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Thursday, 13 October 2016

*बिनाई की हिफाज़त के लिये*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

पाचो नमाज़ों के बाद 11 मर्तबा *يَا نُوْرُ* पढ़ कर दोनों हाथो के पोरो पर दम कर के आँखों पर फेर लीजिये।

*✍🏽जन्नती ज़ेवर, 606*
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 238*

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Wednesday, 12 October 2016

*सवानहे कर्बला​* #25
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_शहादत के वाक़ीआत_* #05
     हज़रते इमामرضي الله تعالي عنه और इमाम के खानदान के नौनिहाल शैके जाबाज़ी में सरशार थे। उन्हों ने मैदान में जाना चाहा लेकिन क़रीब के गाउ वाले जहा इस हंगामे की खबर पहुची थी वहा के मुसलमान बे ताब हो कर हाज़िरे खिदमत हो गए थे उन्होंने इसरार किये, हज़रत के दरपे हो गए और किसी तरह राज़ी न हुए की जब तक इन में से एक भी ज़िन्दा है ख़ानदाने अहले बैत का कोई बच्चा भी मैदान में जाए।
     हज़रते इमामرضي الله تعالي عنه को इन इख्लास केशो की सरफरोशाना इलतीजाए मंजूर फ़रमानी पड़ी और उन्हों ने मैदान में पहुच कर दुश्मनाने अहले बैत से मुक़ाबले किये और अपनी बहादुरी के सिक्के जमा दिए और एक एक ने आदा की कशिर तादाद को हल्का कर के राहे जन्नत इख़्तियार करना शुरू की। इस तेह बहुत से जांबाज़ फरज़न्दे रसूल पर अपनी जाने निषार कर गए।
     इस क़बीले में वहब इब्ने अब्दुल्लाह कल्बि जिनकी शादी को सिर्फ 17 दिन हुए थे की आप के पास आपकी वालिदा पहुची जो एक बेवा औरत थी और जिन की सारी कमाई और घर का चराग यही एक नौजवान बेटा था। उस माँ ने प्यारे बेटे के गले में बहे डाल कर रोना शुरू कर दिया। बेटा हैरत में आ कर माँ से दरयाफ़्त करता है की रंजो मलाल का सबब क्या है ? में ने कभी आप की नाफ़रमानी न की न आइन्दा कर सकता हु। आप के दिल को क्या सदमा पंहुचा और आप को किस गम ने रुलाया ? अपने बेटे की ये गुफ्तगू सुनकर माँ और चीख मार कर रोने लगी और कहने लगी : मेने अपनी जान धूल धुला कर तेरी जवानी की बहार पाई है, तू जी मेरे दिल का क़रार है तू ही मेरी जान का चैन है, एक दम तेरी जुदाई मुझ से बर्दाश्त नही हो सकती।
     मेने तुजे अपना खूने जिगर पिलाया है। आज मुस्तफा का जिगर गोशा, खातुने जन्नत का नौनिहाल दश्ते कर्बला में मुब्तलाए मुसीबत है, प्यारे बेटे ! क्या तुझ से हो सकता है की तू अपनी जान उस के क़दमो पर कुर्बान कर डाले। इस बेगैरत ज़िन्दगी पर हजार तुफ़ाने है की हम ज़िन्दा रहे और हुज़ूर का लाडला ज़ुल्मो सितम के साथ शहीद किया जाए, अगर तुझे मेरी महब्बते कुछ याद हो और तेरी परवरिश में जो मेहनते मेने उठाई है इन को तू भूला न हो तो तू हुसैन के सर पर सदक़ा हो जा।

वहब ने जो कहा वो अगली पोस्ट में..ان شاء الله
*✍🏽सवानहे कर्बला, 142*
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*सवानहे कर्बला​* #24
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
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*_शहादत के वाक़ीआत_* #04
     एक शख्स मुज़नी ने इमामرضي الله تعالي عنه के सामने आ कर कहा की ऐ इमाम देखो तो दरयाए फुरात केसा मौज़े मार रहा है। खुदा की क़सम खा कर कहता हु तुम्हे इस का एक क़तरा न मिलेगा और तुम प्यासे हलाक हो जाओगे।
     हज़रते इमामرضي الله تعالي عنه ने उस के हक़ में फ़रमाया : या रब इसको प्यासा मार, इमामرضي الله تعالي عنه का ये फरमाना था की मुज़नी का घोडा चमका, मुज़नी गिरा, घोडा भागा और मुज़नी उस को पकड़ने के लिये उस के पीछे दौड़ा और प्यास उस पर ग़ालिब हुई, इस शिद्दत की ग़ालिब हुई की اَلْعَطَشُ اَلْعَطَشُ पुकारता था और जब पानी उस के मुह से लगाते थे तो एक क़तरा न पी सकता था यहाँ तक की इसी शिद्दते प्यास में मर गया।
     फरज़न्दे रसूलﷺ को ये बात भी दिखा देना थी की इन की मक़बूलिय्यते बारगाहे हक़ पर और उन के कुर्ब व मन्ज़िलत पर जैसी की अहादिशे शाहिरा शहीद है ऐसे ही उन के ख्वारिक व करामात भी गवाह है। अपने इस फ़ज़्ल का अमली इज़हार भी इत्मामे हुज्जत के सिलसिले की एक कड़ी थी की अगर तुम आँख रखते हो तो देख लो की जो ऐसा मुस्तजाबुद्दा'वात है उसके मुक़ाबले में आना खुदा से जंग करना है इस का अंजाम सोच लो और बाज़ रहो।
     मगर शरारत के मुजस्स्मे इससे भी सबक़ न ले सके और दुन्याए ना पाएदार की हिर्स का भुत जो उनके सरो पर सुवार था उस ने उन्हें अंधा बना दिया और नेज़े बाज़ लश्कर से निकल कर रज्ज़ ख्वानी करते हुए मैदान में आ कूदे और तकब्बुर व तबख़्तूर के साथ इतराते हुए घोड़े दौड़ा कर और हथियार चमका कर इमामرضي الله تعالي عنه से मुबारीज़ के तालिब हुए।

बाक़ी अगली पोस्ट में.. انشاء الله
*✍🏽सवानहे कर्बला, 139*
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*सवानहे कर्बला​* #23
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
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*_शहादत के वाक़ीआत_* #03
     हाथ उठा कर इमामे हुसैनرضي الله تعالي عنه ने बारगाहे इलाही में अर्ज़ किया या रब अज़ाबे नार से क़ब्ल इस गुस्ताख को दुन्या में आतशे अज़ाब में मुब्तला कर। इमामرضي الله تعالي عنه का हाथ उठना ही था की उस के घोड़े का पाउ एक सुराख में गया और वो घोड़े से गिरा और उसका पाउ रिकाब में उलझा और घोडा उसे ले कर भागा और आग की खन्दक में डाल दिया।
     हज़रते इमामرضي الله تعالي عنه ने सजदऐ शुक्र अदा किया और अपने रब की हम्दो षना की और फ़रमाया : ऐ परवरदिगार तेरा शुक्र है की तूने अहले बैते रिसालत के बदबख्त को सज़ा दी। हज़रते इमामرضي الله تعالي عنه की ज़बान से ये कलिमा सुन कर सफे आदा में से एक और बेबाक ने कहा की आप को मेगम्बरे खुदा से क्या निस्बत ? ये कलिमा तो इमाम के लिये बहुत तकलीफ देह था। आप ने उस के लिये भी बद दुआ फ़रमाई और अर्ज़ किया या रब इस बदज़बान को फौरी अज़ाब में गिरफ्तार कर। इमामرضي الله تعالي عنه ने ये दुआ फ़रमाई और उस को क़ज़ाए हाजत की ज़रूरत पेश आई, घोड़े से उतर कर एक तरफ भागा और किसी जगह क़ज़ाए हाजत के लिये बरहना हो कर बेठा। एक सियाह बिच्छु ने डंग मारा तो नजासत आलूदा तड़पता फिरता था। इस रुस्वाई के साथ तमाम लश्कर के सामने उस नापाक की जान निकली मगर सख्त दिलाने बे हमिय्यत को गैरत न हुई।

बाक़ी अगली पोस्ट में.. انشاء الله
*✍🏽सवानहे कर्बला, 139*
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*सवानहे कर्बला​* #22
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
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*_शहादत के वाक़ीआत_* #02
     इसका जवाब ये दिया गया की तमाम फ़ज़ाइल हमे मालुम है मगर उस वक़्त ये मसअला ज़ेरे बहष नही है, आप जंग के लिये किसी को मैदान में भेजिये और गुफ्तगू खत्म फरमाये।
     हज़रते इमामرضي الله تعالي عنه ने फ़रमाया की में हुज्जते खत्म करना चाहता हु ताकि इस जंग को दफा करने की तदाबिर में से मेरी तरफ से कोई तदबीर रह न जाए और जब तुम मजबूर करते हो तो ब मजबूरी व नाचारी मुझको तलवार उठाना ही पड़ेगी।
     ये गुफ्तगू हो ही रही थी की एक शख्स घोडा दौड़ा कर सामने आया (जिसका नाम मालिक बिन उर्वा था) जब उस ने देखा की लश्करे इमाम के गिर्द खन्दक में आग जल रही है और शोले बुलंद हो रहे है और इस तदबीर से अहले खैमा की हिफाज़त की जाती है तो उस गुस्ताखने हज़रते इमामرضي الله تعالي عنه से कहा की ऐ हुसैन तुम ने वहा की आग से पहले यही आग लगा ली? हज़रते इमामرضي الله تعالي عنه ने फ़रमाया ऐ दुश्मने खुदा ! तू काजीब है। तुझे गुमान है की में दोज़ख में जाऊँगा ?
     मुस्लिम बिन औसजाرضي الله تعالي عنه को मालिक बिन उर्वा का ये कलिमा बहुत न गवार हुवा और उन्हों ने हज़रते इमामرضي الله تعالي عنه से उस बद ज़बान के मुह पर तीर मारने की इजाज़त चाही। सब्रो तहम्मुल और तक़वा और रास्तबाज़ी और अदालत व इन्साफ का एक आदिमूल मिषाल मन्ज़र है की ऐसी हालत में जब की जंग के लिये मजबूर कीये गए थे। उस वक़्त भी अपने जज़्बात क़ब्ज़े में है तैश नहीं आता। फरमाते है : खबरदार ! मेरी तरफ से कोई जंग की इब्तिदा न करे ताकि इस खून रेजी का बवाल आदा ही की गर्दन पर रहे और हमारा दामन इक़दाम से आलूदा न हो।

     ये फरमा कर दस्ते दुआ दर्ज़ा फरमाए और बारगाहे इलाही में अर्ज़ किया...बाक़ी अगली पोस्ट में.. انشاء الله
*✍🏽सवानहे कर्बला, 139*
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*सवानहे कर्बला​* #21
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
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*_शहादत के वाक़ीआत_* #01
*_10मुहर्रम के दिलडोज वाक़ीआत_* #01
     10वी मुहर्रम का क़यामत नुमादिन आया। जुमुआ की सुब्ह हज़रते इमामرضي الله تعالي عنه ने तमाम अपने रुकफाए अहले बैत के साथ फज़र के वक़्त अपनी उम्र की आखरी नमाज़ अदा फ़रमाई। पेशानियो ने सजदों में खूब मज़े लिये, ज़बानों ने किराअत व तसबिहात के लुत्फ़ उठाए। नमाज़ से फराग के बाद ख़ैमे में तशरीफ़ लाए, 10वी मुहर्रम का आफताब करिबे तुलुअ है, इमामे आली मक़ामرضي الله تعالي عنه और उनके तमाम रुफका व अहले बैत 3 दिन के भूके प्यासे है, एक कतराए आब मुयस्सर नहीं आया और एक लूक़मा हल्क़ से नही उतरा, भूक प्यास से जिस क़दर ज़ोफ़् व नातुवानी का गल्बा हो जाता है इसका वही लोग कुछ अंदाज़ा कर सकते है जिन्हें कभी दो तिन वक़्त के फाके की नौबत आई हो। फिर बे वतनी, तेज़ धुप, गर्म रेत, गर्म हवाए, उन्हों ने नाज़ परवर दगाने आगोशे रिसालत को केसा पज़मुर्दा कर दिया होगा।
     इन बे वतन पर जोरो के पहाड़ तोड़ने के लिये 22000 फ़ौज सफर बांधे मौजूद, जंग का नक़्क़ारा बजा दिया गया और मुस्तफाﷺ के फ़रज़न्द और फातिमा ज़हराرضي الله تعالي عنها के जिगर को मेहमान बना कर बुलाने वाली क़ौम ने जानो पर खेलने की दावत दी।
     हज़रते इमामرضي الله تعالي عنه ने अर्सए कारज़ार में तशरीफ़ फरमा कर एक ख़ुत्बा फ़रमाया जिस में बयान फ़रमाया की "खूने नाहक हराम और गजबे इलाही का मुजीब है, में तुम्हे आगाह करता हु की तुम इस गुनाह में मुब्तला न हो, में ने किसी को क़त्ल नही किया है, किसी का घर नही जलाया, किसी पर हमला आवर नही हुवा। अगर तुम अपने शहर में मेरा आना नही चाहते हो तो मुझे वापस जाने दो, तुम से किसी चीज़ का तलबगार नही, तुम्हारे दरपे आज़ार नही, तुम क्यू मेरी जान के दरपे हो और तुम किस तरह मेरे खून के इलज़ाम से बरी होब्स्क्ते हो ?
     रोज़े मेहशर तुम्हारे पास मेरे खून का क्या जवाब होगा ? अपना अंजाम सोचो और अपनी अपनी आकिबत पर नज़र डालो, फिर ये भी समजो की में कौन और बारगाहे रिसालत में किस चश्मे करम का मंजूरे नज़र हु, मेरे वालिद कौन है और मेरी वालिदा किस की लखते जिगर है ? में उन्ही बतुले ज़हरा का नुरे दीदा हु जिन के पुल सिरात पर गुज़रते वक़्त अर्श से निदा की जाएगी की ऐ अहले मेहशर ! सर झुकाओ और आँखे बंद करो की हज़रते खातुने जन्नत पुल सिरात से 70000 हूरो को रिकाबे सआदत में ले कर गुज़रने वाली है।
     में वही हु जिसकी महब्बत को सरवरे आलमﷺ ने अपनी महब्बत फ़रमाया है, मेरे फ़ज़ाइल तुम्हे खूब मालुम है, मेरे हक़ में जो अहादिश वारिद हुई है इस से तुम बे खबर नही हो।

इसके जवाब में कुफियो ने जो कहा वो अगली पोस्ट में.. انشاء الله
*✍🏽सवानहे कर्बला, 137*
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Tuesday, 11 October 2016

*आशूरा की दुआ*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     बेशक ज़िन्दगी और मौत अल्लाह ही के दस्ते क़ुदरत है। लेकिन रब अपने फ़ज़लो करमसे अपने महबूब बंदोकी दुआओ को हमेशा इज़्ज़त अता फ़रमाता है। इस दुआ को जो भी बन्दा लिखो हुई तरतीब से सच्चे दिल से पढ़ेगा वो पूरा साल मौत के सदमेसे महफूज़ रहेगा انشاء الله. और आनेवाला आशूरा ज़रूर देखेगा। जिस साल उस को मौत लिखी होगी उस साल वो शख्स ये दुआ किस भी बहानेसे नही पढ़ सकेगा।

7 मर्तबा ये दुआ पढ़े।
*बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्र्हिम*
*सुब्हानअल्लाहे मिल्अल्मीज़ाने व मुन्तहल्इल्मे व मब्ल-गर्रेदा। व ज़िनतल्अर्शे  वला मल्जाअ वला मन्जाअ मिनल्लाहे इल्ला इलैहे। सुब्हानल्लाहे अद-दश्फए वल्वत्रे व अद-दल्कलेमातित्ताम्माते व अस्अलोहुस्सलाम-त बे रहमतेही वला हौल वला कुव्वत इल्ला बिल्लाहिल अलिय्यिल अज़ीम। वहोव हस्बि व नेअ्मलवकिल व नेअ्मलमौला व नेअ्मन्नासिर। व-सल्लल्लाहो अला खैरे खल्केहि मोहम्मदिव व आलेही व अस्हाबेहि अजमईन।*

