेने दीजिये_*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

सुवाल :
अगर कोई शख्स हर साल गरीबो को खाल देता हो, उस पर इंफिरादि कोशिश कर के अपने मदरसे या दीगर दीनी कामो के लिये खाल लेना और गरीबो को महरूम कर देना केसा है ?

जवाब :
अगर वाक़ई कोई ऐसा गरीब मुस्तहिक़ आदमी है जिस का गुज़ारा उसी खाल या ज़कात व फीत्रा पर मौक़ूफ़ है तो अब उस को मिलने वाले इन अतिय्यात की अपने इदारे के लिये तरकिब कर के उस गरीब को महरूम करने की हरगिज़ इजाज़त नही।
     आला हज़रत अलैरहमा फरमाते है : अगर कुछ लोग अपने यहाँ की खाले हाजत मन्द यतिमो, बेवाओं, मिस्कीनों को देना चाहे कि इन की सूरते हाजत रवाई यही है, उसे कोई वाइज़ (यानी वाइज़ कहने वाला) या मदरसे वाला रोक कर मदरसे के लिये ले ले तो ये उसका ज़ुल्म होगा।
*✍🏽फतावा रज़विय्या, 20/501*
*✍🏽अब्लाक़ घोड़े सुवार, 25*
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मदनी पंजसुरह

*दुन्या व आख़िरत में सआदत मंद*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     हज़रते अब्दुल्लाह बिन अम्र अल आसرضي الله تعالي عنه ने फ़रमाया : पाच आदते ऐसी है कि कोई इन्हें इख़्तियार कर ले तो दुन्या व आख़िरत में सआदत मंद हो जाए।

1 वक़्तन फ वक़्तन *لَآ اِلٰهَ اِلَّا اللّٰهُ مُحَمَّدٌ رَّسُوٍلُ اللّٰهِ* कहता रहे।

2 जब किसी मुसीबत में मुब्तला हो (मसलन बीमार या नुक़सान हो जाए या परेशानी की खबर सुने) तो *اِنّا لِلّٰهِ وَاِنَّٓ الَيْهِ رَاجِعُوْنَ* और  *لَا حَوْلَ وَلَا قُوَّةَ اِلَّا بِاللّٰهِ الْعَلِىْ الْظِيْمِ* पढ़े।

3 जब भी नेमत मिले तो शुक्राने में *الْحَمْدُ لِلّٰهِ رَبِّ الْعٰلَمِيْنَ* कहे।

4 जब किसी जाइज़ काम का आगाज़ करे तो *بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحْيْمِ* पढ़े।

5 जब गुनाह कर बेठे तो यु कहे اَسْتَغْفِرُ اللّٰهَ الْظِيْمَ وَاَتُوْبُ اِلَيْهِ*
(में अल्लाह से मग्फिरत तलब करते हुए उसकी तरफ तौबा करता हु।)
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 155*
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फुतूह अल ग़ैब

*ज़ातकी नफी मुखालिफते नफ्स:*
(हिस्सा 8)

 *بِسْــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ*

      इसलिये ऐसे काममें जलदी न करो। क्योंके के इसका मकसद, अन्जाम, खुदाकी मरज़ीका तुम्हें इल्हाम नहीं और ये भी पता नही के इसमें फितना, हिलाकत, मकर या इम्तेहान क्या चीज़ कारफरमा है। चुनान्चे उस वक्त तक सब्र से काम लो। जब अल्लाह तआला खुद ही फाइल हो जाए। जब सिर्फ फअले हककी कैफियत बाकी रेह जाएगी और तुम्हें “ताइदे हक” मिल जाएगी। ऐसे में अगर कोइ फित्ना पैश भी आए तो उसके शर (बदी-बुराइ) से तुम्हें मेहफूज़ कर दिया जाएगा। क्योंके खुदावंदे करीम अपनी मशीयत (किसमत) पर तुम्हारी पकड नहीं करेगा। बंदे को अज़ाब इसी सूरत में दिया जाता है, जब वो खुदाई कामोंमें दखल दे। अगर तुम विलायतकी रिफअतोंके खवाहिशमंद हो तो मुखलिफते नफस को शआर कर लो और अवामिर (एहकाम)की पैरवी में अपने आपको ढाल लो।
      ये पैरवी दो तरह से है। *पेहली किस्म* ये है के दुनिया के माल से खुरदोनोश के लिये सिर्फ बकद्रे किफायत लिया जाए। नफसकी लिज़्ज़तोंसे बचें और अपने ज़ाहिर और बातिन को गुनाहोंसे बचाऐं।
*दुसरी किस्म* ये है के अपने आपको बातिनी अमर(लाफानी, फरमान) पर माअमूर कर लें।
बाक़ी कल की पोस्ट में... इंसा अल्लाह

*✍🏽फुतूहल ग़ैब*  पेज 25
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Monday, 8 August 2016

अब्लाक़ घोड़े सुवार

*क़ुरबानी के मसाइल*
*_चंदे की रकम से इज्तिमाई क़ुरबानी के लिये गाए खरीदना_*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

सुवाल :
मज़हबी या फलाही इदारे के चंदे की रक़म से इज्तिमाई क़ुरबानी के लिये बेचने के वासिते गाए खरीदी जा सकती है या नही ?

जवाब :
चंदे की रक़म कारोबार में लगाना जाइज़ नही। इस के लिये चन्दा देने वाले से सराहतन यानी साफ़ लफ़्ज़ों में इजाज़त लेनी ज़रूरी है।
(जो इसकी इजाज़त दे सिर्फ उसी के चंदे की रक़म जाइज़ कारोबार में लगाई जा सकती है यु ही बिला इजाज़ते मालिक उसके दिये हुए चंदे की रक़म क़र्ज़ देने की भी इजाज़त नही)
*✍🏽अब्लाक़ घोड़े सुवार, 24*
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तफ़सीरे अशरफी


हिस्सा-60
*_सूरए बक़रह, पारह 01_*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*आयत ⑤⑨, तर्जुमह*
तो बदल डाला जिन्होंने ने अंधेर कर रखा था बात को उसकी दूसरी बोली से, जो सिखाई गई थी उन्हें। तो उतारा हमने उन पर, जिन्होंने अंधेर मचाया था, अज़ाबको आसमान से, के वो नाफ़रमानी करते जा रहे थे।

*तफ़सीर*
     मगर बनी इस्राइल शरारत पर उत्तर आये, तो इस वादा व करम से कोइ फायदा हासिल न किया। बल्कि सरकशी करते हुए बदल डाला हमारी बात को, हमारी तालीम के खिलाफ, उसकी दूसरी बोली से, जो सिखाई गई थी उन्हें।
     हुक्म हुआ था "हित्ततुन" का। वो मज़ाकियो की तरह "हिन्ततून" "हब्बतुन फि शअरतीन" (यानी गेहू, गेहू बालियोके दाने) बकने लगे। तो इस ना फ़रमानी पर उतारा अज़ाब हमने उन जालिमो पर, जिन्होंने इस किस्म का अंधेर मचाया था, जिससे 70,000 बनी इस्राइल मर गये।
    ये सज़ा इस लिये दी गई के वो ना फ़रमानी करते जा रहे थे। बार बार ना फ़रमानी करते जा रहे थे और हुक्म के खिलाफ चलते थे।
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मदनी पंजसुरह

*गीबत से बचने का मदनी फूल*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     हज़रते अल्लामा मजदुद्दीन फ़िरोज़आबादी अलैरहमा से मन्कुल है : जब किसी मजलिस में (यानी लोगो में) बैठो तो कहो :
*بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحْيْمِ وَصَلَّى اللّٰهُ عَلٰى مُحَمَّدٍ*
तो अल्लाह तुम पर एक फ़रिश्ता मुक़र्रर फरमा देगा जो तुम को गीबत से बाज़ रखेगा।
     और जब मजलिस से इथो तब भी यही कहो तो वो फ़रिश्ता लोगो को तुम्हारी गीबत से बाज़ रखेगा।

*✍🏽मदनी पंजसुरह, 154*
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फुतूह अल ग़ैब

*ज़ातकी नफी मुखालिफते नफ्स:*
(हिस्सा 7)

 *بِسْــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ*

     और अगर ऐसी बातकी तरफ इशारा हो जिसे कुर्आन-व-सुन्नतने हराम या मुबाह करार दिया बल्के तुम इसको समजते ही नही हो मसलन ये के किसी खास जगाह जा कर किसी खास आदमीसे मिलना जब के खुदा तआलासे हासिल करदाह इल्म व मआरिफत के हिसाब से तुम्हें वहां जा कर किसी मर्दे सालेह से मुलाकातकी ज़ुरूरत नहीं है तो इस सिलसिले में जल्दी न करो, तवक्कूफ (ढील) करो, दिलमें सोचो के क्या ये खुदाकी तरफ से इल्हाम है।
    इंतेजार करो, अगर हुकमे इलाही हुआ तो वही इल्हाम बार बार होगा। तुम्हें इस पर अमलका हुकम दिया जाएग। या कोइ एसी निशानी ज़ाहिर होगी जो आलमे बिल्लाह इन्सानों पर ज़ाहिर हुवा करती है, और साहबाने कुव्वत व इदराक औलिया व अब्दाल पर खुलती है।

बाक़ी कल की पोस्ट में... इंसा अल्लाह
*✍🏽फुतूहल ग़ैब*  पेज 24,25
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खादिमे दिने नबी ﷺ
 *फ़ैयाज़ सैय्यिद*
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Sunday, 7 August 2016

