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Monday, 24 July 2017

*83 आसान नेकियां* #06
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_3-ज़िकरुल्लाह करना_* #04

*अज़कारो अवराद और इन के षवाब पर फरामिने मुस्तफा* #01

*_100 हज का षवाब_*
     जिज ने सुबहो शाम 100-100 मर्तबा سبحان الله पढ़ा तो वो 100 हज करने वाले की तरह है।
*✍🏼तिर्मिज़ी*

*_बुराइयां मिटा कर नेकियां लिख दी जाती है_*
     जो बन्दा दिन या रात की किसी घड़ी में لٙا اِلٰهٙ اِلّٙااللّٰهُ कहता है तो उस के नामए आमाल में से बुराइयां मिटा कर उन की जगह उतनी ही नेकियां लिख दी जाती है।
*✍🏼مجمع الزواهر*

*_100 के बदले 1000_*
     दो खसलते ऐसी है जो बन्दा इन पर हमेशगी इख़्तियार करेगा जन्नत में दाखिल होगा, ये दोनों काम है तो बहुत आसान मगर इन पर अमल करने वाले लोग बहुत कम है।
     तुम में से कोई हर नमाज़ के बाद 10 मर्तबा سبحان الله  10 मर्तबा الحمد لله और 10 मर्तबा الله اكبر पढ़ लिया करे तो ये ज़बान पर डेढ़ सो है जब की मीज़ान में 1500 है।
     फिर जब वो अपने बिस्तर की तरफ आए तो 33 मर्तबा سبحان الله  33 मर्तबा الحمد لله और 34 मर्तबा الله اكبر कहे, ये ज़बान पर तो 100 है जब की मीज़ान में 1000 है।
*✍🏼सुनन इब्ने माजह*

बाक़ी अगली पोस्ट में..أن شاء الله
*✍🏼40 फरमाने मुस्तफा, 26*

*___________________________________*
मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
*___________________________________*
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*4-निय्यत की अहमिय्यत*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     हज़रते उमरे फारूक رضي الله عنه से रिवायत है की हुज़ूर صلى الله عليه وسلم ने फ़रमाया : आमाल का दारो मदार निय्यतो पर है।
*✍🏼सहीह बुखारी*

     इस हदिष से मालुम हुआ की आमाल का षवाब निय्यत पर ही है, बगैर निय्यत किसी अमल पर षवाब का हक़ नही। आमाल अमल की जमा है और इस का इत्लाक़ आज़ा, ज़बान और दिल तीनो के अफआल पर होता है और यहाँ आमाल से मुराद आमाले सालिहा (नेक आमाल) और मुबाह (जाइज़) अफआल है। और निय्यत लुग्वी तौर पर दिल के पुख्ता इरादे को कहते है और शरअन इबादत के इरादे को निय्यत कहा जाता है।

     इबादत की दो किस्मे है : (1) मक़्सूदा (2) गैर मक़्सूदा इसकी तफ़सील अगली पोस्ट में أن شاء الله
*✍🏼40 फरमाने मुस्तफा, 10*

*___________________________________*
मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*नमाज़ तोड़ने वाली बाते* #05
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*_अमले कसीर की तारीफ_*
★ अमले कसीर नमाज़ को फासिद् कर देता है जब कि न नमाज़ के आमाल से हो न ही इस्लाहे नमाज़ के लिए किया गया हो.
★ जिस काम के करने वाले को दूर कसे देखने से ऐसा लगे कि ये नमाज़ में नही है बल्कि अगर गुमान भी ग़ालिब हो कि नमाज़ में नही तब भी अमले कसीर है.

★ और अगर दूर से देखने वाले को शको शुबा है कि नमाज़ में है या नहीं तो अमले क़लिल है और नमाज़ फासिद् न होगी.
*✍🏼दुर्रे मुख्तार मअ रद्दल मोहतार, जी. 2 स.464*

बाक़ी अगली पोस्ट में..ان شاء الله
*✍🏼नमाज़ के अहकाम, स. 186*

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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Sunday, 23 July 2017

*नमाज़ तोड़ने वाली बाते* #04
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*_दौराने नमाज़ देख कर पढ़ना_*

★ मुसहफ़ शरीफ से या किसी कागज़ से या मेहराब वग़ैरा में लिखा हुवा देख कर कुरआन शरीफ पढ़ना (हा अगर याद पर पढ़ रहे है और मुसहफ़ शरीफ या मेहराब वगैरा पर सिर्फ नज़र है तो हर्ज नही, अगर किसी कागज़ वगैरा पर आयात लिखी है उसे देखा और समझ मगर पढ़ा नहीं इस में भी कोई मुज़ायका नहीं.
*✍🏼रद्दलमोहतार, जी,2 स.464*

★ इस्लामी किताब या इस्लामी मज़्मून दौराने नमाज़ जानबूझ कर देखना और इरादतन समझना मकरूह है.
*✍🏼आलमगिरी, जी.1 स.101*

★ दुनयावी मज़्मून हो तो ज़्यादा कराहिय्यत है, लिहाज़ा नमाज़ में अपने क़रीब किताबे या तहरीर वाले पैकेट और शॉपिंग बेग, मोबाइल फोन या घड़ी वगैरा इस तरह रखिये कि उन की लिखाई पर नज़र न पड़े या इन पर रुमाल वगैरा उढ़ा दीजिये, निज दौराने नमाज़ सुतून वगैरा पर लगे हुए स्टिकर्ज़, इश्तिहार और फ्रेमो वगैरा पर नज़र डालने से भी बचिये.

बाक़ी अगली पोस्ट में..ان شاء الله
*✍🏼नमाज़ के अहकाम, स. 186*

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
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Saturday, 22 July 2017

*4-निय्यत की अहमिय्यत*
     हज़रते उमरे फारूक رضي الله عنه से रिवायत है की हुज़ूर صلى الله عليه وسلم ने फ़रमाया : आमाल का दारो मदार निय्यतो पर है।
*सहीह बुखारी*

     इस हदिष से मालुम हुआ की आमाल का षवाब निय्यत पर ही है, बगैर निय्यत किसी अमल पर षवाब का हक़ नही। आमाल अमल की जमा है और इस का इत्लाक़ आज़ा, ज़बान और दिल तीनो के अफआल पर होता है और यहाँ आमाल से मुराद आमाले सालिहा (नेक आमाल) और मुबाह (जाइज़) अफआल है। और निय्यत लुग्वी तौर पर दिल के पुख्ता इरादे को कहते है और शरअन इबादत के इरादे को निय्यत कहा जाता है।

     इबादत की दो किस्मे है : (1) मक़्सूदा (2) गैर मक़्सूदा इसकी तफ़सील अगली पोस्ट में أن شاء الله
*40 फरमाने मुस्तफा, 10*

