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Thursday, 23 March 2017

*मुबारक महीने* #16
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*शव्वालुल मुकर्रम*
*_शश ईद के रोज़े के 3 फ़ज़ाइल_*
*नौ मौलूद की तरह गुनाहो से पाक*
     हज़रते अब्दुल्लाह बिन उमर رضي الله تعالي عنه से रिवायत है, हुज़ूर ﷺ फरमाते है : जिस ने रमज़ान के रोज़े रखे फिर 6 दिन शव्वाल में रखे तो गुनाहो से ऐसे निकल गया जैसे आज ही माँ के पेट से पैदा हुवा है।
*✍🏽मजमउ ज़वाइद, 3/425, हदिष:5102*

*_गोया उम्र भर का रोज़ा रखा_*
     हज़रते अबू अय्यूब رضي الله تعالي عنه से रिवायत है हुज़ूर ﷺ का फरमाने मुश्कबार है : जिसने रमज़ान के रोज़े रखे फिर इन के बाद 6 रोज़े शव्वाल में रखे तो ऐसा है जैसे उम्र भर के लिये रोज़ा रखा।
*✍🏽सहीह मुस्लिम, 592, हदिष:1164*

*_साल भर रोज़े रखे_*
     हज़रते सौबान رضي الله تعالي عنه से रिवायत है, रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया : जिसने ईदुल फ़ित्र के बाद शव्वाल में 6 रोज़े रख लिये तो उस ने पुरे साल में रोज़े रखे की जो एक नेकी उसे 10 मिलेगी।
*✍🏽सुनन इब्ने माजह, 2/333, हदिष:1715*
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 350*
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मिट जाए गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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Wednesday, 22 March 2017

*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #177
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_सूरतुल बक़रह, आयत ②③③_*
     और माएं दूध पिलाएं अपने बच्चों को (4) पूरे दो बरस उसके लिये जो दूध की मुद्दत पूरी करनी चाहे (5) और जिसका बच्चा है (6) उसपर औरतों का खाना और पहनना है दस्तूर के अनुसार (7) किसी जान पर बोझ न रखा जाए उसके बच्चे से  (8) और न औलाद वाले को उसकी औलाद से  (9) या माँ बाप ज़रर न दे अपने बच्चे को और न औलाद वाला अपनी औलाद को  (10) और जो बाप की जगह है उसपर भी ऐसा ही वाजिब है फिर अगर माँ बाप दानों आपस की रज़ा और सलाह से दूध छुड़ाना चाहें तो उनपर गुनाह नहीं. और अगर तुम चाहो कि दाइयों से अपने बच्चों को दूध पिलाओ तो भी तुमपर हरज नहीं कि जब जो देना ठहरा था भलाई के साथ उन्हें अदा करदो और अल्लाह से डरते रहो और जान रखो कि अल्लाह तुम्हारे काम देख रहा है.

*तफ़सीर*
     (5) यानी इस मुद्दत का पूरा करना अनिवार्य नहीं. अगर बच्चे को ज़रूरत न रहे और दूध छुड़ाने में उसके लिये ख़तरा न हो तो इससे कम मुद्दत में भी छुड़ाना जायज़ है. (तफ़सीरे अहमदी, ख़ाज़िन वग़ैरह)
     (6) यानी वालिद. इस अन्दाज़े बयान से मालूम हुआ कि नसब बाप की तरफ़ पलटता है.
     (7) बच्चे की परवरिश और उसको दूध पिलवाना बाप के ज़िम्मे वाजिब है. इसके लिये वह दूध पिलाने वाली मुक़र्रर करे. लेकिन अगर माँ अपनी रग़बत से बच्चे को दूध पिलाए तो बेहतर है. शौहर अपनी बीवी पर बच्चे को दूध पिलाने के लिये ज़बरदस्ती नहीं कर सकता, और न औरत शौहर से बच्चे के दूध पिलाने की उजरत या मज़दूरी तलब कर सकती है. जब तक कि उसके निकाह या इद्दत में रहे. अगर किसी शख़्त ने अपनी बीवी को तलाक़ दी और इद्दत गुज़र चुकी तो वह उस बच्चे के दूध पिलाने की उजरत ले सकती है. अगर आप ने किसी औरत को अपने बच्चे के दूध पिलाने पर रखा और उसकी माँ उसी वेतन पर या बिना पैसे दूध पिलाने पर राज़ी हुई तो माँ ही दूध पिलाने की ज़्यादा हक़दार है. और अगर माँ ने ज़्यादा वेतन तलब किया तो बाप को उससे दूध पिलवाने पर मजबूर नहीं किया जाएगा. (तफ़सीरे अहमदी व मदारिक). “अलमअरूफ़” (दस्तूर के अनुसार) से मुराद यह है कि हैसियत के मुताबिक़ हो, तंगी या फ़ुज़ूलख़र्ची के बग़ैर.
     (8) यानी उसको उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ दूध पिलाने पर मजबूर न किया जाए.
     (9) ज़्यादा वेतन तलब करके.
     (10) माँ का बच्चे को कष्ट देना यह है कि उसको वक़्त पर दूध न दे और उसकी निगरानी न रखे या अपने साथ मानूस कर लेने के बाद छोड़ दे. और बाप का बच्चे को कष्ट देना यह है कि हिले हुए बच्चे को माँ से छीन ले या माँ के हक़ में कमी करे जिससे बच्चे को नुक़सान हो.
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*जमाअत छोड़ने की सजा* #03/08
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
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*_नमाज़ जमाअत से अदा करो_*
     क़ुरआने पाक और अहादिसे मुबारका में जहा भी नमाज़ की अदाएगी का हुक्म आया है, उससे मुराद नमाज़ को तमाम तर फराइज़ो वाजिबात के साथ अदा करना है। और नमाज़ के वाजिबात में से ये भी है की उसे जमाअत के साथ पढ़ा जाए।

     परह 1 सूरतुल बक़रह, आयत 43 में इर्शाद होता है :
*और नमाज़ काइम रखो और ज़कात दो और रुकूअ करने वालो के साथ रुकूअ करो।*
     तफ़्सीरे ख़ाज़िन में है : इस आयत में नमाज़े बा जमाअत अदा करने पर उभारा गया है।

     एक और मक़ाम पर अल्लाह फरमाता है : पारह 29 सूरतुल कलम, आयत 42-43
*जिस दिन एक साक खोली जाएगी (जिसके माना अल्लाह ही जनता है) और सजदे को बुलाए जाएंगे तो न कर सकेंगे, नीची निगाहे किये हुवे उन पर ख्वाहि चढ़ रही होगी और बेशक दुन्या में सजदे के लीये बुलाए जाते थे जब तंदुरस्त थे।*
     हज़रते इब्राहिम तैमी इस फरमान की तफ़्सीर में फरमाते है : वो कियामत का दिन होगा, उस दिन इन्हें नदामत की जिल्लत ठापे होगी, क्यू की इन्हें दुन्या में जब सजदों की तरफ बुलाया जाता तो ये तंदुरस्त होने के बा-वुजूद नमाज़ में हाज़िर न होते।
     हज़रते काबुल अहबारी इर्शाद फरमाते है : खुदा की कसम ! ये आयते मुबारका जमाअत से पीछे रह जाने वालो ही के बारे में नाज़िल हुई है और बिगैर उज़्र के जमाअत तर्क कर देने वालो के लीये इससे जियादा सख्त कौन सी वईद होगी।
*✍🏽तर्के जमाअत की वईदे, स. 6*
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*मुबारक महीने* #15
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*रमज़ानुल मुबारक* #07
*_खर्च में कुशादगी करो_*
     हज़रते ज़मुरह رضي الله تعالي عنه से मरवी है की नबियो के सुलतान ﷺ का फरमान है : माहे रमज़ान में घर वालो के खर्च में कुशादगी करो क्यू की माहे रमज़ान में खर्च करना अल्लाह की राह में खर्च करने की तरह है।
*✍🏽अल जामेउ सगीर, 162, हदिष:2716*

     मीठे और प्यारे इस्लामी भाइयो ! माहे रमज़ान के फ़ज़ाइल से कुतूबे अहादिसा मालामाल है। रमज़ान में इस क़दर बरकतें और रहमते है की हमारे प्यारे आक़ा ﷺ ने यहाँ तक इरशाद फ़रमाया, "अगर बन्दों को मालुम होता की रमज़ान क्या है तो मेरी उम्मत तमन्ना करती की काश ! पूरा साल रमज़ान ही हो।
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 349*
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Tuesday, 21 March 2017

*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #176
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_सूरतुल बक़रह, आयत ②③②_*
     और जब तुम औरतों को तलाक़ दो और उनकी मीआद पूरी हो जाए (1) तो ऐ औरतों के वालियों, उन्हें न रोको इससे कि अपने शौहरों से निकाह कर लें  (2) जब कि आपस में शरीअत के अनुसार रज़ामंद हो जाएं (3) यह नसीहत उसे दी जाती है जो तुम में से अल्लाह और क़यामत पर ईमान रखता हो यह तुम्हारे लिये ज़्यादा सुथरा और पाकीज़ा है और अल्लाह जानता है और तुम नहीं जानते.

*तफ़सीर*
     (1) यानी उनकी इद्दत गुज़र चुके.
     (2) जिनको उन्होंने अपने निकाह के लिये चुना हो, चाहे वो नए हों या यही तलाक़ देने वाले या उनसे पहले जो तलाक़ दे चुके थे.
     (3) अपने क़ुफ़्व यानी बराबर वाले में मेहरे मिस्ल पर, क्योंकि इसके ख़िलाफ़ की सूरत में सरपरस्त हस्तक्षेप और एतिराज़ का हक़ रखते हैं. मअक़ल बिन यसार मुज़नी की बहन का निकाह आसिम बिन अदी के साथ हुआ था. उन्होंने तलाक़ दी और इद्दत गुज़रने के बाद फिर आसिम ने दरख़ास्त की तो मअक़ल बिन यसार आड़े आए. उनके बारे में यह आयत उतरी. (बुख़ारी शरीफ़)
     (4) तलाक़ के बयान के बाद यह सवाल अपने आप सामने आता है कि अगर तलाक़ वाली औरत की गोद में दूध पीता बच्चा हो तो उसके अलग होने के बाद बच्चे की परवरिश का क्या तरीक़ा होगा इसलिये यह ज़रूरी है कि बच्चे के पालन पोषण के बारे में माँ बाप पर जो अहकाम हैं वो इस मौक़े पर बयान फ़रमा दिये जाएं. लिहाज़ा यहाँ उन मसाइल का बयान हुआ.
     माँ चाहे तलाक़ शुदा हो या न हो, उस पर अपने बच्चे को दूध पिलाना वाजिब है, शर्त यह है कि बाप को उजरत या वेतन पर दूध पिलवाने की क्षमता और ताक़त न हो या कोई दूध पिलाने वाली उपलब्ध न हो. या बच्चा माँ के सिवा किसी का दूध क़ुबूल न करे. अगर ये बात न हो, यानी बच्चे की परवरिश ख़ास माँ के दूध पर निर्भर न हो तो माँ पर दूध पिलाना वाजिब नहीं, मुस्तहब है. (तफ़सीरे अहमदी व जुमल वग़ैरह)
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*जमाअत छोड़ने की सजा* #02/08
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*नमाज़ की फर्जीयत*
     मीठे मीठे इस्लामी भाइयो ❗जमाअत छूट जाने के बाद अगर कोई 27 बार पढ़ भी ले तब भी बा जमाअत नमाज़ पढ़ने के षवाब के बराबर नहीं पहुच सकता।
     यक़ीनन बा जमाअत नमाज़ पढ़नेकी अपनी ही बरकतें है जो बगैर जमाअत के हासिल नहीं हो सकती। लिहाजा हमें चाहिए की बा जमाअत नमाज़ की अदाएगी के लिए वक़्त की पाबन्दी का खास ख्याल रखे और अपने काम, अहलो इयाल और दीगर मसरुफिय्यत पर नमाज़ को फौकिय्यत दे। क्यू की कोई अमल नमाज़ से बढ़ कर अहमिय्यत का हामिल नहीं हो सकता।
     अल्लाह पारह 28 सूरतुल मुनाफिकुन् की आयत 9 में इर्शाद फरमाता है।
*ऐ ईमान वालो तुम्हारे माल न तुम्हारी अवलाद कोई चीज़ तुम्हे अल्लाह के ज़िक्र से गाफिल न करे और जो ऐसा करे तो वोही लोग नुक्शान में है।*

     मुफ़स्सिरीने किराम की एक जमाअत का कौल है की इस आयते मुबारका में ज़िकृल्लाह से मुराद 5 नमाज़े है लिहाज जो अपने माल सामान खरीदो फरोख्त या पेशे या अपनी अवलाद की वज्ह से नमाज़ों को इन के अवकात में अदा करने से ग़फ़लत इख़्तियार करेगा वो ख़सारा पाने वालो में से होगा।
*✍🏽तर्के जमाअत की वईद, स. 4*
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*मुबारक महीने* #14
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
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*रमज़ानुल मुबारक* #06
*_जुमुआ की हर घड़ी में दस लाख की मगफिरत_*
     हज़रते अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास رضي الله تعالي عنه से रिवायत है की हुज़ूर ﷺ का फरमान है : अल्लाह माहे रमज़ान में रोज़ाना इफ्तार के वक़्त दस लाख ऐसे गुनाहगारो को जहन्नम से आज़ाद फ़रमाता है जिन पर गुनाहो की वजह से जहन्नम वाजिब हो चूका था, नीज़ शबे जुमुआ और रोज़े जुमुआ की हर घड़ी में ऐसे दस दस लाख गुनाहगारो को जहन्नम से आज़ाद किया जाता है जो अज़ाब के हक़दार क़रार दिये जा चुके होते है।

*✍🏽कन्जुल उम्माल, 8/223, हदिष:23716*
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 347*
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Monday, 20 March 2017

*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #175
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_सूरतुल बक़रह, आयत ②③①_*
     और  जब तुम औरतों को तलाक़ दो और  उनकी मीआद (अवधि) आ लगे (10) तो उस वक़्त तक या भलाई के साथ रोक लो (11) या नेकी के साथ छोड़ दो (12) और उन्हें ज़रर (तक़लीफ़) देने के लिये रोकना न हो कि हद से बढ़ो और जो ऐसा करे वह अपना ही नुक़सान करता है (13) और अल्लाह की आयतों को ठठ्ठा न बना लो. (14) और याद करो अल्लाह का एहसान जो तुमपर है (15) और वह जो तुम पर किताब और हिकमत (16) उतारी तुम्हें नसीहत देने को और अल्लाह से डरते रहो और जान रखो कि अल्लाह सब कुछ जानता है (17).