क़ब्र में आनेवाला दोस्त

*_हम किस पर महेरबान है?_*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     इंसान वफादार दोस्त का क़द्रदान और उसी पर ज़्यादा महेरबान होता है, इसी बात के पेशे नज़र हमे ज़्यादा अह्मिययत "क़ब्र व हशर में काम आने वाले दोस्त" यानी अमल को देनी चाहिये थी मगर अफ़सोस ! ऐसा नही है, हम में से कुछ लोग माल को ज़्यादा अहम समजते है हालांके ये उस वक़्त तक हमारा साथ देता है जब तक हमारी सासे बहाल है, आँखे बन्द होते ही हमे छोड़ कर हमारे वारिसों के पास चला जाता है और क़ब्र में फूटी कोडी भी हमारे साथ नही जाती क्यू के कफ़न में थैली होती है न क़ब्र में तिजोरी !
     ज़रुरिय्याते ज़िन्दगी की तकमील के लिये माल की अहमिय्यत से इनकार नही मगर आज हमारी ग़ालिब अक्सरिय्यत मालो दौलत की महब्बत में ऐसी गिरफ्तार है के ज़्यादा से ज़्यादा माल कमाने की धुन में हराम व ना जाइज़ ज़रिये इस्तिमाल किये जाते है मसलन रिशवत और सूद का लेन देन किया जाता है, ज़खीरा अन्दोज़ी की जाती है ज़मीनो पर क़ब्ज़े किये जाते है, लोगो के कर्जे दबाए जाते है, अमानत में खियानत की जाती है, चोरी की जाती है अल ग़रज़ तिजोरी को रुपयो पैसे, सोना चान्दी से भरने के लिये नामए आमाल को खूब गुनाहो से भरा जाता है।
     ऐसा करने वालो के दिलो दिमाग पर हिर्स व लालच का इतना गलबा हो जाता है के उन्हें ये एहसास तक नही होता के एक दिन सब यही छोड़ जाना है।
*✍🏽क़ब्र में आनेवाला दोस्त  12*
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खादिमे दिने नबी ﷺ, *मुहम्मद मोईन*
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अब्लाक़ घोड़े सुवार

*क़ुरबानी के मसाइल*
*_क़ुरबानी के गोश्त के 3 हिस्से_*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     क़ुरबानी का गोश्त खुद भी खा सकते है और दूसरे शख्स गनी या फ़क़ीर को दे सकता है खिला सकता है बल्कि इस में से कुछ खा लेना क़ुरबानी करने वाले के लिये मुस्तहब है।
     बेहतर ये है कि गोश्त के 3 हिस्से करे, एक हिस्सा फ़ुक़रा के लिये और एक हिस्सा दोस्तों व अहबाब के लिये और एक हिस्सा अपने घरवालो के लिये।
*✍🏽आलमगिरी, 5/300*
     अगर सारा गोश्त खुद ही रख लिया तब भी कोई गुनाह नही। आला हज़रत अलैरहमा फरमाते है : 3 हिस्से करना सिर्फ इस्तिहबाबी अम्र है कुछ ज़रूरी नही, चाहे तो सब अपने इस्तिमाल में कर ले या सब अज़ीज़ों करिबो को दे दे, या सब मसाकिन को बाट दे।
*✍🏽फतावा रज़विय्या, 20/253*

*_वसिय्यत की क़ुरबानी का गोश्त का मसअला_*
     मन्नत या मर्हुम की वसिय्यत पर की जाने वाली क़ुरबानी का सब गोश्त फ़ुक़रा और मसाकिन को सदक़ा करना वाजिब है, न खुद खाए न मालदारों को दे।
*✍🏽बहारे शरीअत, 3/345*
*✍🏽अब्लाक़ घोड़े सुवार, 23*
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सिरते मुस्तफाﷺ


*_गज़्वाए बनू नज़ीर_*
हिस्सा-01
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     हज़रते अम्र बिन उमय्या ज़मरीرضي الله تعالي عنه ने क़बिलए बनू किलाब के जिन दो शख्सों को क़त्ल कर दिया था और हुज़ूरﷺ ने उन दोनों का खून बहा अदा करने का एलान फरमा दिया था इसी मुआमले के मुतअल्लिक़ गुफ्तगू करने के लिये हुज़ूरﷺ क़बिलए बनू नज़ीर के यहूदियो के पास तशरीफ़ ले गए, क्यू की इन यहूदियो से आप का मुआह्दा था मगर यहूदी दर हक़ीक़त बहुत ही बद बातिन जेहनिययत वाली क़ौम है मुआह्दा कर लेने के बा वुजूद इन खबिशो के दिलो में मैगम्बरे इस्लाम की दुश्मनी और इनाद की आग भरी हुई थी।
      हुज़ूरﷺ इन बद बातीनो से अहले किताब होने की बिना पर अच्छा सुलूक फरमाते थे मगर ये लोग हमेशा इस्लाम की बेख कुनी और बानिये इस्लाम की दुश्मनी में मसरूफ़ रहे।
     मुसलमानो से बुग्ज़ो इनाद और कुफ्फार व मुनाफ़िक़ीन से साज़बाज और इत्तिहाद येही हमेशा इन गद्दारो का तर्ज़े अमल रहा।
चुनांचे इस मौके पर जब रसूलल्लाहﷺ उन यहूदियो के पास तशरीफ़ ले गए तो उन लोगो ने ब ज़ाहिर तो बड़े अख़लाक़ का मुज़ाहरा किया मगर अंदरुनी तौर पर बड़ी ही खौफनाक साजिश और इन्तिहाई खतरनाक स्किम का मन्सूबा बना लिया।

बाक़ी कल की पोस्ट में... انشاء الله
*✍🏽सिरते मुस्तफा, 296*
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तफ़सीरे अशरफी


हिस्सा-59
*_सूरए बक़रह, पारह 01_*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*आयत ⑤⑧, तर्जुमह*
और जब के हुक्म दिया हमने के दाखिल हो जाओ इस आबादी में। फिर खाते रहो उससे जहा चाहो बे खटके। और दाखिल हो दरवाज़े में सज्दा करते हुए, अर्ज़ करो मुआफ़ी हो। हम बख्श देंगे तुम्हे तुम्हारी खताओं को। और क़रीब  है के हम ज़्यादा दे ऐहसाँवालो को।

*तफ़सीर*
     और इस सफर का ये हिस्सा याद रखो के हज़रते मुसाका इरादा था के शहर "अरीहा" को, जिस पर क़ौमे आड़ मेसे बचे हुए "एमालेका" आबाद थे और "औज बिन उनुक" उनका हाकिम था, उसको बनी इसराइल फ़त्ह करके वहा से कुफ़्र को मिटा कर आबाद हो जाए और सरज़मीने शाम के हरियाले मैदानों में चैन करे।
     और ये भी इरादा था के शहर बैतूल मुक़द्दस में, जो उनका क़िबला था, हाज़िर हो और आज तक शाम के बदआमालि से जो खताए करते रहे है, उस पर मग्फिरत के तालिब हो।
     चुनांचे याद करो, जब के इस मन्शा को पूरा करने के लिये हुक्म दिया हमने के अय बनी इसराइल ! बेधड़क दाखिल हो जाओ इस शहर की आबादी में। फिर मालिमाना शान से खाते रहो उस की पैदावार से जिस वक़्त और जहां चाहो बे खटके। कोई रोक टॉक नही। और दाखिल हो तौबा के दरवाज़े में आजिज़ाना शक्ल में सज्दा करते हुए। और यु दुआ मांगो के "माफ़ी हो" यही लफ्ज़ कहो या इस्तिग़फ़ार ऐसी करो, बिस्मिल्लाह शरीफ, अल्माए तौहीद पढ़ो के तुम्हारी माफ़ी हो जाए। तुम्हारे इस अंदाज़े बंदगी को देख कर हम बख्श देंगे तुम्हे और माफ़ कर देंगे तुम्हारी खताओं को।
     इतना ही करम नहीं। बल्कि अगर तुम लोग सरापा इख्लास व पैकर एहसान (मुख्लिस और नेक) हो गए, तो हम ये करेंगे के और ज़्यादा करम फरमाएंगे। इसे याद रखो के क़रीब है के हम ज़यादा दे नेकी करने वालो को।
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खादिमे दिने नबी ﷺ *मुहम्मद मोईन*
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मदनी पंजसुरह

*चार करोड़ नेकिया कमाए*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     हमारे आक़ाﷺ ने फ़रमाया : जो शख्स ये कलिमात 10 मर्तबा कहे, ऐसे आदमी के लिये चार करोड़ नेकिया लिखी जाती है।

*اَشْهَدُ اَنْ لَّااِلٰهَ اِلَّااللّٰهُ وَحْدَهُ لَاشَرٍيْكَ لَهُ اِلٰهًا وَّاحِدًا صَمَدًا لَّمْ يَتَّخِذْ صَاحِبَةً  وَّلَاوَلَدًا وَّلَمْ يَكُنْ لَّهُ كُفُوًا اَحَدٌ o*

*✍🏽तिर्मिज़ी, 5/289*
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 153*
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फुतूह अल ग़ैब

*ज़ातकी नफी मुखालिफते नफ्स:*
(हिस्सा 6)

 *بِسْــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ*

     अपने हिस्सेको मख्लूक से अलाहेदा समज़ो, हुकमे इलाही बजा लाओ। किसी मआमले में खुद हुकमरान न बन बैठना। क्योंके हाकमियते असली अल्लाह तआलाकी है और क्योंके मख्लूक में तुम्हारी शमूलियत (शामिल) मुकद्दर हो चुकी है और मुकद्दर की तारीकी (अंधेरे) में किताब-व-सुन्नतकी रोशनी ले कर दाखिल होना ज़ुरूरि है। उस पर पूरी तरह अमल करना। अगर तुम्हारे दिलमें कोई वसवसा पैदा हो या इल्हामे राह (खुदा की तरफ से दिलमें आइ हुइ बात) पाए तो देखलो के वो कुर्आन-व-सुन्नतके मुताबिक है या नहीं।
     अगर ज़िना (बदकारी) करने, सूद लेने, फासिक फाजिर लोगोंसे तआल्लुकात उस्तेवार करने और इसी किस्मकी दूसरी तमन्नाऐं दिलमें जनम लें तो चूंके ये सब काम हराम है, इसलिये इनसे बचो। इस किसमके वसवसे-शैतान दिलोंमें पैदा करता है। इन्हें दिल-व-दिमागसे निकाल फेंको और किसी सूरत इन पर अमल न करो और जिन बातोंको कुर्आन व सुन्नतने मुबाह (हलाल) करार दिया है मसलन खाना, पीना, पेहनना, निकाह करना वगैरह तो इनसे भी ऐहतेराज़ (परहेज़) करो! क्योंके हाकीकतन ये भी नफसकी ख्वाहिशें हैं और तुम्हें नफस और उसकी ख्वाहिशोंकी मुखालेफत करनी है।

*✍🏽फुतूहल ग़ैब*  पेज ,24
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खादिमे दिने नबी ﷺ
 *फ़ैयाज़ सैय्यिद*
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Saturday, 6 August 2016