Friday, 21 July 2017

*83 आसान नेकियां* #05
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
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*_3-ज़िकरुल्लाह करना_* #03
*_मुझ पर रहमत की नज़र रखना_*
     एक बार हज़रते अबू फर्वा رضي الله عنه एक मिल तक सफर कर गए मगर इस दौरान ज़िकरुल्लाह न कर पाए, लिहाज़ा वापस आए और वो मसाफत ज़िकरुल्लाह करते हुवे दोबारा तै की। जब तै कर चुके तो अर्ज़ की : या इलाही ! अबू फर्वा पर रहमत की नज़र रखना क्यू की ये तुझे नही भूलता।

*_मेरी गवाही दे_*
     हज़रते अबुल मलीह رحمة الله عليه जब अल्लाह का ज़िक्र करते तो (ख़ुशी से) झूम जाते और फ़रमाते : मेरा ये झूमना अल्लाह के ज़िक्र की वजह से है क्यू की अल्लाह ने इर्शाद फ़रमाया है : فٙاذْكُرُوْنِىَْ اٙذْكُرْ كُمْ (तो मेरी याद करो में तुम्हारा चर्चा करूँगा) सूरह 2/152, और जब आप किसी रास्ते पर चलते और अल्लाह का ज़िक्र करना भूल जाते तो वापस आ कर फिर उसी रास्ते पर चलते और उसमे अल्लाह का ज़िक्र करते अगर्चे एक दिन का सफर हो, और फ़रमाते में इस बात को पसन्द करता हु की में जिस ज़मीन से गुजरूं वो तमाम ज़मीन क़यामत के दिन मेरे ज़िकरुल्लाह की गवाही दे।

     मीठे और प्यारे इस्लामी भाइयो ! ये अल्लाह का हम पर अज़ीम एहसान है की उस का ज़िक्र हम हर जगह कर सकते है। इस के लिये कोई ख़ास मक़ाम और वक़्त मुक़र्रर नही फ़रमाया। जहा जाए, जिधर जाए, अल्लाह अल्लाह कर सकते है, जैसा की हज़रते हसन बसरी عليه رحما फ़रमाते है : अल्लाह ने अपने फरमाने अज़ीम  فٙاذْكُرُوْنِىَْ اٙذْكُرْ كُمْ (तो मेरी याद करो में तुम्हारा चर्चा करूँगा) सूरह 2/152,  से हम पर आसानी कर दी है और अपने ज़िक्र के लिये कोई जगह मख़्सूस नही फ़रमाई अगर अल्लाह हमारे लिये ज़िक्र करने की कोई जगह मख़्सूस फरमा देता तो हमारा वहा जाना वाजिब हो जाता ख्वाह वो मक़ाम एक सदी की मुसाफत पर ही क्यू न होता जैसा की हज के लिये लोगो को काबा में बुलाया है।
*✍🏼आसान नेकियां, 25*

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*नमाज़ तोड़ने वाली बाते* #02
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*_नमाज़ में रोना_*
◆ दर्द या मुसीबत की वजह से ये अलफ़ाज़ "आह" "ऊह" "उफ़" "तूफ" निकल गए या आवाज़ से ओने में हर्फ़ पैदा हो गए नमाज़ फासिद् हो गई.

◆ अगर रोने में सिर्फ आसु निकले आवाज़ व हरुफ़ नही निकले तो हर्ज नही.
*✍🏼आलमगिरी, जी.1 स. 101*

◆ अगर नमाज़ में इमाम के पढंने की आवाज़ पर रोने लगा और "अरे" "नअम" "हा" ज़बान से जारी हो गया तो कोई हर्ज़ नही कि ये खुशुअ के बाइस है और अगर इमाम की खुश इल्हानि के सबब ये अलफ़ाज़ कहे तो नमाज़ टूट गई.

बाक़ी अगली पोस्ट में..ان شاء الله
*✍🏼दुर्रे मुख्तार, जी.2 स.456*
*✍🏼नमाज़ के अहकाम, स. 185*

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*10 रहमते*
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     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : जिसने मुझ पर एक बार दुरुदे पाक पढ़ा, अल्लाह उस पर 10 रहमते भेजेगा और उस के 10 गुनाह मुआफ़ किये जाएंगे और उस के 10 दरजात बुलन्द किये जाएंगे।

     मालुम हुआ की एक दुरुदे पाक में तीन फायदे है। 10 रहमते, 10 गुनाह की मुआफ़ी और 10 दर्जो की बुलन्दी।

*✍🏼40 फरमाने मुस्तफा, 9*

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Thursday, 20 July 2017

*83 आसान नेकियां* #04
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*_3-ज़िकरुल्लाह करना_* #02

*ज़िक्र की अक़्साम*
     अकषर येही ख्याल किया जाता है की ज़बान से अल्हम्दुलिल्लाह, सुब्हानअल्लाह वगैरा अदा करने का नाम ही ज़िक्र है, इस में कोई शक नही की ये भी ज़िक्र है मगर कलामें अरब में ज़िक्र का लफ्ज़ बहुत से मानी में इस्तिमाल होता है। चुनान्चे सदरुल अफ़ाज़िल हज़रते मौलाना मुफ़्ती नईमुद्दीन मुरादाबादी عليه رحما सूरए बक़रह की आयत 152 के तहत तफ़सीरे ख़ज़ाइनुल इरफ़ान में लिखते है : ज़िक्र 3 तरह का होता है :
(1) लिसानी (यानी ज़बान से)
ज़िक्रे लिसानी तस्बीह, तक़दिस, षना वगैरा बयान करना है, ख़ुत्बा, तौबा, इस्तिग़फ़ार, दुआ वगैरा इस में दाखिल है।

(2) क़ल्बी (यानी दिल से)
ज़िक्रे क़ल्बी अल्लाह की नेमतों का याद करना उस की अज़मत व किब्रियाइ और उस के दलाइले क़ुदरत में गौर करना, उलमा का इस्तिम्बाते मसाइल में गौर करना भी इस में दाखिल है।

(3) बिल जवारिह (यानी आज़ाए जिस्म से)
ज़िक्रे बिल जवारिह ये है की आज़ा ताअते इलाही में मश्गुल हो जैसे हज के लिये सफर करना ये ज़िक्र बिल जवारिह में दाखिल है। नमाज़ तीनो किस्म के ज़िक्र पर मुश्तमिल है। तस्बीह व तकबीर, षना व किरआत तो ज़िक्रे लिसानी है और खुशुअ व ख़ुज़ूअ, इखलास ज़िक्रे क़ल्बी और क़याम, रूकू व सुजूद वगैरा ज़िक्रे बिल जवारिह है।

*✍🏼आसान नेकियां, 23*

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*नमाज़ तोड़ने वाली बाते* #01
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◆ बात करना
◆ किसी को सलाम करना, सलाम का जवाब देना
◆ छिक का जवाब देना [नमाज़ में खुद को छिक आए तो खामोश रहे] अगर अलहम्दु लिल्लाह कह लिया तब भी हर्ज़ नही और अगर उस वक़्त हम्द न की तो फारिग हो कर कहे.
◆ खुश खबरी सुन कर जवाबन अलहम्दु लिल्लाह कहना.
◆ बुरी खबर [या किसी की मौत की खबर] सुन क्र इन्न-लिल्लाहि-व-इन्न-इलैहि-राजिउन कहना.
◆ अल्लाह का नाम सुन कर जवाबन जल जलालुहु कहना.
◆ सरकारे मदीना ﷺ का इसमें गिरामी सुन कर जवाबन दुरुद शरीफ पढ़ना.