फिर 10 बार ये दुरुदे इब्राहिम पढ़े
फिर हाथ उठा कर ये दुआ पढ़े।

*बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्र्हिम*
*या फारेजल्कुर्बे जिन्नूने यौम आशूरा। व या जामेअ शम्ले यअ्क़ूब यौम आशूरा। व या सामेअ दअ्वते मूसा व हारून यौम आशूरा। व या रहमानद-दुन्या वल-आखेरते व रहीम-हुमा सल्ले अला सय्यिदेना मुहम्मदिव व आले सय्यिदेना मोहम्मदिव व सल्ले व सल्लीम अला जमीइलअम्बियाऐ वल-मुर्सलीन वक़दे हाजातेन फिद-दुन्या वल-आखेरते व तव्विल उम्रना बे रहमतेक या अरहमर्राहेमिन।*

*बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्र्हिम*
*इलाही बे हुर्मतील-हुसैने व अखिहे व उम्मेही व अबीहे व जद्देहि व बनीहे फ़र्रिज अम्मा अना फिहे व-सल्लल्लाहो अला खैरे खल्केहि सय्यिदेना मोहम्मदिव व आलेही अजमइन*

उसके बाद 2 रकअत नमाज़ नफ्ल पढ़े। हर रकअत में अलहम्दु के बाद 10 बार कुलहुवल्लाह पढ़े। सलाम के बाद आयतुल कुर्सी और दुरुद शरीफ 11-11 मर्तबा पढ़े। और हज़रते इमामे आली मक़ाम और शोहदाए कर्बला की अरवाह को पहुचाए।
(अगर असर की नमाज़ के बाद दुआ पढ़े तो नफ्ल नमाज़ न पढ़े)

*नॉट :* जिन हज़रात को अरबी आती हो वो इस दुआ को अरबी में पढ़े।
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*सवानहे कर्बला​* #20
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_शहादत के वाक़ीआत_*
*_​​हज़रते इमामे हुसैन की कूफा को रवानगी_*​​ #06
     अहले बैते किराम पर पानी बंद करने और इन के खुनो के दरया बहाने के लिये बे गैरती से सामने आने वालो में ज़्यादा तादाद उन्ही बे हयाओ की थी जिन्होंने हज़रते इमामرضي الله تعالي عنه को दरख्वास्ते भेज बुलाया था और मुस्लिम बिन अक़ीलرضي الله تعالي عنه के हाथ पर हज़रते इमामرضي الله تعالي عنه की बैअत की थी। मगर आज उन बे गैरतो को न अपने अहद व बैअत का ख्याल था न अपनी दावत व मेज़बानी का लिहाज़। फुरात का बे हिसाब पानी इस सियाह बातीनोने ख़ानदाने रिसालत पर बंद कर दिया था।
     अहले बैत के छोटे छोटे फातिमि चमन के नौनिहाल खुश्क लब, नादान बच्चे एक एक क़तरे के लिये तड़प रहे थे, नूर की तस्वीरें प्यास की शिद्दत में दम तोड़ रही थी, सरे चश्म तयम्मुम से नमाज़े पढ़नी पड़ती थी, इस तरह 3 दिन गुज़र गए, छोटे छोटे बच्चे और बिविया सब भूक व प्यास से बेताब व तुवा हो गए।
     इस ज़ुल्मो सितम में अगर रुस्तम भी होता तो उसके हौसले पस्त हो जाते मगर फरज़न्दे रसूल को मसाएब का हुजूम जगह से न हटा सका, हक़ व सदाक़त का हामी मुसीबतो की भयानक घटाओ से न डरा और तुफ़ाने बला के सेलाब से उसके पाए जुम्बिश भी न हुई, 10 मुहर्रम तक यही बहष रही की हज़रते इमाम यज़ीद की बैअत कर ले।
     अगर आपرضي الله تعالي عنه यज़ीद की बैअत करते तो वो तमाम लश्कर आप के जिलव में होता, आप का कमाले इकराम व एहतिराम किया जाता, खज़ानों के मुह खोल दिये जाते और दौलते दुन्या क़दमो पर लूटा दी जाती मगर जिस का दिल हुब्बे दुन्या से खाली हो और दुन्या के  राज़ जिस पर खुले हुए हो वो इस बात पर कब राज़ी होता है, जिस आँख ने हक़ीक़ी हुस्न के जल्वे देखे हो वो नुमाइशी रंगो रूप पर क्या नज़र डेल ?
     हज़रते इमामرضي الله تعالي عنه ने राहते दुन्या के मुह पर ठोकर मार दी और राहे हक़ में पहुचने वाली मुसीबतो का खुश दिली से खैर मक़दम किया और मुसलमानो की तबाही व बर्बादी गवारा न फ़रमाई, अपना घर लुटाना और अपना खून बहाना मंज़ूर किया मगर इस्लाम की इज़्ज़त में फ़र्क़ आना बर्दास्त न हो सका।
*✍🏽सवानहे कर्बला, 135*
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*सवानहे कर्बला​* #19
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
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*_शहादत के वाक़ीआत_*
*_​​हज़रते इमामे हुसैन की कूफा को रवानगी_*​​ #05
सब के सब हज़रते इमामرضي الله تعالي عنه की अज़मत व फ़ज़ीलत को खूब जानते पहचानते थे और आप की जलालत व मर्तबा का हर दिल मोतरीफ था। इस वजह से इब्ने साद ने हज़रते इमामرضي الله تعالي عنه से मुक़ाबला करने से इनकार किया। वो चाहता था की हज़रते इमामرضي الله تعالي عنه के खून के इलज़ाम से वो बचा रहे मगर इब्ने ज़ियाद ने उसे मजबूर किया की अब दो ही सूरते है या तो रै की हुकूमत को छोड़ दे या इमाम से मुक़ाबला किया जाए।
     दुन्यवि हुकूमत के लालच ने उस को जंग पर आमद कर दिया। आखिर कार वो हज़रते इमामرضي الله تعالي عنه के मुक़ाबले के लिये रवाना हुवा और इब्ने ज़ियादे बद निहाद लशकरो को भेजता रहा यहाँ तक की अम्र बिन साद के पास 22000 का लश्कर जमा हो गए और उसने जमीअत के साथ कर्बला में पहुच कर फुरात के कनारे पड़ाव किया और अपना मर्कज़ क़ाइम किया।
     हैरत नाक बात है और दुन्या की किसी जंग में इस की मिषाल नही मिलती की कुल 82 तो आदमी, इनमे बिविया भी, बच्चे भी, बीमार भी, फिर वो भी की वो बिरादए जंग नही आए थे और इन्तिज़ाम हर्ब काफी न रखते थे। उनके लिये 22000 की ज़र्रार फ़ौज भेजी जाए। आखिर वो इन 82 नुफुसे मुक़द्दसा को अपने ख्याल में क्या समझते थे और उनकी शुजाअत व बसालत के कैसे कैसे मनाज़िर उन की आँखों ने देखे थे की छोटी सी जमाअत के लिये दो गुनी, चौगुनी, दस गुनी तो क्या सो गुनी तादाद को भी काफी न समझा, बे अंदाज़ा लश्कर भेज दिया, फौजो के पहाड़ लगा डाले, इस पर भी दिल खौफ ज़दा है और जंग आजमाओ, दिलावरो के हौसले पस्त है और वो समझते है की शैराने हक़ के हमले की ताब लाना मुश्किल है मजबूरन ये तदबीर करनी पड़ी की लश्करे इमाम पर पानी बंद किया जाए, प्यास की शिद्दत और गर्मी की हिद्द्त इन्तिहा को पहुच चुके तब जंग शुरू की जाए।

बाक़ी कल की पोस्ट में.. انشاء الله
*✍🏽सवानहे कर्बला, 133*
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Monday, 10 October 2016

*सवानहे कर्बला​* #18
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
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*_शहादत के वाक़ीआत_*
*_​​हज़रते इमामे हुसैन की कूफा को रवानगी_*​​ #04
     यहाँ तो मुसाफिराने बे वतन का सामान बे तरतीब पड़ा है और उधर हज़ार सुवार का मुसल्लह लश्कर मुक़ाबला खैमाज़न है जो अपने मेहमानो को नेज़ो की नोकें और तलवारो की धारो दिखा रहा है और बजाए आदाबे मेज़बानी के खुँख्वारि पर तुला हुवा है। दरियाए फुरात के क़रीब दोनों लश्कर थे और दरियाए फुरात का पानी दोनों लशकरो में से किसी को सैराब न कर सका। इमामرضي الله تعالي عنه के लश्कर को तो इस का एक क़तरा पहुचना ही मुश्किल हो गया और यज़ीदी लश्कर जितने आते गए इन सब को अहले बैते रिसालत के बे गुनाह खून की प्यास बढ़ती गई। आबे फुरात से इन की तिशनगी में कोई फर्क न आया।
     अभी इत्मीनान से बैठने और थकान दूर करने की सूरत भी नज़र न आई थी की हज़रते इमामرضي الله تعالي عنه की खिदमत में इब्ने ज़ियाद का एक मकतूब पंहुचा जिस में उसने हज़रते इमाम से यज़ीदे नापाक की बैअत तलब की थी। हज़रते इमामرضي الله تعالي عنه ने वो खत पढ़ कर डाल दिया और क़ासिद से कहा मेरे पास इस का कुछ जवाब नही।
     यज़ीद की बैअत को कोई भी वाकिफ हाल दीनदार आदमी गवारा नही कर सकता था न वो बैअत किसी तरह जाइज़ थी। इमाम को इन बे हयाओ की इस जुरअत पर हैरत थी और इसी लिये आप ने फ़रमाया की मेरे पास इसका कुछ जवाब नही है। इससे इब्ने ज़ियाद का तैश और ज़्यादा हो गया और उस ने मज़ीद असाकिर व अफवाज तरतीब दिये और इन लशकरो का सिपह सालार उमर बीन साद को बनाया जो उस ज़माने में मुल्के रै का गवर्नर था। रै खुरासान का एक शहर है जो आज कल ईरान माँ दारुस्सलतन्त है और इस को तेहरान कहते है।

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*✍🏽सवानहे कर्बला, 132*
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*सज्दए तिलावत और शैतान की शामत*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     अल्लाह के महबूबﷺ ने फ़रमाया : जब जब आदमी आयते सज्दा पढ़ कर सज्दा करता है, शैतान हट जाता है और रो कर कहता है, हाय मेरी बर्बादी !
     इब्ने आदम को सज्दे का हुक्म हुवा उसने सज्दा किया उसके लिये जन्नत है और मुझे हुक्म हुवा मेने इन्कार किया मेरे लिये दोज़ख है।
*✍🏽सहीह मुस्लिम 1/61*

_*इन्शा अल्लाह हर मुराद पूरी हो*_
     जिस मक़सद के लिये एक मजलिस में सज्दे की सब (यानी 14) आयते पढ़ कर सज्दे करे अल्लाह उसका मक़सद पूरा फ़रमा देगा। ख्वाह एक एक आयत पढ़ कर उसका सज्दा करता जाए या सब पढ़ कर आखिर में 14 सज्दा करले।
*✍🏽गुन्या, दुर्रेमुखतार*
*✍🏽नमाज़ के अहकाम स.211*
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*सवानहे कर्बला​* #17
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_शहादत के वाक़ीआत_*
*_​​हज़रते इमामे हुसैन की कूफा को रवानगी_*​​ #03
     ये मुहर्रम सी. 61 ही. की दूसरी तारीख थी। आपرضي الله تعالي عنه ने इस मक़ाम का नाम दरयाफ़्त किया तो मालुम हुवा की इस जगह को कर्बला कहते है। हज़रते इमामرضي الله تعالي عنه कर्बला से वाकिफ थे और आप को मालुम था की कर्बला ही वो जगह है जहा अहले बैते रिसालत को राहे हक़ में अपने खून की नदिया बहानी होगी।
     आप ने इन्ही दिनों में हुज़ूरﷺ की ज़ियारत हुई, हुज़ूरﷺ ने आप को शहादत की खबर दी और आप के सिनए मुबारक पर दस्ते अक़दस रख कर दुआ फ़रमाई : *اَللّٰهُمَّ اَعْطِ الْحُسَيْنَ صَبْرًا وَاَخْرًا*
     आज़िब वक़्त है के सुल्ताने दारैन के नुरे नज़र को सदहा तमन्नाओ से मेहमान बना कर बुलाया है, अर्जियों और दरख्वास्तो के तुमार लगा दिए है, क़ासिदो और पयामो की रोज़ मर्रा डाक लग गई है। अहले कूफा रातो को अपने मकानों में इमाम की तशरीफ़ आवरी ख्वाब में देखते है और ख़ुशी से फुले नही समाते, जमाअते मुद्दतो रक सुब्ह से शाम तक हिजाज़ की सड़क पर बैठ कर इमाम की आमद का इन्तिज़ार किया करती है और शाम को दिल मगमुम वापस जाती है लेकिन जब वो करीम मेहमान अपने करम से इन की ज़मीन में तशरीफ़ लाते है तो इन ही कुफियो का मुसल्लह लश्कर सामने आता है और न शहर में दाखिल होने देता है न अपने वतन ही को वापस तशरीफ़ ले जाने पर राज़ी होता है।
     यहाँ तक की इस मोअज़्ज़ज़् मेहमान को व अपने अहले बैत  को खुले मैदान में रखते इक़ामत डालना पड़ता है और दुष्मनाने हया को गैरत नही आती। दुन्या में ऐसे मोअज़्ज़ज़् मेहमान के साथ ऐसी बे हमिय्यति का सुलूक कभी न हुवा होगा जो कुफियो ने हज़रते इमाम के साथ किया।

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*✍🏽सवानहे कर्बला, 131*
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*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #57
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*
*_सूरतुल बक़रह, आयत ⑥③_*
और जब हमने तुमसे एहद लिया (2)
और तुम पर तूर (पहाड़) को ऊंचा किया (3)
और जो कुछ हम तुमको देते हैं ज़ोर से(4)
और उसके मज़मून याद करो इस उम्मीद पर कि तुम्हें परहेज़गारी मिले

*तफ़सीर*
     (2) कि तुम तौरात मानोगे और उस पर अमल करोगे. फिर तुमने उसे निर्देशों को बोझ जानकर क़ुबूल करने से इन्कार कर दिया. जबकि तुमने ख़ुद अपनी तरफ़ से हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से ऐसी आसमानी किताब की प्रार्थना की थी जिसमें शरीअत के क़ानून और इबादत के तरीक़े विस्तार से दर्ज हों. और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने तुमसे बार बार इसके क़ुबूल करने और इस पर अमल करने का एहद लिया था. जब वह किताब दी गई तो तुमने उसे क़ुबूल करने से इन्कार कर दिया और एहद पूरा न किया.
     (3) बनी इस्राईल के एहद तोड़ने के बाद हज़रत जिब्रील ने अल्लाह के हुक्म से तूर पहाड़ को उठाकर उनके सरों पर लटका दिया और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया तुम एहद क़ुबूल करो वरना ये पहाड़ तुमपर गिरा दिया जाएगा, और तुम कुचल डाले जाओगे. वास्तव में पहाड़ का सर पर लटका दिया जाना अल्लाह की निशानी और उसकी क़ुदरत का खुला प्रमाण है. इससे दिलों को इत्मीनान हासिल होता है कि बेशक यह रसूल अल्लाह की क़ुव्वत और क़ुदरत के ज़ाहिर करने वाले हैं. यह इत्मीनान उनको मानने और एहद पूरा करने का अस्ल कारण है.
     (4) यानी पूरी कोशिश के साथ.
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Sunday, 9 October 2016