क़ब्र में आनेवाला दोस्त

*क़ब्र में आनेवाला दोस्त*
हिस्सा-03
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     फिर हुज़ूरﷺ ने मजीद इरशाद फ़रमाया : फिर वो शख्स अपने तीसरे भाई से कहे : यक़ीनन तुम भी मेरी हालत देख रहे हो और तुम ने मेरे अहलो अयाल व माल का जवाब सुन लिया है, बताओ तुम मेरे लिये क्या कर सकते हो ?
     वो उसे तसल्ली देते हुए कहे : मेरे भाई ! में तो क़ब्र में भी तुम्हारे साथ रहूंगा और तुम्हे वहशत से बचाऊंगा और जब यौमे हिसाब आएगा तो में तेरे मीज़ान में जा बैठूंगा और उसे वज़न दार कर दूंगा। ये उसका अमल है, इस के बारे में तुम्हारा क्या ख़याल है ?
     सहाबा ने अर्ज़ की या रसूलल्लाहﷺ ! ये तो बहुत अच्छा दोस्त है
     हुज़ूरﷺ ने फ़रमाया : यही हक़ीक़त है।
*✍🏽कन्जुल आमाल 10/318*

*_वफादार कौन_*
     आप ने देखा की हमारे आक़ा ﷺ
 ने एक आसान मिसाल के ज़रिए अमल की अह्मिययत को बयान फ़रमाया। यक़ीनन माल, अहलो अयाल और आमाल में से हमारा सब से वफादार  दोस्त *अमल* है जो क़ब्र व हशर में भी हमारा मददगार होगा।
*✍🏽क़ब्र में आनेवाला दोस्त 11*
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तफ़सीरे अशरफी


हिस्सा-58
*_सूरए बक़रह, पारह 01_*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*आयत ⑤⑦, तर्जुमह*
और साएबान किया हमने तुम पर सब्रको, और उतारा तुम पर मन्न और स्लवाको, के खाओ पाकीज़ा चीज़ों से, जो दिया हमने तुम्हे। और उन्होंने नही अंधेर में डाला हमको, लेकिन वो लोग खुद अपने को अंदर में डालते थे।

*तफ़सीर*
     और मिस्र से दोबारा निकल ने, दरिया से पार होने पर ये वाक़या का हिस्सा भी खास है के जब तुम लोग अय यहूदियो ! एक चटयल गरम मैदान में पहोंचे, जहां न कोई छाव था, न कुछ खाने को था। तुम इस सफर से युही गभराये हुए थे और मिस्र की जुदाई का दुःख रखते थे के फिरौनियो के बाद उस पर मुफ्तका कब्ज़ा कर चुके थे और चेन कर रहे थे।
     चुनांचे क़दम क़दम पर हज़रते मूसा से ऐसे सवालात करते तगेके किसी तरह ये सफर मुल्तवी हो जाए। इस अज़ाबि गरम चटयल मैदान को पाकर तुमको मौक़ा मिला के वापसी के लिये बहाना करो, के न यहाँ साया है, न कुछ खाने को है।
     चुनांचे तुमने ये केह भी डाला। और तुम्हारे उज़्र को खत्म करने के लिये हज़रते मूसा की दुआए छत की तरह मेहरबान किया हमने तुम लोगो के बाप दादाओ पर सुफेद रंग के बादल को। यु धुप से पनाह दी। और तुम्हारे खाने को कुछ न था, तो उतारा तुम लोगो के बाप दादाओ पर बे-मशक्कत की ग़िज़ा मन्न (तुरंजबिनि शिर्के की तरह एक चीज़, एक तरह की कुदरती शकर) और बटेर वगैरा की तरह सल्वा को इस हुक्म के साथ के खाओ और बस खाओ पाकीज़ा चीज़ों मन्न व सल्वा जो दिया हमने तुम्हे। और खाने के सिवा कुछ बचा कर न रखो। रोज़ जो मिले, खा जाया करो।
     हा ! सनीचर के दिन तुमको कुछ न मिलेगा। मगर जुमुआ को इतना मिलेगा के सनीचर के लिये रख दोगे, तो तुम्हारा काम चल जाएगा। और किसी दिन भी दूसरे दिन के लिये मत रखना।
     मगर अय यहूदियो ! तुमसे इस बारे में भी सब्र न हो सका और रोज़ाना जमा करना शुरू कर दिया, जो दूसरे दिन सड़ जाता था। और खाने के सड़ने की शुरुआत इन्ही सड़े हुए लोगो से हुई।
     बिल आखिर मन्न व सल्वा की नेअमते बगैर मेहनत की नेअमत से महरूम हो गए। कितनी बड़ी बात अंधेर की उनसे हुई। लेकिन हमारा क्या बिगड़ा। और सच ये है के उन्होंने इस हरकत से अंधेर में नही डाला हमको और वो हमें क्या नुकसान पहुचा सकते है ? लेकिन  हा ! वो लोग खुद अपने को अपने करतूत से अंधेर में डालते थे और खुद अपनी बनिको बिगाड़ ते थे।
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अब्लाक़ घोड़े सुवार

*क़ुरबानी के मसाइल*
*_इज्तिमाई क़ुरबानी का गोश्त वज़्न कर के तक़सीम करना होगा*_
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     अगर शिर्कत में गाय की क़ुरबानी कि तो ज़रूरी है कि गोश्त वज़्न कर के तक़सीम किया जाए, अंदाज़े से तक़सीम मरना जाइज़ नही, करेंगे तो गुनाहगार होंगे। बख़ुशी एक दूसरे को कम ज़्यादा मुआफ़ लार देना काफी नही।
*✍🏽बहारे शरीअत, 3/335*
     हा अगर सब एक ही घर में रहते है कि मिल कर ही बटेंगे और खाएंगे या शुरका अपना अपना हिस्सा लेना नही चाहते, ऐसी सूरत में वज़्न करने की हाजत नही।

*_अंदाज़े से गोश्त तक़सीम करने के दो हिले_*
     अगर शुरका अपना अपना हिस्सा ले जाना चाहते हो तो वज़्न करने की मशक्कत से बचने के लिये ये दो हिले कर सकते है :
     1 ज़बह के बाद इस गाय का सारा गोश्त एक ऐसे बालिग़ मुसलमान को हिबा (यानि तोहफ्तन मालिक) कर दे जो उन की क़ुरबानी में शरीक न हो और अब वो अंदाज़े से सब में तक़सीम कर सकता है।
     2 दूसरा हिला इस से भी आसान है जैसा कि फ़ुक़हाए किराम फरमाते है : गोश्त तक़सीम करते वक़्त उस में कोई दूसरी जीन्स (मसलन कलेजी मग्ज़ वगैरा) शामिल की जाए तो भी अंदाज़े से तक़सीम कर सकते है।
*✍🏽दुर्रेमुखतार, 9/527*
     अगर कोई चीज़ डाली है तो हर एक में से टुकड़ा टुकड़ा देना लाज़िम है। गोश्त के साथ सिर्फ एक चीज़ देना भी काफी है। मसलन, तिल्ली, कलेजी, सीरी पाए डाले है तो गोश्त के साथ किसी को तिल्ली दे दी, किसी को कलेजी का टुकड़ा, किसी को पाया, किसी को सीरी। अगर सारी चीज़ों में से टुकड़ा टुकड़ा देना चाहे तब भी हर्ज नहीं।
*✍🏽अब्लाक़ घोड़े सुवार, 22*
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मदनी पंजसुरह

*ईमान पर खातिमा के अवराद*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     एक शख्स बारगाहे *आला हज़रत* अलैरहमा में हाज़िर हो कर ईमान पर खातिमा बिलखैर के लिये दुआ का तालिब हुवा तो आप ने उस के लिये दुआ फ़रमाई और इरशाद फ़रमाया :
     रोज़ाना 41 बार सुब्ह को *يَا حَيُّ يَا قَيُّوْمُ لَٓا اِلَٓاهَ اِلَٓا اَنْتَ* (ऐ हमेशा ज़िन्दा रहने वाले ! ऐ हमेशा क़ाइम रहने वाले ! कोई मअबूद नही मगर तू) अव्वल आखिर दुरुद शरीफ।
     नीज़ सोते वक़्त अपने सब अवराद के बाद *सूरए काफिरुन* रोज़ाना पढ़ लिया कीजिये इस के बाद कलाम वगैरा न कीजिये हा अगर हो तो कलाम के बाद फिर सूरह तिलावत कर ले कि खातिमा इसी पर हो ان شاء الله खातिमा ईमान पर होगा।

     और 3 बार सुब्ह और 3 बार शाम इस दुआ का विर्द रखे
*اَللّٰهُمَّ اِنَّا نَعُوْذُبِكَ مِنْ اَنْ نُشْرِكَ بِكَ شَيْءًا نَّعْلَمُهُ وَنَسْتَغْفِرُكَ لِمَالَا نَعْلَمُهُ*
(ऐ अल्लाह ! हम तेरी पनाह मांगते है इससे कि जान कर हम तेरे साथ किसी चीज़ को शरीक करे और हम उससे इस्तिग़फ़ार करते है जिस को नही जानते।)

     *بِسْمِ اللّٰهِ عَلٰى دِيْنِىْ بِسْمِ اللّٰهِ عَلٰى نَفْسِىْ وَوُلْدِىْ وَاَهْلِىْ وَمَالِىْ*
(अल्लाह के नाम की बरकत से मेरे दिन, जान, औलाद और अहलो माल की हिफाज़त हो) सुब्ह व शाम 3-3 बार पढ़िये, दिन, ईमान, जान, माल, बच्चे सब महफूज़ रहे।
_नॉट : गुरुबे आफताब से सुब्ह सादिक़ तक रात और अधि रात ढ़ले से सूरज की पहली किरन चमकने रक सुब्ह है_
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 153*
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खादिमे दिने नबी ﷺ *मुहम्मद मोईन*
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फुतूह अल ग़ैब

*ज़ातकी नफी मुखालिफते नफ्स:*
(हिस्सा 5)