बाक़ी अगली पोस्ट में..ان شاء الله
*✍🏼नमाज़ के अहकाम, स.184*

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*रहमतो की बरसात*
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     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : मुझ पर दुरुद शरीफ पढ़ो, अल्लाह तुम पर रहमत भेजेगा।

     सलात के माना है रहमत या तलबे रहमत, जब इस का करने वाला रब हो तो (सलात) ब माँ आ रहमत होती है और फ़ाइल जब बन्दे हो तो ब माना तलबे रहमत।
     इस्लाम में एक नेकी का बदला कम अज़ कम 10 गुना है। ख्याल रहे की बन्दा अपनी हैसिय्यत के लायक़ दुरुद शरीफ पढ़ता है मगर रब तआला अपनी शान के लायक़ उस पर रहमते उतारता है जो बन्दे के ख्याल व गुमान से बुलन्द है।

*✍🏼40 फरमाने मुस्तफा, 8*

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*सूरए बक़रह-154*
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وَلَا تَقُولُوا۟ لِمَن يُقْتَلُ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ أَمْوَٰتٌۢ بَلْ أَحْيَآءٌ وَلَٰكِن لَّا تَشْعُرُونَ

और जो लोग ख़ुदा की राह में मारे गए उन्हें कभी मुर्दा न कहना बल्कि वह लोग ज़िन्दा हैं मगर तुम उनकी ज़िन्दगी की हक़ीकत का कुछ भी शऊर नहीं रखते

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Wednesday, 19 July 2017

*83 आसान नेकियां* #03
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
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*_3-ज़िकरुल्लाह करना_* #01
     ज़िकरुल्लाह भी ऐसी आसान इबादत है की इसे इन्सान थोड़ी सी तवज्जोह से किसी भी वक़्त अन्जाम दे सकता है। इस के फ़ज़ाइल और फ़वाइद बे शुमार है।
     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : अगर एक शख्स की झोली दिरहमो से भरी हुई हो और वो इन्हें तक़सीम कर रहा हो और दूसरा अल्लाह का ज़िक्र कर रहा हो तो ज़िकरुल्लाह करने वाला अफ़्ज़ल होगा।
*✍🏼तिबरानी*

*_अफ़्ज़ल दर्जे में होगा_*
     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : क़यामत के दिन अल्लाह के नज़दीक सब से अफ़्ज़ल दर्जे वाले वो लोग होंगे जो अल्लाह का कषरत से ज़िक्र करने वाले होंगे।
*✍🏼तिर्मिज़ी*

*_तुम्हारी ज़बान ज़िकरुल्लाह से तर रहा करे_*
     हज़रते अब्दुल्लाह बिन बसर رضي الله عنه से रिवायत है की एक शख्स ने अर्ज़ की, या रसूलुल्लाह صلى الله عليه وسلم इस्लाम के अहकामे शरईय्या मुझ पर बहुत है, मुझे कोई एक बात ऐसी बता दे जिसे में मज़बूत थाम लू ? इर्शाद फ़रमाया तुम्हारी ज़बान अल्लाह के ज़िक्र से तर रहा करे।

बाक़ी अगली पोस्ट में..أن شاء الله
*✍🏼आसान नेकियां, 22*

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*गर्द आलूद पेशानी की फ़ज़ीलत*
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     हज़रते वासिला बिन अस्क़अ رضي الله تعالي عنه से रिवायत है कि हुज़ूर ﷺ का फरमाने पुर सुरूर है : तुम में से कोई शख्स जब तक नमाज़ से फारिग न हो जाए अपनी पेशानी की मिटटी को साफ़ न करे क्यू कि कब तक उस की पेशानी पर नमाज़ के सजदे का निशान रहता है फ़रिश्ते उस के लिये दुआए मगफिरत करते रहते है.

     मीठे और प्यारे इस्लिमी भाइयो ! दौरान नमाज़ पेशानी से मिटटी छुड़ाना बेहतर नहीं और मआज़अल्लाह तकब्बुर के तौर पर छुड़ाना गुनाह है. और अगर न छुड़ाने से तकलीफ होती होती हो या ख़याल बटता हो तो छुड़ाने में हर्ज नही. अगर किसी को रियाकारी का खौफ हो तो उसे चाहिये कि नमाज़ के बाद पशनो से मिटटी साफ़ कर ले.
*✍🏼नमाज़ के अहकाम, स. 183-184*

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*क़ुर्ब मुस्तफा*
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     हज़रते अब्दुल्लाह बिन मसऊद رضي الله عنه से मरवी है की अल्लाह के महबूब صلى الله عليه وسلم का फरमाने तक़र्रुब निशान है : बरोज़े क़यामत लोगों में मेरे क़रीब तर वो होगा, जिस ने दुन्या में मुझ पर ज़्यादा दुरुदे पाक पढ़े होंगे।
*✍🏼तिर्मिज़ी*

     क़यामत में सब से आराम में वो होगा जो हुज़ूर صلى الله عليه وسلم के साथ रहे और आप की हमराही नसीब होने का ज़रीआ दुरुद शरीफ की कसरत है। इस से मालुम हुवा की दुरुदे पाक बेहतरीन नेकी है की तमाम नेकियों से जन्नत मिलती है और दुरुदे पाक से बज़्मे जन्नत के दूल्हा صلى الله عليه وسلم।
*✍🏼मीरआतुल मनाजिह्, 2/100*

     दुन्या में दुरुद शरीफ की कसरत अक़ीदे की मज़बूती, निय्यत के ख़ुलूस, महब्बत की सच्चाई और इबादत की हमेशगी पर दलालत करती है। लिहाज़ा हमे भी कसरत से दुरुद शरीफ पढ़ना चाहिये।

*✍🏼40 फरमाने मुस्तफा, 4*

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Tuesday, 18 July 2017

*83 आसान नेकियां* #02
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*2-हर जाइज़ काम बिस्मिल्लाह से शुरू करना*