*तफ़सीर*
     (10) यानी इद्दत ख़त्म होने के क़रीब हो. यह आयत साबित बिन यसार अन्सारी के बारे में उतरी. उन्होंने अपनी औरत को तलाक़ दी थी और जब इद्दत ख़त्म होने के क़रीब होती थी, रूजू कर लिया करते थे ताकि औरत कै़द में पड़ी रहे.
     (11) यानी निबाहने और अच्छा मामला करने की नियत से रूजू करो.
    (12) और इद्दत गुज़र जाने दो ताकि इद्दत के बाद वो आज़ाद हो जाएं.
    (13) कि अल्लाह के हुक्म की मुख़ालिफ़त करके गुनहगार होता है.
     (14) कि उनकी पर्वाह न करो और उनके ख़िलाफ़ अमल करो.
    (15) कि तुम्हें मुसलमान किया और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का उम्मती बनाया.
     (16) किताब से क़ुरआन और हिकमत से क़ुरआन के आदेश और रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की सुन्नत मुराद है.
     (17) उससे कुछ छुपा हुआ नहीं है.
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*मुबारक महीने* #13
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*रमज़ानुल मुबारक* #05
*_रोज़ाना दस लाख गुनाहगारो की दोज़ख से रिहाई_*
     अल्लाह की इनायतो, रहमतो और बख्शिशो का तज़किरा करते हुए एक मौके पर हुज़ूर ﷺ ने इरशाद फ़रमाया : जब रमज़ान की पहली रात होती है तो अल्लाह अपनी मख्लूक़ की तरफ नज़र फ़रमाता है और जब अल्लाह किसी बन्दे की तरफ नज़र फरमाए तो उसे कभी अज़ाब न देगा। और हर रोज़ दस लाख गुनाहगारो को जहन्नम से आज़ाद फ़रमाता है और जब 29वी रात होती है तो महीने भर में जितने आज़ाद  किये उन के मज़मुऐ के बराबर उस एक रात में आज़ाद फ़रमाता है। फिर जब ईदुल फ़ित्र की रात आती है, मलाएका ख़ुशी करते है और अल्लाह अपने नूर की ख़ास तजल्ली फ़रमाता है और फरिश्तों से फ़रमाता है,
     ऐ गिरोहे मलाएका ! उस मज़दूर का क्या बदला है जिस ने काम पूरा कर लिया ? फ़रिश्ते अर्ज़ करते है, उस को पूरा पूरा अज्र दिया जाए। अल्लाह फ़रमाता है, में तुम्हे गवाह करता हु की में ने उन सब को बख्श दिया।
*✍🏽कन्जुल उमाल, 8/219, हदिष:2370*
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 344*
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*जमाअत छोड़ने की सज़ा * #01/08
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     हज़रते सय्यिदुना उबैदुल्लाह बिन उमर कवारीरी फरमाते है : मेने हमेशा ईशा की नमाज़ बा जमाअत अदा की, मगर अफ़सोस ! एक मर्तबा मेरी ईशा की नमाज़ बा जमाअत फौत हो गई। इसका सबब ये हुआ की मेरे यहाँ एक मेहमान आया, उसकी मेहमान नवाज़ी में लगा रहा। फरागत के बाद जब मस्जिद पंहुचा तो जमाअत हो चुकी थी। अब में सोचने लगा की ऐसा कौनसा अमल किया जाए जिस से इस नुक्शान की तलाफि हो। यका यक मुझे अल्लाह के हबीब का ये फरमान याद आया "बा जमाअत नमाज़ मुन्फरिद की नमाज़ पर 21 दरजे फ़ज़ीलत रखती है। इस तरह 25 और 27 दरजे फ़ज़ीलत की भी हदिष भी मरवी है।
*✍🏽शहीह बुखारी*

     मेने सोचा अगर में 27 मर्तबा नमाज़ पढ़ लू तो शायद जमाअत फौत हो जाने से जो कमी हुई वो पूरी हो जाए। चुनांचे मेने 27 मर्तबा ईशा की नमाज़ पढ़ी, फिर मुझे नींद आ गई। मेने अपने आप को चन्द घोड़े सुवरो के साथ देखा, हम सब कही जा रहे थे। इतने में एक घोड़े सुवार ने मुझसे कहा : "तुम अपने घोड़े को मशक्कत में न डालो, बेशक तुम हमसे नहीं मिल सकते।" मेने कहा में आपके साथ क्यू नहीं मिल सकता ? कहा : इस लिए की हम ने ईशा की नमाज़ बा जमाअत अदा की है।
*✍🏽उयुनूल हिकायत, जी, 2 स. 94*

     मीठे मीठे इस्लामी भाइयो ! इससे मालूम हुआ की जमाअत छूट जाने के बाद अगर कोई उस नमाज़ को 27 बार पढ़ भी ले तब भी बा जमाअत नमाज़ पठने के षवाब के बराबर नहीं पहुच सकता। यक़ीनन बा जमाअत नमाज़ की अपनी ही बरकतें है।
*✍🏽तर्के जमाअत की वईद, स. 3*
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Sunday, 19 March 2017

*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #174
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
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*_सूरतुल बक़रह, आयत ②③ⓞ_*
     फिर अगर तीसरी तलाक़ उसे दी तो अब वह औरत उसे हलाल न होगी जब तक दूसरे शौहर के पास न रहे (8) फिर वह दूसरा अगर उसे तलाक़ दे दे तो उन दोनों पर गुनाह नहीं कि आपस में मिल जाएं (9) अगर समझते हों कि अल्लाह कि हदें निभाएंगे और ये अल्लाह की हदें है जिन्हें बयान करता है अक़ल वालों के लिये.

*तफ़सीर*
     (8) तीन तलाक़ों के बाद औरत शौहर पर हराम हो जाती है, अब न उससे रूजू हो सकता है न दोबारा निकाह, जब तक कि हलाला हो, यानी इद्दत के बाद दूसरे से निकाह करे और वह सहवास के बाद तलाक़ दे, फिर इद्दत गुज़रे.
     (9) दोबारा निकाह कर लें.
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*मुबारक महीने* #12
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*रमज़ानुल मुबारक* #04
*_हर शब् 60000 की बख्शिश_*
     हज़रते अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद رضي الله تعالي عنه से रिवायत है की हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया : रमज़ान शरीफ की हर शब् आसमानों में सुबहे सादिक़ तक एक मुनादी ये निदा करता है, "ऐ अच्छाई मांगने वाले ! अल्लाह की इताअत की तरफ आगे बढ़ और खुश हो जा। और ऐ शरीर ! शर से बाज़ आ जा और इबरत हासिल कर।
*है कोई मगफिरत का तालिब !* की उसकी तलब पूरी की जाए।
*है कोई तौबा करने वाला !* की उसकी तौबा क़बूल की जाए।
*है कोई दुआ मांगने वाला !* की उसकी दुआ क़बूल की जाए।
*है कोई साइल !* की उसका सवाल पूरा किया जाए।
     अल्लाह तआला रमज़ानुल मुबारक की हर शन में इफ्तार के वक़्त 60000 गुनाहगारो को दोज़ख से आज़ाद फरमा देता है। और ईद के दिन सारे महीने के बराबर गुनाहगारो की बख्शिश की जाती है
*दुर्रे मंसूर, 1/446*

     मदीने के दीवानो ! रमज़ानुल मुबारक की जलवा गरी तो क्या होती है, हम गरीबो के वारे न्यारे हो जाते है। अल्लाह के फ्ज़लो करम से रहमत के दरवाज़े खोल दिये जाते है और खूब मगफिरत के परवाने तक़सीम होते है। काश ! हम गुनाहगारो को ब तुफेले माहे रमज़ान, सरवरे कौनो मकान के रहमत भरे हाथो जहन्नम से रिहाई का परवाना मिल जाए।
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 345*
*___________________________________*
मिट जाए गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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Saturday, 18 March 2017

*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #173
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_सूरतुल बक़रह, आयत ②②⑨_*
     यह तलाक़ (1) दो बार तक है फिर भलाई के साथ रोक लेना है (2) या नेकी के साथ छोड़ देना है(3) और तुम्हें रवा नहीं कि जो कुछ औरतों को दिया (4) उसमें से कुछ वापिस लो (5) मगर जब दोनों को डर हो कि अल्लाह की हदें क़ायम न करेंगे (6) फिर अगर तुम्हें डर हो कि वो दोनों ठीक उन्हीं हदों पर न रहेंगे तो उनपर कुछ गुनाह नहीं इसमें जो बदला देकर औरत छुट्टी ले (7) ये अल्लाह की हदें हैं इनसे आगे न बढ़ो तो वही लोग ज़ालिम हैं.

*तफ़सीर*
     (1) यानी तलाक़े रजई. एक औरत ने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर होकर अर्ज़ किया कि उसके शौहर ने कहा है कि वह उसको तलाक़ देता और रूजू करता रहेगा. हर बार जब तलाक़ की इद्दत गुज़रने के क़रीब होगी रूजू कर लेगा, फिर तलाक़ दे देगा, इसी तरह उम्र भर उसको क़ैद में रखेगा. इस पर यह आयत उतरी और इरशाद फ़रमाया कि तलाक़ रजई दो बार तक है. इसके बाद फिर तलाक़ देने पर रूजू करने का हक़ नहीं.
     (2) रूजू करके.
     (3) इस तरह कि रूजू न करे और इद्दत गुज़रकर औरत बयान हो जाए.
     (4) यानी मेहर.
     (5) तलाक़ देते वक़्त.
     (6) जो मियाँ बीवी के हुक़ूक के बारे में है.
     (7) यानी तलाक़ हासिल करे. यह आयत जमीला बिन्ते अब्दुल्लाह के बारे में उतरी. यह जमीला साबित बिन क़ैस इब्ने शमास के निकाह में थीं और शौहर से सख़्त नफ़रत रखतीं थीं. रसूले खुदा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के हुज़ूर में अपने शौहर की शिकायत लाई और किसी तरह उनके पास रहने पर राज़ी न हुई, तब साबित ने कहा कि मैं ने इनको एक बाग़ दिया है अगर यह मेरे पास रहना गवारा नहीं करतीं और मुझसे अलग होना चाहती हैं तो वह बाग़ मुझे वापस करें, मैं इनको आज़ाद कर दूँ. जमीला ने इसको मंज़ूर कर लिया. साबित ने बाग़ ले लिया और तलाक़ दे दी. इस तरह की तलाक़ को ख़ुला कहते हैं. ख़ुला तलाक़े बयान होता है. ख़ुला में “ख़ुला” शब्द का ज़िक्र ज़रूरी है. अगर जुदाई की तलबगार औरत हो तो ख़ुला में मेहर की मिक़दार से ज़्यादा लेना मकरूह है और अगर औरत की तरफ़ से नुशूज़ न हो, मर्द ही अलाहिदगी चाहे तो मर्द को तलाक़ के बदले माल लेना बिल्कुल मकरूह है.
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*क़ज़ा नमाज़ का तरीका* #14/15
*بِسْــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ*

*_ज़ोहर की 4 सुन्नते रह जाए तो क्या करे?_*
     अगर ज़ोहर के फ़र्ज़ पहले पढ़ लिये तो दो रकाअत सुन्नत अदा करने के बाद चार रकाअत सुनत अदा कीजिये उसके बाद दो नफ्ल अदा किजोये।

*_फज्र की सुन्नते रह जाए तो क्या करे ?_*
     सुन्नते पढ़ने से अगर फज्र की जमाअत छूट जाने का अंदेशा हो तो बगैर पढ़े शामिल हो जाए। मग़र सलाम फेरने के बाद पढ़ना जाइज़ नही।
     तुलुए आफताब के कम अज़ कम 20 मिनट बाद से ले कर ज़हवए कुब्रा तक पढ़ले कि मुस्तहब है। ईसके बाद मुस्तहब भी नही।
*✍🏽नमाज़ के हकाम 254*
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*मुबारक महीने* #11
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
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*रमज़ानुल मुबारक* #03
*_सगीरा गुनाहो का कफ़्फ़ारा_*
    हज़रते अबू हुरैरा رضي الله تعالي عنه से मरवी है, हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया : पाचो नमाज़े, और जुमुआ अगले जुमुआ तक और माहे रमज़ान अगले माहे रमज़ान तक गुनाहो का कफ़्फ़ारा है जब तक की कबीरा गुनाहो से बचा जाए।
*✍🏽सहीह मुस्लिम, 144, हदिष : 233*

*_तौबा का तरीक़ा_*
     रमज़ानुल मुबारक में रहमतो की छमाछम बारिशे और गुनाहे सगीरा के कफ्फारे का सामान हो जाता है। गुनाहे कबीरा तौबा से मुआफ़ होते है। तौबा करने का तरीक़ा ये है की जो गुनाह हुवा ख़ास उस गुनाह का ज़िक्र कर के दिल की बेज़ारी और आइन्दा उस से बचने का अहद कर के तौबा करे।
     मसलन झूट बोला, तो बारगाहे खुदा वन्दी में अर्ज़ करे, या अल्लाह ! में ने जो झूट बोला इस से तौबा करता हु और आइन्दा नही बोलूंगा।
     तौबा के दौरान दिल में झूट से नफरत हो और आइन्दा नही बोलूंगा कहते वक़्त दिल में ये इरादा भी हो की जो कुछ कह रहा हु ऐसा ही करूँगा जभी तौबा है।
     अगर बन्दे की हक़ तलफि की है तो तौबा के साथ साथ उस बन्दे से मुआफ़ करवाना भी ज़रूरी है।
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 344*
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लोगो में सबसे पहले शहीद जन्नत में दाखिल होगा।
*✍🏽मुसनद इमाम अहमद बिन हम्बल, 3/412, हदिष:9497*

जहन्नम में सबसे पहले ज़बरदस्ती हुक्मरान बनने वाला दाखिल होगा।
*✍🏽सहीह इब्ने हब्बान, 9/282, हदिष:7438*
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Friday, 17 March 2017

*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

दुन्या की खूबसूरती की क्या बात करते हो..
*दरे मुस्तफा ﷺ से हसीन* कोई नज़ारा नही...