 *بِسْــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ*

      ईसके बावजूद मख्लूक की महोब्बत और कोशिश के उसूलको फरामोश नही करना चाहिये। अगर ये भूल बेठे तो फिरका जबरया (इस्लाम का एक फिरका जिसका एअतेकाद है के ईन्सान को अपने आअमाल-व-अफआल पर कोई ईख्तियार नही) में शामिल हो जाओगे। लेकिन ये अकीदा जुरूरी है के कोई काम कुदरते खुदावंदी के बगैर मुकम्मिल नहीं होता।
      खुदा को भूल कर मख्लूक को पूजने लगोगे। ये समजना के बंदा खुदा के बगैर खुद ही अपने ईरादे और फैअल का मालिक-व-मुख्तार है। कुफ्र है और फिरकए “कदरिय” (एक फिरका जो कज़ा-व-कद्रका मुंकर है) में शमुलियत (शालिम होना) पर दाल (आतिशी शोशेका अकस जिससे आग सुलगती है) हैं। दुरस्त अकीदा ये है के अफआलका खालिक अल्लाह है और ऊन्हे अंजाम देनेवाले बंदे है। जैसा के अजाब-व-सवाब के सिलसिले में बयान होनेवाली हदीससे वाज़ेह है, पस (इसलिये), एहकामे ,ताअमील-ज़ुरूरी है।
*✍🏽फुतूहल ग़ैब*  पेज ,23
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खादिमे दिने नबी ﷺ
 *फ़ैयाज़ सैय्यिद*
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Friday, 5 August 2016

क़ब्र में आनेवाला दोस्त

*क़ब्र में आने वाला दोस्त*
हिस्सा-02
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     हुज़ूरﷺ ने कलाम जारी रखते हुए इरशाद फ़रमाया : फिर वो अपने दुआरे भाई से कहे : तुम भी मेरी हालत देखरहे हो, मेरे लिये क्या कर सकते हो ?
     तो वो जवाब में कहेगा : में उस वक़्त तक तुम्हारा साथ दूंगा जब तक तुम ज़िन्दा हो, जू ही तुम दुन्या से रुखसत होंगे हमारे रस्ते जुदा हो जायेंगे क्यू के तुम क़ब्र में पहोच जाओगे और में यही दुन्या में रह जाऊंगा।
     आप ने सहाबा से फ़रमाया ये भाई अस्ल में उस शख्स का माल है, इसके बारे में तुम्हारा क्या ख़याल है ?
     सहाबा ने अर्ज़ की : या रसूलल्लाहﷺ ! हम इसमें भी अच्छा नहीं समजते।

बाक़ी कल की पोस्ट में..इन्शा अल्लाह
*✍🏽क़ब्र में आनेवाला दोस्त 11*
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अब्लाक़ घोड़े सुवार

*क़ुरबानी के मसाइल*
*_बकरी छुरी की तरफ देख रही थी_*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     नबीए करीमﷺ एक आदमी के क़रीब से गुज़रे, वो बकरी की गर्दन पर पाउ रख कर छुरी तेज़ कर रहा था और बकरी उसकी तरफ देख रही थी, आप ने इरशाद फ़रमाया : क्या तुम पहले ऐसा नही कर सकते थे ? क्या तुम इसे कई मौते मारना चाहते हो ? इसे लिटाने से पहले अपनी छुरी तेज़ क्यू न कर ली ?
*✍🏽मुस्तदरक, 5/327*
*✍🏽बहकी, 9/481*

*_ज़बह के लिये टांग मत घसीटो !_*
     हज़रते फारुके आज़मرضي الله تعالي عنه ने एक शख्स को देखा जो बकरी को ज़बह करने के लिये उसे टांग से पकड़ कर घसीट रहा है, आप ने इरशाद फ़रमाया : तेरे लिये खराबी हो, इसे मौत की तरफ अच्छे अन्दाज़ में ले कर जा।
*✍🏽अब्लाक़ घोड़े सुवार, 20*
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तफ़सीरे अशरफी


हिस्सा-57
*_सूरए बक़रह, पारह 01_*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*आयत ⑤⑥, तर्जुमह*
फिर उठाया हमने तुम्हे बाद तुम्हारी मौत के, के अब शुक्रगुज़ार हो।

*तफ़सीर*
     तुम तो इस क़बिल न थे के तुम पर तरस खाया जाता। मगर हज़रते मूसा को ख़याल आया के यहाँ से तन्हा क़ौम के पास जा कर क्या सूरत होगी ? उन्होंने इनकार की काफिराना धमकी का कुछ ख्याल न किया और रहमसे काम लेकर हाथ उठा कर दुआ की। ये दुआ मक़बूल बन्दे की दुआ थी। चुनांचे क़ुबूल हुई।
     फिर क्या था ? हज़रते मूसा के कहने से ज़िन्दा खड़ा कर दिया हमने तुमको बाद तुम्हरी मौत के, के बिलकुल मर चुके थे। हिकमत ये थी के अभी तक नेअमत की ना शुक्रि करते रहे हो, तो अब किसी तरह शुक्रगुज़ार हो जाओ।
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मदनी पंजसुरह

*सुब्ह व शाम के अज़्कार*
हिस्सा-02
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     हुज़ूरﷺ ने फ़रमाया : जिसने सुब्ह व शाम *سُبْحَانَ اللّٰهِ وَبِحَمْدِهٖ*  100 मर्तबा पढ़ा क़यामत के दिन उससे अफज़ल अमल ले कर आनेवाला कोई न होगा मगर वो जो उसकी मिस्ल कहे या उस से ज़्यादा पढ़े।
*✍🏽सहीह मुस्लिम, 1440*

     हज़रते अबू दरदाرضي الله تعالي عنه फरमाते है : की जिसने सुब्ह व शाम 7-7 मर्तबा *حَسْبِىَ اللّٰهُ لَآاِلٰهَ اِلَّاهُوَ عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ وَهُوَ رَبُّ الْعَرْشِ الْعَظِيْمِ*
*तर्जुमह :* मुझे अल्लाह काफी है उसके सिवा किसी की बंदगी नही में ने उसी पर भरोसा किया और वो बड़े अर्श का मालिक है।
     अल्लाह उसकी तमाम परेशानियो में किफायत करेगा।
*✍🏽सुनन इब्ने दाऊद, 4/416*

     नबीए करीमﷺ ने फ़रमाया : जो सुब्ह के वक़्त ये पढ़े
*رَضِيْتُ بِاللّٰهِ رَبًّا وَّبِالْاِسْلَامِ دِيْنًاوَّبِمُحَمَّدٍ نَبِيَّا*
*तर्जुमह :* में अल्लाह के रब होने और इस्लाम के दिन होने और हज़रत मुहम्मद के नबी होने पर राज़ी हु।
     तो में उसे अपने हाथ से पकड़ कर जन्नत में दाखिल करने की ज़मानत देता हु।
*✍🏽मजमउ जवाइद, 10/157*
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 149*
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फुतूह अल ग़ैब

*ज़ातकी नफी मुखालिफते नफ्स:*
(हिस्सा 4)

 *بِسْــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ*

     पस (इस लिये) नफ्सकी मुखालेफत ही में बेहतरी है। दरहकीकत नफ्सकी मुखालिफत करते हुवे लोगोंके हराम और मुशतबा (जिसमे शुबा न हो) मालसे इजतेनाबही परहेज़गारी है। न इनका एहसानमन्द हो न इन पर भरोसा करो और, न इन से डरो, न इनके पास जो कुछ थोडा बहोत है उसका लालच करो और न ज़कात, सदकात, कुफ्फारा, हदीया या नज़र के हुसूलकी तवक्को रख्खो।
     चुनान्चे खलकत से कोइ ख्वाहिशात हासिल करनेका कोइ इरादा न करो। यहा तक के किसी बासरवत रिश्तेदारकी वफात पर तुम्हें माल मिलनेकी उम्मीद हो तो उसकी रेहलतकी ख्वाहिश न करो और हर इम्कानी तरीके से मख्लूक से किनारा कर लो।
उन्हें उन दरवाज़ोंकी तरह समज़ो जो कभी खुलते कभी बंद होते है या उन दरख्तो की तरह जानो जो कभी फल देते है, कभी नही देते और यकीन जानो के ये सब अफआल अल्लाह तआला के फेअल और तदब्बुर (गौर करना) ही के बाईस अमलमें आते है के वही फाइले हकीकी है।

*✍🏽फुतूहल ग़ैब*  पेज 22,23
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 *फ़ैयाज़ सैय्यिद*
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Thursday, 4 August 2016

सिरते मुस्तफाﷺ


*_वाक़ीअए बीरे मुअव्वना_*
हिस्सा-03
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     हज़रते अम्र बिन उमय्या ज़मरीرضي الله تعالي عنه को आमिर बिन तुफैल ने ये कह कर छोड़ दिया कि मेरी माँ ने एक गुलाम आज़ाद करने की मन्नत मानी थी इस लिये में तुम को आज़ाद करता हु, ये कहा और इन की चोटी का बाल काट कर इनको छोड़ दिया।
     हज़रते अम्रرضي الله تعالي عنه वहा से चल कर जब मक़ामे "क़र क़रह" में आए तो एक दरख्त के साए में ठहरे वही क़बीलए बनु किलाब के दो आदमी भी ठहरे हुए थे। जब वो दोनों सो गए तो हज़रते अम्र ने उन दोनों काफिरो को क़त्ल कर दिया और ये सोचकर दिल में ख़ुश हो रहे थे कि मेने सहाबए किराम के खून का बदला ले लिया है।
     मगर उन दोनों शख्सों को हुज़ूरﷺ अमान दे चुके थे जिस का हज़रते अम्रرضي الله تعالي عنه को इल्म न था। जब मदीना पहुच कर इन्होंने ने सारा हाल दरबारे रिसालत में बयान किया तो असहाबे बीरे मुअव्वना की शहादत की खबर सुन कर सरकारे रिसालतﷺ को इतना अज़ीम सदमा पहुचा कि तमाम उम्र शरीफ में कभी भी इतना रन्ज व सदमा नही पहुचा था।
     चुनांचे हुज़ूरﷺ महीना भर तक क़बाइले रअल व जक्वान और असिय्या व बनु लहयान पर नमाज़े फज्र में लानत भेजते रहे और हज़रते अमرضي الله تعالي عنه्र ने जिन दो शख्सों को क़त्ल कर दिया था हुज़ूरﷺ ने उन दोनों के खुंन बहा अदा करने का एलान फ़रमाया।
*✍🏽बुखारी, 1/136*
*✍🏽सिरते मुस्तफा, 296*
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तफ़सीरे अशरफी