*सवानहे कर्बला​* #16
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_शहादत के वाक़ीआत_*
*_​​हज़रते इमामे हुसैन की कूफा को रवानगी_*​​ #02
     राह में हज़रते इमामे आली मक़ामرضي الله تعالي عنه को कुफियो की बद अहदी और हज़रते मुस्लिमرضي الله تعالي عنه की शहादत की खबर मिल गई। उस वक़्त आप की जमाअत में मुख़्तलिफ़ राए हुई और एक मर्तबा आप ने वापसी का क़स्द ज़ाहिर फ़रमाया लेकिन बहुत गुफ्तगू के बाद ये राए पाई की सफर जारी रखा जाए और वापसी का ख्याल तर्क किया जाए।
     हज़रते इमामرضي الله تعالي عنه ने भी इस मशवरे से इत्तिफ़ाक़ किया और क़ाफ़िला आगे चल दिया यहाँ तक की जब कूफा दो मन्ज़िल रह गया तब आप को हर बिन यज़ीद रियाही मिला, उसके साथ इब्ने ज़ियाद के 1000 हथियार बंद सुवार थे, हर ने हज़रते इमामرضي الله تعالي عنه की जानिब में अर्ज़ किया की इस को इब्ने ज़ियाद ने आप की तरफ भेज है और हुक्म दिया है की आप को उस के पास ले चले, हर ने ये भी ज़ाहिर किया की वो मजबुराना बादिले न ख्वास्ता आया है और उस को आप की खिदमत में जुरअत बहुत न पसन्द व नागवार है।
     हज़रते इमामرضي الله تعالي عنه ने हर से फ़रमाया की में इस शहर में खुद न आया बल्कि मुझे बुलाने के लिये अहले कूफा के मुतवातिर पयाम गए और लगातार नामे पहुचते रहे। ऐ अहले कूफा ! अगर तुम अपने अहद व बैअत पर क़ाइम हो और तुम्हे अपनी ज़बानों का कुछ पास हो तो तुम्हारे शहर में दाखिल होउ वरना यही से वापस जाऊ। हर ने क़सम खा कर कहा की हम को इस का कुछ इल्म नही की आप के पास इल्तिजा नामे और क़ासिद भेजे गए और में न आप को छोड़ सकता हु और न वापस हो सकता हु।
     हुर के दिल में खानदाने नुबुव्वत और अहले बैत की अज़मत ज़रूर थी लेकिन वो इब्ने ज़ियाद के हुक्म से मजबूर था और उस को ये अन्देशा भी था की वो अगर हज़रते इमाम के साथ कोई मराआत करे तो इब्ने ज़ियाद पर ये बात ज़ाहिर हो कर रहेगी की हज़ार सुवार साथ है, ऐसी सूरत में किसी बात का छुपाना मुमकिन नही  और अगर इब्ने ज़ियाद को मालुम हुवा की हज़रते इमामرضي الله تعالي عنه के साथ ज़रा भी ज़रुगुज़ाश्त की गई है तो वो निहायत सख्ती के साथ पेश आएगा। इस अंदेशे और ख्याल से हर अपनी बात पर अड़ा रहा यहाँ तक की हज़रते इमामرضي الله تعالي عنه को कूफा की राह से हट कर कर्बला में नुज़ूल फरमान पड़ा।

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*✍🏽सवानहे कर्बला, 130*
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*सज्दए सहव का तरीक़ा*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

➡अत्तहिय्यात पढ़ कर बल्कि अफज़ल ये है की दुरुद शरीफ भी पढ़ लीजिये, सीधी तरफ सलाम फेर कर दो सज्दे कीजिये, फिर तशह्हुद, दुरुद शरीफ और दुआ पढ़ कर सलाम फेर दीजिये।

*सज्दए सहव करना भूल जाए तो..?*

➡सज्दए सहव करना था और भूल कर सलाम फेरा तो जब तक मस्जिद से बहार न हुवा सज्दा करले।
➡मैदान में हो तो जब तक सफों से मुतजाविज़ न हो या आगे को सज्दे की जगह से न गुज़रा, सज्दा करले,
➡जो चीज़ मानए बिना है मसलन कलाम वग़ैरा मुनाफिये नमाज़ अगर सलाम के बाद पाई गई तो अब सज्दए सहव नही हो सकता।
*✍🏽दुर्रेमुखतार*
*✍🏽नमाज़ के अहकाम* स.211
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*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #56
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*
*_सूरतुल बक़रह, आयत ⑥②_*
बेशक ईमान वाले और  यहूदियों और ईसाइयों और सितारों के पुजारियों में से वो कि सच्चे दिल से अल्लाह और पिछले दीन पर ईमान लाएं और नेक काम करें उन का सवाब पुण्य उनके रब के पास हैं और न उन्हें कुछ अन्देशा (आशंकाद) हो और न कुछ ग़म

*तफ़सीर*
     इब्ने जरीर और इब्ने अबी हातिम ने सदी से रिवायत की कि यह आयत हज़रत सलमान फ़ारसी (अल्लाह उनसे राज़ी हो) के साथियों के बारे में उतरी.
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*सवानहे कर्बला​* #15
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_शहादत के वाक़ीआत_*
*_हज़रते इमामे हुसैन की कूफा को रवानगी_* #01
     हज़रते इब्ने अब्बास, इब्ने उमर, जाबिर, अबू सईद खुदरी, अबू वाक़ीद लैषी और दूसरे सहाबए किराम आपرضي الله تعالي عنه को रोकने में बहुत मुसिर थे और आखिर तक वो यही कोशिश करते रहे की आप मक्का से तशरीफ़ न ले जाए, लेकिन ये कोशिश कार आमद न हुई और हज़रते इमामे आली मक़ामرضي الله تعالي عنه ने 3 ज़िल हिज्जा सी. 60 ही. को अपने अहलो अयाल व खुद्दाम कुल 82 लोगो को हमराह ले कर राहे इराक़ इख़्तियार की।
     मक्का से अहले बैते रिसालत का ये छोटा सा क़ाफ़िला रवाना होता है और दुन्या से सफर करने वाले बैतुल्लाहुल हराम का आखरी तवाफ़ कर के मगमुम कर दिया, मक्का का बच्चा बच्चा अहले बैत के इस काफिले को हरम शरीफ से रुख्सत होता देख कर आबदीदा और मगमुम हो रहा था मगर वो ज़ाबाज़ो के मीरे लश्कर और फिदाकारो के क़ाफ़िला सालार मर्दाना हिम्मत के साथ रवाना हुए।
     राह में जाते अर्क़ के मक़ाम पर बशीर इब्ने ग़ालिब असदि कुफासे आते मिले। हज़रते इमाम ने उन से अहले इराक़ का हाल पूछा, अर्ज़ किया की उन के कुलूब आप के साथ है और तलवारे बनी उमय्या के साथ और खुदा जो चाहता है करता है। हज़रते इमामرضي الله تعالي عنهने फ़रमाया सच है।
     आगे अब्दुल्लाह बिन मुतीअ से मुलाक़ात हुई। वो हज़रते इमामرضي الله تعالي عنه के बहुत दरपे हुए की आप इस सफर को तर्क फरमाए और इस में उन्होंने अंदेशे ज़ाहिर किये। हज़रते इमामرضي الله تعالي عنه ने फ़रमाया हमे वही मुसीबत पहुच सकती है जो ख़ुदावन्दे आलम ने हमारे लिये मुक़र्रर फरमा दी।

बाक़ी अगली पोस्ट में.. انشاء الله
*✍🏽सवानहे कर्बला, 129*
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Saturday, 8 October 2016

_*सजदए सहव*_ #03
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

_*निहायत अहम मसअला*_
कसीर इस्लामी भाई ना वाकिफिय्यत की बिना पर अपनी नमाज़ ज़ाए कर बैठते है लिहाज़ा ये मसअला खूब तवज्जोह से पढ़िये।

मसबुक (यानी जो एक या कई रकअते छूट जाने के बाद नमाज़ में शामिल हुवा) को इमाम के साथ सलाम फेरना जाइज़ नहीं, अगर क़सदन फिरेगा तो नमाज़ जाती रहेगी और अगर भूल कर इमाम के साथ बिला वक़्फ़ा फौरन सलाम फेरा तो हरज नहीं लेकिन ऐसा बहुत ही कम होता है और अगर भूल कर सलाम इमाम के कुछ भी बाद फेरा तो खड़ा हो जाए अपनी नमाज़ पूरी करके सज्दए सहव करे।

मसबुक इमाम के साथ सज्दए सहव करे अगर्चे उसके शरीक होने से पहले इमाम को सहव हुवा और अगर इमाम के साथ सज्दए सहव न किया और अपनी बाक़ी नमाज़ पढ़ने खड़ा हो गया तो आखिर में सज्दए सहव करे और इस मसबुक से अपनी नमाज़ में भी सहव हुवा तो आखिर में येही सज्दे इस इमाम वाले सहव के लिये भी काफी है।

क़ायदाए ऊला में तशह्हुद के बाद इतना पढ़ा *अल्लाहुम्म सल्ली अला मुहम्मदीन* तो सज्दए सहव वाजिब है।
इस की वजह ये नहीं कि दुरुद शरीफ पढ़ा बल्कि उस की वजह ये है कि तीसरी रकअत के क़याम में ताख़ीर हुई। लिहाज़ा अगर इतनी देर खामोश रहा जब भी सज्दए सहव वाजिब है।

किसी कायदे में तशह्हुद में कुछ रह गया तो सज्दए सहव वाजिब है नमाज़ फ़र्ज़ हो या नफ्ल।
*✍🏽नमाज़ के अहकाम स.209*
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*सवानहे कर्बला​* #
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*_शहादत के वाक़ीआत_*
*_​​कूफा को हज़रते मुस्लिम की रवानगी​​​​​​​​​​​​​​​​_* #08
     चुनांचे ये लोग हज़रते मुस्लिमرضي الله تعالي عنه को और उनके दोनों बेटो को इब्ने ज़ियाद के पास ले कर रवाना हुए। उस बद बख्त ने पहले ही से दरवाज़े के दोनों पहलुओ में अंदर की जानिब तेग ज़न छुपा कर खड़े कर दिये थे और उन्हें हुक्म दे दिया था की हज़रते मुस्लिमرضي الله تعالي عنه दरवाज़े में दाखिल हो तो एक दम दोनों तरफ से इन पर वार किया जाए।
     हज़रते मुस्लिमرضي الله تعالي عنه को इस की क्या खबर थी और आप इस मक्कारी क्र कय्यादि से क्या वाकिफ थे, आप आयते करीम *ऐ रब हमारे हम में और हमारी क़ौम में हक़ फैसला कर* (पारह 9) पढ़ते हुए दरवाज़े में दाखिल हुए। दाखिल होना था की अश्किया ने दोनों तरफ से तलवारो के वार किये और बनी हाशिम का मज़लूम मुसाफिर आदाए दिन की बे रहमी से शहीद हुवा।
     दोनों साहबज़ादे आप के साथ थे। उन्हों ने इस बे कसी की हालत में औने शफ़ीक़ वालिद का सर उन के मुबारक तन से जुदा होते देखा। छोटे छोटे बच्चों के दिल गम से फट गए और इस सदमे में वो बैद की तरह लराजने और काम्पने लगे। एक भाई दूसरे भाई को देखता था और उन की आँखों से अश्क जारी थे, लेकिन इस सितम में कोई इन नादानों पर रहम करने वाला न था, सितमगरो ने इन नौनिहालो को भी तेगे सितम से शहीद किया और हानि को क़त्ल करके सूली चढ़ाया।
     इन तमाम शहीदों के सर नेजो पर चढ़ा कर कूफा के गली कुचो में फिराए गए और बे हयाई के साथ कुफियो ने अपनी संग दिली और मेहमान कुशी का अमली तौर पर ऐलान किया।
     ये वाक़या 3 ज़िल हिज्जा सी. 60 ही. का है। इसी रोज़ मक्का से हज़रते इमामे हुसैन कूफा की तरफ रवाना हुए।
*✍🏽सवानहे कर्बला, 125*
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*सवानहे कर्बला​* #13
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*_शहादत के वाक़ीआत_*
*_कूफा को हज़रते मुस्लिम की रवानगी_*​​​​​​​​​​​​​​ #07
     हज़रते मुस्लिमرضي الله تعالي عنه ने उस औरत से पानी मांगा, उस ने आप को पहचान कर पानी दिया और अपनी सआदत समझ कर आप को अपने मकान में फरोश किया। उस औरत का बेटा मुहम्मद इब्ने अशअष का गुर्गा था, उसने फौरन ही उस को खबर दी और उस ने इब्ने ज़ियाद को इस पर मुत्तला किया।
     इब्ने ज़ियाद ने अम्र बिन हरीष (कोतवाले कूफा) और मुहम्मद बिन अशअष को भेजा, इन दोनों ने एक जमाअत साथ ले कर तूआ के घर का इहाता किया और चाहा की हज़रते मुस्लिमرضي الله تعالي عنه को गिरफ्तार कर ले।
     हज़रते मुस्लिमرضي الله تعالي عنه अपनी तलवार ले कर निकले और ब नाचारि आप ने उन जालिमो से मुक़ाबला शुरू किया। उन्हों ने देखा की हज़रते मुस्लिमرضي الله تعالي عنه इस जमाअत पर इस तरह टूट पड़े जेसे शेरे बबर अपने शिकार पर हमला आवर हो। आप के शेराना हमलो से दिल आवरो ने दिल छोड़ दिये और बहुत आदमी ज़ख़्मी हो गए, बाज़ मर गए।
     मालुम हुआ की बनी हाशिम के इस एक जवान से नामर्दाने कूफा की ये जमाअत नबर्द आज़मा नही हो सकती। अब तजवीज़ की, की कोई चाल चलनी चाहिये और किसी फरेब से हज़रते मुस्लिमرضي الله تعالي عنه पर क़ाबू पाने की कोशिश की जाए। ये सोच कर अम्नो सुलह का ऐलान कर दिया और हज़रते मुस्लिमرضي الله تعالي عنه से अर्ज़ किया की हमारे आप के दरमियान जंग की ज़रूरत नही है न हम आप से लड़ना चाहते है, मुद्दा सिर्फ इस क़दर है की इब्ने ज़ियाद के पास तशरीफ़ ले चले और उस से गुफ्तगू कर के मुआमला तै कर ले।
     हज़रते मुस्लिमرضي الله تعالي عنه ने फ़रमाया की मेरा खुद कसदे जंग नही और जिस वक़्त मेरे साथ 40000 का लश्कर था उस वक़्त भी में ने जंग नही की और में यही इन्तिज़ार करता रहा की इब्ने ज़ियाद गुफ्तगू कर के कोई शक्ले मुसालहत पैदा करे तो खून रेज़ी न हो।

बाक़ी अगली पोस्ट में.. انشاء الله
*✍🏽सवानहे कर्बला, 124*
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*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #
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*_सूरतुल बक़रह, आयत ⑥①_*
और जब तुमने कहा ऐ मूसा (4)
हम से तो एक खाने पर(5)
कभी सब्र न होगा तो आप अपने रब से दुआ की, कि ज़मीन की उगाई हुई चीज़ें हमारे लिये निकाले कुछ साग और ककड़ी और गेंहूं और मसूर और प्याज़.
फ़रमाया क्या मामूली चीज़ को बेहतर के बदले मांगते हो(6)
अच्छा मिस्त्र(7)
या किसी शहर में उतरो वहां तुम्हें मिलेगा जो तुमने मांगा(8)
और उनपर मुक़र्रर कर दी गई ख्व़ारी (ज़िल्लत) और नादारी (9)
और ख़ुदा के ग़ज़ब में लौटे(10)
ये बदला था उसका कि वो अल्लाह की आयतों का इन्कार करते और नबियों को नाहक़ शहीद करते (11)
ये बदला उनकी नाफ़रमानियों और हद से बढ़ने का