अपने बच्चों को *इश्के मुस्तफा ﷺ* सिखाए...
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*जुमुआ मुबारक*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

फरमाने मुस्तफा ﷺ : जो मुझ पर जुमुआ की रात या जुमुआ के दिन एक बार दुरुदे पाक पढता है अल्लाह उस की 100 उखरवी हाजत और 30 दुन्यवि हाजत पूरी करता है।
*✍🏽शोएबुल ईमान, 3/111, हदिष:3035*

_*दुरुदे शफ़ाअत*_

शाफए उमम ﷺ का फ़रमाने मुअज़्ज़्म है : जो शख्स यु दुरुदे पाक पढ़े उसके लिये मेरी शफ़ाअत वाजिब हो जाती है।
आइये हम भी अपनी शफ़ाअत करवाले।
 *ﺑِﺴْـــــــﻢِﷲِﺍﻟﺮَّﺣْﻤَﻦِﺍلرَّﺣِﻴﻢ*

*اَللّٰھُمَّ  صَلِّ  عَلٰی  مُحَمَّدٍ  وَّ اَنْزِلْهُ الْمَقْعَدَ  الْمُقَرَّبَ  عِنْدَکَ یَوْمَ  الْقِیَا  مَةِ*

*अल्लाहुम्म सल्ले-अ'ला मुहम्मदीन व-अन्ज़िल्हु अल-मक़अ'द अल-मूक़र्र-ब ई'न्दक यौमल क़ीयाम-ह*
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*क़ज़ा नमाज़ का तरीका* #13/15
*بِسْــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ*

*_फ़ज्र व असर के बाद नवाफ़िल नही पढ़ सकते_*
     नमाज़े फ़ज्र और असर के बाद वो तमाम नवाफ़िल अदा करना मकरुहे तहरिमि है, अगर्चे फ़ज्र व असर की सुन्नते ही क्यू न हो।
*✍🏽दुर्रेमुखतार 2/44*

     क़ज़ा के लिये कोई वक़्त मुअय्यन नही उम्र में जब भी पढ़ेगा बरियूज़्ज़िम्मा हो जाएगा। मगर तुलुअ व गुरुब और ज़वाल के वक़्त नमाज़ नहीं पढ़ सकता कि इन वक़्तों में नमाज़ जाइज़ नही।
*✍🏽बहारे शरीअत 1/702*
*✍🏽आलमगिरी 1/52*
*✍🏽नमाज़ के अहकाम 254*
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Thursday, 16 March 2017

*क़ज़ा नमाज़ का तरीका* #12/15
*بِسْــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
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*_क़ज़ा का लफ्ज़ कहना भूल गया तो?_*
     आला हज़रत फरमाते है : हमारे उलमा तसरिह फरमाते है : क़ज़ा ब निययते अदा और अदा ब निययते क़ज़ा दोनों सहीह है।
*✍🏽फतावा रज़विय्या 8/161*

*_क़ज़ा नमाज़े नवाफ़िल की अदाएगी से बेहतर_*
     क़ज़ा नमाज़े नवाफ़िल की अदाएगी से बेहतर और अहम है मगर सुन्नते मुअक्क्दा, नमाज़े चाश्त, स्लातुत्तस्बीह और वो नमाज़े जिन के बारे में अहादीस मरवी है यानी जेसे तहिय्यतुल मस्जिद असर से पहले की चार रकअत (सुन्नते गैर मुअक्कदा) और मगरिब के बाद 6 रकअत पढ़ी जाएगी।
*✍🏽रद्दुलमोहतार 2/646*

     याद रहे क़ज़ा नमाज़ के बिना पर सुन्नते मुअक्कदा छोड़ना जाइज़ नहीं, अलबत्ता सुन्नते गैर मुअक्कदा और अहादिसो में वारिद शुदा मुखसुस नवाफ़िल पढ़े तो षवाब का हक़दार है मगर इन्हें न पड़ने पर कोई गुनाह नही।
*✍🏽नमाज़ के अहकाम 253*
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*गौष किसे कहते है ?*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
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     गौषियत बुज़ुर्गी का एक ख़ास दर्जा है लफ्ज़ "गौष" के लुग्वि माना है : *"फरियाद रस यानी फरियाद को पहुचने वाला".*
     चुकी हज़रत शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी رضي الله تعالي عنه गरीबो, बेकसों और हाजत मन्दो के मदद गार है इसी लिए आप को *"गौषे आज़म"* के खिताब से सरफ़राज़ किया गया। और बाज़ अक़ीदत मन्द आप को *"पीराने पिर दस्तगीर"* के लक़ब से भी याद करते है।

*✍🏽गौषे पाक के हालात, 15*
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Wednesday, 15 March 2017

*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #171
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
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*_सूरतुल बक़रह, आयत ②②⑥_*
     और वो जो क़सम खा बैठते हैं अपनी औरतों के पास न जाने की उन्हें चार महीने की मोहलत है तो अगर इस मुद्दत में फिर आए तो अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है.

*_सूरतुल बक़रह, आयत ②②⑦_*
     और अगर छोड़ देने का इरादा पक्का कर लिया तो अल्लाह सुनता जानता है.
*तफ़सीर*
     जाहिलियत के दिनों में लोगों का यह तरीक़ा था कि अपनी औरतों से माल तलब करते, अगर वह देने से इन्कार करतीं तो एक साल, दो साल, तीन साल या इससे ज़्यादा समय तक उनके पास ना जाते और उनके साथ सहवास न करने की क़सम खा लेते थे और उन्हें परेशानी में छोड़ देते थे. न वो बेवा ही थीं कि कहीं अपना ठिकाना कर लेतीं, न शौहर वाली कि शौहर से आराम पातीं.
     इस्लाम ने इस अत्याचार को मिटाया और ऐसी क़सम खाने वालों के लिये चार महीने की मुद्दत निश्चित फ़रमादी कि अगर औरत से चार माह के लिये सोहबत न करने की क़सम खाले जिसको ईला कहते हैं तो उसके लिये चार माह इन्तिज़ार की मोहलत है. इस अर्से में ख़ूब सोच समझ ले कि औरत को छोड़ना उसके लिये बेहतर है या रखना. अगर रखना बेहतर समझे और इस मुद्दत के अन्दर रूजू करले तो निकाह बाक़ी रहेगा और क़सम का कफ़्फ़ारा लाज़िम आएगा, और अगर इस मुद्दत में रूजू न किया और क़सम न तोड़ी तो औरत निकाह से बाहर हो गई और उस पर तलाक़े बायन वाक़े हो गई. अगर मर्द सहवास की क्षमता रखता हो तो रूजू हमबिस्तरी से ही होगा और अगर किसी वजह से ताक़त न हो तो ताक़त आने के बाद सोहबत का वादा रूजू है. (तफ़सीरे अहमदी)
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*क़ज़ा नमाज़ का तरीका* #11/15
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*_जमानए इर्तिदाद की नमाज़े_*
     जो शख्स मआजअल्लाह मुर्तद हो गया फिर इस्लाम लाया तो जमानए इर्तिदाद की नमाज़ की क़ज़ा नही और मुर्तद होने से पहले जमानए इस्लाम में जो नमाज़े जाती रही थी उनकी क़ज़ा वाजिब है।
*✍🏽रद्दुलमोहतार 2/647*

*_मरीज़ को नमाज़ कब मुआफ़ है?_*
     ऐसा मरीज़ कि इशारे से भी नमाज़ नही पढ़ सकता अगर ये हालत पुरे 6 वक़्त तक रही तो इस हालत में जो नमाज़े हुई उनकी क़ज़ा वाजिब नही।
*✍🏽आलमगिरी 1/121*
*✍🏽नमाज़ के अहकाम 252*
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*मुबारक महीने* #09
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*रमज़ानुल मुबारक* #01

     खुदाए रहमान का करोड़ हा करोड़ एहसान की उस ने हमे माहे रमज़ान जेसी अज़ीमुश्शान नेअमत से सरफ़राज़ फ़रमाया। माहे रमज़ान के फैजान के क्या कहने ! इस की तो हर घड़ी रहमत भरी है। इस महीने में अज्रो षवाब बहुत ही बढ़ जाता है। नफ्ल का षवाब फ़र्ज़ के बराबर और फ़र्ज़ का षवाब 70 गुना कर दिया जाता है। बल्कि इस महीने में तो रोज़ादार का सोना भी इबादत में शुमार किया जाता है।
     अर्श उठाने वाले फ़रिश्ते रोज़ादारो की दुआ पर आमीन कहते है और एक हदिष के मुताबिक़ "रमज़ान के रोज़ादार के लिये दरिया की मछलिया इफ्तार तक दुआए मगफिरत करती रहती है।

*✍🏽मदनी पंजसुरह, 337*
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Tuesday, 14 March 2017

*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #170
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
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*_सूरतुल बक़रह, आयत ②②⑤_*
     अल्लाह तुम्हें नहीं पकड़ता उन क़स्मों में जो बेईरादा ज़बान से निकल जाएं, हाँ उसपर पकड़ फ़रमाता है जो काम तुम्हारे दिलों ने किये और अल्लाह बख़्शने वाला हिल्म (सहिष्णुता) वाला है.

*तफ़सीर*
     क़सम तीन तरह की होती है : (1) लग्व (2) ग़मूस (3) मुनअक़िदा. लग्व यह है कि किसी गुज़री हुई बात पर अपने ख़याल में सही जानकर क़सम खाए और अस्ल में वह उसके विपरीत हो, यह माफ़ है, और इस पर कफ़्फ़ारा नहीं. ग़मूस यह है कि किसी गुज़री हुई बात पर जान बूझकर झूठी क़सम खाए, इसमें गुनाहगार होगा. मुनअक़िदा यह है कि किसी आने वाली बात पर इरादा करके क़सम खाए. क़सम को अगर तोड़े तो गुनाहगार भी है और कफ़्फ़ारा भी लाज़िम.
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*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*क़ज़ा नमाज़ का तरीका* #10/15
*بِسْــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ*

*_क़ज़ाए उम्री का तरीका_*
     क़ज़ा हर रोज़ की 20 रकअत होती है।
2 फ़र्ज़ फ़ज्र की, 4 ज़ोहर की, 4 असर की, 3 मगरिब की, 4 ईशा की और 3 वित्र।
निय्यत इस तरह कीजिये
*सबसे पहली फ़ज्र जो मुझ से क़ज़ा हुई उसको अदा करता हु* हर नमाज़ में इसी तरह नियत कीजिये।

*_नमाज़े क़सर की क़ज़ा_*
     अगर हालते सफर की क़ज़ा नमाज़ हालते इक़ामत में पढ़ेंगे तो क़सर ही पढ़ेंगे और हालते इक़ामत की क़ज़ा हालते सफर में पढ़ेंगे तो पूरी पढ़ेंगे।
*✍🏽आलमगिरी 1/121*
*✍🏽नमाज़ के अहकाम 251*
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मिट जाए गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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Monday, 13 March 2017

*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #169
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_सूरतुल बक़रह, आयत ②②④_*
     और अल्लाह को अपनी क़िस्मतों का निशाना न बना लो कि एहसान और परहेज़गारी और लोगों में सुलह करने की क़सम कर लो और अल्लाह सुनता जानता है.