हिस्सा-56
*सूरए बक़रह, पारह 01*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*आयत ⑤⑤, तर्जुमह*
और जब तुम लोग बोले थे के अय मूसा ! हरगिज़ न मानेगे हम आपको, यहाँ तक के हम देख ले अल्लाह को एअलानीयह। पस पकड़ा तुम लोगोको कड़कती बिजली ने, और तुम देख रहे हो।

*तफ़सीर*
     और इस वाक़या का हम हिस्सा वो भी है जब अल्लाह के हुक्म से हज़रते मूसा ने 70 आदमियो को चुना था और उनसे रोज़ा रखवा कर, कपड़े पाक साफ़ कराने के बाद, कोहे तुर पर ले कर चले, के गाय पूजा के लिये माफ़ी मांगे। वहा पहोच ते ही एक बादल का पड़छाया खड़ा हो गया, जिसमे हज़रते मूसा दाखिल हो गए और उन 70 लोगो को भी बुलाया, जो उसमे दाखिल हुए और सजदे में गिर पड़े। हज़रते मूसा से अल्लाह ने कलाम फ़रमाया।
     उस वक़्त उनके चमकते चेहरे पर निगाह डालना बशरकी ताकत से बाहर था। लेहाज़ा पर्दा डाल दिया। अल्लाह के कलाम को सबने सुना, मगर अय यहूदियो ! कितनी बड़ी ये तुम्हारी शरारते आबाई (खानदानी बदमाशी) है के तुम लोग बोले थे के अय मूसा ! आज हम उस मकाम में है, जहा पहुच कर कोई आदमी दिलमे मान जानेके सिवा आपके खिलाफ शक भी उम्र भर नही कर सकता। मगर हम लोगों को पूछिए, तो साफ बात ये है के हरगिज़ न मानेगे हम आपको, यहाँ तक के अपनी इन्ही आँखों से इसी मुकाम पर अच्छी तरह हम देख ले अल्लाह को एअलानीयह, जेसे हम एक दूसरे को देखा करते है।
     ज़ाहिर है के कलामे इलाही सुन कर भी, हज़रते मूसा को न मानने की धमकी, आखरी दरजेकि मुजरिमाना बगावत और सरकशी थी। पस इस जुर्म की सज़ा में पकड़ा तुम लोगो को डरावनी, झुल्सा देने वाली बिजली ने, जिसमे पड़ कर तुम लोग इस तरह मर गये के एक एक मरते जा रहे हो और तुम एक दूसरे को मरते हुए देख भी रहे हो।
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मदनी पंजसुरह

*सुबह व शाम के अज़्कार*
हिस्सा-01
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     हज़रते अबू हुरैराرضي الله تعالي عنه से मारवी है कि एक शख्स बारगाहे रिसालत में हाज़िर हुआ और अर्ज़ किया : या रसूलल्लाहﷺ ! मेने ऐसा बिच्छु कभी नही देखा जिसने मुझे कल रात काटा। हुज़ूरﷺ ने इरशाद फ़रमाया : तुम ने शाम के वक़्त
*اَعُوْذُ بِكَلِمَاتِ اللّٰهِ التَّامَّاتِ مِنْ شَرِّمَاخَلَقَ*
*तर्जमह*
में अल्लाह के पुरे और कामिल कलिमात के साथ मख्लूक़ के शर से पनाह लेता हु।
क्यू न पढ़ लिया कि बिच्छु तुम्हे कोई नुकशान न पहुचता।

     हज़रते उष्मानرضي الله تعالي عنه से मरवी है कि हुज़ूरﷺ ने फ़रमाया : जो शख्स सुब्ह व शाम 3-3 मर्तबा ये पढ़ेगा, तो कोई चीज़ नुक़सान न पहुचा सकेगी।
*بَسْمِ اللّٓهِ الّذِىْ لَايَضَرُّ مَعَ اسْمِهٖ شَىْءٌ فِى الْاَرْضِ وَلَا فَى اسَّمَآءِ وَهُوَ السَّمِيْعُ الٍعَلِيْمُ*
*तर्जमह*
अल्लाह के नाम से जिस के नाम की बरकत से ज़मीन व आसमान की कोई चीज़ नुक़सान नही पहुचा सकती और वोही सुनता जानता है।
*✍🏽सुनन तिर्मिज़ी, 5/251*
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 148*
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फुतूह अल ग़ैब

*ज़ातकी नफी मुखालिफते नफ्स:*
(हिस्सा 3)

 *بِسْــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ*

      खुदावंदे करीम फरमाते है: “हर चीज़ खुदाकी हम्द सरा है और उसीकी तस्बीह करती है लेकिन तुम इस बातका शउर नहीं रखते”। नीज़ फरमाया: “खुदाने आसमानों और ज़मीनों से कहा के आमादगी से या गैर आमादगीसे बहरहाल मेरी इताअत करो,” उन्होने जवाब दिया के हम मुताबेअत(पैरवी) में हाज़िर है”।             लेहाज़ा इबादत की तकमील ये है के ख्वाहिशाते नफ्सकी मुखालेफत की जाए। अल्लाह करीमने फरमाया के नफ्से अम्मारा (बदीकी तरफ रगबत दिलानेवाले) की पैरवी न करो। के ये खुदाकी राह पे न चलने देगा।
     हज़रत दाउद अलैहिस्सलामसे भी फरमाया गया के, नफ्सानी ख्वाहिशात से ज़यादा राहे रास्तसे भटका देनेवाली कोइ चीज़ नहीं। इन्की पैरवी न कर और हज़रत बायज़ीद बुस्तामी रेहमतुल्लाह अलयहके मुताल्लिक मशहूर है के उन्होने खुदा तआला को खाव्बमें कहा के कोनसा रास्ता तुज़ तक पहोंचा देगा ?
जवाब मीला: नफ्स छोडकर।
     चुनांचे हज़रत बायज़ीद बुस्तामी फरमाते हैं मैंने अपने नफ्सको इस तरह छोड दिया जिस तरह सांप केंचली उतार फेंकता हैं।

*✍🏽फुतूहल ग़ैब*  पेज 22
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Wednesday, 3 August 2016

क़ब्र में आनेवाला दोस्त


हिस्सा-01
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     उम्मुल मुअमिनिन हज़रते आइशा सिद्दीक़ाرضي الله تعالي عنها से मारवी है के, हुज़ूरﷺ ने सहबए किराम से दरयाफ़्त फ़रमाया : तुम जानते हो के तुम्हारी, तुम्हारे अहलो अयाल,  माल और आमाल की मिसाल केसी है ? अर्ज़ की अल्लाह और उसका रसूल बेहतर जानते है।
     इरशाद फ़रमाया : तुम्हारी, तुम्हारे अहलो अयाल, माल और आमाल की मिसाल उस शख्स की तरह है जिस के 3 भाई हो, जब उसकी मौत का वक़्त क़रीब आए तो वो अपने तीनो भाइयो को बुलाए और एक से कहे :
"तुम मेरी हालत देख रहे हो, ये बताओ के तुम मेरे लिये क्या कर सकते हो ?
वो जवाब दे : में तुम्हारे लिये इतना कर सकता हु के फिलहाल तुम्हारी तिमार दारी करू, तुम्हारे साथ रह कर तुम्हारी हाजत व जरूरियात को पूरा करू फिर जब तुम्हारा इंतिक़ाल हो जाए तो तुम्हे गुस्ल दे कर कफ़न पहनाऊँ और तुम्हे दफन कर के वापस आउ, और तुम्हारे बारे में कोई पूछे तो तुम्हारी भलाई बयान करू।
ये भाई दर हक़ीक़त उस शख्स के अहलो अयाल है।
     ये फरमाने के बाद हुज़ूरﷺ ने सहाबए किराम से पूछा : इसके बारे में तुम्हारा क्या ख्याल है ? अर्ज़ की : या रसूलल्लाहﷺ ! हम इसमें कोई भलाई नहीं पाते

बाक़ी कल की पोस्ट में..इन्शा अल्लाह
*✍🏽क़ब्र में आने वाला दोस्त 9*
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सिरते मुस्तफाﷺ


*_वाक़ीअए बीरे मुअव्वना_*
हिस्सा-02
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     यहाँ हज़रते सहाबए किराम बीरे मुअव्वना के पास बहुत देर तक हज़रते हिरामرضي الله تعالي عنه की वापसी का इंतज़ार करते रहे मगर जब बहुत ज़्यादा देर हो गई तो ये लोग आगे बढ़े।
     रस्ते में आमिर बिन तुफैल की फ़ौज का सामना हुवा और जंग शुरू हो गई कुफ्फार ने हज़रते अम्र बिन उमय्या ज़मरीرضي الله تعالي عنه के सिवा तमाम सहाबए किराम को शहीद कर दिया, इन्ही शुहदाए किराम में हज़रते आमिर बिन फुहैराرضي الله تعالي عنه भी थे। जिसके बारे में आमिर बिन तुफैल का बयान है की क़त्ल होने के बाद इन की लाश बुलन्द हो कर आसमान तक पहुची फिर ज़मीन पर आ गई, इस के बाद इनकी लाश तलाश करने पर भी नही मिली क्यू की फरिश्तों ने इन्हें दफ़्न कर दिया।
*✍🏽बुखारी 2/587*
*✍🏽सिरते मुस्तफा 295*
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अब्लाक़ घोड़े सुवार

*क़ुरबानी के मसाइल*
*_ज़बिहा को आराम पहुँचाइये_*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     हज़रते सद्दाद बिन औसرضي الله تعالي عنه से रिवायत है कि नबीﷺ ने फ़रमाया : अल्लाह ने हर चीज़ के साथ नेकी करने का हुक्म दिया है, लिहाज़ा जब तुम किसी को क़त्ल करो तो अहसन (यानी बहुत अच्छे) तरीके से क़त्ल करो और जब तुम ज़बह करो तो अहसन (यानी खूब उम्दा) तरीके से ज़बह करो और तुम अपनी छुरी को अच्छी तरह तेज़ कर लिया करो और ज़बिहा को आराम दिया करो।
*✍🏽सहीह मुस्लिम, 1080*

     ब वक़्ते ज़बह रिज़ाए इलाही की निय्यत से जानवर पर रहम खाना कारे षवाब है जैसा कि एक सहाबी ने बारगाहे रिसालत में अर्ज़ की : या रसूलल्लाह ! मुझे बकरी ज़बह करने पर रहम आता है। फ़रमाया : अगर उस पर रहम करोगे अल्लाह भी तुम पर रहम फ़रमाएगा।
*✍🏽इमाम अहमद बिन हम्बल, 5/304*
*✍🏽अब्लाक़ घोड़े सुवार, 18*
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फुतूह अल ग़ैब