*तफ़सीर*
     (4) बनी इस्त्राईल की यह अदा भी बहुत बेअदबी की थी कि बड़े दर्जे वाले एक नबी को नाम लेकर पुकारा. या नबी, या रसूलल्लाह या और आदर का शब्द न कहा.
*✍🏽फ़त्हुल अज़ीज़*
     जब नबियों का ख़ाली नाम लेना बेअदबी है तो उनको मामूली आदमी और एलची कहना किस तरह गुस्ताख़ी न होगा. नबियों के ज़िक्र में ज़रा सी भी बेअदबी नाजायज़ है.
     (5) “एक खाने” से एक क़िस्म का खाना मुराद है.
     (6) जब वो इस पर भी न माने तो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने अल्लाह की बारगाह में दुआ की, हुक्म हुआ “इहबितू” (उतरो).
     (7) मिस्र अरबी में शहर को भी कहते हैं, कोई शहर हो और ख़ास शहर यानी मिस्र मूसा अलैहिस्सलाम का नाम भी है. यहां दोनों में से एक मुराद हो सकता है. कुछ का ख़याल है कि यहां ख़ास शहर मुराद नहीं हो सकता. मगर यह ख़याल सही नही है.
     (8) यानी साग, ककड़ी वग़ैरह, हालांकि इन चीज़ों की तलब गुनाह न थी लेकिन मन्न व सलवा जैसी बेमेहनत की नेअमत छोड़कर उनकी तरफ़ खिंचना तुच्छ विचार है. हमेशा उन लोगों की तबीयत तुच्छ चीज़ों और बातों की तरफ़ खिंची रही और हज़रत हारून और हज़रत मूसा वग़ैरह बुजुर्गी वाले बलन्द हिम्मत नबियों के बाद बनी इस्राईल की बदनसीबी और कमहिम्मती पूरी तरह ज़ाहिर हुई और जालूत के तसल्लुत (अधिपत्य) और बख़्ते नस्सर की घटना के बाद तो वो बहुत ही ज़लील व ख़्वार हो गए. इसका बयान “दुरेबत अलैहिमुज़ ज़िल्लतु” (और उन पर मुकर्रर कर दी गई ख़्वारी और नादारी) (सूरए आले ईमरान, आयत : 112) में है.
     (9) यहूद की ज़िल्लत तो यह कि दुनिया में कहीं नाम को उनकी सल्तनत नहीं और नादारी यह कि माल मौजूद होते हुए भी लालच की वजह से मोहताज ही रहते हैं.
     (10) नबियों और नेक लोगों की बदौलत जो रूत्बे उन्हें हासिल हुए थे उनसे मेहरूम हो गए. इस प्रकोप का कारण सिर्फ़ यही नहीं कि उन्होंने आसमानी ग़िज़ाओं के बदले ज़मीनी पैदावार की इच्छा की या उसी तरह और ख़ताएं हो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के ज़माने में उनसे हुई, बल्कि नबुव्वत के एहद से दूर होने और लम्बा समय गुज़रने से उनकी क्षमताएं बातिल हुई और निहायत बुरे कर्म और बड़े पाप उनसे हुए. ये उनकी ज़िल्लत और ख़्वारी के कारण बने.
     (11) जैसा कि उन्होने हज़रत ज़करिया और हज़रत यहया को शहीद किया और ये क़त्ल ऐसे नाहक़ थे जिनकी वजह ख़ुद ये क़ातिल भी नहीं बता सकते.
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*सवानहे कर्बला​* #12
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_शहादत के वाक़ीआत_*
*_कूफा को हज़रते मुस्लिम की रवानगी_*​​​​​​​​​​​​ #06
     हज़रते मुस्लिमرضي الله تعالي عنه इस गुर्बत व मुसाफरत में तन्हा रह गए। किधर जाए, कहा क़याम करे, हैरत है कूफा के तमाम मेहमान खानो के दरवाज़े बांध हो गए थे, नादान बच्चे साथ है, कहा उन्हें लिटाए, कहा सुलाए, कूफा के वसी खित्ते में दो चार गज़ ज़मीन हज़रते मुस्लिमرضي الله تعالي عنه के शब् गुज़ारने के लिये नज़र नहीं आती।
     उस वक़्त हज़रते मुस्लिमرضي الله تعالي عنه को इमामे हुसैनرضي الله تعالي عنه की याद आती है और दिल तड़पा देती है, वो सोचते है की मेने इमाम की जनाब में खत लिखा, तशरीफ़ आवरी की इल्तिजा की है और इस बद अहद क़ौम के इख्लास व अक़ीदत का एक दिलकश नक़्शा इमामे आली मक़ामرضي الله تعالي عنه के हुज़ूर पेश किया है और तशरीफ़ आवरी पर ज़ोर दिया है। यक़ीनन हज़रते इमाम हुसैनرضي الله تعالي عنه मेरी इल्तिजा रद नही फरमाएंगे और यहा के हालात से हालात से मुतमइन हो कर अहलो अयाल चल पड़े होंगे, यहाँ उन्हें क्या मसाइब और उन जन्नती फूलो को इस बे मेहरी की तपिश कैसे सुकून पोहचएगी।
     ये गम अलग दिल को घायल कर रहा था ओर अपनी तहरीर पर शर्मिंदगी और हज़रते इमामرضي الله تعالي عنه के लिये खतरात अलाहिदा बे चैन कर रहे थे और मौजूदा परेशानी जुदा दामनगिर थी।
     इस हालत में हज़रते मुस्लिमرضي الله تعالي عنه को प्यास मालुम हुई, एक घर सामने नज़र पड़ा जहा तूआ नामी एक औरत मौजूद थी उससे आप ने पानी मांगा।

बाक़ी अगली पोस्ट में.. انشاء الله
*✍🏽सवानहे कर्बला, 123*
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Friday, 7 October 2016

*सवानहे कर्बला​* #11
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_शहादत के वाक़ीआत_*
*_कूफा को हज़रते मुस्लिम की रवानगी​​​​​​​​​​_* #05
     ये लोग इब्ने ज़ियाद के हाथ में क़ैद थे और जानते थे की अगर इब्ने ज़ियाद को शिकस्त भी हुई तो वो किल्ला फ़त्ह होने तक इन का खातिमा कर देगा। इस खौफ से वो घबरा कर उठे और उन्होंने दीवारे किल्ला पर चढ़ कर अपने मुतअल्लीकीन व मुतवस्सिलिन से गुफ्तगू की और उन्हें हज़रते मुस्लिमرضي الله تعالي عنه की रफ़ाक़त छोड़ देने पर इन्तिहाई दर्जे का ज़ोर दिया और बताया की इलावा इस बात के की हुकूमत तुम्हारी दुश्मन हो जाएगी यज़ीदे नापाक तुम्हारे बच्चों को क़त्ल कर डालेगा, तुम्हारे माल लुटवा देगा, तुम्हारी जागीर व मकानात ज़ब्त हो जाएगे। ये और मुसीबत है की अगर तुम इमाम मुस्लिम के हाथ रहे तो हम जो इब्ने ज़ियाद के हाथ में क़ैद है किल्ले के अंदर मारे जाएगे, हमारे हाल पर रहम करो, अपने घरो पर चले जाओ।
     ये हिला कामयाब हुवा और हज़रते मुस्लिमرضي الله تعالي عنه का लश्कर मुन्तशिर होने लगा यहाँ तक की ता बवक़्ते शाम हज़रते मुस्लिमرضي الله تعالي عنه ने मस्जिदे कूफा में जिस वक़्त मगरिब की नमाज़ शुरू की तो आप के साथ 500 आदमी थे और जब आप नमाज़ से फरीक हुए तो आपके साथ एक भी न था। तमन्नाओ के इज़हार और इलतीजाओ के तुमार से जिस अज़ीज़ मेहमान को बुलाया था उस के साथ ये वफ़ा है की वो तन्हा है और इन की रफ़ाक़त के लिये कोई भी मौजूद नही।
     कूफा वालो ने हज़रते मुस्लिमرضي الله تعالي عنه को छोड़ने से पहले गैरत व हमिय्यत से कतए तअल्लुक़ किया और उन्हें ज़रा परवाह न हुई की क़यामत तक तमाम आलम में उनकी बे हिम्मती का शोहरा रहेगा और इस बुज़दिलाना बे मुरव्वती और नामर्दी से वो रुस्वाए आलम होंगे।
     हज़रते मुस्लिमرضي الله تعالي عنه इस गुर्बत व मुसाफरत में तन्हा रह गए।

बाक़ी अगली पोस्ट में.. انشاء الله
*✍🏽सवानहे कर्बला, 123*
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_*सजदए सहव*_ #02
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

नमाज़ में अगर्चे 10 वाजिब तर्क हुए हो, सहव के दो ही सज्दे सब के लिये काफी है।

रूकू के बाद सीधा खड़ा होना या दो सजदों के दरमियान एक बार *सुब्हान अल्लाह* कहने की क़िक़दार सीधा बेठना भूल गए तो सज्दए सहव वाजिब है।

क़ुनूत या तकबीरे क़ुनूत भूल गए तो सज्दए सहव वाजिब है।

किराअत वग़ैरा किसी मौक़ा पर सोचने में *3 बार सुब्हान अल्लाह* कहने का वक़्फ़ा गुज़र गया तब सज्दए सहव वाजिब हो गया।

सज्दए सहव के बाद भी अत्तहिय्यात पढ़ना वाजिब है।

इमाम से सहव हुवा और सज्दए सहव किया तो मुक्तदि पर भी सज्दा वाजिब है।

अगर मुक्तदि से ब हालते इक़्तिदा सहव वाके हुवा तो सज्दए सहव वाजिब नहीं।
और नमाज़ लौटने की भी हाजत नहीं।

📮बाक़ी कल की पोस्ट में.. انشاء الله
*✍🏽नमाज़ के अहकाम स.208*
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*सवानहे कर्बला​* #10
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
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*_शहादत के वाक़ीआत_*
*_कूफा को हज़रते मुस्लिम की रवानगी_*​​​​​​​​ #04
     अगर मुस्लिम बिन अक़ीलرضي الله تعالي عنه हमला करने का हुक्म देते तो उसी वक़्त किल्ला फ़त्ह पाता और इब्ने ज़ियाद और उस के हमराही हज़रते मुस्लिमرضي الله تعالي عنه के हाथ में गिरफ्तार होते और येही लश्कर सैलाब की तरह उमड़ कर शामियो को ताख्त व ताराज कर डालता और यज़ीद को जान बचाने के लिये कोई राह न मिलती।
     नकाशा तो यही जमा था मगर बन्दों का सोचा क्या होता है। हज़रते मुस्लिमرضي الله تعالي عنه ने किल्ले का इहाता तो लार लिया और बा वुजूद ये की कुफियो की बदअहदी और इब्ने ज़ियाद की फरेबकारी और यज़ीद की अदावत पुरे तौर पर षाबित हो चुकी थी। फिर भी आप ने अपने लश्कर को हमले का हुक्म न दिया और एक बादशाह दाद गुस्तर के नायब की हेशिय्यत से आपने इन्तिज़ार फ़रमाया की पहले गुफ्तगू से कतए हुज्जत कर लिया जाए और सुलह की सूरत पैदा हो सके तो मुसलमानो में खून रेज़ी न होने दी जाए।
     आप अपने इस पाक इरादे से इंतज़ार में रहे और अपनी एहतियात को हाथ से जाने न दिया, दुश्मन ने इस वक्फे से फायदा उठाया और कूफा के रऊसा व अमाइद जिन को इब्ने ज़ियाद ने पहले से किल्ले में बंद कर रखा था इन्हें मजबूर किया की वो अपने रिश्तेदारो और ज़ेरे अशर लोगो को मजबूर कर के हज़रते मुस्लिम की जमाअत से अलाहिदा कर दे।

बाक़ी अगली पोस्ट में.. انشاء الله
*✍🏽सवानहे कर्बला, 122*
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*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #54
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
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*_सूरतुल बक़रह, आयत ⑥ⓞ_*
और जब मूसा ने अपनी क़ौम के लिये पानी मांगा तो हमने फ़रमाया इस पत्थर पर अपनी लाठी मारो फ़ौरन उस में से बारह चश्में बह निकले(1)
हर समूह ने अपना घाट पहचान लिया, खाओ पियो ख़ुदा का दिया(2)
और ज़मीन में फ़साद उठाते न फिरो(3)

*तफ़सीर*
     (1) जब बनी इस्त्राईल ने सफ़र में पानी न पाया तो प्यास की तेज़ी की शिकायत की. हज़रत मूसा को हुक्म हुआ कि अपनी लाठी पत्थर पर मारें.  आपके पास एक चौकोर पत्थर था. जब पानी की ज़रूरत होती, आप उस पर अपनी लाठी मारते, उससे बारह चश्मे जारी हो जाते, और सब प्यास बुझाते, यह बड़ा मोजिज़ा (चमत्कार) है.
     लेकिन नबियों के सरदार सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की मुबारक उंगलियों से चश्मे जारी फ़रमाकर एक बड़ी जमाअत की प्यास और दूसरी ज़रूरतों को पूरा फ़रमाना इससे बहुत बड़ा और उत्तम चमत्कार है. क्योंकि मनुष्य के शरीर के किसी अंग से पानी की धार फूट निकलना पत्थर के मुक़ाबले में ज़्यादा आश्चर्य की बात है.
*✍🏽ख़ाज़िन व मदारिक*
     (2) यानी आसमानी खाना मन्न व सलवा खाओ और पत्थर के चश्मों का पानी पियो जो तुम्हें अल्लाह की कृपा से बिना परिश्रम उपलब्ध है.
     (3) नेअमतों के ज़िक्र के बाद बनी इस्त्राईल की अयोग्यता, कम हिम्मती और नाफ़रमानी की कुछ घटनाएं बयान की जाती हैं.
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*सवानहे कर्बला​* #09
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_शहादत के वाक़ीआत_*
*_कूफा को हज़रते मुस्लिम की रवानगी​​​​​​_* #03
     इब्ने ज़ोयाद गवर्नर हाउस में दाखिल हो गया उस वक़्त कुफि ये समझे की ये हज़रते इमाम हुसैनرضي الله تعالي عنه न थे बल्कि इब्ने ज़ियाद इस फरेब कारी के साथ आया और उन्हें हसरत व मायूसी हुई।
     रात गुज़ार कर इब्ने ज़ियाद सुब्ह को अहले कूफा को जमा किया और हुकूमत का परवाना पढ़ कर इन्हें सुनाया और यज़ीद की मुखालिफत से डराया धमकाया, तरह तरह के हिलो से हज़रते मुस्लिम की जमाअत को मुन्तशिर कर दिया।
     हज़रते मुस्लिमرضي الله تعالي عنه ने हानि बिन उर्वा के मकान में इक़ामत फ़रमाई। इब्ने ज़ियाद ने मुहम्मद बिन अशअष को एक दस्ता फौज के साथ हानि के मकान पर भेज कर उस को गितफ्तार करा मंगाया और कैद कर लिया, कूफा के तमाम रऊसा व अमाइद को भी किल्ले में नज़र बंद कर लिया।
     हज़रते मुस्लिमرضي الله تعالي عنه ये खबर पा कर बर आमद हुए और आपने अपने मुतवस्सिलिन को आवाज़ दी, लोग आने शुरू हो गए 40000 की जमाअत हो गई, सूरत बन गई थी हमला करने की देर थी।

बाक़ी अगली पोस्ट में.. انشاء الله
*✍🏽सवानहे कर्बला, 121*
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Thursday, 6 October 2016