*तफ़सीर*
     हज़रत अब्दुल्लाह बिन रवाना ने अपने बेहनोई नोमान बिन बशीर के घर जाने और उनसे बात चीत करने और उनके दुश्मनों के साथ उनकी सुलह कराने से क़सम खाली थी. जब इसके बारे में उनसे कहा जाता था तो कह देते थे कि मैं क़सम खा चुका हूँ इसलिये यह काम कर ही नहीं सकता. इस सिलसिले में यह आयत नाज़िल हुई और नेक काम करने से क़सम खा लेने को मना किया गया. अगर कोई व्यक्ति नेकी से दूर रहने की क़सम खाले तो उसको चाहिये कि क़सम को पूरा न करे बल्कि वह नेक काम ज़रूर करे और क़सम का कफ़्फ़ारा दे.
     मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में है, रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया जिस शख़्स ने किसी बात पर क़सम खाली फिर मालूम हुआ कि अच्छाई और बेहतरी इसके ख़िलाफ़ में है तो चाहिये कि उस अच्छे काम को करे और क़सम का कफ़्फ़ारा दे.
     कुछ मुफ़स्सिरों ने यह भी कहा है कि इस आयत से बार बार क़सम खाने की मुमानिअत यानी मनाही साबित होती है.
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मिट जाए गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*मुबारक महीने* #08
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*शाबानुल मुअज़्ज़म* #01
*_आक़ा का महीना_*
     हुज़ूर ﷺ का शाबानुल मुअज़्ज़म के बारे में फरमाने मुकर्रम है, शाबान मेरा महीना है और रमज़ानुल मुबारक अल्लाह का महीना है।
*✍🏽अल-जामेउ सगीर, 103, हदिष : 4889*

*_रमज़ान के बाद कौनसा महीना अफज़ल है ?_*
     हज़रते अनस رضي الله تعالي عنه फरमाते है, दो आलम के मालिको मुख्तार ﷺ की बारगाह में अर्ज़ की गई की रमज़ान के बाद कौनसा रोज़ा अफज़ल है ? इरशाद फ़रमाया : ताज़िमे रमज़ान के लिये शाबान का। फिर अर्ज़ की गई, कौनसा सदक़ा अफज़ल है ? फ़रमाया : रमज़ान के माह में सदक़ा करना।
*✍🏽तिर्मिज़ी, 2/146, हदिष:663*

*_15वी शब् में तजल्ली_*
     हज़रते आइशा सिद्दोका رضي الله تعالي عنها से रिवायत है, हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया : अल्लाह शाबान की 15वी शब् में तजल्ली फ़रमाता है। इस्तिग़फ़ार (तौबा) करने वालो को बख्श देता और तालिबे रहमत पर रहम फ़रमाता और अदावत वालो को जिस हाल पर है उसी पर छोड़ देता है।
*✍🏽शोएबुल ईमान, 3/383, हदिष:3835*

*_भलाइयों वाली राते_*
     हज़रते आइशा رضي الله تعالي عنها रिवायत फरमाती है की मेने हुज़ूर ﷺ को फरमाते सुना, अल्लाह (खास तौर पर) 4 रातो में भलाइयों के दरवाज़े खोल देता है :
(1) बकरी ईद की रात (2) ईदुल फ़ित्र की रात (3) शाबान की 15वी रात की इस रात में मरने वालो के नाम और लोगो का रिज़्क़ और (इस साल) हज करने वालो के नाम लिखे जाते है (4) अरफा (9 जुल हिज्जा) की रात, अज़ान फज्र तक।
*✍🏽दुर्रू मन्सूर, 7/402*
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 332*
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Sunday, 12 March 2017

*क़ज़ा नमाज़ का तरीका* #08/15
*بِسْــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ*

*_अदा, क़ज़ा और वाजीबुल इआदा की तारीफ़_*
     जिस चीज़ का बन्दों को हुक्म है उसे वक़्त में बजा लाने को अदा कहते है और वक़्त खत्म होने के बाद अमल में लाना क़ज़ा है और अगर उस हुक्म के बाज लाने में कोई खराबी पैदा हो जाए तो उस खराबी को दूर करने के लिये वो अमल दोबारा बजा लाना इआदा कहलाता है।
     वक़्त के अंदर अंदर अगर तहरिमा बांध ली तो नमाज़ क़ज़ा न हुई बल्कि अदा है।
*✍🏽दुर्रे मुख़्तार 2/627*
     नमाज़े फ़ज्र, जुमुआ और इदैन में वक़्त के अंदर सलाम फिरना लाज़िम है वरना नमाज़ न होगी
*✍🏽बहारे शरीअत 1/701*
     बिला उज़्रे शरई नमाज़ क़ज़ा कर देना सख्त गुनाह है, इस पर फ़र्ज़ है कि उसकी क़ज़ा पढ़े और सच्चे दिल से तौबा भी करे, तौबा या हज्जे मक़बूल से इन्शा अल्लाह ताखीर का गुनाह मुआफ़ हो जाएगा
*✍🏽दुर्रे मुख्तार 2/626*
     तौबा उसी वक़्त सहीह है जब कि क़ज़ा पढ़ ले उसको अदा किये बगैर तौबा किये जाना तौबा नही कि, जो नमाज़ इस के ज़िम्मे थी उसको पढ़ना तो अब भी बाक़ी है और जब गुनाह से बाज़ न आया तो तौबा कहा हुई ?
*✍🏽रद्दल मोहतार 2/627*

     हज़रते इब्ने अब्बास رضي الله تعالي عنه से मरवी है, हुज़ूर ﷺ ने इरशाद फ़रमाया : गुनाह पर क़ाइम रह कर तौबा करने वाला उस की मिस्ल है जो अपने रब से ठठा यानी मज़ाक करता है।
*✍🏽शोएबुल ईमान 5/436*
*✍🏽नमाज़ के अहकाम 246*
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*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #167
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_सूरतुल बक़रह, आयत ②②②_*
     और तुमसे पूछते हैं हैज़ का हुक्म तुम फ़रमाओ वह नापाकी है तो औरतों से अलग रहो हैज़ के दिनों और उनके क़रीब न जाओ जब तक पाक न हो लें फिर जब पाक हो जाएं तो जहां से तुम्हें अल्लाह ने हुक्म दिया बेशक अल्लाह पसन्द करता है बहुत तौबह करने वालों को और पसन्द रखता है सुथरों को.

*तफ़सीर*
     अरब के लोग यहूदियों और मजूसीयों यानी आग के पुजारियों की तरह माहवारी वाली औरतों से सख़्त नफ़रत करते थे. अरब खाना पीना, एक मकान में रहना गवारा न था, बल्कि सख़्ती यहाँ तक पहुँच गई थी कि उनकी तरफ़ देखना और उनसे बात चीत करना भी हराम समझते थे, और ईसाई इसके विपरीत माहवारी के दिनों में औरतों के साथ बड़ी महब्बत से मशग़ूल होते थे, और सहवास में बहुत आगे बढ़ जाते थे.
     मुसलमानों ने हुज़ूर से माहवारी का हुक्म पूछा. इस पर यह आयत उतरी और बहुत कम तथा बहुत ज़्यादा की राह छोड़ कर बीच की राह अपनाने की तालीम दी गई और बता दिया गया कि माहवारी के दिनों में औरतों से हमबिस्तरी करना मना है.
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Saturday, 11 March 2017

*आदाबे_सोहबत (जिमाअ) ताल्लुक़ात के बयान*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

मियां बीवी के ताल्लुक़ से कुछ ऐसे मसले मसायल हैं जिनका जानना उनको ज़रूरी है मगर वो नहीं जानते,क्यों,क्योंकि दीनी किताब हम पढ़ते नहीं और आलिम से पूछने में शर्म आती है मगर अजीब बात है कि मसला पूछने में तो हमें शर्म आती है मगर वही ग़ैरत उस वक़्त मर जाती है जब दूल्हा अपने दोस्तों को और दुल्हन अपनी सहेलियों को पूरी रात की कहानी सुनाते हैं,खैर ये msg सेव करके रखें और अपने दोस्तों और अज़ीज़ो में जिनकी शादियां हों उन्हें तोहफे के तौर पर ये msg सेंड करें

* हज़रत इमाम गज़ाली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि जिमअ यानि सोहबत करना जन्नत की लज़्ज़तों में से एक लज़्ज़त है
📕 कीमियाये सआदत,सफह 496

* हज़रत जुनैद बग़दादी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि इंसान को जिमअ की ऐसी ही ज़रूरत है जैसी गिज़ा की क्योंकि बीवी दिल की तहारत का सबब है
📕 अहयाउल उलूम,जिल्द 2,सफह 29

* हदीसे पाक में आता है कि जिस तरह हराम सोहबत पर गुनाह है उसी तरह जायज़ सोहबत पर नेकियां हैं
📕 मुस्लिम,जिल्द 1,सफह 324

* उम्मुल मोमेनीन सय्यदना आयशा सिद्दीका रज़ियल्लाहु तआला अंहा से मरवी है कि हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं कि जब एक मर्द अपनी बीवी का हाथ पकड़ता है तो उसके नामये आमाल में एक नेकी लिख दी जाती है और जब उसके गले में हाथ डालता है तो दस नेकियां लिखी जाती है और जब उससे सोहबत करता है तो दुनिया और माफीहा से बेहतर हो जाता है और जब ग़ुस्ले जनाबत करता है तो पानी जिस जिस बाल पर गुज़रता है तो हर बाल के बदले एक नेकी लिखी जाती है और एक गुनाह कम होता जाता है और एक दर्जा बुलंद होता जाता है
📕 गुनियतुत तालेबीन,सफह 113

* हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से एक शख्स ने अर्ज़ किया कि मैंने जिस लड़की से शादी की है मुझे लगता है कि वो मुझे पसंद नहीं करेगी तो आप फरमाते हैं कि मुहब्बत खुदा की तरफ से होती है और नफरत शैतान की तरफ से तो ऐसा करो कि जब तुम पहली बार उसके पास जाओ तो दोनों वुज़ु करो और 2 रकात नमाज़ नफ्ल शुकराना इस तरह पढ़ो कि तुम इमाम हो और वो तुम्हारी इक़्तिदा करे तो इन शा अल्लाह तुम उसे मुहब्बत और वफा करने वाली पाओगे
📕 गुनियतुत तालेबीन,सफह 115

* नमाज़ के बाद शौहर अपनी दुल्हन की पेशानी के थोड़े से बाल नर्मी और मुहब्बत से पकड़कर ये दुआ पढ़े अल्लाहुम्मा इन्नी असअलोका मिन खैरेहा वखैरे मा जबलतहा अलैहे व आऊज़ोबेका मिन शर्रेहा मा जबलतहा अलैह तो नमाज़ और इस दुआ की बरकत से मियां बीवी के दरमियान मुहब्बत और उल्फत क़ायम होगी इन शा अल्लाह
📕 अबु दाऊद,सफह 293

* खास जिमा के वक़्त बात करना मकरूह है इससे बच्चे के तोतले होने का खतरा है उसी तरह उस वक़्त औरत की शर्मगाह की तरह नज़र करने से भी बचना चाहिये कि बच्चे का अंधा होने का अमकान है युंही बिल्कुल बरहना भी सोहबत ना करें वरना बच्चे के बे हया होने का अंदेशा है
📕 फतावा रज़वियह,जिल्द 9,सफह 46

* हमबिस्तरी के वक़्त बिस्मिल्लाह शरीफ पढ़ना सुन्नत है मगर याद रहे कि सतर खोलने से पहले पढ़ें और सबसे बेहतर है कि जब कमरे में दाखिल हो तब ही बिस्मिल्लाह शरीफ पढ़कर दायां क़दम अन्दर दाखिल करें अगर हमेशा ऐसा करता रहेगा तो शैतान कमरे से बाहर ही ठहर जाएगा वरना वो भी आपके साथ शरीक होगा
📕 तफसीरे नईमी,जिल्द 2,सफह 410

* आलाहज़रत फरमाते हैं कि औरत के अंदर मर्द के मुकाबले 100 गुना ज़्यादा शहवत है मगर उस पर हया को मुसल्लत कर दिया गया है तो अगर मर्द जल्दी फारिग हो जाये तो फौरन अपनी बीवी से जुदा ना हो बल्कि कुछ देर ठहरे फिर अलग हो
📕 फतावा रज़वियह,जिल्द 9,सफह 183

* जिमअ के वक़्त किसी और का तसव्वुर करना भी ज़िना है और सख्त गुनाह और जिमअ के लिए कोई वक़्त मुकर्रर नहीं हां बस इतना ख्याल रहे कि नमाज़ ना फौत होने पाये क्योंकि बीवी से भी नमाज़ रोज़ा एहराम एतेकाफ हैज़ व निफास और नमाज़ के ऐसे वक़्त में सोहबत करना कि नमाज़ का वक़्त निकल जाये हराम है
📕 फतावा रज़वियह,जिल्द 1,सफह 584

* मर्द का अपनी औरत की छाती को मुंह लगाना जायज़ है मगर इस तरह कि दूध हलक़ से नीचे ना उतरे ये हराम है लेकिन ऐसा हो भी गया तो तौबा करे मगर इससे निकाह पर कोई फर्क नहीं आता
📕 दुर्रे मुख्तार,जिल्द 2,सफह 58
📕 फतावा रज़वियह,जिल्द ,सफह 568

* मर्द व औरत को एक दूसरे का सतर देखना या छूना जायज़ है मगर हुक्म यही है कि मक़ामे मख़सूस की तरफ ना देखा जाये कि इससे निस्यान का मर्ज़ होता है और निगाह भी कमज़ोर हो जाती है
📕 रद्दुल मुख्तार,जिल्द 5,सफह 256