     रोज़ मर्रा के हर जाइज़ काम को (जब की कोई मानेए शरई न हो) बिस्मिल्लाह शरीफ से शुरू करना अपना मामूल बना लिया जाए तो हज़ारो नेकियों का खज़ाना इकठ्ठा किया जा सकता है।
     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : जो बिस्मिल्लाह पढ़ेगा अल्लाह हर हर्फ़ के बदले उस के नामए आमाल में चार हज़ार नेकियां दर्ज फ़रमाएगा, चार हज़ार गुनाह बख्श देगा और चार हज़ार दरजात बुलन्द फ़रमाएगा।
     ज़रा हिसाब तो लगाइये بسم الله الرحمن الرحيم में 19 हरुफ़ है। यूं एक बार पढ़ने से أن شاء الله चन्द सेकण्ड में 76 हज़ार नेकियां मिलेगी, 76 हज़ार गुनाह मुआफ़ होंगे और 76 हज़ार दरजात बुलन्द होंगे।

*_बिस्मिल्लाह दुरुस्त पढ़िये_*
     बिस्मिल्लाह पढ़ने में मखारिज से हरुफ़ की अदाएगी लाज़िम है। और कम अज़ कम इतनी आवाज़ भी ज़रूरी है की रुकावट न होने की सूरत में अपने कानों से सुन सकें। जल्द बाज़ी में बाज़ लोग हरुफ़ चबा जाते है, जान बुझ कर इस तरह पढ़ना ममनूअ है और माना फासिद् होने की सूरत में गुनाह। लिहाज़ा जल्दी जल्दी पढ़ने की आदत की वजह से जो लोग गलत पढ़ डालते है वो अपनी इस्लाह कर लें नीज़ जहां पूरी पढ़ने की कोई ख़ास वजह मौजूद न हो और जल्दी भी हो वहां सिर्फ बिस्मिल्लाह कह ले तब भी हरज नही।

*_घरेलू झगड़ों का इलाज_*
     मुफ़्ती अहमद यार खान عليه رحما फ़रमाते है : घर में दाखिल होते वक़्त बिस्मिल्लाह पढ़ कर पहले सीधा क़दम दरवाज़े में दाखिल करना चाहिये फिर घर वालों को सलाम करते हुवे घर के अन्दर आए। अगर घर में कोई न हो तो السلام عليك ايها النبي و رحمه الله و بركاته कहें। बाज़ बुज़ुर्गो को देखा गया है की दिन की इब्तिदा में पहली बार घर में दाखिल होते वक़्त बिस्मिल्लाह और कुलहुवल्लाह शरीफ पढ़ लेते है की इस से घर में इत्तिफ़ाक़ भी रहता है और रोज़ी में बरकत भी।
*✍🏼आसान नेकियां, 20*

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*नमाज़ के मुस्तहब्बात*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

★ निय्यत के अलफ़ाज़ ज़बान से कह लेना. जब की दिल में निय्यत हाज़िर हो वरना तो नमाज़ होगी ही नही.

★ कियाम में दोनों पंजो के दर मियान 4 उंगल का फ़ासिला होना.
★ कियाम की हालत में सजदे की जगह,
★ रूकू में दोनों  क़दमो की पुश्त पर,
★ सजदे में नाक की तरफ,
★ क़ायदे में गोद की तरफ,
★ पहली सलाम में सीधे कंधे की तरफ और
★ दूसरी सलाम में उलटे कंधे की तरफ नज़र करना.

★ मुंफरीद को रुकूअ और सजदों में तिन बार से ज्यादा [मगर ताक अदद यानि 5, 7, 9] तस्बीह कहना.
     "हिल्या" बगैर में हज़रते अब्दुल्लाह बिन मुबारक वगैरा से  है की इमाम के लिये तसबिहात 5 बार कहना मुस्तहब है.

★ जिस को खासी आए उस के लिए मुस्तहसब है की जब तक मुमकिन हो न ख़ासे.
★ जमाहि आए तो मुह बंद किये रहिये और न रुके तो हॉट दांत के निचे दबाइये. अगर इस तरह भी न रुके तो कियाम में सीधे हाथ को पुश्त से और गैर कियाम में उलटे हाथ की पुश्त से मुह ढांप लीजिये.
     जमाहि रोकने का बेहतरीन तरीका ये है की दिल में ख़याल कीजिये की सरकार मदीना और दीगर अम्बिया अलैहिमुस्सलाम को जमाहि कभी नही आती थी. ان شاء الله फौरन रुक जाएगी.

★ जब मुगब्बीर "हय्या-अ-ललफला" कहे तो इमाम व मुक्तदि सब का खड़ा हो जाना

★ सजदा ज़मीन पर बिल हाइल होना.
*✍🏼नमाज़ के अहकाम, स. 182-183*

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*क़र्ज़ देने के फ़ज़ाइल* #02
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_इमामे आज़म का तक़्वा_*
     हज़रते इमामे आज़म अबू हनीफा رضي الله عنه एक जनाज़ा पढ़ने तशरीफ़ ले गए धुप की बड़ी शिद्दत थी और वहा कोई साया भी न था साथ ही एक शख्स का मकान था। उस मकान की दिवार का साया देख कर लोगो ने इमाम साहिब से अर्ज़ किया की हुज़ूर ! आप इस साए में खड़े हो जाइये। आप ने फ़रमाया, की इस मकान का मालिक मेरा मक़रुज़ है और अगर में ने इस की दिवार से कुछ नफा हासिल किया तो में डरता हु की अल्लाह के नज़दीक कहि सूद लेने वालो में मेरा शुनार न हो जाए, क्यू की रसूलुल्लाह صلى الله عليه وسلم ने फ़रमाया है की जिस क़र्ज़ से कुछ नफा लिया जाए वो सूद है। चुनान्चे आप धुप ही में खड़े रहे।

     अल्लाहु अकबर ! हमारे इमामे आज़म رضي الله عنه का तक़्वा क्या ही खूब था। बुज़ुर्गाने दीन के दिलों में अल्लाह का खौफ फुट फुट कर भरा होता है। इस लिये ये हज़रात क़दम क़दम पर अल्लाह से डरते है। अल्लाह की उन पर रहमत हो और उन के सदके हमारी मगफिरत हो।
اٰمِيْن بِـجٙـاهِ النّٙـبِـىِّ الْاٙ مِيْن

*_क़यामत के गम से बचने के लिये_*
     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : जिस शख्स को ये बात पसन्द हो की अल्लाह उसे क़यामत के दिन गम और घुटन से बचाए तो उसे चाहिये की तंगदस्त क़र्ज़दार को मोहलत दे या क़र्ज़ का बोझ उस के ऊपर से उतार दे। (यानी मुआफ़ कर दे)
*✍🏼सुन्नते और आदाब, 115*

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Monday, 17 July 2017

*83 आसान नेकियां* #01
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_1-अच्छी अच्छी निय्यते करना_* #01
     बिला शुबा अच्छी निय्यते करना एक ऐसा अमल है जो मेहनत के ऐतिबार से बेहद छोटा, लेकिन अज़्रो षवाब के लिहाज़ से हद दरजा अज़ीम है।