*सवानहे कर्बला​* #09
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_शहादत के वाक़ीआत_*
*_कूफा को हज़रते मुस्लिम की रवानगी​​​​_* #02
     उबैदुल्लाह बिन यज़ीद बहुत मक्कार व कय्याद था, वो बसरा से रवाना हुवा और उसने अपनी फ़ौज को क़ादिसिय्या में छोड़ा और खुद हिजाज़ियो का लिबास पहन कर ऊंट पर सुवार हुवा और चन्द आदमी हमराह ले कर शब् की तारीकी में मगरिब व ईशा के दरमियान उस राह से कूफा में दाखिल हुवा जिस से हिजज़ी काफिले आया करते थे। इस मक्कारी से उस का मतलब ये था की इस वक़्त अहले कूफा में बहुत जोश है, ऐसे तौर पर दाखिल होना चाहिए की वो इब्ने ज़ियाद को न पहचाने और ये समझे की हज़रते इमाम हुसैनرضي الله تعالي عنه तशरीफ़ ले आए ताकि वो बे खतरा व अन्देशा अम्न व आफिय्यत के साथ कूफा में दाखिल हो जाए।
     चुनांचे ऐसा ही हुवा, अहले कूफा जिन को हर लम्हा हज़रते इमामे आली मक़ामرضي الله تعالي عنه की तशरीफ़ आवरी का इन्तिज़ार था, उन्हों ने धोका खाया और शब् की तारीकी में हिजाज़ी लिबास और हिजाज़ी राह से आता देख कर समझे की हज़रते इमामرضي الله تعالي عنه तशरीफ़ ले आए। नारऐ मुसर्रत बुलन्द किये, गिर्दो पेश मरहबा कहते चले।
     ये मर्दुद दिल में तो जलता रहा और इस ने अंदाज़ा कर लिया की कुफियो को हज़रते इमाम की तशरीफ़ आवरी का इंतज़ार है और इन के दिल उन की तरफ माइल है मगर उस वक़्त की मस्लहत से खामोश रहा ताकि इन पर उसका मक्र खुल न जाए यहाँ तक की दारुल अम्मारा (गवर्नर हाउस) में दाखिल हो गया।
*✍🏽सवानहे कर्बला, 120*
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_*सजदए सहव*_ #01
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

वाजीबाते नमाज़ में से अगर कोई वाजिब भूले से रह जाए या फराइज़ व वाजीबाते नमाज़ में भूले से ताख़ीर हो जाए तो सज्दए सहव वाजिब है।

अगर सज्दए सहव वाजिब होने के बा वुजूद न किया तो नमाज़ लौटाना वाजिब है।

कोई ऐसा वाजिब तर्क हुवा जो वाजीबाते नमाज़ से नहीं बल्कि इसका वुजुब अम्रे खारिज से हो तो सज्दए सहव वाजिब नहीं..
मसलन ख़िलाफे तरतीब क़ुरआन पढ़ना तर्के वाजिब (और गुनाह) है मगर इसका तअल्लुक़ वाजीबाते नमाज़ से नहीं बल्कि वाजीबाते तिलावत से है लिहाज़ा सज्दए सहव नहीं (अलबत्ता इससे तौबा करे)

फ़र्ज़े तर्क होने से नमाज़ जाती रहती है सज्दए सहव से इसकी तलाफि नहीं हो सकती लिहाज़ा दोबारा पढ़िये।

सुन्नते या मुस्तहब्बात मसलन *सना,* *तअव्वुज़,* *तस्मिया,* *आमीन,* *तकबिराने इन्तिक़ालात* और *तस्बिहात* के तर्क से सज्दए सहव वाजिब नहीं होता, नमाज़ हो गई,
मगर दोबारा पढ़ लेना मुस्तहब है भूल कर तर्क किया हो या जानबुझ कर।

बाक़ी अगली पोस्ट में.. انشاء الله
*✍🏽नमाज़ के अहकाम स.207*
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*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #53
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_सूरतुल बक़रह, आयत ⑤⑨_*
तो ज़ालिमों ने बात बदल दी जो फ़रमाई गई थी उसके सिवा(19)
तो हमने आसमान से उनपर अज़ाब उतारा(20)
बदला उनकी बे हुकमी का

*तफ़सीर*
     (19) बुख़ारी और मुस्लिम की हदीस में है कि बनी इस्राईल को हुक्म हुआ था कि दर्वाज़े में सज्दा करते हुए दाख़िल हों और ज़बान से “हित्ततुन” यानी तौबह और माफ़ी का शब्द कहते जाएं. उन्होंने इन दोनों आदेशों के विरूद्ध  किया. दाख़िल तो हुए पर चूतड़ों के बल घिसरते और तौबह के शब्द की जगह मज़ाक के अंदाज़ में “हब्बतुन फ़ी शअरतिन” कहा जिसके मानी हैं बाल में दाना.
     (20) यह अज़ाब ताऊन (प्लेग) था जिससे एक घण्टे में चौबीस हज़ार हलाक हो गए. यही हदीस की किताबों में है कि ताऊन पिछली उम्मतों के अज़ाब का शेष हिस्सा हैं. जब तुम्हारे शहर में फैले, वहां से न भागो. दूसरे शहर में हो तो ताऊन वाले शहर में न जाओ. सही हदीस में है कि जो लोग वबा के फैलने के वक़्त अल्लाह की मर्ज़ी पर सर झुकाए सब्र करें तो अगर वो वबा (महामारी) से बच जाएं तो भी उन्हें शहादत का सवाब मिलेगा.
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*सवानहे कर्बला​* #08
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
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*_शहादत के वाक़ीआत_*
*_कूफा को हज़रते मुस्लिम की रवानगी​​_* #02
     हज़रते मुस्लिम बिन अक़ीलرضي الله تعالي عنه ने अहले इराक़ की गिरविदगी व अक़ीदत देख कर हज़रते इमाम हुसैनرضي الله تعالي عنه की जनाब में अरिज़ा लिखा जिस मे यहा के हालात की इत्तिला दी और इलतिमास की, की ज़रूरत है की हज़रत जल्द तशरीफ़ लाए ताकि बन्दगाने खुदा, नापाक के शर से महफूज़ रहे और दिने हक़ की ताईद हो, मुसलमान इमामे हक़ की बैअत से मुशर्रफ व फ़ैज़याब हो सके।
     अहले कूफा का ये जोश देख कर हज़रते नोमान बिन बशीर सहाबी ने जो उस ज़माने में हुकूमते शाम की जानिब से कूफा के गवर्नर थे। अहले कूफा को मुत्तलअ किया की ये बैअत यज़ीद की मर्ज़ी के खिलाफ है और वो इस पर बहुत भड़केगा लेकिन इतनी इत्तला दे कर ज़ाबिते की कार्रवाई पूरी कर के हज़रते नोमान बिन बशीर खामोश हो बेठे और इस मुआमले में किसी किस्म की दस्त अंदाज़ी न की।
      मुस्लिम बिन यज़ीद हज़्रमि और अम्मार बिन वलीद बिन उक़बा ने यज़ीद को इत्तला दी की हज़रते मुस्लिम बिन अक़ील तशरीफ़ लाए है और अहले कूफा में इन की महब्बत व अक़ीदत का जोश दम बदम बढ़ रहा है। हज़ारहा आदमी इन के हाथ पर इमाम हुसैन की बैअत कर चुके है और नोमान बिन बशीर ने अब तक कोई कार्रवाई उन के खिलाफ नही की न इनसीदादी तदाबिर अमल में लाए।
     यज़ीद ने ये इत्तला पते ही मोमान बिन बशीर को माज़ूल किया  और उबैदुल्लाह बिन यज़ीद को जो उसकी तरफ से बसरा का गवर्नर था उन का क़ाइम मक़ाम किया।

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Wednesday, 5 October 2016

*सवानहे कर्बला​* #08
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
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*_शहादत के वाक़ीआत_*
*_कूफा को हज़रते मुस्लिम की रवानगी_* #01
     हज़रते मुस्लिम बिन अक़ीलرضي الله تعالي عنه को कूफा रवाना फ़रमाया और अहले कूफा को तहरीर फ़रमाया की तुम्हारी इस्तिदआ पर हम हज़रते मुस्लिमرضي الله تعالي عنه को रवाना करते है इन की नुसरत व हिमायत तुम पर लाज़िम है।
     हज़रते मुस्लिमرضي الله تعالي عنه के दो फ़रज़न्द मुहम्मद और इब्राहिम जो अपने बाप के बहुत प्यारे बेटे थे इस सफर में अपने पिदरे मुशफ़िक़ के हमराह हुए।
     हज़रते मुस्लिमرضي الله تعالي عنه ने कूफा पहुच कर मुख्तार बिन अबी उबैद के मकान पर क़याम फ़रमाया आप की तशरीफ़ आवरी की खबर सुन कर जुक जुक मख्लूक़ आप की ज़ियारत को आई और 12000 से ज़्यादा तादाद ने आप के दस्ते मुबारक पर हज़रते इमामे हुसैनرضي الله تعالي عنه की बैअत की।

बाक़ी अगली पोस्ट में.. انشاء الله
*✍🏽सवानहे कर्बला, 118*
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*नमाज़े वित्र् के मदनी फूल*
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नमाज़े वित्र् वाजिब है, अगर ये छूट जाए तो इसकी क़ज़ा लाज़िम है।
*✍🏽दुर्रेमुखतार, रद्दलमोहतार, 2/532*

वित्र् का वक़्त ईशा के फर्ज़ो के बाद से सुबह सादिक़ तक है, जो सो कर उठने पर क़ादिर हो उस के लिये अफज़ल है कि पिछली रात में उठ कर पहले तहज्जुद अदा करे फिर वित्र्।
*✍🏽गुन्यातुल मुस्तमली, 403*

इसकी 3 रकअत है, इसमें क़ादए ऊला वाजिब है सिर्फ तशह्हुद पढ़ कर खड़े हो जाइये।

तीसरी रकअत में किराअत के बाद तकबीरे क़ुनूत कहना वाजिब है।

जिस तरह तकबीरे तहरिमा कहते है इसी तरह पहले हाथ कानो तक उठाये फिर अल्लाहु अक्बर कहिये, फिर हाथ बांध कर दुआए क़ुनूत पढ़िये।

दुआए क़ुनूत के बाद दुरुद शरीफ पढ़ना बेहतर है
*✍🏽गुन्यातुल मुस्तमली, 402*

जो दुआए क़ुनूत न पढ़ सके वो ये पढ़े
*अल्लाहुम्म रब्बना आतिना फिद-दुन्या हसनतव वफिल आखिरती हसनतव वक़ीन अज़ाबन्नार*

अगर दुआए क़ुनूत पढ़ना भूल गए और रूकू में चले गए तो वापस न लौटीये बल्कि सजदए सहव कर लीजिये।

वित्र् जमाअत से पढ़ी जा रही हो और मुक्तदि क़ुनूत से फारिग न हुवा था कि इमाम रूकू में चला गया तो मुक्तदि भी रूकू में चला जाए।
*✍🏽आलमगिरी 1/110*
 *✍🏽नमाज़ के अहकाम स.206*
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*सवानहे कर्बला​* #07
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
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*_​​​इमाम की जनाब में कुफियो की दरख्वास्ते​​​_* #03
अगर्चे अकाबिर सहाबए किराम हज़रते इब्ने अब्बास व हज़रते इब्ने उमर व हज़रते जाबिर व हज़रते अबू सईद व हज़रते अबू वाक़ीद लैषीرضي الله تعالي عنهم वग़ैरहु हज़रते इमामे हुसैनرضي الله تعالي عنه की इस राय से मुत्तफ़िक़ न थे और इन्हें कुफियो के अहद व मवाषिक का ऐतिबार न था, इमाम की महब्बत और शहादते इमाम की शोहरत इन सब के दिलो में इख्तिलाज पैदा कर रही थी, गोकि ये यक़ीन करने की भी कोई वजह न थी की शहादत का येही वक़्त है और इसी सफर में ये मरहला दरपेश होगा लेकिन अन्देशा मानेअ था। हज़रते इमामे हुसैनرضي الله تعالي عنه के सामने मसअले की ये सूरत दरपेश थी की इस दस्तिदआ को रोकने के लिये उज़्रे शरई क्या है।

     इधर ऐसे जलिलुल क़द्र सहाबा के शदीद इसरार का लिहाज़, उधर अहले कूफा की इस्तिदआ रद न फरमाने के लिये कोई शरई उज़्र न होना हज़रते इमामرضي الله تعالي عنه के लिये निहायत पेचीदा मसअला था जिस का हल ब जुज़ इस के कुछ नज़र न आया की पहले हज़रते इमाम मुस्लिमرضي الله تعالي عنه को भेजा जाए अगर कुफियो ने बद अहदी व बे वफाई की तो उज़्रे शरई मिल जाएगा और अगर वो अपने अहद पर क़ाइम रहे तो सहाबा को तसल्ली दी जा सकेगी।
*✍🏽सवानहे कर्बला, 117*
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*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #52

*_​​सूरतुल बक़रह, आयत ⑤⑧_*
और जब हमने फ़रमाया उस बस्ती में जाओ (16)
फिर उसमें जहां चाहो, बे रोक टोक खाओ और दरवाज़ें में सजदा करते दाख़िल हो(17)
और कहो हमारे गुनाह माफ़ हों हम तुम्हारी ख़ताएं बख्श़ देंगे और क़रीब है कि नेकी वालों को और ज्य़ादा दें(18)

*तफ़सीर*
     (16) “उस बस्ती” से बैतुल मक़दिस मुराद है या अरीहा जो बैतुल मक़दिस से क़रीब है, जिसमें अमालिक़ा आबाद थे और उसको ख़ाली कर गए. वहां ग़ल्ले मेवे की बहुतात थी.
     (17) यह दर्वाज़ा उनके लिये काबे के दर्जे का था कि इसमें दाख़िल होना और इसकी तरफ़ सज्दा करना गुनाहों के प्रायश्चित का कारण क़रार दिया गया.
     (18) इस आयत से मालूम हुआ कि ज़बान से माफ़ी मांगना और बदन की इबादत सज्दा वग़ैरह तौबह का पूरक है. यह भी मालूम हुआ कि मशहूर गुनाह की तौबह ऐलान के साथ होनी चाहिये. यह भी मालूम हुआ कि पवित्र स्थल जो अल्लाह की रहमत वाले हों, वहाँ तौबह करना और हुक्म बजा लाना नेक फलों और तौबह जल्द क़ुबूल होने का कारण बनता है.
*✍🏽फ़त्हुल अज़ीज़*
     इसी लिये बुज़ुर्गों का तरीका़ रहा है कि नबियों और वलियों की पैदाइश की जगहों और मज़ारात पर हाज़िर होकर तौबह और अल्लाह की बारगाह में सर झुकाते हैं. उर्स और दर्गाहों पर हाज़िरी में भी यही फ़ायदा समझा जाता है.
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सवानहे कर्बला​​

#06
​بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ​
​اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ​

*_​इमाम की जनाब में कुफियो की दरख्वास्ते​_* #02
     अगर्चे इमामे हुसैनرضي الله تعالي عنه की शहादत की खबर मसहूर थी और कुफियो की बे वफाई का पहले भी तजिरबा हो चूका था मगर जब यज़ीद बादशाह बन गया और उस की हुकूमत व सल्तनत दिन के लिये खतरा थी और इस वजह से उस की बैअत न रवा थी और वो तरह तरह की तदबिरो और हिलो से चाहता था की लोग उस की बैअत करे।
     इन हालात में कुफियो का बपासे मिल्लत यज़ीद की बैअत से दस्तकशि करना और हज़रते इमामرضي الله تعالي عنه से तालिबे बैअत होना इमाम पर लाज़िम करता था इन की दरख्वास्त क़बूल फरमाए जब एक क़ौम ज़ालिम व फ़ासिक़ की बैअत पर राज़ी न हो और साहिबे इस्तिहक़ाक़ अहल से दरख्वास्ते बैअत करे इस पर अगर वो इनकी इस्तीदआ क़बूल न करे तो इस के ये माना होते है की वो इस क़ौम को इस जाबिर ही के हवाले करना चाहता है।
     इमामे हुसैनرضي الله تعالي عنه अगर उस वक़्त कुफियो की दरख्वास्त क़बूल न फरमाते तो बारगाहे इलाहि में कुफियो के इस मुतालबे का इमाम के पास क्या जवाब होता की हम हर चन्द दरपे हुए मगर इमाम हुसैनرضي الله تعالي عنه बैअत के लिये राज़ी न हुए। यही वजह हमे यज़ीद के जुल्मो तशद्दुद से मजबूर हो कर उसकी बैअत करनी पड़ी अगर इमाम हाथ बढ़ाते तो हम इन पर जाने फ़िदा करने के लिये हाज़िर थे। ये मसअला ऐसा दरपेश आया जिस का हल बजुज़ इस के और कुछ न था की हज़रते इमामرضي الله تعالي عنه उन की दावत पर लबैक फरमाए।