*ज़ातकी नफी मुखालिफते नफ्स:*
(हिस्सा 2)

 *بِسْــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ*

      जिस तरह अल्लाहने हज़रत दाउद अलैहिस्सलामको फरमाया: अय दाउद! मै तुम्हारा चाराहसाज़ हूं। तुम अपने चाराहसाज़से तआल्लुक महकम (मजबूत) कर लो और ये इसी सूरत में होगा जब नफ्ससे अदावत को शआर कर लो। इसी तरह खालिक-व-मालिकसे तुम्हारी दोस्ती और उसकी बंदगी साबित होगी। तुम्हें पाकिज़ा हिस्से मिलेंगे, तुम अज़ीज़-व-मोहतरम बन जाओगे और चीज़ें तुम्हारी ताबेअ और खिदमतगुज़ार हो जाएगी। इसलिये के हर चीज़ उसके ताबेअ है। उसने हर चीज़ को पैदा कीय, वही हर चीज़ को दुबारा पैदा करेगा। हर चीज़ उसके माअबूद होने का इकरार करती है।

*✍🏽फुतूहल ग़ैब*  पेज 22
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खादिमे दिने नबी ﷺ
 *फ़ैयाज़ सैय्यिद*
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तफ़सीरे अशरफी

हिस्सा-55
*_सूरए बक़रह, पारह 01_*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*आयत ⑤④, तर्जुमह*
और जब के कहा मूसा ने अपनी क़ौम के लिये के अय मेरी क़ौम ! बेशक तुमने अंधेर कर दिया खुद अपने लिये अपने बूत बना लेने से गाय को। तो मुतवज्जेह हो जाओ अपने पैदा करनेवाले की तरफ, के क़त्ल कर डालो अपनों को। ये बेहतर है तुम्हारे लिये तुम्हारे पैदा करनेवाले के नज़दीक। पद तौबा क़ुबूल फरमा ली तुम्हारी। बेशक वही तौबा फरमाने वाला बख्शने वाला है।

*तर्जुमह*
     और इस वाक़ीए का एक टुकड़ा ये भी है के जब के कफे तुर से वापसी पर गाय पूजा देखि थी, तो कहा था मूसा ने अपनी क़ौम के फायदे के लिये और ऐलान किया था के अय मेरी क़ौम ! बेशक तुमने बहोत बड़ा अंधेर कर दिया खुद अपने लिये किसीका कुछ न बिगड़ा, खुद तुम्हारा बिगड़ा, तुम्हारे अपने बूत बना केने से गाय को। ऐसा मुश्रिकाना जुर्म कर डाला है। तो इसके सिवा नजात की कोई सूरत नही के मुतवज्जेह हो जाओ अपने पैदा करनेवाले अल्लाह की तरफ, सच्चे दिलसे तौबा करो और उसके हुक्म के सामने गर्दन डालदो (के क़त्ल कर डालो) अपने हाथ में तलवार ले कर खुद अपनों को। हर बूत परस्त गर्दन झुक कर खड़ा हो जाए और जो इस जुर्म में न था, वो गर्दन कटता चला जाए।
     तौबा का ये तरीका रह गया है जो निहायत बेहतर है तुम्हारे लिये। इसीमे तुम्हारा भला है। किसी दूसरे का नही, बल्कि खुद तुम्हारे पैदा करनेवाले के नज़दीक। क्यू के ईमान लाने के बाद तुम गाय पूजा में सबब मुर्तद हो चुके। और मुर्तद की सज़ा अल्लाह के नज़दीक, तौबा करने के साथ साथ क़त्ल है। (हज़रते मूसा की शरीअत में मुर्तद की सज़ा तौबा के साथ क़त्ल थी)
     चुनांचे मुजरिमो ने ऐसा ही किया और दो जानू बैठ कर गर्दन झुक दी और क़त्ले आम होता रहा। मगर किसीने सर न उठाया, न जुम्बिश की। यहाँ तक के 70,000 को उन 12,000 ने जो हज़रते हारून के साथी थे और गाय पूजा में शरीक न थे, उन्होंने क़त्ल कर डाला, इस मन्ज़र से हज़रते मूसा व हज़रते हारून के रहमो करम में जोश आ गया। हाथ उठा कर दुआ की के अल्लाह अब बचे हुओ पर रहम फरमा।
     पस बनी इस्राइल के इस तौबाके अंदाज़ और हज़रते मूसा व हारून की दुआ की ब दौलत तौबा क़ुबूल फरमा ली तुम्हारी अल्लाह ने। क़त्ल होने वालो को शहीद का दर्ज़ा बख्शा और जो बच गए, उन्हें माफ़ फरमा दिया और बख्श दिया। बेशक वही अल्लाह तौबा क़ुबूल फर्मानेवाला, बख्शनेवाला है। जिसकी तौबा वो न क़ुबूल फरमाए, तो फिर कौन क़ुबूल करे ? और जिसकी तौबा वो क़ुबूल फरमाए, उसे कोई रद नही कर सकता।
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मदनी पंजसुरह

*बेदार होते वक़्त के अवराद*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     हमारे आक़ाﷺ ने फ़रमाया कि जिस ने नींद से बेदार हो कर कहा :
*لَآ اِلٰهَ اِلَّا اللّٰهُ وَحْدَهُ لَاشَرِيْكَ يْكَ لَهُ لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ وَهُوَ عَلٰى كُلِّ شَىْءٍ قَدِيْرٌ، اَلْحَمْدُ لِلّٰهِ وَسُبْحَانَ اللّٰهِ وَلٰآ اِلٰهَ اِلَّا اللّٰهُ وَاللّٰهُ اَكْبَرُ وَلَا حَوْلَ وَلَا قُوَّةَ اِلَّا بِاللّٰهِ*
*तर्जमह :* अल्लाह के सिवा कोई मअबूद नही वो तन्हा है उसका कोई शरीक नही, उसी की बादशाही है और उसी की खुबिया और वो हर चीज़ पर क़ुदरत रखता है, अल्लाह पाक है और अल्लाह खूबियों वाला है और अल्लाह के सिवा कोई मअबूद नही, और अल्लाह सबसे बड़ा है और गुनाह से बचने की क़ुव्वत और नेकी करने की ताक़त अल्लाह ही की तरफ से हासिल होती है।
     फिर *اَللّٰهُمَّ اغْفِرْلِى*  कहा या कोई दुआ मांगी तो उसे क़बूल कर लिया जाएगा, फिर अगर वुज़ू किया और नमाज़ पढ़ी तो उस की नमाज़ क़बूल कर ली जाएगी।
*✍🏽सहीह बुखारी, 1/391*

     अल्लाह के महबूबﷺ ने फ़रमाया : जिसने नींद से बेदार होते वक़्त
*بِسْمِ اللّٰهِ، سُبْحَانَ اللّٰهِ، اٰمَنْتُ بِاللّٰهِ وَكَفَرْتُ بِالْجِبْتِ وَالطَّاغُوْتِ*
*तर्जमह :* अल्लाह के नाम से, अल्लाह पाक है, में अल्लाह पर ईमान लाया और बूत और शैतान से मुन्किर हुवा।
10 मर्तबा पढ़ा तो हर गुनाह से बचा लिया जाएगा जिस का उसे खौफ हो और कोई गुनाह उस तक न पहुच सकेगा।
*✍🏽मजमउल जवाइद, 10/174*

     *اَلْحَمْدُ لِلّٰهِ الَّذِىْٓ  اَحْيَانَا بَعٍدَمَآ اَمَاتَنَا وَاِلَيْهِ النُّشُوْرُ o*
*तर्जमह :* तमाम तारीफ़ अल्लाह के लिये जिसने हमे मौत (नींद) के बाद हयात (बेदारी) अता फ़रमाई और हमे उसी की तरफ लौटना है।
*✍🏽सहीह बुखारी, 4/192*
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 147*
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Tuesday, 2 August 2016

मुर्दे की बेबसी

*जहन्नम का तोशा*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     हज़रते अब्दुल्लाह इब्ने मसऊदرضي الله تعالي عنه से रिवायत है कि बन्दा जो हराम माल कमाएगा अगर खर्च करेगा तो उस में बरकत न होगी और अगर सदक़ा करेगा तो वो मक़बूल नही होगा और अगर उसको पीठ के पीछे छोड़ कर मर जाएगा तो वो उस के लिये जहन्नम का तोशा बन जाएगा।
*✍🏽मसनद इमाम अहमद 2/34*

*_सुन्नत की बहारे_*
     मीठे मीठे इस्लामी भाइयो ! होश में आइये ! गफलत से बेदार हो जाइए ! झटपट गुनाहो से तौबा कर लीजिये, फिरंगी तहज़ीब से पीछा छुडाइये, मुस्तफा की सुन्नते अपनाइए, अपनी इस्लाह के साथ साथ दुसरो की इस्लाह का भी ज़ेहन बनाइये, नेकी की दावत की खातिर मर मिटने का जज़्बा पैदा कीजये, जान व माल और वक़्त सब कुछ सुन्नत के लिये क़ुरबान करने माँ ज़ौक़ बढाइये और नियत फरमाइये कि
*मुझे अपनी और सारी दुन्या के लोगो की इस्लाह की कोशिश करनी है, انشاء اللّه عزوجل*

*✍🏽मुर्दे की बेबसी 21*
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40 फरमाने मुस्तफा

*निय्यत की अहमिय्यत*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     हुज़ूर ﷺ ने इर्शाद फ़रमाया : आ'माल का दारो मदार निय्यत पर है।
     मीठे मीठे इस्लामी भाइयो ! इस हदिष से मालुम हुआ की आ'माल का षवाब निय्यत पर ही है. बगैर निय्यत किसी अ'मल पर षवाब का हक़ नहीं।
     आ'माल अ'मल की जमा है और इसका इत्लाक़ आ'जा, ज़बान और दिल तीनो के अफआल पर होता है, और यहा आ'माल से मुराद आ'माले सालिहा (नेक आ'माल) और जाइज़ अफआल है।
     निय्यत लुग्वि तौर पर दिल के पुखता इरादे को कहते है और शरअन इबादत के इरादे को निय्यत कहा जाता है।