     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : सच्ची निय्यत सब से अफ़्ज़ल अमल है।

     निय्यत दिल के पुख्ता इरादे को कहते है ख्वाह वो किसी चीज़ का हो और शरीअत में निय्यत इबादत के इरादे को कहते है।

     किसी भी नेक अमल को करते वक़्त अच्छी अच्छी निय्यते कर ली जाए तो इस का षवाब बढ़ जाता है, हज़रते शैख़ अब्दुल हक़ मुहद्दिश देहलवी عليه رحما लिखते है : एक अमल में जितनी निय्यते होंगी उतनी नेकियों का षवाब मिलेगा, मषलन मोहताज़ क़राबत दार की मदद करने में अगर निय्यत फ़क़त अल्लाह के लिये देने की होगी तो एक निय्यत का षवाब पाएगा और अगर सीलए रहमी की निय्यत भी करेगा तो दोहरा षवाब पाएगा।

     इमाम अहमद रज़ा खान عليه رحما लिखते है : बेशक जो इल्मे निय्यत जानता है एक एक फेल को अपने लिये कई कई नेकियां कर सकता है।

*_अच्छी अच्छी निययतें करने का तरीक़_*
     हज़रत इल्यास अत्तार क़ादरी دامت بركاته العاليه निय्यत के बारे में हमारा मदनी ज़हन बनाते हुवे लिखते है : अच्छी अच्छी निय्यते करने के लिये ज़रूरी है की ज़ेहन हाज़िर रहे, जो अच्छी निययतो का आदी नही है उसे शुरू में ब तकल्लुफ इस की आदत बनानी पड़ेगी लिहाज़ा इब्तिदाअन इस के लिये सर झुकाए, आँखे बन्द कर के ज़ेहन को मुख़्तलिफ़ ख्यालात से खाली कर के यकसू हो जाना मुफीद है।
     इधर उधर नज़रे घुमाते हुवे, बदन सहलाते खुजाते हुवे, कोई चीज़ रखते उठाते हुवे या जल्द बाज़ी के साथ निय्यते करना चाहेंगे तो शायद हो नही पाएगी।
    निययतो की आदत बनाने के लिये इन की अहमिय्यत पर नज़र रखते हुवे आप को सन्जिदगी के साथ पहले अपना ज़ेहन बनाना पड़ेगा।

बाक़ी अगली पोस्ट में..أن شاء الله
*✍🏼आसान नेकियां, 14*

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*नमाज़ की सुन्नते* #11
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*_सुन्नते बादिय्या की सुन्नते_*
★जिन फर्ज़ो के बाद सुन्नते है उन में बादे फ़र्ज़ कलाम न करना चाहिये अगरचे सुन्नत हो जाएगी मगर षवाब कम होगा और सुन्नतो में ताखीर भी मकरूह है इसी तरह बड़े बड़े अवरादो वज़ाइफ की भी इजाज़त नहीं।

★ फर्ज़ो के बाद क़ब्ले सुन्नत मुख़्तसर दुआ पर क़नाअत चाहिये वरना सुन्नतो का षवाब कम हो जाएगा।
*बहरे शरीअत, जी.3 स.81*

★ सुन्नत व फ़र्ज़ के दरमियान कलाम करने से दुरुस्त तरीन ये है कि सुन्नत बातिल नहीं होती अलबत्ता षवाब कम हो जाता है। यही हुक्म उस काम का है जो मुनाफिये तहरीमा है।

★ सुन्नते वही न पढ़िये बल्कि दाए, बाए, आगे, पीछे हट कर पढ़िये या घर जा कर अदा किजिये।
*आलमगिरी, जी.1 स.77*

★ सुन्नते पढ़ने के लिये घर जाने की वजह से जो फ़ासिला हुवा उस में हर्ज नही।
★ जगह बदलने या घर जाने के लिये नमाज़ी के आगे से गुज़रना या उस की तरफ अपना चेहरा करना गुनाह है अगर निकलने की जगह न मिले तो वही सुन्नते पढ़ लीजिये।
*✍🏼नमाज़ के अहकाम, सफा 179*

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*क़र्ज़ देने के फ़ज़ाइल*
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     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : हर क़र्ज़ सदक़ा है।
*شعب الإيمان*

     आप का फरमान है : मेराज की रात में ने जन्नत के दरवाज़े पर लिखा हुवा देखा की सदक़ा का हर दिरहम, दस दिरहम के बराबर है और क़र्ज़ का हर दिरहम 18 दिरहम के बराबर है। मेने पूछा जिब्राइल ! क़र्ज़ सदके से किस वजह से अफ़्ज़ल है ? अर्ज़ की, साइल सुवाल करता है जब की उस के पास (माल) होता है और क़र्ज़ तलब करने वाला अपनी ज़रूरत के लिये क़र्ज़ तलब करता है।

     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : जो शख्स अपने किसी भाई को दोबारा क़र्ज़ देगा, अल्लाह उस को एक मर्तबा सदक़ा करने का षवाब देगा।
*سنن ابن ماجه*

बाक़ी अगली पोस्ट में..أن شاء الله
*✍🏼सुन्नते और आदाब, 114*

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Sunday, 16 July 2017

*आसान नेकियां*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
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     बेशुमार नेकियां ऐसी भी है जिन में मेहनत बेहद कम मगर षवाब बहुत ज़्यादा होता है लेकिन तवज्जोह न होने या ला इल्मी की वजह से हम इन षवाबात के हुसूल के कई मवाकेअ ज़ाएअ कर बैठते है। अगर थोड़ी सी तवज्जोह कर ली जाए तो أن شاء الله हमारे नामए आमाल में बेशुमार नेकियां जमा हो सकती है।

*_अमल शुरू कर दीजिये_*
     जिस पर एक एक नेकी जमा करने की धुन सुवार हो जाए, आसान हो या मुश्किल वो नेकी करने का कोई मौक़ा हाथ से नही जाने देता। लिहाज़ा नेकियों का खज़ाना जमा करने के लिये आज और अभी से निय्यत कर लीजिये की में फराइज़ व वाजिबात की पाबन्दी करने के साथ साथ जब भी किसी मुस्तहब अमल की फ़ज़ीलत के बारे में पढ़ु या सुनूँगा तो أن شاء الله मौक़ा मिलते ही उस पर अमल करने और इस्तिकामत पाने की कोशिश करूँगा, क्यू की जिस तरह रेल की पटरी बिछाना एक काम है और इस पर ट्रेन चलाना दूसरा काम ! बिल्कुल इसी तरह किसी अमल की फ़ज़ीलत जान लेना एक काम है मगर उस फ़ज़ीलत को हासिल करना दूसरा काम है। नेकियों में मसरूफ़ रहने का एक फायदा ये भी होगा की गुनाह करने का मौक़ा ही नही मिलेगा أن شاء الله.
*✍🏼आसान नेकियां, 11*

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*नमाज़ की सुन्नते* #10
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
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*_सलाम फेरने के बाद की सुन्नते_*

★ सलाम के बाद इमाम के लिए सुन्नत ये है की दाई या बाई तरफ रुख कर ले,
★ दाई तरफ अफज़ल है

★ और मुक्तदियो की तरफ रुख कर के भी बैठ सकता है जब की आखिरी सफ तक भी कोई इस के सामने [यानि इस के चेहरे की सीध में] नमाज़ न पढ़ता हो.