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Tuesday, 4 October 2016

*सवानहे कर्बला​* #05
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*इमाम की जनाब में कुफियो की दरख्वास्ते*
     यज़ीदियो कि कोशिशो से अहले शाम से जहां यज़ीद की तख्तगाह थी यज़ीद की राए मिल सकी और वहा के बाशिन्दों ने उस की बैअत की। अहले कूफा अमीरे मुआवियाرضي الله تعالي عنه के ज़माने ही में हज़रते इमाम हुसैनرضي الله تعالي عنه किं खिदमत में दरख्वास्ते भेज रहे थे, तशरीफ़ आवरी की इलतीजाए कर रहे थे लेकिन इमाम ने साफ़ इनकार कर दिया था।
     अमीरे मुआवियाرضي الله تعالي عنه की वफ़ात और यज़ीद की तख्त नशीनी के बाद अहले इराक़ की जमाअतो ने मुत्तफ़िक़ हो कर इमामرضي الله تعالي عنه की खिदमत में दरख्वास्त भेजी और इन में अपनी नियाज़ मन्दी व जज़्बाते अक़ीदत व इख्लास का इज़हार किया और हज़रते इमामرضي الله تعالي عنه पर अपने जानो माल फ़िदा करने की तमन्ना ज़ाहिर की।
     इस तरह के इल्तिज़ानामो और दरख्वास्तो का सिलसिला बंध गया और तमाम जमाअतो और फिरको की तरफ से 150 से करीब अर्जियां हज़रते इमामे आली मक़ाम की खिदमत में पहुची, कहा तक इगमाज़ किया जाता और कब तक आप के अख़लाक़ जवाबे खुश्क की इजाज़त देते ? ना चार आप ने अपने चचाज़ाद भाई हज़रते मुस्लिम बिन अक़ीलرضي الله تعالي عنه की रवानगी तजवीज़ फ़रमाई।

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*✍🏽सवानहे कर्बला, 116*
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*सवानहे कर्बला​* #04
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*हज़रते इमाम हुसैन की मदीने से रिहलत*
     मदनी से हज़रते इमाम हुसैनرضي الله تعالي عنه की रिहलत का दिन अहले मदीना और खुद हज़रते इमाम के लिये कैसे रंजो अन्दोह का दिन था। अतराफे आलम से तो मुसलमान वतन तर्क कर के अइज़्ज़ा व अहबाब को छोड़ कर मदीना तैय्यबा हाज़िर होने की तमन्नाए करे, दरबारे रिसालत की हाज़िरी का शौक़ दुश्वार गुज़ार मन्ज़िले और बहरो बर का तवील और खौफनाक सफर इख़्तियार करने के लिये बेक़रार बना दे। एक एक लम्हे की जुदाई इन्हें शाक हो, और फरज़न्दे रसूल से रिहलत करने पर मजबूर हो।
     उस वक़्त का तसव्वुर दिल को पाश पाश कर देता है जब हज़रते इमामे हुसैनرضي الله تعالي عنه बईरादए रुख्सत आस्तानाए कुदसिय्या पर हाज़िर हुए होंगे और दिदए खून बार अश्के गम की बारिश की होगी। दिल दर्द मन्दे गमे महजुरि से घायल होगा, जद्दे करीम को रोज़ए ताहिरा से जुदाई का सदमा हज़रते इमाम के दिल पर रंजो गम के पहाड़ तोड़ रहा होगा, अहले मदीना की मुसीबत का भी क्या अंदाज़ा हो सकता है।
     दीदारे हबीब के फिदाई इस फ़रज़न्द की ज़ियारत से अपने कल्बे मजरूह को तस्कीन देते थे। इन का दीदार इन के दिल का क़रार था, आह ! आज ये क़रारे दिल मदीना से रुख्सत हो रहे है। इमामे आली मक़ामرضي الله تعالي عنه ने मदीना से बहज़ार गम व अन्दोह बादिले नाशाद रिहलत फरमा कर मक्का में इक़ामत फ़रमाई।
*✍🏽सवानहे कर्बला, 115*
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*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान*

#52
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_सूरतुल बक़रह, आयत ⑤⑤_*
और जब तुमने कहा ऐ मूसा हम हरगिज़ (कदाचित) तुम्हारा यक़ीन न लाएंगे जब तक खुले बन्दों ख़ुदा को न देख लें तो तुम्हें कड़क ने आ लिया और तुम देख रहे थे

*_सूरतुल बक़रह, आयत ⑤⑥_*
फिर मेरे पीछे हमने तुम्हें ज़िन्दा किया कि कहीं तुम एहसान मानो

*_सूरतुल बक़रह, आयत ⑤⑦_*
और हमने बादल को तुम्हारा सायबान किया(14)
और तुमपर मत्र और सलवा उतारा, खाओ हमारी दी हुई सुथरी चीज़ें(15)
ओर उन्होंने कुछ हमारा न बिगाड़ा, हां अपनी ही जानों का बिगाड़ करते थे

*तफ़सीर*
     (14) जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम फ़ारिग़ होकर बनी इस्राईल के लश्कर में पहुंचे और आपने उन्हें अल्लाह का हुक्म सुनाया कि मुल्के शाम हज़रत इब्राहीम और उनकी औलाद का मदफ़न (अन्तिम आश्रय स्थल) है, उसी में बैतुल मक़दिस है. उसको अमालिक़ा से आज़ाद कराने के लिए जिहाद करो और मिस्र छोड़कर वहीं अपना वतन बनाओं।
     मिस्र का छोड़ना बनी इस्राईल पर बड़ा भारी था. पहले तो वो काफ़ी आगे पीछे हुए और जब अपनी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ सिर्फ़ अल्लाह के हुक्म से मजबूर होकर हज़रत हारून और हज़रत मूसा के साथ रवाना हुए तो रास्ते में जो कठिनाई पेश आती, हज़रत मूसा से शिकायत करते. जब उस सहरा (मरूस्थल) में पहुंचे जहां हरियाली थी न छाया, न ग़ल्ला साथ था. वहां धूप की तेज़ी और भूख की शिकायत की. अल्लाह तआला ने हज़रत मूसा की दुआ से सफ़ेद बादल को उनके सरों पर छा दिया जो दिन भर उनके साथ चलता. रात को उनके लिए प्रकाश का एक सुतून (स्तम्भ) उतरता जिसकी रौशनी में काम करते. उनके कपड़े मैले और पुराने न होते, नाख़ुन और बाल न बढ़ते, उस सफ़र में जो बच्चा पैदा होता उसका लिबास उसके साथ पैदा होता, जितना वह बढ़ता, लिबास भी बढ़ता.
     (15) मन्न, तरंजबीन (दलिया) की तरह एक मीठी चीज़ थी, रोज़ाना सुब्ह पौ फटे सूरज निकलने तक हर आदमी के लिये एक साअ के बराबर आसमान से उतरती. लोग उसको चादरों में लेकर दिन भर खाते रहते. सलवा एक छोटी चिड़िया होती है. उसको हवा लाती. ये शिकार करके खाते. दोनों चीज़ें शनिवार को बिल्कुल न आतीं, बाक़ी हर रोज़ पहुंचतीं. शुक्रवार को और दिनों से दुगुनी आतीं. हुक्म यह था कि शुक्रवार को शनिवार के लिये भी ज़रूरत के अनुसार जमा कर लो मगर एक दिन से ज़्यादा का न जमा करो.
     बनी इस्राईल ने इन नेअमतों की नाशुक्री की. भंडार जमा किये, वो सड़ गए और आसमान से उनका उतरना बंद हो गया. यह उन्होंने अपना ही नुक़सान किया कि दुनिया में नेअमत से मेहरूम और आख़िरत में अज़ाब के हक़दार हुए.
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सवानहे कर्बला​

#03
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_अमीरे मुआविया की वफ़ात और यज़ीद की सल्तनत_*
     अमीरे मुआवियाرضي الله تعالي عنه ने रजब सी 60 ही में दमिश्क़ में लक़्वा में मुब्तला हो कर वफ़ात पाई। आप के पास हुज़ूरﷺ के तबर्रुकात में से इजार शरीफ, रिदाए अक़दस, क़मिस मुबारक, मुए शरीफ और तराशहाए। नाख़ून हुमायूँ थे। आप ने वसिय्यत की थी की मुझे हुज़ूरﷺ की इजार व रिदाए मुबारक व क़मीज़ में दफ़्न दिया जाए और मेरे इन आज़ा पर जिन से सज्दा किया जाता है हुज़ूरﷺ के मुए मुबारक और तराशहाए नाखून रख दिये जाए।
     अमीरे मुआवियाرضي الله تعالي عنه की वफ़ात के बाद यज़ीद तख्ते सल्तनत पर बैठा और उस ने अपनी बैअत लेने के लिये अतराफ़ व मुमालिक सल्तनत में मकतूब रवाना किये, मदीने का आमिल जब यज़ीद की बैअत लेने के लिये हज़रते इमाम हुसैनرضي الله تعالي عنه की खिदमत में हाज़िर हुवा तो आप ने उस के फिस्को ज़ुल्म की बिना पर उस को ना अहल क़रार दिया और बैअत से इनकार फ़रमाया, इसी तरह हज़रते ज़ुबैरرضي الله تعالي عنه ने भी इनकार किया।
     हज़रते इमाम हुसैनرضي الله تعالي عنه जानते थे की बैअत का इनकार यज़ीद के इश्तिआल का बाईष होगा और ना बकार जान का दुश्मन और खून का प्यासा हो जाएगा, लेकिन इमाम के दीयानत व तक़वा ने इजाज़त न दी की अपनी जान की खातिर न अहल के हाथ पर बैअत कर ले और मुसलमानो की तबाही और शरअ व अहकाम की बे हुर्मति और दिन की मज़र्रत की परवाह न करे और ये इमाम जेसे जलीलुश्शान फ़रज़न्दे रसूलﷺ से किस तरह मुमकिन था ?
     अगर इमामرضي الله تعالي عنه उस वक़्त यज़ीद की बैअत कर लेते तो यज़ीद आप की बहुत क़द्रों मन्ज़िलत करता और आप की आफिय्यत व राहत में कोई फ़र्क़ न आता बल्कि बहुत सी दौलते दुन्या आप के पास जमा हो जाती, लेकिन इस्लाम का निज़ाम दरहम बरहम हो जाता और दिन में ऐसा फसाद बरपा हों जाता जिस का दूर करना बाद को मुमकिन न होता। यज़ीद की हर बदकारी के जवाज़ के लिये इमाम की बैअत सनद होती और शरीअते इस्लामिया व मिल्लते हनफिया का नक़्शा मिट जाता।
     हज़रते इमामे व इब्ने ज़ुबैरرضي الله تعالي عنهم से बैअत की दरख्वास्त इस लिये पहले की गई थी की तमाम अहले मदीना इन का इत्तिबाअ करेंगे, लेकिन इन हज़रात के इनकार से वो मन्सूबा ख़ाक मे मिल गया और यज़ीदियो में उसी वक़्त से आतशे इनाद भड़क उठी और ब ज़रूरत इन हज़रात को उसी शब् मदीना से मक्का मुन्तकिल होना पड़ा। ये वाक़या 4 शाबान सी 60 ही का है।
*✍🏽सवानहे कर्बला, 113*
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Monday, 3 October 2016

सवानहे कर्बला​

#02
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_यज़ीद का मुख़्तसर तज़किरा_*
     यज़ीद बिन। मुआविया अबू खालिद उमवी वो बद नसीब शख्स है जिस की पेशानी पर अहले बैत के बे गुनाह क़त्ल का सियाह दाग है और जिस पर हर क़रन में दुन्याए इस्लाम मलामत करती रही है और क़यामत तक इस का नाम तहक़ीर के साथ लिया जाएगा।
     इसकी शरारते और बेहुदगिया ऐसी है जिन से बद मुआशो को भी शर्म आए। अब्दुल्लाह बिन हन्ज़ला गसिलرضي الله تعالي عنه ने फ़रमाया : खुदा की क़सम ! हम ने यज़ीद पर उस वक़्त खुरुज किया जब हमे अन्देशा हो गया की उस की बड़कारियो के सबब आसमान से पथ्थर बरसने लगे।
     महरमात के साथ निकाह और सूद वगैरा मुंहिय्यात को इस बे दिन ने अलानिया रवाज दिया। मदीना व मक्का की हुर्मति कराई। ऐसे शख्स की हुकूमत गुर्ग  की चोपानी से ज़्यादा खतरनाक थी।
     सी 59 ही में हज़रते अबू हुरैराرضي الله تعالي عنه ने दुआ की : या रब ! में तुजसे पनाह मांगता हु सी 60 ही के आगाज़ और लड़को की हुकूमत से।
     रुयानी ने अपनी मुस्नद में हज़रते अबू दरदा सहाबीرضي الله تعالي عنه से एक हदिष रिवायत की है की हुज़ूरﷺ ने फ़रमाया, मेरी सुन्नत का पहला बदलने वाला बनी उमय्या का एक शख्स होगा जिस का नाम यज़ीद होगा।
     अबू याला ने अपनी मुस्नद में हज़रते अबू उबैदाرضي الله تعالي عنه से रिवायत की, हुज़ूरﷺ ने फ़रमाया : मेरी उम्मत में अदलो इन्साफ क़ाइम रहेगा यहाँ तक की पहला रखना अंदाज़ व बानिये सितम बनी उमय्या का एक शख्स होगा जिस का नाम यज़ीद होगा।
*✍🏽सवानहे कर्बला, 112*
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Sunday, 2 October 2016

*दुआए डेंग्यू-ए शिफ़ा*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*وَاِنْ يَّمْسَسْكَ اللّٰهُ بِضُرٍّ فَلَا كَاشِفَ لَهُٓ اِلَّا هُوَ، وَاِنْ يَّمْسَسْكَ بِجَيْرٍ فَهُوَ عَلٰى كُلِّ شَىْءٍ قَدِيْرٌ o*

डेंग्यू के मरीज़ इस दुआ की कसरत करते रहे انشاء الله शिफ़ा मिलेगी।
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मुहर्रम कैसे मनाये

#05
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_ताज्यादारी और उलमा ए एहले सुन्नत_*
     कुछ लोग समजते है की ताज्यादारी सुन्नियो का काम है और उससे रोकना, मना करना वहाबियों का काम है। जब की जबसे ये ताज्यादारी सुरु हुई है तबसे कोई भी जिम्मेदार सुन्नी उल्माने उसे अच्छा नहीं कहा।

     हिन्दुस्तान में वहाबियत से पहले के उलमा व बुज़ुर्ग हज़रत शाह अब्दुलअजीज मुहदिशे दहेल्वी फरमाते है : मुहर्रम के 10 दिनो में जो ताज्यादारी होती है वो सब नाजाइज़ है।
*✍🏽फतावा अजीजिया, 1/75*

     आला हज़रत जो इमामे एहले सुन्नत कहलाते है जिनका फतवा सारे जहा में माननीय है वो फरमाते है : आज कल ताज्यादारी वो नापसंदीदा तरीके का नाम है, जो बिदअत, नाजाइज़ और हराम है।
*✍🏽फतावा राज़वीययह, 24/513*