*इबादत की दो किस्मे है*
*_1 मक़सूद_*
     जौसे नमाज़, रोज़ा इनसे मकसूद हुसुले षवाब है इन्हें अगर बिगैर निय्यत अदा किया जाए तो ये सहीह न होंगे इसलिये की इन से मक़सूद षवाब था और जब षवाब मफकुद हो गया तो इस की वजह से अस्ल शै ही अदा न होगी।
*_2 गैर मक़्सूदा_*
     वो जो दूसरी इबादतों के लिये ज़रिया हो जेसे नमाज़ के लिये चलना, वुज़ु, गुस्ल वगैरा। इन इबादतें गैर मक़्सूदा को अगर कोई निय्यते इबादत के साथ करेंगा तो उसे षवाब मिलेगा और अगर बिला निय्यत करेगा तो षवाब नहीं मिलेगा मगर इनका ज़रिया या वसीला बनना अब भी दुरुस्त होगा और इनसे नमाज़ सहीह हो जाएगी।
*✍🏽माखुज़ अज़ नूज़हतुल कारी सहीहुल बुखारी, 1/226*
*✍🏽40 फरमाने मुस्तफा, स. 10-11*
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सिरते मुस्तफाﷺ


*_वाक़ीअए बीरे मुअव्वना_*
हिस्सा-01
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     माहे सफर सि.4 हि. में "बीरे मुअव्वना" का मशहूर वाक़या पेश आया। अबू बराअ आमिर बिन मालिक जो अपनी बहादुरी की वजह से "बरछियो से खेलने वाला" कहलाता था, बारगाहे रिसालत में आया, हुज़ूरﷺ ने उस को इस्लाम की दावत दी, उस ने न तो इस्लाम क़बूल किया न इस से कोई नफरत ज़ाहिर की बल्कि ये दरख्वास्त की, कि आप अपने चन्द मुन्तख़ब सहाबा को हमारे दीयार में भेज दीजिये मुझे उम्मीद है कि वो लोग इस्लाम की दावत क़बूल कर लेंगे।
     आपﷺ ने फ़रमाया कि मुझे नज्द के कुफ्फार की तरफ से खतरा है। अबू बराअ ने कहा कि में आप के असहाब की जान व माल की हिफाज़त का ज़ामिन हु।
     इसके बाद हुज़ूरﷺ ने सहाबा में से 70 मुन्तख़ब सालिहीन को जो "कुर्रा" कहलाते थे भेज दिया। ये हज़रात जब मक़ामे "बीरे मुअव्वना" पर पहुचे तो ठहर गए और सहाबा के काफिला सालार हज़रते हिराम बिन मल्हानرضي الله تعالي عنه हुज़ूरﷺ का खत ले कर आमिर बिन तुफैल के पास अकेले तशरीफ़ ले गए जो क़बीले का रईस और अबू बराअ का भतीजा था। उसने खत को पढ़ा भी नही और एक शख्स को इशारा कर दिया जिसने पीछे से हज़रते हिरामرضي الله تعالي عنه को नेजा मार कर शहीद कर दिया।
    और आस पास के क़बाइल यानी रअल व जक्वान और असिय्या व बनू लहयान वगैरा को जमा करके एक लश्कर तैयार कर लिया और सहाबए किराम पर हमले के लिये रवाना हो गया।

बाक़ी कल की पोस्ट में..इन्शा अल्लाह
*✍🏽सिरते मुस्तफा, 294*
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अब्लाक़ घोड़े सुवार

*क़ुरबानी के मसाइल*
*_जानवरो पर रहम की अपील_*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     गाय वगैरा को गिराने से पहले ही किब्ले का तअय्युन कर लिया जाए, लिटाने के बाद बिल खुसुस पथरीली ज़मीन पर घसीट कर कीब्ला रुख करना बे ज़बान जानवर के लिये सख्त अज़िय्यत का बाइस है। ज़बह करने में इतना न काटे कि छुरी गर्दन के मोहरे (हड्डी) तक पहुच जाए कि ये बे वजह की तकलीफ है,
     फिर जब तक जानवर मुकम्मल तौर पर ठन्डा न हो जाए न उस के पाउ काटे न खाल उतारे, ज़बह कर लेने के बाद जब रूह न निकल जाए छुरी न ही कटे हुए गले पर मस (touch) करे न ही हाथ।
     बाज़ कस्साब जल्द ठन्डा करने के लिये ज़बह के बाद तड़पती गाय की गर्दन की ज़िन्दा खाल उधेड़ कर छुरी घोप कर दिल की रगे काटते है, इसी तरह बकरे को ज़बह करने के फौरन बाद बेचारे की गर्दन चटखा देते है, बे ज़बानों पर इस तरह कि बिला वजह इज़ा पहुचाने वाले को रोके। अगर बा वुजुदे कुदरत नही रोकेगा तो खुद भी गुनहगार और जहन्नम का हक़दार होगा।
     जानवर पर ज़ुल्म करना ज़िम्मी काफिर और (अब दुन्या में सब काफिर हर्बि है) ज़ुल्म करने से ज़्यादा बुरा है और ज़िम्मी पर ज़ुल्म करना मुस्लिम पर ज़ुल्म करने से भी बुरा है क्यू की जानवर का कोई मुईन व मददगार अल्लाह के सिवा नही इस गरीब को इस ज़ुल्म से कौन बचाए।
*✍🏽दुर्रेमुखतार व रद्दलमोहतर, 9/662*
*✍🏽अब्लाक़ घोड़े सुवार, 15*
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तफसीरे अशरफी


हिस्सा-54
*_सूरए बक़रह, पारह 01_*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*आयत ⑤③, तर्जुमह*
और जबकि दी हमने मूसा को किताब और हक़-नाहक़ का इम्तियाज़, के तुम लोग अब राहे रास्ता पर आ जाओ।

*तफ़सीर*
     ऐ यहूदियो ! इस सिलसिले में उस वाक़या को याद करो जब के दी थी हमने कोहे तुर पर बुला कर मूसा को किताब तौरेत, जिसमे हिदायत व गुमराही की तफ़सील है और हक़ नाहक़ का फर्क है के अभी तक तुम लोग भटकते रहे हो, तो अब राहे रास्ता पाकर इस पर आ जाओ।
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मदनी पंजसुरह

*जन्नत का दरवाज़ा*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     हुज़ूरﷺ ने फ़रमाया : क्या में तुम्हे जन्नत के दरवाज़े में से एक दरवाज़े के बारे में न बताऊ ? अर्ज़ की गई : वो क्या है ? इरशाद फ़रमाया : *"لَا حَوْلَ وَلَا قُوَّةَاِلَّابِاللّٰهٍ"*

*_99 बीमारियो के लिये दवा_*
     हुज़ूरﷺ ने फ़रमाया : जिसने *"لَا حَوْلَ وَلَا قُوَّةَاِلَّابِاللّٰهٍ"* कहा तो ये उसके लिये 99 बीमारियो की दवा है उन में सब से हल्की बीमारी रंजो अलम है।

*_नेअमत की हिफाज़त_*
     हुज़ूरﷺ ने फ़रमाया : जिसे अल्लाह ने कोई नेअमत अता फ़रमाई फिर वो बन्दा उन नेअमत को बाक़ी रखना चाहता हो तो उसे चाहये कि *"لَا حَوْلَ وَلَا قُوَّةَاِلَّابِاللّٰهٍ"* की कसरत करे।
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 145*
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फुतूह अल ग़ैब

*ज़ातकी नफी मुखालिफते नफ्स:*
(हिस्सा 1)

*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

      मेहबूबे सुबहानी शेख अब्दुलकादर जीलानी رضي الله تعالي عنه ने फरमाया-सूरत ये है के सब चीजे खुदाकी ताबेअ है। चुनांचे तुम्हारा नफस भी अल्लाह तआला की मख्लूक और मिल्कीयत है। लेकिन ख्वाहिशो, लिज्जतो और शेहवतो और अस्बाबे तकब्बुर की वजह से खुदा का दुश्मन और मुखालिफ है। इसलिये जब तुम खुदा की ईताअत के लिये नफस की मखालेफत करो, तो गोया खुदा के लिये नफस के दुस्मन हो जाओगें।

*✍🏽फुतूहल ग़ैब*  पेज 21
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Monday, 1 August 2016

मुर्दे की बेबसी

*वादा खिलाफी का वबाल*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     जो लोग बात बात पर वादा कर लेते है मगर बिला उज़्रे शरई पुरन्हि करते उन के लिये मक़ामे गौर है।
     हुज़ूरﷺ ने फ़रमाया : को किसी मुसलमान से वादा खिलाफी करे उस पर अल्लाह और फरिश्तों और तमाम इंसानो की लानत है और उस का कोई फ़र्ज़ क़बूल न होगा और न ही नफ्ल।
*✍🏽बुखारी 1/616*

*_पेट में सांप_*
     हुज़ूरﷺ ने फ़रमाया : मेराज की रात मुझे एक ऐसी क़ौम के पास सेर कराई गई  की उनके पेट कोढ़रियो के मिस्ल थे जिन में सांप भरे थे, जो पेट के बाहर से नज़र आ रहे थे। मेने पूछा ऐ जिब्राईल ! ये कौन लोग है ? उन्हों ने कहा ये सूद खाने वाले है।
*✍🏽इब्ने माजह 3/71*

*_36 बार ज़िना से बुरा_*
     हुज़ूरﷺ ने फ़रमाया : सूद का एक दिरहम जान बुझ कर खाना 36 मर्तबा ज़िना करने से भी ज़्यादा सख्त और बड़ा गुनाह है।
*✍🏽सुनन दाऊद 3/19*
*✍🏽मुर्दे की बेबसी 20*
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खादिमे दिने नबी ﷺ *मुहम्मद मोईन*
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40 फरमाने मुस्तफा

*दस रहमते*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     हज़रते अबू हुरैरा رضي الله تعالي عنه से मरवी है की नबिय्ये मुकर्रम ﷺ का फरमाने मुश्कबार है : जिसने मुझ पर एक बार दुरुदे पाक पढ़ा, अल्लाह عزوجل उस पर दस रहमते भेजेगा और उसके दस गुनाह मुआफ़ किये जाएंगे और उस के दस दरजे बुलंद किये जाएंगे।