★ अकेले नमाज़ पढ़ने वाला बैगेर रुख बदले अगर वही दुआ मांगे तो जाइज़ है.

बाक़ी अगली पोस्ट में..ان شاء الله
*✍🏼आलमगिरी, जी. 1 स. 77*
*✍🏼नमाज़ के अहकाम, सफा 179*

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*इमामे के फ़ज़ाइल* #02
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*_हिकायत_*
     हज़रते सालिम बिन अब्दुल्लाह बिन उमर رضي الله عنه फ़रमाते है की में अपने वालिद के हुज़ूर हाज़िर हुवा वो इमामा बांध रहे थे जब बांध चुके तो मेरी तरफ इल्तीफात कर के फ़रमाया : तुम इमामा को दोस्त रखते हो ? में ने अर्ज़ की : क्यू नही ! फ़रमाया : इसे दोस्त रखो इज़्ज़त पाओगे और जब शैतान तुम्हे देखेगा तुम से पीठ फेर लेगा, ऐ फ़रज़न्द इमामा बांध की फ़रिश्ते जुमुआ के दिन इमामा बांधे आते है और सूरज डूबने तक इमामा बांधने वालो पर सलाम भेजते रहते है।

     इमामे पेच सीधी जानिब होने चाहिए चुनान्चे इमाम अहमद रज़ा खान عليه رحما इमामा शरीफ इस तरह बांधते की शिमलाए मुबारका सीधे शाना पर रहता। नीज़ बांधते वक़्त उस की गर्दिश बाए हाथ से फ़रमाते जब की सीधा हाथ पेशानी पर रखते और इसी से हर पेच की गरिफ्त फ़रमाते।

*_इमामा के आदाब_*
★ इमामा 7 हाथ (साढ़े तिन गज़) से छोटा न हो और 12 हाथ (छ गज़) से बड़ा न हो।
★ इमामा के शिम्ले की मिक़दार कम अज़ कम चार उंगल और ज़्यादा से ज़्यादा इतना हो की बैठने में न दबे।
★ इमामा उतारते वक़्त भी एक एक के पेच खोलना चाहिये। इमामा किब्ला की तरफ रुख कर के खड़े खड़े बांधे।

     ऐ हमारे प्यारे अल्लाह ! हमे इमामा की सुन्नत पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता फरमा।
اٰمِيْن بِـجٙـاهِ النّٙـبِـىِّ الْاٙ مِيْن
*✍🏼सुन्नते और आदाब, 112*

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Saturday, 15 July 2017

*हर नेकी मुश्किल नही होती*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     सच्ची बात तो ये है की "हर नेकी मुश्किल नही होती, हमारा नफ़्स इन्हें मुश्किल समझता है।" अलबत्ता कुछ नेकियां ऐसी होती है जिन में थोड़ी बहुत मेहनत मशक़्क़त करनी पड़ती है लेकिन अगर हिम्मत कर के इन्हें शुरू कर दिया जाए तो वक़्त के साथ साथ आसानी पैदा हो जाती है, मशलन नींद कुर्बान कर के तहज्जुद पढ़ना बेहद मुश्किल महसूस होता है लेकिन जो इस का मामूल बना ले उस के लिये नमाज़े तहज्जुद की अदाएगी क़दरे आसान हो जाती है। बहर हाल कोई नेकी दुश्वार भी हो तो छोड़नी नही चाहिये और मशक़्क़त नही बल्कि इनआम को पेशे नज़र रखना चाहिये क्यू की आरज़ी मशक़्क़त खत्म हो जाएगी जब की इस का इनआम أن شاء الله हमेशा आप के पास रहेगा।

*_जितनी मशक़्क़त ज़्यादा उतना षवाब ज़्यादा_*
     अपना मदनी ज़हन बना लीजिये की नेकी में जितनी मशक़्क़त ज़्यादा होगी أن شاء الله उतना ही षवाब ज़्यादा मिलेगा जैसा की मन्कुल है : अफ़्ज़ल इबादत वो है जिस में ज़हमत (तकलीफ) ज़्यादा है।
     इमाम शर्फुद्दीन नववी عليه رحما फ़रमाते है : इबादत में मशक़्क़त और खर्च ज़्यादा होने से षवाब और फ़ज़ीलत ज़्यादा हो जाती है।
     हज़रते इब्राहिम बिन अदहम का फरमान है : दुन्या में जो नेक अमल जितना दुश्वार होगा क़यामत के रोज़ नेकियों के पलड़े में उतना ही ज़्यादा वज़नदार होगा।
*✍🏼आसान नेकियां, 10*

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*नमाज़ की सुन्नते* #09
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*_सलाम फेरने की सुन्नते_*

★ इन अलफ़ाज़ के साथ दो बार सलाम फेरना "अस्सलामु अलैकुम वरहमतुल्लाह"

★ पहले सीधी तरफ फिर उलटी तरफ मुह फेरना

★ इमाम के लिये दोनों सलाम बुलंद आवाज़ से कहना सुन्नत है मगर दूसरा पहले से कम आवाज़ में कहे।

★ हर तरफ के सलाम में उस तरफ वाले मुक्तदियो और उन उलमा की निय्यत करे नीज़ जिस तरफ इमाम हो उस तरफ के सलाम में इमाम की भी निय्यत करे और अगर इमाम उस के ठीक सामने की सीध में हो तो दोनों सलामो में इमाम की भी निय्यत करे

★ अकेले नमाज़ पढ़ने वाला किरामन कातिबिन् और उन मलाएका की निय्यत करे जिन को अल्लाह ने हिफाज़त के लिये मुक़र्रर किया है और निय्यत में कोई अदद मुअय्यन न करे।

★ मुक्तदि का तमाम इन्तिक़ालात यानि रूकू सुजूद वग़ैरा इमाम के साथ होना।

बाक़ी अगली पोस्ट में..ان شاء الله
*✍🏼नमाज़ के अहकाम, सफा 178-179*

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*इमामे के फ़ज़ाइल* #01
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
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     इमामा शरीफ हमारे प्यारे आक़ा صلى الله عليه وسلم की बहुत ही प्यारी सुन्नत है। आप ने हमेशा सरे अक़दस पर अपनी मुबारक टोपी पर इमामा मुबारक को सजा कर रखा।