* मर्द नीचे हो और औरत ऊपर,ये तरीका हरगिज़ सही नहीं है इससे औरत के बांझ हो जाने का खतरा है
📕 मुजरबाते सुयूती,सफह 41

* फरागत के बाद मर्द व औरत को अलग अलग कपड़े से अपना सतर साफ करना चाहिए क्योंकि दोनों का एक ही कपड़ा इस्तेमाल करना नफरत और जुदायगी का सबब है
📕 कीमियाये सआदत,सफह  266

* एहतेलाम होने के बाद या दूसरी मर्तबा सोहबत करना चाहता है तब भी सतर धोकर वुज़ु कर लेना बेहतर है वरना होने वाले बच्चे को बीमारी का खतरा है
📕 क़ुवतुल क़ुलूब,जिल्द 2,सफह 489

* ज़्यादा बूढ़ी औरत से या खड़े होकर सोहबत करने से जिस्म बहुल जल्द कमज़ोर हो जाता है उसी तरह भरे पेट पर सोहबत करना भी सख्त नुकसान देह है
📕 बिस्तानुल आरेफीन,सफह 139

* जिमअ के बाद औरत को दाईं करवट पर लेटने का हुक्म दें कि अगर नुत्फा क़रार पा गया तो इन शा अल्लाह लड़का ही होगा
📕 मुजरबाते सुयूती,सफह 42

* जिमअ के फौरन बाद पानी पीना या नहाना सेहत के लिए नुकसान देह है हां सतर धो लेना और दोनों का पेशाब कर लेना सेहत के लिए फायदे मंद है
📕 बिस्तानुल आरेफीन,सफह 138

* तबीब कहते हैं कि हफ्ते में दो बार से ज़्यादा सोहबत करना हलाकत का बाईस है,शेर के बारे में आता है कि वो अपनी मादा से साल में एक मर्तबा ही जिमअ करता है और उसके बाद उस पर इतनी कमजोरी लाहिक़ हो जाती है अगले 48 घंटो तक वो चलने फिरने के काबिल भी नहीं रहता और 48 घंटो के बाद जब वो उठता है तब भी लड़खड़ाता है
📕 मुजरबाते सुयूती,सफह 41

* औरत से हैज़ की हालत में सोहबत करना जायज नहीं अगर चे शादी की पहली रात ही क्यों ना हो और अगर इसको जायज़ जाने जब तो काफिर हो जायेगा युंही उसके पीछे के मक़ाम में सोहबत करना भी सख्त हराम है
📕 बहारे शरीयत,हिस्सा 2,सफह 78

* मगर हैज़ की हालत में वो अछूत भी नहीं हो जाती जैसा कि बहुत जगह रिवाज है कि फातिहा वगैरह का खाना भी नहीं बनाने देते ये जिहालत है,बल्कि उसके साथ सोने में भी हर्ज नहीं जबकि शहवत का खतरा ना हो वरना अलग सोये
📕 फतावा मुस्तफविया,जिल्द 3,सफह 13

* क़यामत के दिन सबसे बदतर मर्द व औरत वो होंगे जो अपनी राज़ की बातें अपने दोस्तों को सुनाते हैं
📕 मुस्लिम,जिल्द 1,सफह 464

* औरत से जुदा रहने की मुद्दत 4 महीना है इससे ज़्यादा दूर रहना मना है
📕 तारीखुल खुलफा,सफह 97

* आलाहज़रत फरमाते हैं कि हमल ठहरने से रोकने के लिए दवा या कोई और तरीका इस्तेमाल करना या हमल ठहरने के बाद उसमें रूह फूकने की मुद्दत 120 दिन है तो अगर किसी उज़्रे शरई मसलन बच्चा अभी छोटा है और ये दूसरा बच्चा नहीं चाहता तो हमल साकित करना जायज़ है मगर रूह पड़ने के बाद हमल गिराना हराम और गोया क़त्ल है
📕 फतावा रज़वियह,जिल्द 9,सफह 524

* अगर तोगरे में क़ुरान की आयत लिखी है तो जब तक उस पर कोई कपड़ा ना डाला जाए उस कमरे में सोहबत करना या बरहना होना बे अदबी है हां क़ुरान अगर जुज़दान में है तो हर्ज नहीं युंही किबला रु होना भी मना है
📕 फतावा रज़वियह,जिल्द 9,सफह 522

* जो बच्चा समझदार हो उसके सामने सोहबत करना मकरूह है
📕 अलमलफूज़,हिस्सा 1,सफह 14

* किसी की दो बीवियां हैं अगर चे उसका किसी से पर्दा नहीं मगर औरत का औरत से पर्दा है तो एक के सामने दूसरे से सोहबत करना जायज़ नहीं
📕 फतावा रज़वियह,जिल्द 9,सफह २०७

याद रहे पहली रात खून आना कोई ज़ुरूरी नही है...जो जाहिल इस तरह की बात सोचते है वो कमिलमि है क्योंकि आज के दौर में जिस झिल्ली के फटने से वो खून ऑर्ट की शर्मगाह से आता है वो बचपन में खेल,कूद,साइकल चलाने हटता के और भी चीज़ों से फट सकती है...लिहाज़ा अक़्ल से काम लिया कीजिये....
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*क़ज़ा नमाज़ का तरीका* #07/15
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*الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ*

*_रात के आखरी हिस्से में सोना केसा ?_*
     नमाज़ का वक़्त दाखिल हो जाने के बाद सो गया फिर वक़्त निकल गया और नमाज़ क़ज़ा हो गई तो गुनाहगार हुवा जब की जागने पर सहीह ऐतिमाद या जगाने वाला मौजूद न हो, बल्कि फ़ज्र में दुखुले वक़्त से पहले भी सोने की इजाज़त नही हो सकती जब की अक्सर हिस्सा रात का जागने में गुज़रा और ज़न्ने ग़ालिब है कि अब सो गया तो वक़्त में आँख न खुलेगी।
*✍🏽बहारे शरीअत 1/701*

*_रात देर तक जागना_*
     नात ख्वानी, ज़िक्रो फ़िक्र की महफ़िलो नीज़ सुन्नतो भव इज्तेमाअ वगैरा में रात देर तक जागने के बाद सोने के सबब अगर नमाज़े फ़ज्र क़ज़ा होने का अंदेशा हो तो ब निययते एतिकाफ मस्जिद में क़याम करे या वहा सीए जहा कोई क़ाबिले एतिमाद इस्लामी भाई जगाने वाला मौजूद हो। या अलार्म लगाले इससे आँख खुल जाती हो।
     फ़ुक़हाए किराम फरमाते है : जब ये अंदेशा हो की नमाज़ जाती रहेगी तो बिला ज़रूरते शरईय्या उसे रात देर तक जागना ममनुअ है।
*✍🏽रद्दलमुहतार 2/33*
*✍🏽नमाज़ के अहकाम 245*
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*मुबारक महीने* #06
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*रबीउल अव्वल (रबिउन्नूर शरीफ)* #03
*_शबे क़द्र से भी अफज़ल रात_*
     हज़रते शैख़ अब्दुल हक़ मुहद्दिस देहलवी अलैरहमा फरमाते है : बेशक सरवरे आलम ﷺ की शबे विलादत शबे क़द्र से भी अफज़ल है क्यू की शबे विलादत सरकारे मदीना ﷺ के इस दुन्या में जल्वा गर होने की रात है जब की शबे क़द्र सरकार ﷺ को अता करदा शब् है। और जो रात ज़ुहूरे जाते सरवरे काएनात ﷺ की वजह से मुशर्रफ हो वॉ इस रात से ज़्यादा शर्फ व इज़्ज़त वाली है जो मलाएका के नुज़ूल की बिना पर मुशर्रफ है।

*_जशने विलादत मनाने का षवाब_*
     शैख़ अब्दुल हक़ मुहद्दिस देहलवी फरमाते है : हुज़ूर ﷺ की विलादत की रात ख़ुशी मनाने वालो की जज़ा ये है की अल्लाह उन्हें फ्ज़लो करम से जन्नतुन्नइम में दाखिल फ़रमाएगा। मुसलमान हमेशा से महफिले मिलाद मूनअक़ीद करते आए है और विलादत की ख़ुशी में दावते देते, खाने पक्वाते और खूब सदक़ा व खैरात देते आए है। खूब ख़ुशी का इज़हार करते और दिल खोल कर खर्च कर करते है नीज़ आप की विलादते बा सआदत के ज़िक्र का एहतिमाम करते है और अपने मकानों को सजाते है और इन तमाम अफआले हसना की बरकत से उन लोगो पर अल्लाह की रहमतो का नुज़ूल होता है।
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 328*
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गर होजाए यक़ीन के.....
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*जहद (परहेजगारी)का सवाब*  #1
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

        हज़रत शैख अब्दुलकादर जीलानी رضي الله تعالي عنه ने फरमया: ज़ाहिदोको दो सवाब मिलते है। पेहला तर्के असबाब के बाइस क्योंके नफ्सकी ख्वाहिशातसे मोहतरिज़ (परहेज़ करनेवाला) होकर सिर्फ हुकमका पाबन्द हो जाता है और जब नफससे उसकी मुखालेफत और दुश्मनी साबित हो जाती है, उसको हकीकत-व-विलायत की मन्ज़िल मिल जाती है और अब्दालों और आरिफों का मकाम हासिल हो जाता है।
    जो सिर्फ हुकम दे दिया जाता है के जो कुछ उसकी तकदीर में है, जो सिर्फ उसीके लिये तख़्लीक़ की गई है और खामए कुदरत से उसके लिये तेहरीर हो चुकी है और रोशनाई खुश्क हो चुकी और ऐसा ऐसा पहलेही से था, सिर्फ इसीसे ताल्लुक रखे।
बाक़ी कल की पोस्ट में... इंसा अल्लाह

*✍🏽फुतूहल ग़ैब*  पेज 115
*_____________________________________*
मिट जाए गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाये यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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Friday, 10 March 2017

*मुबारक महीने* #05
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*रबीउल अव्वल (रबिउन्नूर शरीफ)* #02
_*मोजिज़ात*_
     12 रबीउल अव्वल को अल्लाह के नूर की दुन्या में जलवा गरी होते ही क़ुफ़्रो ज़ुल्मत के बादल छत गए, शाहे ईरान किसरा के महल पर ज़लज़ला आया, 14 कुंगूरे गिर गए। ईरान का जो आतश कदा 1000 साल से शोला जन था वो बुझ गया, दरियाए सावह खुश्क हो गया, काबे को वज्द आ गया और बूत सर के बल गिर पड़े।
     ताजदारे रिसालत ﷺ जहां में फ़ज़लो रहमत बन कर तशरीफ़ लाए और यक़ीनन अल्लाह की रहमत के नुज़ूल का दिन ख़ुशी व मुसर्रत का दिन होता है। चुनांचे अल्लाह इरशाद फ़रमाता है :
    *तुम फ़रमाओ अल्लाह ही के फ़ज़ल और इसी की रहमत और उसी लर चाहिये की ख़ुशी करे। वो उन के सब धन दौलत से बेहतर है।* (पारह 11)

     अल्लाहु अकबर ! रहमते खुदा वन्दी पर ख़ुशी मनाने का क़ुरआन हुक्म देता है। और क्या हमारे प्यारे आक़ा ﷺ से बढ़ कर भी कोई अल्लाह की रहमत है ? देखिये मुक़द्दस क़ुरआन में साफ साफ़ एलान है :
*وٙمٙآ اٙرْسٙلْنٰكٙ اِلّا رٙحْمٙةً لّٙلْعٰلٙمِيْنٙ o*
तर्जुमा : और हमने तुम्हे न भेजा मगर रहमत सारे जहान के लिये। (पारह, 17)

*✍🏽मदनी पंजसुरह, 327*
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Thursday, 9 March 2017

*शबे जुमुआ़ का दुरुद*
*بِسْــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ*

बुज़ुर्गो ने फ़रमाया की जो शख्स हर शबे जुमुआ़ (जुमुआ़ और जुमेरात की दरमियानी रात, जो आज है) इस दुरुद शरीफ को पाबंदी से कम अज़ कम एक मर्तबा पढेगा तो मौत के वक़्त सरकारे मदीना ﷺ की ज़ियारत करेगा और कब्र में दाखिल होते वक़्त भी, यहाँ तक की वो देखेगा की सरकारे मदीना ﷺ उसे कब्र में अपने रहमत भरे हाथो से उतार रहे है.
*بِسْــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*

*اللّٰھُمَّ صَلِّ وَسَلِّمْ وبَارِکْ عَلٰی سَیِّدِ نَا مُحَمَّدِنِ النَّبِیِّ الْاُمِّیِّ الْحَبِیْبِ الْعَالِی الْقَدْرِ الْعَظِیْمِ الْجَاھِ  وَعَلٰی  اٰلِہٖ  وَصَحْبِہٖ  وَسَلِّمْ*

*अल्लाहुम्म-सल्ली-वसल्लिम-व-बारीक-अ'ला-सय्यिदिना-मुहम्मदीन-नबिय्यिल-उम्मिय्यिल-ह्-बिबिल-आ'लिल-क़द्रील-अ'ज़िमील-जाहि-व-अ'ला आलिही व-स्ह्-बिहि व-सल्लिम*
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*क़ज़ा नमाज़ का तरीका* #05/15
*بِسْــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ*