     जो कहते है ताज्या बनाना एहले सुन्नत का काम है वो आला हज़रत की किताबोका मुताअला करे, एक पूरी किताब आप ने इस बारे में लिखी है जिसका नाम है
*"आलिल इफ़ादा फि ताजियतील हिंद व बयाने शहादत"*

मुफ़्ती आजमे हिंद मौलाना शाह मुस्तफा रज़ाखा फरमाते है : ताज्यादारी शरीअत की बिना पर नाजायज़ है।
*✍🏽फतावा मुस्तफविय्यह, 534*

सदरूश्शरीअह हज़रत मौलाना अमजदअलि साहब फरमाते है : ये बिलकुल खुराफात है। इन सब से हज़रत सैयदना हुसैन की रूह खुश नहीं।
ये घटना तुम्हारे लिए नसीहत था और तुमने उसे खेल तमाशा बना लिया।
*✍🏽बहारे शरीअत, 16/248*
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Thursday, 29 September 2016

क़ब्र में आनेवाला दोस्त

*अज़ाबे क़ब्र से महफूज़ रहने वाले खुश नसीब*​ #02
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_पेट के मरज़ में मरने वाला_*
     नबीए करीम ने फ़रमाया के जिसे उस के पेट ने मारा (यानी जिसे पेट की तकलीफ की वजह से मौत आई) तो उसे अज़ाबे क़ब्र न होगा।
*✍🏽तिर्मिज़ी, 2/334*

     हज़रते मुफ़्ती अहमद यार खान अलैरहमा फरमाते है : पेट की बिमारी से मरने वाला अज़ाबे क़ब्र से महफूज़ है क्यू के इसे दुन्या में इस मरज़ की वजह से बहुत तकलीफ पहोच चुकी है, ये तकलीफे क़ब्र का दफईय्या बन गई।
*✍🏽मीरआतुल मनाजिह, 2/425*
*✍🏽क़ब्र में आनेवाला दोस्त, 90*
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तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान

#49
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_सूरतुल बक़रह, आयत ⑤①_*
और जब हमने मूसा से चालीस रात का वादा फ़रमाया फिर उसके पीछे तुमने बछड़े की पूजा शुरू कर दी और तुम ज़ालिम थे

*तफ़सीर*
     फ़िरऔन और उसकी क़ौम के हलाक हो जाने के बाद जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम बनी इस्राईल को लेकर मिस्र की तरफ़ लौटे और उनकी प्रार्थना पर अल्लाह तआला ने तौरात अता करने का वादा फ़रमाया और इसके लिये मीक़ात निशिचत किया जिसकी मुद्दत बढ़ौतरी समेत एक माह दस दिन थी यानी एक माह ज़िलक़ाद और दस दिन ज़िलहज के.
     हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम क़ौम में अपने भाई हज़रत हारून अलैहिस्सलाम को अपना ख़लीफ़ा व जानशीन (उत्तराधिकारी) बनाकर, तौरात हासिल करने तूर पहाड़ पर तशरीफ़ ले गए, चालीस रात वहां ठहरे. इस अर्से में किसी से बात न की. अल्लाह तआला ने ज़बरजद की तख़्तियों में, आप पर तौरात उतारी.
     यहां सामरी ने सोने का जवाहरात जड़ा बछड़ा बनाकर क़ौम से कहा कि यह तुम्हारा माबूद है. वो लोग एक माह हज़रत का इन्तिज़ार करके सामरी के बहकाने पर बछड़ा पूजने लगे, सिवाए हज़रत हारून अलैहिस्सलाम और आपके बारह हज़ार साथियों के तमाम बनी इस्राईल ने बछड़े को पूजा.
*✍🏽ख़ाज़िन*
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मुहर्रम कैसे मनाये

#03
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_ताजिया के बारे में गलत फहमी_*
     आज कल जो ताजिया बनाते है उसमे पहली बात ये की वो हज़रत इमाम हुसैन के रोज़ा मुबारक की तरह नहीं होता। अजब कज़ब तरीके के ताजिये बनाये जाते है। और फिर उसे गुमाते हे गस्त लगाते है। एक दुसरो से मुकाबला करते है और ऐसे मुकाबले में कभी कभी जगडे फसाद भी हो जाते है। और ये सब इमाम हुसैन की मुहब्बत नाम पर होता है।
     अफ़सोस! ये मुसलमानो को क्या हो गया है? वो कहा से चला था और कहा पहोच गया? कोई समजाये तो मानने के लिए राज़ी नहीं, बल्के समजाने वाले को ही भला बुरा कहते है।
     मतलब के अभी के वक़्त में जो ताजिया और उसके साथ होने वाली सब बिदअते और बुराई और वाहियात बाते सब नाजाइज़ और गुनाह है।
     जेसे के मातम करना, ताजिया पे चढ़ावा चढ़ाना, उसके सामने खाना रख के वहा फातिहा चढ़ाना, उनसे मन्नते मुरादे मांगना, उनके निचे से बच्चों को निकालना, ताजिया देखने जाना, उसको जुक जुक कर सलाम करना, सवारिया निकलना ये सब जाहिलाना और नाजाइज़ बाते है। इसे इस्लाम के साथ कोई वास्ता नहीं। और जो लोग इस्लाम को अच्छे से जानते है उनका दिल खुद ही कहेगा के इस्लाम जैसा सीधा और शराफत वाला मज़हब ये तमाशा और वहेम परस्ती भरी बातोंको कैसे कबुल कर शकता है।
     कुछ लोग कहते है ताजियादारी और ढोल तमासे और मातम करते हुए गुमने से इस्लाम और मुसलमान की शान जाहिर होती है। लेकिन ये फ़ुज़ूल बात है।
     पाँच वक़्त की अज़ान और महोल्ला, बस्ती और सभी मुसलमानो का मस्जिद में नमाज़े ब-जमाअत से ज्यादा मुसलमानो की शान बढ़ा ने वाली कोई चीज नहीं।
     ताजियादारी और उसके साथ ढोल तमासे और नाचना, कूदना और मातम मनाना और बुज़ुर्गोके नाम पर गैर शरई उर्स, मेला और आजकी कव्वालियों की महफिले देख के गैर मुस्लिम ऐसा समजते है के ये भी हमारे मज़हब के जैसा तमाशेवाला मज़हब है।
     और नमाज़, रोज़ा, ईमानदारी और सच्चाई, शरीअतके हुक्मो की पाबन्दी और दीनदारी देख के गैर मुस्लिम ऐसा कहते है की "अगर मज़हब कोई है तो वो इस्लाम ही है"
     कोई मज़बूरी की वजह से वो मुसलमान नहीं बनते पर उनका दिल मुसलमान बनने को तड़पता है।  और कितने तो मुसलमान हो भी जाते है, और होते रहते है।
     ज़रा सोचे 1400 साल में मुसलमान की तादाद कितनी हो चुकी है। ये सब नमाज़, रोज़े, इस्लाम की सीधी सच्ची बाते देख के बने है, ना की ताजियादारी, मेले तमासे देख के बनते है।
     *और ताजियादारी इस्लाम की शान नहीं बल्कि बदनामी है। आज वहाबी के उलमा यही सब दिखाके सुन्नियो को वहाबी बनाते है। यानी वो हमारे ये गैर मज़हबी रश्मो रिवाज़ दिखा के वहाबी बनाते है।*
     मुसलमान का अक़ीदा और ईमान इतना मजबूत होना चाहिए की दुनियाइ नफ़ा हो या नुकशान पर हम तो वही करेंगे जिससे अल्लाह और रसूल राज़ी होते है।
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मदनी पंजसुरह

*क़ुव्वते हाफीजा के लिये*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

पाचो नमाज़ों के बाद सर पर दाहिना हाथ रख कर 11 मर्तबा *يَاقَوِىُّ* पढ़े।

*✍🏽जन्नती ज़ेवर, 605*
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 237*
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फुतूह अल ग़ैब

*तुम्हारे लिए अच्छा क्या है और बुरा क्या?*  #3
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

      पस तुम्हें चाहिये के किसी चीज़ की तलब के लिये मखलूक की तरफ न देखो और खालिक के सिवा किसी और से तआल्लुक न रखो और न किसीको अपने हालात बताओ। महोब्बत उसीसे करो, हाजतें उसीसे अर्ज़ करो, तकलीफ के इज़ालेके लिये उसी तरफ रुजुअ करो क्यों के सुदोज़िया उसीकी तरफ से हैं, परेशनिया वही रफअ कर सकता है,इज़्ज़त व ज़िल्लत और बुलंदी व पस्ती देनेवाला वही है, ईशरत व सरवत वही दे सकता है और हरकत व सुकून उसीके कब्ज़ए कुदरत में है।
      तमाम वाकेआत और अवामिल उसीके हुकम और इजाज़त से ज़ाहिर होते हैं। हर चीज़ उसी वक़्त जारी रेहती है जिसका तअइयुन (मुकर्रर) वो कर दे जिसको खालिक व मालिकने मकदम (आमद) किया है। वो मोवख्खिर (आखरी) नही हो सकती और जो मोवख्खर है, उसे कोई मकदम (पैर धरने नहीं दे)  सकता। अल्लाह तआलाने फरमाया के अगर अल्लाहकी तरफसे कोई नुकसान पहोंचे तो वोही और सिर्फ वोही उसे दूर कर सकता है और अगर खुदा तेरी भलाई करना चाहे तो उसके फ़ज़लको रद करनेवाला कोई नहीँ।
बाक़ी कल की पोस्ट में... इंसा अल्लाह

*✍🏽फुतूहल ग़ैब*  पेज  42
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खादिमे दिने नबी ﷺ
 *फ़ैयाज़ सैय्यिद*
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Wednesday, 28 September 2016

क़ब्र में आनेवाला दोस्त

*अज़ाबे क़ब्र से महफूज़ रहने वाले खुश नसीब* #01
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_शहीद अज़ाबे क़ब्र से महफूज़ रहता है_*
     हज़रते मिकदाम बिन मादी करीब से रिवायत है के हुज़ूर ने फ़रमाया : बेशक अल्लाह शहीद को 6 इनआम अता फ़रमाता है,

1 उस के खून का पहला कतरा गिरते ही उस की मग्फिरत फरमा देता है और जन्नत में उसे उस का ठिकाना दिखा देता है।

2 उसे अज़ाबे क़ब्र से महफूज़ फ़रमाता है।

3 क़यामत के दिन उसे बड़ी घबराहट से अम्न अता फ़रमाएगा।

4 उस के सर पर वकार का ताज़ रखेगा जिस का याकूत दुन्या और इस की हर चीज़ से बेहतर होगा।

5 उसका हूरो में से 72 हूरो के साथ निकाह कराएगा।

6 उस की 70 रिश्तेदारो के हक़्क़ में शफ़ाअत क़बूल फ़रमाएगा।

*✍🏽इब्ने माजह, 3/36*
*✍🏽क़ब्र में आनेवाला दोस्त, 89*
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*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #48
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_सूरतुल बक़रह, आयत ⑤ⓞ_*
और जब हमने तुम्हारे लिये दरिया फ़ाड़ दिया तो तुम्हें बचा लिया. और फ़िरऔन वालों को तुम्हारी आंखों के सामने डुबो दिया

*तफ़सीर*
     यह दूसरी नेअमत का बयान है जो बनी इस्त्राईल पर फ़रमाई कि उन्हें फ़िरऔन वालों के ज़ुल्म और सितम से नजात दी और फ़िरऔन को उसकी क़ौम समेत उनके सामने डुबो दिया. यहां आले फ़िरऔन (फ़िरऔन वालों) से फ़िरऔन और उसकी क़ौम दोनों मुराद हैं. जैसे कि “कर्रमना बनी आदमा” यानी और बेशक हमने औलादे आदम को इज़्ज़त दी (सूरए इसरा, आयत 70) में हज़रत आदम और उनकी औलाद दोनों शामिल हैं.
*✍🏽जुमल*
     संक्षिप्त वाक़िआ यह है कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम अल्लाह के हुक्म से रात में बनी इस्त्राईल को मिस्र से लेकर रवाना हुए, सुब्ह को फ़िरऔन उनकी खोज में भारी लश्कर लेकर चला और उन्हें दरिया के किनारे जा लिया. बनी इस्त्राईल ने फ़िरऔन का लश्कर देख़कर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से फ़रियाद की. आपने अल्लाह के हुक्म से दरिया में अपनी लाठी मारी, उसकी बरकत से दरिया में बारह ख़ुश्क रास्ते पैदा हो गए. पानी दीवारों की तरह खड़ा हो गया. उन दीवारों में जाली की तरह रौशनदान बन गए. बनी इस्राईल की हर जमाअत इन रास्तों में एक दूसरे को देखती और आपस में बात करती गुज़र गई. फ़िरऔन दरियाई रास्ते देखकर उनमें चल पड़ा. जब उसका सारा लश्कर दरिया के अन्दर आ गया तो दरिया जैसा था वैसा हो गया और तमाम फ़िरऔनी उसमें डूब गए. दरिया की चौड़ाई चार फरसंग थी.
     ये घटना बेहरे कुलज़म की है जो बेहरे फ़ारस के किनारे पर है, या बेहरे मा-वराए मिस्र की, जिसको असाफ़ कहते है. बनी इस्राईल दरिया के उस पार फ़िरऔनी लश्कर के डूबने का दृश्य देख रहे थे.
     यह वाक़िआ दसवीं मुहर्रम को हुआ. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने उस दिन शुक्र का रोज़ा रखा. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के ज़माने तक भी यहूदी इस दिन का रोज़ा रखते थे. हुज़ूर ने भी इस दिन का रोज़ा रखा और फ़रमाया कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की विजय की ख़ुशी मनाने और उसकी शुक्र गुज़ारी करने के हम यहूदियों से ज़्यादा हक़दार हैं.
     इस से मालूम हुआ कि दसवीं मुहर्रम यानी आशुरा का रोज़ा सुन्नत है. यह भी मालूम हुआ कि नबियों पर जो इनाम अल्लाह का हुआ उसकी यादगार क़ायम करना और शुक्र अदा करना अच्छी बात है. यह भी मालूम हुआ कि ऐसे कामों में दिन का निशिचत किया जाना रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की सुन्नत है. यह भी मालूम हुआ कि नबियों की यादगार अगर काफ़िर लोग भी क़ायम करते हों जब भी उसको छोड़ा न जाएगा.
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मुहर्रम कैसे मनाये

#01
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_हुसैनी दिन यानी 10 मुहर्रम_*
     मुहर्रम में कुछ लोग इमाम हुसैन के किरदार को भूल गये और इस दिन को खेल तमाशो, गैर शरई रस्मो नाचगाना, मेले और गुमने फिरने का दिन बना दिया। और ऐसा लगने लगा की जेसे इस्लाम मजहब भी दूसरे मजहबो की तरह खेल तमाशो, गुमने फिरने और रंग रलिया वाला मजहब है।
     मुसलमान कहलाने वालो में सिर्फ एक फिरका जिसको राफजी यानी शिया कहते है उनके वहा नमाज़, रोज़ा वगैरा शरीअत के हुक्मो का और दीनदारी के मुआमले में कोई अहमियत देने में नहीं आता। बस मुहर्रम आते ही रोना, पीटना, चिल्लाना यही उनका मज़हब है। जाने की अल्लाह ने उसके रसूलﷺ को यही सब करने और सिखाने भेज था और यही सब बेतुकी बातो का नाम इस्लाम है।
     हदीसे पाक में है : हुज़ूर ﷺ फरमाते है जो कोई गम मे गाल पिटे, गला फाडे, जाहिलियत के ज़माने जैसा चिल्लाये वो हम में से नहीं है।
*✍🏽मिश्कात शरीफ, स. 150*
*_नियाज़ और फातेहा_*
     हज़रत इमाम हुसैन और जो लोग उनके साथ शहीद हुए है उनके इसाले सवाब के लीये सदका, खैरात करे, गरीबो मिस्नकिनो, दोस्तों, पड़ोसीओ, रिस्तेदारो को शरबत या खिचड़ा या मलीदा वगैरा कोई भी जाइज़ खाने पिने वाली चीज़े खिलाना और पिलाना जाइज़ है और उसके साथ अगर क़ुरआन की तिलावत करे तो और बेहतर है। इन सब बातो को नियाज़ हातेहा कहते है। ये सब बिना सूबा जाइज़ और मुस्त हसन है और बुजुर्गो की अकीदत पेश करने का अच्छा तरिका है।
     लेकिन इन सब बातो में कुछ चीज़ों का ध्यान रखना ज़रूरी है।