*_ताजदारे मदीना के इर्शादात_*
★ इमामे के साथ दो रकअत बगैर इमामा की 70 रकअतो से अफ़्ज़ल है।
★ इमामा के साथ नमाज़ 10 हज़ार नेकियों के बराबर है।
★ बेशक अल्लाह और उसके फ़रिश्ते दुरुद भेजते है जुमुआ के दिन इमामा वालो पर।
★ टोपी पर इमामा और मुशरिकीन का फ़र्क़ है, हर पेच पर की मुसलमान अपने सर पर देगा इस पर रोज़े क़यामत एक नूर अता किया जाएगा।
★ इमामा बंधो तुम्हारा हिल्म बढ़ेगा।
★ इमामा मुसलमानो का वक़ार और अरब की इज़्ज़त है तो जब अरब इमामा उतार देंगे अपनी इज़्ज़त उतार देंगे।
★ आप صلى الله عليه وسلم ने इमामा की तरफ इशारा कर के फ़रमाया : फरिश्तों के ताज ऐसे ही होते है।
★ इमामा के साथ एक जुमुआ बगैर इमामा के 70 जुमुआ के बराबर है।

बाक़ी अगली पोस्ट में..أن شاء الله
*✍🏼सुन्नते और आदाब, 111*

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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Friday, 14 July 2017

*नेकियों की दो किस्मे*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     नेकिया दो किस्म की होती है : (1) जिन का करना हम पर फ़र्ज़ या वाजिब होता है जेसे नमाज़, रोज़ा, वगैरा तो ऐसी नेकियां हर सूरत में करनी ही होगी क्यू की इन की अदाएगी पर षवाब और अदमे अदाएगी पर मलामत करने के साथ साथ सज़ा भी है। (2) वो नेकियां जो मुस्तहब्बात के दर्जे में है जेसे नवाफ़िल वगैरा यानी अगर करे तो षवाब और न करे तो गुनाह नही लेकिन षवाब से बहर हाल महरूम रहेगे।

*_क्या नेकी कमाना मुश्किल काम है ?_*
     हमारी अक्षरिय्यत इस वस्वसे का शिकार हो कर नेकियों की तरफ क़दम नही बढती की "नेकियां कमाना बहुत मुश्किल है" मगर हैरत उस वक़्त होती है की जब यही लोग दुन्यवी मालो दौलत कमाने के लिये मुश्किल से मुश्किल काम पर राज़ी हो जाते है। इस के लिये भूक, प्यास, धुप, ज़िल्लत, थकावट वगैरा क्या कुछ बर्दाश्त नही करते ! हत्ता की अपनी जान भी खतरे में दाल देते है, सिर्फ इस वजह से की उनका ज़ेहन बना होता है की इस परेशानी के सिले में उन्हें थोड़ी बहुत रकम मिल जाएगी जिस से वो अपनी जरूरियात व ख्वाहिशात पूरी कर सकेंगे, लेकिन अफ़सोस की जब ऐसो के सामने आख़िरत में मिलने वाले इनआमात व आसाइशात का तज़किरा कर के नेक कामो की तरगिब् दी जाए तो उन्हें ये काम बहुत मुश्किल दिखाई देते है और वो राहे फिरार इख़्तियार करने के लिये हिले बहाने बनाने लगते है।
*✍🏼आसान नेकियां, 9*

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*नमाज़ की सुन्नते* #08
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_क़दह की सुन्नते_*
★ दूसरी रकअत के सजदों से फारिग हो कर बाय पाऊ बिछा कर दोनों सुरीन उस पर रख कर बैठना और सीधा क़दम खड़ा रखना
सीधे पाऊ की उंगलिया किब्ला रुख करना

★ सीधा हाथ सीधी रान पर और उल्टा हाथ उलटी रान पर रखना
★ उंगलिया अपनी हालत पर यानि [normal] छोड़ना की न ज्यादा खुली हुई नबिल्कुल मिली हुई.
★ उंगलियो के कनारे घुटनो के पास होंना, घुटने पकड़ना न चाहिए.

★ अत्तहियात में शहादत पर इशारा करना.
★ इसका तरीका ये है की छुंगलिया और पास वाली को बंद कर लीजिये, अंगूठे और बिच वाली का हल्क़ा बाधिये और "लाम" पर कलिमे की ऊँगली उठाइये इस को इधर उधर मत हिलाइये और "इला" पर रख दीजिये और सब उंगलिया सीधी कर लीजिये.

★ दुसरे क़ायदे में भी इसी तरह बैठिये जिस तरह पहले में बैठे थे और अत्तहिय्यत भी पढ़िये।

★ उसके बाद दुरुदे इब्राहिम पढ़िये।

★ नवाफ़िल और सुन्नते गैर मुअक्कदा के क़ायदे ए उला में भी अत्तहिय्यत और दुरुदे इब्राहिम पढ़ना सुन्नत है।

★ अब दुआ ए मासुरा पढ़िये।

बाक़ी अगली पोस्ट में..ان شاء الله
*✍🏼नमाज़ के अहकाम, सफा 177-178*

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*मेहमान नवाज़ी की सुन्नते और आदाब* #02
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_मेहमान मेज़बान के गुनाह मुआफ़ होने का सबब होता है_*
     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : जब कोई मेहमान किसी के यहाँ आता है तो अपना रिज़्क़ ले कर आता है और जब उस के यहाँ से जाता है तो साहिबे खाना के गुनाह बख्शे जाने का सबब होता है।

*_10 फ़रिश्ते साल भर तक घर में रहमत लुटाते है_*
    हज़रते अनस رضي الله عنه ने अपने भाई हज़रते बराअ बिन मालिक رضي الله عنه से फ़रमाया, ऐ बराअ ! आदमी जब अपने भाई की, अल्लाह के लिये मेहमान नवाज़ी करता है और इस की कोई जज़ा और शुक्रिया नही चाहता तो अल्लाह उस के घर में 10 फरिश्तों को भेज देता है जो पुरे एक साल तक अल्लाह की तस्बीह व तहलील और तकबीर पढ़ते और उस के लिये मगफिरत की दुआ करते रहते है। और जब साल पूरा हो जाता है तो उन फरिश्तों की पूरी साल की इबादत के बराबर उस के नामए आमाल में इबादत लिख दी जाती है और अल्लाह के जिम्मए करम पर है की उसको जन्नत की लज़ीज़ ग़िज़ाए "जन्नतुल खुल्द" और न फना होने वाली बादशाही में खिलाए।
   
*_मेहमान को दरवाज़े तक तुख्सत करना सुन्नत है_*
     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : सुन्नत ये है की आदमी मेहमान को दरवाज़े तक रुख्सत करने जाए।