*_अगर नमाज़ पढ़ना भूल जाए तो..?_*
     हुज़ूर ﷺ ने इरशाद फ़रमाया : जो नमाज़ से सो जाए या भूल जाए तो जब याद आए पढ़ ले कि वोही उसका वक़्त है।
*✍🏽मुस्लिम 346*

     फुक़हाए किराम फरमाते है : सोते में या भूले से नमाज़ क़ज़ा हो गई तो उसकी क़ज़ा पढ़नी फ़र्ज़ है अलबत्ता क़ज़ा का गुनाह उस पर नही मगर बेदार होने और याद आने पर अगर वक़्ते मकरूह न हो तो उसी वक़्त पढ़ ले ताखीर मकरूह है।
*✍🏽बहारे शरीअत 1/701*
*✍🏽नमाज़ के अहकाम 243*
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*मुबारक महीने* #04
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*रबीउल अव्वल (रबिउन्नूर शरीफ)* #01

     माहे रबीउल अव्वल तो क्या आता है हर तरफ मौसिमे बहार आ जाता है। मक्की मदनी मुस्तफा ﷺ के दीवानो में ख़ुशी की लहर दौड़ जाती है। हर हक़ीक़ी मुसलमान गोया दिल की ज़बान से बोल उठता है :
          *निसार तेरी चहल पहल पर हज़ार ईदे रबीउल अव्वल*
          *सिवाए इब्लीस के जहां में सभी तो खुशियां मना रहे है*
     जब काएनात में क़ुफ़्रो शिर्क और वहशतो बर-बरिय्यत का धुप अँधेरा छाया हुवा था। बारह रबीउल शरीफ को मक्का में हज़रते आमिना رضي الله تعالي عنها के मकाने रहमत निशान से एक ऐसा नूर चमका जिस ने सारे आलम को जगमग जगमग कर दिया। सिसकती हुई इंसानियत की आँख जिन की तरफ लगी हुई थी वो ताजदारे रिसालत ﷺ तमाम आलमीन के लिये रहमत बन कर मादरे गेती पर जल्वा गर हुए।

*✍🏽मदनी पंजसुरह, 325*
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Wednesday, 8 March 2017

*_जिस्म के आज़ा की फरियाद_*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     हदीशे पाक में है : इब्ने आदम जब सुबह करता है तो तमाम आज़ा ज़बान के सामने आज़िज़ाना ये कहते है, के तुम खुदा से डर, की हम सब तेरे साथ वा बस्ता है अगर तू सीधी रही तो हम भी सीधे रहेंगे, और अगर तू टेडी हो गई तो हम सब टेड़े हो जाएंगे।

*✍🏽जामेउत तिर्मिज़ी, 4/183, हदिष : 2415*
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*कुर्ब-व-वस्ले खुदावन्दी*   #2
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*
   
        तुम्हारा एक बाज़ू हराम-व-मुबाह, तमाम लिज़्ज़त-व-शेहवत और हर तरहकी आसाइशोंको तज देना है और दुसरा बाज़ू अज़ीयतों, महरुहात और तकालिफ को बर्दास्त करने, फराइज़की अदाइमें सख्तियां सहने, मख्लूक़ और ख्वाहिशाते नफ़स और दुनिया-व-आख़िरतके इरादे-व-आरज़ूसे निकल जानेका नाम है।
          इसी उडानके बाइस तुम्हें कुरबत और विसाल हासिल हो सकता है। और इसीकी वजहसे तमन्नाए पूरी हो सकती है। फिर तुम्हें बड़ी करामतें और इज़्ज़त-व-अज़मत अता होगी और तुम्हें मुकरबीन वसालेलीने खुदावन्दी में शुमार किया जाने लगेगा। जिन पर इनायते रब्बानी हुई और मराआत जिनके शामिले हाल है और जिनको महोब्बते खुदावन्दीने खींच कर रहेमत में छुपा लिया।
        इस आलम में अदबको मल्हूज़ रख्खो और अपने हाल पर इतने मगरूर न हो जाओ के खिदमत अदा करनेमें कोताही करो। रउनत जहल-व-ज़ुल्म और उजलतकी असास (बुनियाद) है।

बाक़ी कल की पोस्ट में... इंसा अल्लाह

*✍🏽फुतूहल ग़ैब*  पेज 114
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Tuesday, 7 March 2017

*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #166
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_सूरतुल बक़रह, आयत ②②①_*
     और  शिर्क वाली औरतों से निकाह न करो जब तक मुसलमान न हो जाएं (14) और बेशक मुसलमान लौंडी मुश्रिका औरत से अच्छी है (15) अगरचे वह तुम्हें भाती हो और मुश्रिको के निकाह में न दो जब तक वो ईमान न लाएं (16) और बेशक मुसलमान ग़ुलाम मुश्रिकों से अच्छा है अगरचे वो तुम्हें भाता हो, वो दोज़ख़ की तरफ़ बुलाते हैं (17) और अल्लाह जन्नत और बख़्शिश की तरफ़ बुलाता है अपने हुक्म से और अपनी आयतें लोगों के लिये बयान करता है कि कहीं वो नसीहत मानें.

*तफ़सीर*
     (14) हज़रत मरसद ग़नवी एक बहादुर सहाबी थे. हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उन्हें मक्कए मुकर्रमा रवाना किया ताकि वहाँ से तदबीर के साथ मुसलमानों को निकाल लाएं. वहाँ उनाक़ नामक एक मुश्रिक औरत थी जो जाहिलियत के ज़माने में इनसे महब्बत रखती थी. ख़ूबसूरत और मालदार थी. जब उसको इनके आने की ख़बर हुई तो वह आपके पास आई और मिलने की चाह ज़ाहिर की. आपने अल्लाह के डर से उससे नज़र फेर ली और फ़रमाया कि इस्लाम इसकी इजाजत नहीं देता. तब उसने निकाह की दरख़ास्त की. आपने फ़रमाया कि यह भी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की इजाज़त पर निर्भर है. अपने काम से छुट्टी पाकर जब आप सरकार की ख़िदमत में हाज़िर हुए तो हाल अर्ज़ करके निकाह के बारे में दर्याफ़्त किया. इस पर यह आयत उतरी. (तफ़सीरे अहमदी).
     कुछ उलमा ने फ़रमाया जो कोई नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के साथ कुफ़्र करे वह मुश्रिक है, चाहे अल्लाह को एक ही कहता हो और तौहीद का दावा रखता हो. (ख़ाज़िन)
     (15) एक रोज़ हज़रत अब्दुल्लाह बिन रवाहा ने किसी ग़लती पर अपनी दासी के थप्पड़ मारा फिर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर होकर उसका ज़िक्र किया. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उसका हाल दर्याफ़्त किया. अर्ज़ किया कि वह अल्लाह तआला के एक होने और हुज़ूर के रसूल होने की गवाही देती है, रमज़ान के रोज़े रखती है, ख़ूब वुज़ू करती है और नमाज़ पढ़ती है. हुज़ूर ने फ़रमाया वह ईमान वाली है. आप ने अर्ज़ किया, तो उसकी क़सम जिसने आपको सच्चा नबी बनाकर भेजा, मैं उसको आज़ाद करके उसके साथ निकाह करूंगा और आपने ऐसा ही किया. इस पर लोगों ने ताना किया कि तुमने एक काली दासी से निकाह किया इसके बावुजूद कि अमुक मुश्रिक आज़ाद औरत तुम्हारे लिये हाज़िर है. वह सुंदर भी है. मालदार भी है. इस पर नाज़िल हुआ “वला अमतुम मूमिनतुन”यानी मुसलमान दासी मुश्रिका औरत से अच्छी है. चाहे आज़ाद हो और हुस्न और माल की वजह से अच्छी मालूम होती हो.
     (16) यह औरत के सरपस्तों को सम्बोधन है. मुसलमान औरत का निकाह मुश्रिक व काफ़िर के साथ अवैध व हराम है.
     (17) तो उनसे परहेज़ ज़रूरी है और उनके साथ दोस्ती और रिश्तेदारी ना पसन्दीदा.
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*मुबारक महीने* #02
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
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*_मुहर्रमुल हराम_* #02
 *_आशूरा को वाकेअ होने वाले अहम वाक़यात_*
     10 मुहर्रम के रोज़ *हज़रते आदम अलैहिस्सलाम* की तौबा क़बूल की गई।
     इसी दिन उन्हें पैदा किया गया। इसी दिन उन्हें जन्नत में दाखिल किया गया।
     इसी दिन अर्श, कुर्सी, आसमान, ज़मीन, सूरज, चाँद, सितारे और जन्नत पैदा किये गए।
     इसी दिन *हज़रते इब्राहिम अलैहिस्सलाम* पैदा हुए। इसी दिन उन्हें आग से नजात मिली।
     इसी दिन *हज़रते मूसा अलैहिस्सलाम* और आप की उम्मत को नजात मिली और फिरऔन अपनी क़ौम समेत ग़र्क़ हुवा।
     इसी दिन *हज़रते ईसा अलैहिस्सलाम* पैदा किये गए। इसी दिन उन्हें आसमानों की तरफ उठाया गया।
     इसी दिन *हज़रते नूह अलैहिस्सलाम* की कश्ती कोहे जुदी पर ठहरी।
     इसी दिन *हज़रते सुलैमान अलैहिस्सलाम* को मुल्क अज़ीम अता किया गया।
     इसी दिन *हज़रते युनुस अलैहिस्सलाम* पछली के पेट से निकाले गए।
     इसी दिन *हज़रते याक़ूब अलैहिस्सलाम* की बिनाई का ज़ोफ़् दूर हुवा।
     इसी दिन *हज़रते युसूफ अलैहिस्सलाम* गहरे गए से निकाले गए।
     इसी दिन *हज़रते अय्यूब अलैहिस्सलाम* की तकलीफ रफअ की गई।
     आसमान से ज़मीन पर *सबसे पहली बारिश* इसी दिन नाज़िल हुई।
     इसी दिन का रोज़ा उम्मतों में मशहूर था यहाँ तक की ये भी कहा गया की इसी दिन का रोज़ा रमज़ान से पहले फ़र्ज़ था फिर मनसुख कर दिया गया।
     *इमामें हुसैन رضي الله تعالي عنه* को मअ शाहज़ादगान व रुफ़क़ा 3 दिन भूका रखने के बाद इसी आशूरा के रोज़ दश्ते कर्बला में इंतिहाई सफ़्फ़ाक़ी के साथ शहीद किया गया।
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 317*
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*कुर्ब-व-वस्ले खुदावन्दी*   #1
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*
           
       हज़रत गौसुल आज़म رضي الله تعالي عنه ने फ़रमाया : तुम्हारा मआमला दो हालतों से बहेरहाल खाली नहीं है, या अल्लाह इज़्ज़ो-जलका कुर्ब नहीं होगा, या अल्लाह का कुर्ब और वसाल होगा। अगर तुम इससे दूर हो तो कुरबत हासिल करनेकी ख्वाहिश में सुस्ती और काहिलीकी कैफियत में रेहना दीन-व-दुनियाकी नेअमत और दाएमी इज़्ज़त, सलामती और तवंगरी, किफायत और नफा और मेहबूबियतका वाफिर हिस्सा हासिल करने में पीछे रेह जाना क्यों?
         उठो और अपने दोनों बाज़ुओं के साथ कुर्बे खुदावन्दी की मंज़िल पाने की खातिर तेज़ी से परवाज़ करो। तुम्हारा एक बाज़ू हराम-व-मुबाह, तमाम लिज़्ज़त-व-शेहवत और हर तरहकी आसाइशोंको तज देना है और दुसरा बाज़ू अज़ीयतों, महरुहात और तकालिफ को बर्दास्त करने, फराइज़की अदाइमें सख्तियां सहने, मख्लूक़ और ख्वाहिशाते नफ़स और दुनिया-व-आख़िरतके इरादे-व-आरज़ूसे निकल जानेका नाम है।

बाक़ी कल की पोस्ट में... इंसा अल्लाह

*✍🏽फुतूहल ग़ैब*  पेज 113,14
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Monday, 6 March 2017

*क़ज़ा नमाज़ का तरीक़ा* #02/15
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_जहन्नम की खौफनाक वादी_*
     हज़रते मौलाना मुहम्मद अमजद अली आज़मी अलैरहमा फरमाते है : जहन्नम में वैल नामी एक खौफनाक वादी है जिस की सख्ती से खुद जहन्नम भी पनाह मांगता है। जान बुझ कर नमाज़ क़ज़ा करने वाले उसके मुस्तहिक़ है।
*✍🏽बहारे शरीअत, 1/347*

*_पहाड़ गर्मी से पिघल जाए_*
     हज़रते इमाम मुहम्मद बिन अहमद ज़हबी अलैरहमा फरमाते है : अगर उसमे दुन्या के पहाड़ डाले जाए तो वो भी उस गर्मी से पिघल जाए और ये उन लोगो का ठिकाना है जो नमाज़ में सुस्ती करते और वक़्त के बाद क़ज़ा करके पढ़ते है मगर ये की वो अपनी कोताही पर नादिम हो और बारगाहे खुदा वन्दी में तौबा करे।
*✍🏽किताबुल कबाइर, 19*
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 241*

*नोट :* ख्याल रहे ये सज़ा नमाज़ क़ज़ा करने वालो की है...तो सोचे जो लोग नमाज़ तर्क करते है उनका क्या हाल होगा।
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*मुबारक महीने* #01
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*_मुहर्रामुल हराम_* #01
     इस्लामी साल माहे मुर्रहमूल हराम से शुरू होता है। ये बहुत ही अज़मत व बरकत वाला महीना है, जो हमें सब्रो ईसार का दर्स देता है। इस माह मुबारक में इबादत करने और रोज़ा रखने के बारे में मूतअद्दद् फ़ज़ाइल वारिद हुए है, नीज़ इसी माह में यौमे आशूरा जो अपनी खुसुसिय्यत में मुमताज़ है।