✔उन बातो का खुलासा अगली पोस्ट में होगा انشاء الله
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मदनी पंजसुरह

*बुखार से शिफ़ा*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

जिस को बुखार हो सात बार ये दुआ पढ़े :

*بِسْمِ اللّٰهِ الْكَبِيْرِ اَعُوْذُ بِاللّٰهِ الْعَظِيْمِ مِنْ شَرِّ كُلِّ عِرْقٍ نَّعَّارٍ وَّمِنْ شَرِّ النَّارِ*

अगर मरीज़ खुद न पढ़ सके तो दूसरा नमाज़ी आदमी सात बार पढ़ कर दम कर दे या पानी पर दम कर के पिला दे انشاء الله बुखार उतर जाएगा। एक मर्तबा में बुखार न उतरे तो बार बार ये अम्ल करे।

*✍🏽जन्नती ज़ेवर, 580*
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 234*
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फुतूह अल ग़ैब

*तुम्हारे लिए अच्छा क्या है और बुरा क्या?*  #2
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     खुदा तआला ने फ़रमाया : अल्लाहकी नेअमतें ऐसी और इतनी हैं-के हद-व-हिसाब में नहीं आ सकतीं, बहोतसी ऐसी भी हैं जिनका तुम्हें ऐहसास तक नहीं। पस तुम्हें चाहिये के किसी चीज़ की तलब के लिये मखलूक की तरफ न देखो और खालिक के सिवा किसी और से तआल्लुक न रखो और न किसीको अपने हालात बताओ। महोब्बत उसीसे करो, हाजतें उसीसे अर्ज़ करो, तकलीफ के इज़ालेके लिये उसी तरफ रुजुअ करो क्यों के सुदोज़िया उसीकी तरफ से हैं, परेशनिया वही रफअ कर सकता है,इज़्ज़त व ज़िल्लत और बुलंदी व पस्ती देनेवाला वही है, ईशरत व सतवत वही दे सकता है और हरकत व सुकून उसीके कब्ज़ए कुदरत में है।
बाक़ी कल की पोस्ट में... इंसा अल्लाह

*✍🏽फुतूहल ग़ैब*  पेज  42
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खादिमे दिने नबी ﷺ
 *फ़ैयाज़ सैय्यिद*
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Tuesday, 27 September 2016

फ़ारुके आज़म का इश्के रसूल

#04
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_हर शै से महबूब_*
     हज़रते अब्दुल्लाह बिन हिशामرضي الله تعالي عنه से रिवायत है की हम हुज़ूर के पास बेठे थे। आप ने हज़रते उमर फ़ारुके आज़मرضي الله تعالي عنه का हाथ अपने हाथ में पकड़ रखा था। फ़ारुके आज़म ने अर्ज़ की : या रसूलल्लाहﷺ ! आप मुझे मेरी जान के इलावा हर चीज़ से ज़्यादा महबूब है। आपﷺ ने फ़रमाया : नही उमर ! उस रब की क़सम जिस के कब्जाए कुदरत में मेरी जान है ! (तुम्हारी महब्बत उस वक़्त तक कामिल नही होगी) जब तक में तुम्हारे नज़दीक तुम्हारी जान से भी ज़्यादा महबूब न हो जाऊ।
     फ़ारुके आज़मرضي الله تعالي عنه ने अर्ज़ की : या रसूलल्लाहﷺ ! खुदा की क़सम ! आप मुझे मेरी जान से भी ज़्यादा महबूब है। ये सुन कर हुज़ूरﷺ ने इरशाद फरमाया : ऐ उमर ! अब तुम्हारी महब्बत कामिल हो गई।
*✍🏽बुखारी शरीफ, 4/283*

     ये हुक्म सिर्फ फ़ारुके आज़मرضي الله تعالي عنه के लिये ही नही बल्कि रहती दुन्या तक आने वाले एक एक मुसलमान के लिये है, क्यू की महब्बते मुस्तफा वो चीज़ है जिस के बगैर हमारा ईमान कामिल ही नही हो सकता।
     फरमाने मुस्तफाﷺ : तुम में से कोई शख्स उस वक़्त तक (कामिल) मोमिन नही हो सकता, जब तक की में उस के नज़दीक उस के वालिदैन, अव्लाद और तमाम लोगो से ज़्यादा महबूब न हो जाऊ।
*✍🏽सहीह बुखारी, 1/17*

     हज़रते फ़ारुके आज़मرضي الله تعالي عنه के इश्क रसूल के क्या कहने ! आप के गुलाम हज़रते अस्लमرضي الله تعالي عنه फरमाते है : जब आप हुज़ूरﷺ का ज़िक्र करते तो इश्के रसूल से बे ताब हो कर रोने लगते और फरमाते : प्यारे आक़ाﷺ तो लोगो में सब से ज़्यादा रहम दिल, यतीम के लिये वालिद और लोगो में दिली तौर पर सब से ज़्यादा बहादुर थे, वो तो निखरे निखरे चेहरे वाले, महकती खुशबु वाले और हसब के ऐतिबार से सब से ज़्यादा मुकर्रम थे, अव्वलिनो आखिरिन में आप की मिस्ल कोई नही।
*✍🏽जामीअल जवामिल, 10/16*
*✍🏽फ़ारुके आज़म का इश्के रसूल, 9*
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तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान

#47
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_सूरतुल बक़रह, आयत ④⑨_*
और (याद करो)जब हमने तुमको फ़िरऔन वालों से नजात बख्श़ी (छुटकारा दिलाया)(4)
कि तुमपर बुरा अजा़ब करते थे(5)
तुम्हारे बेटों को ज़िब्ह करते और तुम्हारी बेटियों को ज़िन्दा रखते(6)
और उसमें तुम्हारे रब की तरफ़ से बड़ी बला थी या बड़ा इनाम(7)

*तफ़सीर*
     (4) क़िब्त और अमालीक़ की क़ौम से जो मिसर का बादशाह हुआ. उस को फ़िरऔन कहते है.
     हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के ज़माने के फ़िरऔन का नाम वलीद बिन मुसअब बिन रैयान है. यहां उसी का ज़िक्र है. उसकी उम्र चार सौ बरस से ज़्यादा हुई. आले फ़िरऔन से उसके मानने वाले मुराद है.
*✍🏽जुमल वग़ैरह*
     (5) अज़ाब सब बुरे होते हैं “सूअल अज़ाब” वह कहलाएगा जो और अज़ाबों से ज़्यादा सख़्त हो. इसलिये आला हज़रत ने “बुरा अज़ाब” अनुवाद किया.
     फ़िरऔन ने बनी इस्त्राईल पर बड़ी बेदर्दी से मेहनत व मशक़्क़त के दुश्वार काम लाज़िम किये थे. पत्थरों की चट्टानें काटकर ढोते ढोते उनकी कमरें गर्दनें ज़ख़्मी हो गई थीं. ग़रीबों पर टैक्स मुक़र्रर किये थे जो सूरज डूबने से पहले ज़बरदस्ती वुसूल किये जाते थे. जो नादार किसी दिन टैकस अदा न कर सका, उसके हाथ गर्दन के साथ मिलाकर बांध दिये जाते थे, और महीना भर तक इसी मुसीबत में रखा जाता था, और तरह तरह की सख़्तियां निर्दयता के साथ की जाती थीं.
*✍🏽ख़ाज़िन वग़ैरह*
     (6) फ़िरऔन ने ख़्वाब देखा कि बैतुल मक़दिस की तरफ़ से आग आई उसने मिस्र को घेर कर तमाम क़िब्तियों को जला डाला, बनी इस्त्राईल को कुछ हानि न पहुंचाई. इससे उसको बहुत घबराहट हुई.
     काहिनों (तांत्रिकों) ने ख़्वाब की तअबीर (व्याख्या) में बताया कि बनी इस्त्राईल में एक लड़का पैदा होगा जो तेरी मौत और तेरी सल्तनत के पतन का कारण होगा.
     यह सुनकर फ़िरऔन ने हुक्म दिया कि बनी इस्त्राईल में जो लड़का पैदा हो. क़त्ल कर दिया जाए. दाइयां छान बीन के लिये मुक़र्रर हुई. बारह हजा़र और दूसरे कथन के अनुसार सत्तर हज़ार लड़के क़त्ल कर डाले गए और नव्वे हज़ार हमल (गर्भ) गिरा दिये गये.
     अल्लाह की मर्ज़ी से इस क़ौम के बूढ़े जल्द मरने लगे. क़िब्ती क़ौम के सरदारों ने घबराकर फ़िरऔन से शिकायत की कि बनी इस्त्राईल में मौत की गर्मबाज़ारी है इस पर उनके बच्चे भी क़त्ल किये जाते हैं, तो हमें सेवा करने वाले कहां से मिलेंगे. फ़िरऔन ने हुक्म दिया कि एक साल बच्चे क़त्ल किये जाएं और एक साल छोड़े जाएं. तो जो साल छोडने का था उसमें हज़रत हारून पैदा हुए, और क़त्ल के साल हज़रत मूसा की पैदाइशा हुई.
      (7) बला इम्तिहान और आज़माइशा को कहते हैं. आज़माइश नेअमत से भी होती है और शिद्दत व मेहनत से भी. नेअमत से बन्दे की शुक्रगुज़ारी, और मेहनत से उसके सब्र (संयम और धैर्य) का हाल ज़ाहिर होता है.
     अगर “ज़ालिकुम.”(और इसमें) का इशारा फ़िरऔन के मज़ालिम (अत्याचारों) की तरफ़ हो तो बला से मेहनत और मुसीबत मुराद होगी, और अगर इन अत्याचारों से नजात देने की तरफ़ हो, तो नेअमत.
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मदनी पंजसुरह

*बराए क़ज़ाए हाजात*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

हुज़ूरﷺ फरमाते है की मुझे एक ऐसी आयत मालुम है कि अगर लोग उस पर आमिल हो तो उन की हाजतो को काफी है, फिर ये आयते करीमा इरशाद फ़रमाई।
(अदाए क़र्ज़ और रोज़ी व रोज़गार के लिये इस की कसरत मुफीद व मुजर्र्ब है)

*وَمَنْ يَّتَّقِاللّٰهَ يَجْعَلْ لَّهُ مَخْرَجًا o وَّيَرْزُقْهُ مِنْ حَيْثُ لَايَيَحْتَسِبُ، وَمَنْ يَّتَوَكَّلْ عَلَى اللّٰهِ فَهُوَ حَسْبُهُ، اِنَّ اللّٰهَ بَالِغُ اَمْرِهٖ، قَدْ جَعَلَ اللّٰهُ لِكُلِّ شَىْءٍقَدْرًا o*

*✍🏽पारह 28, अल-तलाक़, 2,3*
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 232*
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Monday, 26 September 2016

तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान

#46
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_सूरतुल बक़रह, आयत ④⑧_*
और डरो उस दिन से जिस दिन कोई जान दूसरे का बदला न हो सकेगी(2)
और न क़ाफिर के लिये कोई सिफ़ारिश मानी जाए और न कुछ लेकर उसकी जान छोड़ी जाए और न उनकी मदद हो(3)

*तफ़सीर*
     (2) वह क़यामत का दिन है. आयत में नफ़्स दो बार आया है, पहले से मूमिन का नफ़्स, दूसरे से काफ़िर मुराद है.
*✍🏽मदारिक*
     (3) यहाँ से रूकू के आख़िर तक दस नेअमतों का बयान है जो इन बनी इस्त्राईल के बाप दादा को मिलीं.
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मदनी पंजसुरह

*बराए क़ुव्वते हाफीजा*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

दीनी किताब या इस्लामी सबक़ पढ़ने से क़ब्ल ये दुआ अव्वल आखिर दुरुद पढ़ के पढ़ लीजिये انشاء الله जो कुछ पढ़ेंगे याद रहेगा

*اَللّٰهُمَّ افْتَحْ عَلَيْنَا حِكْمَتَكَ وَانْشُرْ عَلَيْنَا رَحْمَتَكَ يَاذَالْجَلَالِ وَالْاِكْرَام*
ऐ अल्लाह ! हम पर इल्मो हिक़मत के दरवाज़े खोल दे और हम पर अपनी रहमत नाज़िल फरमा ! ऐ अज़मत और बुज़ुर्गी वाले !

*✍🏽अलमुस्तरफ, 1/40*
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 229*

*नॉट :* जिन हजरात को अरबी नही आती वो तर्जुमा याद करले और उसे पढ़े। और जो अरबी जानते है वो तर्जुमे को जहन में रखे ताकि पता चले की हम क्या पढ़ रहे है, ये दुआ में क्या है। अपनी मादरी ज़बान में दुआ पढ़ना बेहतर है।
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Sunday, 25 September 2016

क़ब्र में आनेवाला दोस्त

*क़ब्र को रौनक बख्शने और इसे आराम देह बनाने वाले आमाल* #11
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_मुसलमान के दिल में ख़ुशी दाखिल करने का सवाब_*
     हुज़ूरﷺ ने इरशाद फ़रमाया : जो शख्स किसी मोमिन के दिल में ख़ुशी दाखिल करता है अल्लाह उस ख़ुशी से एक फ़रिश्ता पैदा फ़रमाता है जो अल्लाह की इबादत और ज़िक्र में मसरूफ़ रहता है। जब वो बन्दा अपनी क़ब्र में चला जाता है तो वो फ़रिश्ता उस के पास आ कर पूछता है : क्या तू मुझे नहीं पहचानता ? वो कहता है के तू कौन है ? तो वो फ़रिश्ता कहता है के में वो ख़ुशी हु जिसे तूने फुला के दिल में दाखिल किया था, आज में तेरी वहशत में तुझे उन्स पहोचाऊँगा और सुवालात के जवाबात में साबित क़दम रखूंगा और तुझे रोज़े क़यामत के मनाज़िर दिखाऊंगा और तेरे लिये रब की बारगाह में सिफारिश करूँगा और तुझे जन्नत में तेरा ठिकाना दिखाऊंगा।

     सुब्हान अल्लाह ! किसी के दिल में ख़ुशी दाखिल करना कितना आसान मगर इसका इनआम कितना शानदार है, मगर ये फ़ज़ीलत उसी वक़्त हासिल हो सकेगी जब वो खशी ऐन शरीअत के मुताबिक़ हो।

*_किसी के दिल में ख़ुशी दाखिल करने के चन्द काम_*
     किसी प्यासे को पानी पिला देना। किसी भूके को खाना खिला देना। कोई दुआ के लिये कहे तो फौरन उसके लिये दुआ कर देना। ज़रूरत मन्द की मदद करना। हाजत मन्द को क़र्ज़ देना। तंगदस्त मकरुज़ को क़र्ज़ अदा करने में मोहलत देना। गरीब मरीज़ की इयादत को जाना। मुस्करा कर बात करना। कोई  गलती कर बेठे तो उस से दर गुज़र करना। पसन्दीदा चीज़ खिलाना। अहम मवाकेअ पर तोहफा देना। वालिदैन की खिदमत करना। मज़लूम की मदद करना। दौराने सफर बैठने के लिये जगह दे देना।
*✍🏽क़ब्र में आनेवाला दोस्त, 88*
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