     मीठे मीठे इस्लामी भाइयो ! मालुम हुआ की एक दुरुदे पाक में तिन फायदे है।
_दस रहमते_
_दस गुनाह की मुआफ़ी_
_दस दरजे की बुलंदी_
*✍🏽40 फरमाने मुस्तफा, 9*
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सिरते मुस्तफाﷺ


*_हज़रते ज़ैद की शहादत_*

     हज़रते ज़ैद बिन दषीनाرضي الله تعالي عنه के क़त्ल का तमाशा देखने के लिये कुफ़्फ़ारे कुरैश कशिर तादाद में जमा हो गए जिन में अबू सुफ़यान भी था। जब इन को सूली पर चढ़ा कर क़ातिल ने तलवार हाथ में ली तो अबू सुफ़यान ने कहा की क्यू ? ऐ ज़ैद ! सच कहना, अगर इस वक़्त तुम्हारी जगह मुहम्मद इस तरह क़त्ल किये जाते तो क्या तुम इस को पसन्द करते ?
     हज़रते ज़ैदرضي الله تعالي عنه अबू सुफ़यान की इस ताना ज़नी को सुन कर तड़प गए और जज़्बात से भरी हुई आवाज़ में फ़रमाया कि ऐ अबू सुफ़यान ! खुदा की क़सम ! में अपनी जान को क़ुरबान कर देना अज़ीज़ समझता हु मगर मेरे प्यारे रसूलﷺ के मुक़द्दस पाउ के तल्वे में एक काँटा भी चुभ जाए। मुझे कभी भी ये गवारा नही हो सकता।
     *मुझे हो नाज़ किस्मत पर अगर नाम मुहम्मद पर*
     *ये सर कट जाए और तेरा कफे पा उस को ठुकराए*
     *ये सब कुछ है गवारा पर ये मुझ से हो नही सकता*
     *की उन के पाउ के तल्वे में इक कांटा भी चुभ जाए*
ये सुन कर अबू सुफ़यान ने कहा की में ने बड़े बड़े महब्बत करने वालो को देखा है। मगर मुहम्मद के आशिक़ो की मिषाल नही मिल सकती। सफ्वान के गुलाम नस्तास ने तलवार से उन की गर्दन मारी।
*✍🏽सिरते मुस्तफा 293*
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अब्लाक़ घोड़े सुवार

*क़ुरबानी का जानवर ज़बह करने से पहले ये दुआ पढ़ी जाए*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*اِنِّىْ وَجَّهْتُ وَجْهِيَ لِلَّذِيْ فَطَرَاسَّمٰوٰتِ وَالْاَرْضَ حَنِيْفًا وَمَآاَنَا مِنَ الْمُشْرِكِيْنَ o اِنَّ صَلَاتِىْ وَنُسُكِىْ وَمَحْيَاىَ وَمَمَاتِىْ لِلّٰهِ رَبِّ الْعٰلَمِيْنَ o لَاشَرِيْكَ لَهُ وَبِذٰلِكَ اُمِرْتُ وَاَنَامِنَ الْمُسْلِمِيْنَ*
*तर्जमह :* मेने अपना मुह उस की तरफ किया जिसने आसमान व ज़मीन बनाए एक उसी का हो कर और में मुश्रिकों में नही। बेशक मेरी नमाज़ और मेरी कुरबानिया और मेरा जीना और मरना सब अल्लाह के लिये है जो रब सारे जहान का। उसका कोई शरीक नही मुझे यही हुक्म है और में मुसलमान में हु।
     और जानवर की गर्दन के क़रीब पहलू पर अपना सीधा पाउ रख कर *اَللّٰهُمَّ لَكَ وَمِنْكَ بُسْمِ اللّٰهِ اللّٰهُ اكْبَر*  (*तर्जमह :* ऐ अल्लाह ! तेरे ही लिये और तेरी दी हुई तौफ़ीक़ से, अल्लाह के नाम से शुरू अल्लाह सबसे बड़ा है) पढ़ कर तेज़ छुरी से जल्द ज़बह कर दीजिये। क़ुरबानी अपनी तरफ से हो तो ज़बह के बाद ये दुआ पढ़िये :
*اَللّٰهُمَّ تَقَبَّلْ مِنِّىْ كَمَا تَقَبَّلْتَ مِنْ خَلِيْلِكَ اِبْرَاهِيْم عَلَيْهِ الصَّلٰةُ وَالسَّلَامُ وَحَبِيْبِكَ مُحَمَّدٍ صَلَّى اللّٰهُ تَعَالٰى عَلَيْهِ وَاٰلهٖ وَسَلَّم*
*तर्जमह :* ऐ अल्लाह ! तू मुझसे इस क़ुरबानी को क़ुबूल फरमा जैसा तूने अपने खलील इब्राहीम अलैहिस्सलाम और अपने हबीब मुहम्मद से क़बूल फ़रमाई।
     अगर दूसरे की तरफ से क़ुरबानी करे तो مِنِّىْ के बजाए مِنْ कह कर उस का नाम लीजिये। (ब वक़्ते ज़बह पेट पर घुटना या पाउ न रखिये की इस तरह बाज़ अवक़ात खून के इलावा ग़िज़ा भी निकल ने लगती है)
*✍🏽बहारे शरीअत, 3/352*
*✍🏽अब्लाक़ घोड़े सुवार, 14*
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फुतूह अल ग़ैब

*जलाली और जमाली सिफात:*
(हिस्सा 3)
 *بِسْــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ*

      और मुशाहेदा ए जमाल दिलों और मिज़ाजोंमे खुदाकी सिफाते रेहमत,नुरो सुरुर,बख्शीश-व-इनायत, अल्ताफ-व-करम,अफ-व-दरगुज़र और जूदो (सखावत) -व-सखा(बख्शीश-खैरात)की तमानियत-व- फरहतका हुसूल है। यही चीज़ें हैं जिनकी तरफ आखिरे कार लौटना है और जिनके साथ फज़लो रेहमतसे इन चीज़ोंको कलमबंद कर के कलम खुश्क हो चुका है और जिसकी बख्शीशें ज़मानए गुज़िश्तामें मुकद्दर हो चुकी हैं।
      खुदावंदे करीम अपने फज़लो करमसे औलियाअ और अब्दाल को तादमे मर्ग(मौत आने तक) इसी हालत पर रखता है। ताके फर्ते शौक से उनकी महोब्बत और शिद्दते शौक हद से ना गुज़र जाए और इनकी कुव्व्तें ज़ाइल हो कर और मौजुदा हालत ज़वालपज़ीर हो कर इनकी हलाकत की वजह न बन जाए। या बंदगी के आदाबमें किसी कोताही या तसापल का अंदेशा न ज़ाहिर हो और ये ऐसी हालतमें फौत (नेस्त,माअदूम) हो जाए।
     लुत्फो करमके लेहाज़ से या चीज़ें इनके दिलोंसे इमराज़को(बीमारियोंको) दूर करती हैं और दिलोंकी तरबियतके ज़रीये नरमी और सलाबत(मज़बूती) इख्तयार करने पर उकसाती हैं। ऐसे लोगोंके लिये खुदावंदे तआला हकीम, अलीम, लतीफ है और उन पर रउफ-व-रहीम हैं।
     चुनांचे फख्रे मौजूदात अलैहिस्सलाम-व-सलात फरमाया करते थे- अय बिलाल! इकामत-(कयाम-करार) केह कर हमें राहत पहोंचा ताके इन चीज़ों के मुशाहेदे के लिये(जिनका ज़िक्र किया जा चुका है) हम नमाज़ में दाखिल हों और जमाले इलाहीसे मुस्तफीद(फायदा चाहनेवाले) हों। इसी लिये आका-व-मौला अल्तहय्यता व सना ने फरमाया : _नमाज़ मेरी आंखोंकी ठंडक है।_
*✍🏽फुतूहल ग़ैब, पेज 21*
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खादिमे दिने नबी ﷺ *फ़ैयाज़ सैय्यिद*
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तफ़सीरे अशरफी


हिस्सा-54
*सूरए बक़रह, पारह 01*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*आयत ⑤②, तर्जुमा*
फिर मुआफ़ फरमा दिया हमने तुमसे उसके बाद, के अब शुक्र गुज़ार हो।

*तफ़सीर*
     ऐ यहूदियो ! अब हमारा करम देखो के फिर जब हज़रते मूसा कोहे तुर से तौरेत की तख्तियों के साथ लौटे और इस वाक़यात को देखा और जलाल (गुस्से) से भर गये और हमारे हुक्म से तुम्हारा क़त्ले आम होने लगा, तो हज़रते मूसा से देखा न गया और दुआ करने लगे, तो मुआफ़ फरमा दिया हमने और सजा उठा ली तुमसे इस तुम्हारे जुर्मे शदीद बूत परस्ती के बाद, के बार बार न फ़रमानी कर चुके और सजा पाते रहे, अब तो शुक्र गुज़ार हो जाओ।
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खादिमे दिने नबी ﷺ *मुहम्मद मोईन*
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मदनी पंजसुरह

*गुनाह मिटा दिये जाते है*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

    हुज़ूरﷺ ने फ़रमाया जो 100 मर्तबा *"سُبْحَانَ اللّٰهِ وَبِحَمْدِهِ"* पढ़ता है उसके गुनाह मिटा दिये जाते है अगर्चे समुन्दर के झाग के बराबर हो।
*✍🏽सुनन तिर्मिज़ी, 5/287*

*_सोने का पहाड़ सदक़ा करने का षवाब_*
     हुज़ूरﷺ ने फ़रमाया : जिस के लिए रात में इबादत करना दुशवार हो या वो अपना माल खर्च करने में बुख्ल से काम लेता हो या दुश्मन से जिहाद करने से डरता हो तो वो कसरत से *"سُبْحَانَ اللّٰهِ وَبِحَمْدِهِ"* पढ़ा करे क्यू की ऐसा करना अल्लाह को अपनी राह में सोने का पहाड़ सदक़ा करने से ज़्यादा मसनद है।
*✍🏽मजमउ जवाइद 10/112*

*_जन्नत में खजूर का दरख्त_*
     हुज़ूरﷺ ने फ़रमाया : जो *"سُبْحَانَ اللّٰهِ وَبِحَمْدِهِ"* पढ़ता है उस के लिये जन्नत में खजूर का एक दरख्त लगा दिया जाता है।
*✍🏽मजमउ जवाइद 10/111*
*✍🏽मदनी पंजसुरह 144*
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