*_रमज़ान के बाद अफज़ल रोज़े_*
     हज़रते अबू हुरैरा رضي الله تعالي عنه से रिवायत है हुज़ूर ﷺ फरमाते है : रमज़ान के बाद मुहर्रम का रोज़ा अफज़ल है और फ़र्ज़ के बाद अफज़ल नमाज़ सलातुल्लैल (यानी रात के नवाफ़िल) है।
*✍🏽सहीह मुस्लिम, 591, हदिष : 1163*

*_एक महीने के रोज़ो के बराबर_*
     अल्लाह के हबीब ﷺ का फरमान है : मुहर्रम के हर दिन का रोज़ा एक महीने के रोज़ो के बराबर है।
*✍🏽अल-मुजमुल सगीर, 2/71*
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 316*
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*नींद या बेदारी*  #3
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*
 
     जो आदमी अमरे खुदावन्दी से बहोत ज़यादा हलाल खा ले, गोया उसने इबादत-व-कुव्वत की ख़ुशी में बहोत ही थोड़ा खाया क्यों के हलाल नूर ही नूर है। और हराम सरापा ज़ुलमत और हुकमे खुदावन्दी के बगैर महेज़ अपनी ख्वाहिश के ज़ेरे असर हलाल खानेमें भी कोई खैर नहीं और हराम चीज़ खाना नींद में इज़ाफेका बाइस होता है। इस लिये उसमें किसी तरह भी भलाइ नहीं।

*✍🏽फुतूहल ग़ैब*  पेज 113
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गर होजाये यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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Sunday, 5 March 2017

*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #163
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_सूरतुल बक़रह, आयत ②①⑨_*
     तुमसे शराब  और जुए का हुक्म पूछते हैं, तुम फ़रमादो कि उन दोनों में बड़ा गुनाह है  और लोगों के कुछ दुनियावी नफ़े भी  और उनका गुनाह उनके नफ़े से बड़ा है(9) और  तुमसे पूछते हैं क्या ख़र्च करें (10) तुम फ़रमाओ जो फ़ाज़िल (अतिरक्त) बचे (11) इसी तरह अल्लाह तुमसे आयतें बयान फ़रमाता है कि कहीं सोचकर करो तुम.

*तफ़सीर*
     (9) हज़रत अली मुरतज़ा रदियल्लाहो अन्हु ने फ़रमाया, अगर शराब की एक बूंद कुंवें में गिर जाए फिर उस जगह एक मीनार बनाया जाए तो मैं उसपर अज़ान न कहूँ. और अगर नदी में शराब की बूंद पडे़, फिर नदी ख़ुश्क हो और वहाँ घास पैदा हो तो उसमें मैं अपने जानवरों को न चराऊं. सुब्हानअल्लाह ! गुनाह से किस क़द्र नफ़रत है. अल्लाह तआला हमें इन बुज़ुर्गों के रास्ते पर चलने की तौफ़ीक अता करे.
     शराब सन तीन हिजरी में ग़जवए अहज़ाब से कुछ दिन बाद हराम की गई. इससे पहले यह बताया गया था कि जुए और शराब का गुनाह उनके नफे़ से ज़्यादा है. नफ़ा तो यही है कि शराब से कुछ सुरूर पैदा होता है या इसकी क्रय विक्रय से तिजारती फ़ायदा होता है. और जुए में कभी मु्फ़्त का माल हाथ आता है और गुनाहों और बुराइयों की क्या गिनती, अक़्ल का पतन, ग़ैरत, शर्म, हया और ख़ुददारी का पतन, इबादतों से मेहरूमी, लोगो से दुश्मनी, सबकी नज़र में ख़्वार होना, दौलत और माल की बर्बादी.
     एक रिवायत में है कि जिब्रील अमीन ने हुज़ूर पुरनूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में अर्ज़ किया कि अल्लाह तआला को जअफ़रे तैयार की चार  विशेषताएं पसन्द हैं. हुज़ूर ने हज़रत जअफ़र तैयार से पूछा, उन्होंने अर्ज़ किया कि एक तो यह है कि मैंने शराब कभी नहीं पी यानी हराम हो जाने के हुक्म से पहले भी और इसकी वजह यह थी कि मैं जानता था कि इससे अक़्ल भ्रष्ट होती है और मैं चाहता था कि अक़्ल और भी तेज़ हो. दूसरी आदत यह है कि जाहिलियत के ज़माने में भी मैंने मूर्ति पूजा नहीं की क्योंकि मैं जानता था कि यह पत्थर है, न नफ़ा दे, न नुक़सान पहुंचा सके, तीसरी ख़सलत यह है कि मैं कभी ज़िना में मुब्तिला नहीं हुआ कि उसको मैं बेग़ैरती और निर्लज्जता समझता था, चौथी ख़सलत यह कि मैंने कभी झूट नहीं बोला क्योंकि मैं इसको कमीना-पन ख़याल करता था. शतरंज, ताश वग़ैरह हार जीत के खेल और जिन पर बाज़ी लगाई जाए, सब जुए में दाख़िल हैं, और हराम हैं. (रूहुल बयान)
     (10) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने मुसलमानों को सदक़ा देने की रग़बत दिलाई तो आपसे दर्याफ़त किया गया कि मिक़दार इरशाद फ़रमाएं कि कितना माल ख़ुदा की राह में दिया जाय. इस पर यह आयत उतरी (ख़ाज़िन)
     (11) यानी जितना तुम्हारी ज़रूरत से ज़्यादा हो. इस्लाम की शुरूआत में ज़रूरत से ज़्यादा माल का ख़र्च करना फ़र्ज़ था. सहाबएं किराम अपने माल में से अपनी ज़रूरत भर का लेकर बाक़ी सब ख़ुदा की राह में दे डालते थे. यह हुक्म ज़कात की आयत के बाद स्थगित हो गया.
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*कज़ा नमाज़ का तरीका* #01/15
*بِسْــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ*

     पारह 30 सूरतुल माऊन की आयत 4 व 5 में इरशाद होता है :
*तो उन नमाज़ियों की खराबी है जो अपनी नमाज़ से भूले बेठे है*

     हज़रत मुफ़्ती अहमद यार खान अलैरहमा आयत 5 के तहत फरमाते है :
कभी न पढ़ना, पाबंदी से न पढ़ना, सहीह वक़्त पर न पढ़ना, नमाज़ सहीह तरीके से अदा न करना, शौक़ से न पढ़ना, समझ बुझ कर अदा न करना, कसल व सुस्ती, बे परवाइ से पढ़ना।
*✍🏽नुरुल इरफ़ान 958*
*✍🏽नमाज़ के अहकाम 240*
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*फैजाने रोज़ा* #07
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_नफ्ल रोज़े के मदनी फूल_*
     माँ बाप अगर बेटे को नफ्ल रोज़े से इस लिये मना करे की बिमारी का अंदेशा है तो वालिदैन की इताअत करे।
*✍🏽रद्दुल मोहतार, 3/478*

     शौहर की इजाज़त के बगैर बीवी नफ्ल रोज़ा नही रख सकती।
*✍🏽दुर्रे मुख्तार, रद्दुल मोहतार, 3/477*

     नफ्ल रोज़ा कसदन शुरू करने से पूरा करना वाजिब हो जाता है अगर तोड़ेगा तो क़ज़ा वाजिब होगी।
*✍🏽दुर्रे मुख्तार, 3/473*

     नफ्ल रोज़ा जान बुझ कर नही तोडा बल्कि बिला इख़्तियार टूट गया मसलन औरत को रोज़े के दौरान हैज़ आ गया तो रोज़ा टूट गया मगर क़ज़ा वाजिब है।
*✍🏽दुर्रे मुख्तार, 3/374*

     वालिदैन की ना राजग़ी के सबब असर से पहले तक नफ्ल रोज़ा तोड़ सकता है। बादे असर नही।
*✍🏽दुर्रे मुख्तार, रद्दुल मोहतार, 3/475*
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 313*
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*नींद या बेदारी*  #2
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*
 
      नींद हर हालतमें नुकसानदेह है। सब भलाइयां बेदारीमें और तमाम बुराइयां नींद में है, चुनान्चे जो आदमी ज़ुरुरतसे ज़यादा खुरदोनोश और नींदमें मशरूफ रेहता हो, तमाम नेकीयां और अच्छाइयां उससे दूर हो जाती है और जिसने बराए नामभी हराम खा लिया, गोया उसने अपनी ख्वाहिशके ज़ेरे असर बहोत ज़यादा हलाल खा लिया।
     इस लिये के हराम नूरे ज़ुलमातमें लपेट लेता है। जिस तरह शराब अकलको तारीकियों की नज़र कर देती है। और जब ईमान ही तारीकियों में गुम हो जाए तो नमाज़, इबादत, इख्लास सब बेसूद है।
बाक़ी कल की पोस्ट में... इंसा अल्लाह

*✍🏽फुतूहल ग़ैब*  पेज 113
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Saturday, 4 March 2017

*मुसाफिर की नमाज़* 9/9
*بِسْــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ*

_*मुसाफिर तीसरी रकअत के लिये खड़ा हो जाए तो ?*_
     अगर मुसाफिर क़सर वाली नमाज़ की तीसरी रकअत शुरू कर दे तो इसकी दो सूरते है...

     1) ब क़दरे तशह्हुद क़ायद ए आख़िरा कर चूका था तो जब तक तीसरी रकअत का सज्दा न किया हो लौट आए और सज्दए सहव करके सलाम फेर दे अगर न लौटे और खड़े खड़े सलाम फेर दे तो भी नमाज़ हो जाएगी मगर सुन्नत तर्क हुई।
     अगर तीसरी रकअत का सज्दा कर लिया तो एक और रकअत मिला कर सज्दए सहव करके नमाज़ मुकम्मल करे ये आखरी दो रकअते नफ्ल शुमार होगी।

    2) क़ायदए आख़िरा किये बैगेर खड़ा हो गया था तो जब तक तीसरी रकअत का सज्दा न किया लोट आए और सज्दए सहव कर के सलाम फेर दे
     अगर तीसरी रकअत का सज्दा कर लिया फ़र्ज़ बातिल हो गए अब एक और रकअत मिला कर सज्दए सहव करके नमाज़ मुकम्मल करे चारो रकअत नफ्ल शुमार होगी। दो रकअत फ़र्ज़ अदा करने अभी जिम्मे बाक़ी है।
*✍🏽दुर्रेमुखतार मअ रद्दलमोहतार 2/550*
*✍🏽नमाज़ के अहकाम 235*
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*फैजाने रोज़ा* #06

*_जुमुआ के रोज़ो के मुतअल्लिक़ फ़ज़ाइल_*
     हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया : जिस ने जुमुआ का रोज़ा रखा तो अल्लाह उसे आख़िरत के दस दिनों के बराबर अज्र आता फ़रमाएगा और उन की तादाद अय्यामे दुन्या की तरह नही है।
*✍🏽शोएबुल ईमान, 3/393, हदिष :3862*

     मगर तन्हा जुमुआ का रोज़ा न रखा जाए इस के साथ जुमारात या सनीचर मिला लेना चाहिये।

*_तन्हा जुमुआ का रोज़ा रखने की मुमानअत की रिवायत_*
     हज़रते अबू हुरैरा رضي الله تعالي عنه रिवायत करते है, मेने हुज़ूर ﷺ को फरमाते हुए सुना, तुम में से कोई हरगिज़ जुमुआ का रोज़ा न रखे मगर ये की इस के पहले या बाद में एक दिन मिला ले।
*✍🏽बुखारी, 1/653, हदिष : 1985*

     हज़रते आमिर बिन लुदैन अशअरी رضي الله تعالي عنه से रिवायत है की में ने हुज़ू ﷺर को फरमाते हुए सुना, जुमुआ का दिन तुम्हारे लिये ईद है इस दिन रोज़ा मत रखो मगर ये की इस से पहले या बाद में भी रोज़ा रखो।
*✍🏽अल-तरगिब् वल-तरहिब, 2/81, हदिष :1592*
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 311*
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*नींद या बेदारी*  #1
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*
          
       हज़रत गौसुल आज़म رضي الله تعالي عنه ने फ़रमाया: जो आदमी बेदारी के बजाए नींद को इख्तियार करता है, वो निहायत नाकिस और अदना चीज़को पसन्द कर रहा है। और चूंके नींद मौत की बहेन है इस लिये गोया वो शख्स अपनी ज़ुरुरतों और मसलेहतों में मौत और गफलत का ख्वाहिशमंद है। इसी लिये ख़ुदातआला नींदसे मावरा है क्योंके वो तमाम नकाइससे पाक है। 
      मलाएकाभी कुर्बे खुदावन्दी के बाइस नींदसे दूर है। यही हाल जन्नतके बासियों का है। चूंके वो जन्नत के ऐसे आला मकाम के रेहनेवाले है। और उनके नफूस पाकीज़ा है, इसलिये उन पर भी नींद ग़ालिब नहीं आती। 
     नींद हर हालतमें नुकसानदेह है।

बाक़ी कल की पोस्ट में... इंसा अल्लाह

*✍🏽फुतूहल ग़ैब*  पेज 112
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Friday, 3 March 2017

*मुसाफिर की नमाज़* 8/9
*بِسْــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ*

_*क़सर के बदले चार की निय्यत बांध ली तो..?*_
     मुसाफिर ने क़सर के बजाए चार रकअत फ़र्ज़ की निय्यत बांध ली फिर याद आने पर दो पर सलाम फेर दिया तो नमाज़ हो जाएगी।
*✍🏽दुर्रेमुखतार मअ रद्दलमोहतार 2/97*

_*क्या मुसाफिर को सुन्नते मुआफ़ है ?*_
     सुन्नतो में क़सर नही बल्कि पूरी पढ़ी जाएगी, खौफ और घबराहट की हालत में सुन्नते मुआफ़ है और अम्न की हालत में पढ़ी जाएगी।
*✍🏽आलमगिरी 1/139*
*✍🏽नमाज़ के अहकाम 234*
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*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #161
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_सूरतुल बक़रह, आयत ②①⑦_*
     तुमसे पूछते हैं माहे हराम में लड़ने का हुक्म  (1) तुम फ़रमाओ इसमें लड़ना बड़ा गुनाह है  (2) और अल्लाह की राह से रोकना  और उसपर ईमान न लाना  और मस्जिदे हराम से रोकना और इसके बसने वालों को निकाल देना (3) अल्लाह के नज़्दीक ये गुनाह उससे भी बड़े हैं और उनका फ़साद (4) क़त्ल से सख़्ततर है (5) और हमेशा तुमसे लड़ते रहेंगे यहां तक कि तुम्हें तुम्हारे दीन से फेर दें अगर बन पड़े (6) और तुममें जो कोई अपने दीन से फिरे, फिर काफ़िर होकर मरे तो उन लोगों का किया अकारत गया दुनिया में और आख़िरत में (7) और वो दोज़ख़ वाले हैं उन्हें उसमें हमेशा रहना.

*तफ़सीर*
     (1) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने अब्दुल्लाह बिन जहश के नेतृत्व में मुजाहिदों की एक जमाअत रवाना फ़रमाई थी. उसने मुश्रिकों से जंग की. उनका ख़याल था कि वह दिन जमादियुल आख़िर का अन्तिम दिन है. मगर दर हक़ीक़त चाँद 29 को हो गया था, और वह रजब की पहली तारीख़ थी. इस पर काफ़िरों ने मुसलमानों को शर्म दिलाई कि तुमने पाबन्दी वाले महीने में जंग की और हुज़ूर से इसके बारे में सवाल होने लगे. इस पर यह आयत उतरी.
     (2) मगर सहाबा से यह गुनाह वाक़े नही हुआ, क्योंकि उन्हें चाँद होने की ख़बर ही न थी. उनके ख़याल में वह दिन माहे हराम, यानी पाबन्दी वाले महीने रजब का न था. पाबन्दी वाले महीनों में जंग न करने का हुक्म “उक़्तुलुल मुश्रिकीना हैसो वजद तुमूहुम” यानी मुश्रिकों को मारो जहां पाओ (9 : 5) की आयत द्वारा स्थगित हो गया.
     (3) जो मुश्रिकों से वाक़े हुआ कि उन्होंने हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और आपके सहाबा को, हुदैबिया वाले साल, काबए मुअज़्ज़मा से रोका और मक्के में आपके क़याम के ज़माने में आपको और आपके साथियों को इतनी तकलीफ़ें दीं कि वहाँ से हिजरत करना पडी.
     (4) यानी मुश्रिकों का, कि वह शिर्क करते हैं और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और मूमिनों को मस्जिदें हराम से रोकते हैं और तरह तरह के कष्ट देते हैं.
     (5) क्योंकि क़त्ल तो कुछ हालतों में जायज़ होता है, और कुफ़्र किसी हाल में जायज़ नहीं. और यहाँ तारीख़ का मशकूक यानी संदेह में होना मुनासिब वजह है. और काफ़िरों के कुफ़्र के लिये तो कोई वजह ही नहीं है.
     (6) इसमें ख़बर दी गई कि काफ़िर मुसलमानों से हमेशा दुश्मनी रखेंगे. कभी इसके ख़िलाफ़ न होगा. और जहाँ तक उनसे संभव होगा वो मुसलमानों को दीन से फेरने की कोशिश करते रहेंगे, “इनिस्तताऊ” (अगर बन पड़े) से ज़ाहिर होता है कि अल्लाह तआला के करम से वो अपनी इस मुराद में नाकाम रहेंगे.
     (7) इस आयत से मालूम हुआ कि दीन से फिर जाने से सारे कर्म बातिल यानी बेकार हो जाते हैं. आख़िरत में तो इस तरह कि उनपर कोई पुण्य, इनाम या सवाब नहीं. और दुनिया में इस तरह कि शरीअत मुर्तद यानी दीन से फिर जाने वाले के क़त्ल का हुक्म देती है. उसकी औरत उसपर हलाल नहीं रहती, वो अपने रिश्तेदारों की विरासत पाने का अधिकारी नहीं रहता, उसका माल छीना या लूटा या चुराया जा सकता है. उसकी तारीफ़ और मदद जायज़ नहीं. (रूहुल बयान वग़ैरह).
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*फैजाने रोज़ा* #05
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*_पिर और जुमारात के रोज़े के मुतअल्लिक़ रिवायत_*
     हज़रते अबू हुरैरा رضي الله تعالي عنه से मरवी है, हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया : पिर और जुमारात को आमाल पेश होते है तो में पसंद करता हु की मेरा अमल उस वक़्त पेश हो की में रोज़ादार हु।
*✍🏽तिर्मिज़ी, 2/187*

     हुज़ूर ﷺ पिर और जुमारात को रोज़े रखा करते थे इस के बारे में आप ने फ़रमाया : इन दिनों में अल्लाह हर मुसलमान की मगफिरत फ़रमाता है मगर वो दो शख्स जिन्होंने बाहम जुदाई कर ली है उन की निस्बत मलाइका से फ़रमाता है इन्हें छोड़ दो यहाँ तक की सुलह कर ले।
*✍🏽इब्ने माजह, 2/344*

     हज़रते अबू क़तादा رضي الله تعالي عنه फरमाते है, हुज़ूर ﷺ से पीर के रोज़े का सबब दरयाफ़्त किया गया तो फ़रमाया, इसी में मेरी विलादत हुई, इसी में मुझ पर वही नाज़िल हुई।
*✍🏽सहीह मुस्लिम, 591, हदिष : 1162*
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 304*
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Thursday, 2 March 2017

*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #160
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
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*_सूरतुल बक़रह, आयत ②①⑥_*
     तुमपर फ़र्ज़ हुआ अल्लाह की राह में लड़ना और वह तुम्हें नागवार है (18) और क़रीब है कि कोई बात तुम्हें बुरी लगे और वह तुम्हारे हक़ में बेहतर हो और क़रीब है कि कोई बात तुम्हें पसन्द आए  और वह तुम्हारे हक़ में बुरी हो.  और अल्लाह जानता है और तुम नहीं जानते (19)

*तफ़सीर*
     (18) जिहाद फ़र्ज़ है, जब इसकी शर्ते पाई जाएं. अगर काफ़िर मुसलमानों के मुल्क पर चढ़ाई करें तो जिहाद अत्यन्त अनिवार्य हो जाता है. वरना फ़र्जे़ किफ़ाया यानी एक के करने से सब का फ़र्ज़ अदा हो गया.
     (19) कि तुम्हारे हक़ में क्या बेहतर है. तो तुम पर लाज़िम है, अल्लाह के हुक्म का पालन करो और उसी को बेहतर समझो, चाहे वह तुम्हारी अन्तरआत्मा पर भारी हो.
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*फैजाने रोज़ा* #04
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*_हड्डिया तस्बिह करती है_*
     हज़रते बुरैदा से मरवी है की हुज़ूर ने हज़रते बिलाल से फ़रमाया ऐ बिलाल ! आओ नाश्ता करे। तो हज़रते बिलाल ने अर्ज़ की, में रोज़े से हु। आप ने फ़रमाया : हम अपना रिज़्क़ खा रहे है और बिलाल का रिज़्क़ जन्नत में बढ़ रहा है। फिर फ़रमाया : ऐ बिलाल ! क्या तुम्हे मालुम है की जितनी देर तक रोज़ादार के सामने खाना खाया जाता है तो उस की हड्डिया तस्बिह करती है और मलाइका उस के लिये इस्तिग़फ़ार करते रहते है।
*✍🏽सुनन इब्ने माजाह, 2/348, हदिष : 1749*

*_रोज़े की हालत में मरने की फ़ज़ीलत_*
     उम्मुल मुअमिनिन आइशा सिद्दीक़ा से रिवायत है, हुज़ूर ने फ़रमाया : जो रोज़े की हालत में मरा, अल्लाह क़यामत तक के लिये उसके हिसाब में रोज़े लिख देगा।
*✍🏽फ़िरदौस, 3/504, हदिष : 5557*
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 298*
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मिट जाए गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*फराइज़ और नवाफ़िल*  #3
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

           सुन्नत को छोड़ कर नफलमें मश्गूल हो जाना भी ऐसा है के इस तरह फराइज़ की तरतीब बाकी नहीं रेहती निफली ईबादत फ़र्ज़ के साथ दाएमी मामूल की हैसियत रखती और न शारए इस्लाम (अलैहिस्सलाम) ने उन्हें अदा करने की ताकीद फ़रमाई। मुसलमान पर फ़र्ज़ है के हराम और शिर्क से मुकम्मल इज़तेनाब करते हुए कज़ा-व-कद्र और तख़्लीके खुदावन्दी पर एतेराज़ न करे, और एहकामे इलाहीसे रुगरदां न हो।
        जैसा के आका सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम का इर्शाद है: "अल्लाह तआला की नाफरमानी करते हुए, मखलूककी इताअत जाइज़ नही।"

*✍🏽फुतूहल ग़ैब*  पेज 112
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मिट जाए गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाये यक़ीन के.....
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Wednesday, 1 March 2017

*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #159
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_सूरतुल बक़रह, आयत ②①⑤_*
     तुमसे पूछते हैं (15) क्या ख़र्च करें. तुम फ़रमाओ जो कुछ माल नेकी में ख़र्च करो तो वह माँ बाप  और यतीमों  और मोहताज़ों और राहगीर के लिये है  और जो भलाई करो (16) बेशक अल्लाह उसे जानता है (17).

*तफ़सीर*
     (15) यह आयत अम्र बिन जमूह के जवाब में नाज़िल हुई जो बूढ़े आदमी थे और बड़े मालदार थे उन्होंने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से सवाल किया था कि क्या ख़र्च करें और किस पर ख़र्च करें. इस आयत में उन्हें बता दिया गया कि जिस क़िस्म का और जिस क़दर माल कम या ज़्यादा ख़र्च करो, उसमें सवाब है. और ख़र्च की मदें ये हैं. आयत में नफ़्ल सदक़े का बयान है. माँ बाप को ज़कात और वाजिब सदक़ा (जैसे कि फ़ितरा) देना जायज़ नहीं. (जुमल वग़ैरह).
     (16) यह हर नेकी को आम है. माल का ख़र्च करना हो या और कुछ. और बाक़ी ख़र्च की मदें भी इसमें आ गई.
     (17) उसकी जज़ा यानी बदला या इनाम अता फ़रमाएगा.
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मिट जाए गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
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*फैजाने रोज़ा* #03
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_बेहतरीन अमल_*
     हज़रते अबू उमामा फरमाते है में ने अर्ज़ की या रसूलल्लाह ! मुझे कोई अमल बताइये। इरशाद फ़रमाया : रोज़े रखा करो क्यू की इस जैसा अमल कोई नही। मेने फिर अर्ज़ की, मुझे कोई अमल बताइये। फ़रमाया : रोज़े रखा करो क्यू की इस जैसा कोई अमल नही। मेने फिर अर्ज़ की, फ़रमाया : रोज़े रखा करो क्यू की इसका कोई मिस्ल नही।
*✍🏽सूननु नसाई, 4/166*

*_रोज़े रखो तंदुरस्त हो जाओगे_*
     हज़रते अबू हुरैरा से रिवायत है की हुज़ूर ने फ़रमाया : जिहाद किया करो खुद कफ़ील हो जाओगे, रोज़े रखो तंदुरस्त हो जाओगे और सफर किया करो गनी (मालदार) हो जाओगे।
*✍🏽अलमुअजमुल वुसत, 6/146, हदिष :8312*
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 297*
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*फराइज़ और नवाफ़िल*  #2
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

        हज़रत अली करमुल्लाहु वजहु से मरवी है के हुज़ूर अलयहिस्सलातो वस्सलामने फ़रमाया के फराइज़ से पेहले नवाफ़िल अदा करनेवाला उस हामला ओरत की तरह है जो बच्चा होनेके करीब ज़माने में इस्काते हमल (हमल गिराना) कर दे। इस तरह न वो साहबे हमल होती है, न साहबे औलाद।
      इसी तरह फराइज़ अदा करने से पेहले नफिल पढ़नेवालेकी इबादत ख़ुदातआला कुबूल नहीं करता, ये तो ऐसा ही है जैसे कोई ताजिर जब तक रासुल लाल हासिल न करे, उसे नफा हासिल नहीं होता।
बाक़ी कल की पोस्ट में... इंसा अल्लाह

*✍🏽फुतूहल ग़ैब*  पेज 111,112
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