     ऐ हमारे प्यारे अल्लाह ! हमे मेहमानो की खुश दिली के साथ मेहमान नवाज़ी की तौफ़ीक़ अता फरमा और बार बार हमे मदीने की महकी फ़ज़ाओं में मदनी आक़ा صلى الله عليه وسلم का मेहमान बनने की सआदत नसीब फरमा।
اٰمِيْن بِـجٙـاهِ النّٙـبِـىِّ الْاٙ مِيْن
*✍🏼सुन्नते और आदाब, 110*

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Thursday, 13 July 2017

*अज़ाब से छुटकारे के असबाब* #04
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

★ एक शख्स पुल सिरात पर खड़ा था और टहनी की तरह लरज़ रहा था लेकिन उसका अल्लाह के साथ *हुस्ने ज़न* (यानी अल्लाह से अच्छा गुमान की वो ज़रूर रहमत फ़रमाएगा) आया और उसे बचा लिया और वो पुल सिरात से गुज़र गया।

★ एक शख्स पुल सिरात पर घिसट घिसट कर चल रहा था की उस का मुझ पर *दुरुदे पाक* पढ़ना आ गया और उस को खड़ा कर के पुल सिरात पार करवा दिया।

★ मेरी उम्मत का एक शख्स जन्नत के दरवाज़ों के पास पंहुचा तो वो सब पर बन्द थे की उस का لٙااِلٰهٙ اِلّٙااللّٰهُ की गवाही देना आया और उस के लिये जन्नती दरवाज़े खुल गए और वो जन्नत में दाखिल हो गया।

★ एक औरत को सिर्फ इस लिये बख्श दिया गया की उस ने एक प्यासे कुत्ते को पानी पिलाया था।

★ एक शख्स ने रस्ते में से एक दरख्त को इस लिये हटा दिया ताकि लोगो को इस से इज़ा न पहुचे। अल्लाह ने खुश हो कर उस की मगफिरत फरमा दी।

★ एक हदिष में तक़ाज़े में नरमी (यानी क़र्ज़ में वूसुली में आसानी) करने वाले एक शख्स की नजात हो जाने का वाक़ीआ भी आया है।

सच तो ये है की रहमत के वाकिआत जमा करने जाए तो इतने है की हम जमा ही न कर सके।
*✍🏼आसान नेकियां, 7*

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*नमाज़ की सुन्नते* #07
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

_*दूसरी रकअत के लिये उठने की सुन्नते*_

★ जब दोनों सज्दे कर ले तो दूसरी रकअत के लिये पन्जो के बल, घुटनो पर हाथ रख कर खड़ा होना सुन्नत है।

★ हा कमज़ोरी या पाउ में तकलीफ वग़ैरा मजबूरी की वजह से ज़मीन पर हाथ रख कर खड़े होने में हरज नहीं।

बाक़ी अगली पोस्ट में..ان شاء الله
*✍🏼नमाज़ के अहकाम, सफा 176*

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*मेहमान नवाज़ी की सुन्नते और आदाब* #01
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     मेहमान नवाज़ी करना सुन्नते मुबारका है, अहादिश में इस के बहुत से फ़ज़ाइल बयान किये गए है बल्कि यहाँ तक फ़रमाया की मेहमान बाइसे खैरो बरकत है। एक दफा हुज़ूर صلى الله عليه وسلم के यहाँ मेहमान हाज़िर हुवा तो आप ने क़र्ज़ ले कर उस की मेहमान नवाज़ी फ़रमाई।
     चुनान्चे अबू राफेअ رضي الله عنه कहते है, हुज़ूर صلى الله عليه وسلم ने मुझ से फ़रमाया, फुला यहूदी से कहो की मुझे आटा क़र्ज़ दे। में रजब शरीफ के महीने में अदा कर दूंगा (क्यू की एक मेहमान मेरे पास आया हुवा है) यहूदी ने कहा, जब तक कुछ गिरवी नही रखोगे, न दूंगा। हज़रते अबू राफेअ رضي الله عنه कहते है की में वापस आया और हुज़ूर صلى الله عليه وسلم की खिदमत में उस का जवाब अर्ज़ किया। आप ने फ़रमाया, वल्लाह ! में आसमान में भी अमीन हु और ज़मीन में भी अमीन हु। अगर वो दे देता तो में अदा कर देता। (अब मेरी वो ज़िरह ले जा और गिरवी रख कर आ। में ले गया और ज़िरह गिरवी रख कर लाया)

*_मेहमान बाइसे खैरो बरकत है_*
     हज़रते अनस رضي الله عنه का बयान है की हुज़ूर صلى الله عليه وسلم ने इर्शाद फ़रमाया, जिस घर में मेहमान हो उस घर में खैरो बरकत उसी तरह दौड़ती है जैसे ऊंट की कौहान से छड़ी (तेज़ी से गिरती है), बल्कि इस से भी तेज़।

बाक़ी अगली पोस्ट में..أن شاء الله
*✍🏼सुन्नते और आदाब, 108*

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Wednesday, 12 July 2017

*नमाज़ की सुन्नते* #06
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_जल्से की सुन्नते_*
★ दोनों सजदों के बिच में बैठना इसे जल्सा कहते है।

*मर्द*
◆ जल्से में सीधा क़दम खड़ा कर के उल्टा क़दम बिछा कर उस पर बैठना
◆ सीधे पाउ की उंगलिया किब्ला रुख करना
◆ दोनों हाथ रानो पर रखना

*औरत*
◆ दोनों पाउ सीधी जानिब निकाल देना और उलटी सुरीन पर बैठना
◆ दोनों हाथ रानो पर रखना

बाक़ी अगली पोस्ट में..ان شاء الله
*✍🏼नमाज़ के अहकाम, सफा 176*

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*सोने जागने की सुन्नते और आदाब* #02
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

★ *दाई करवट लेटना सुन्नत है।* हुज़ूर صلى الله عليه وسلم जब अपनी ख्वाब गाह पर तशरीफ़ ले जाते तो अपना सीधा हाथ मुबारक सीधे रुख़्सार शरीफ के निचे रख कर लेटते।

★ *क़ुरआन* के आदाब में से ये भी है की इस की तरफ पीठ न की जाए न पाउ फेलाए जाए, न पाउ को इस से उचा करे, न ये की खुद उची जगह पर हो और क़ुरआन निचे हो। हा क़ुरआन और मुक़द्दस तुगरे वगैरा उची जगह हो तो उस सम्त पाउ करने में मुज़ायक़ा नही।

★ कभी चटाई पर सोए तो कभी बिस्तर पर कभी फर्शे ज़मीन पर ही सो जाए।

★ *जागने के बाद ये दुआ पढ़े* الْحٙمْدُلِلّٰهِ الِّذِىْ اٙحْيٙانٙا بٙعْدٙمٙا اٙمٙاتٙنٙا وٙاِلٙيْهِ النُّشُوْرُ
तर्जमा : तमाम तारीफ अल्लाह के लिये है जिस ने हमे मारने के बाद ज़िन्दा किया और उसी की तरफ लौट कर जाना है।

     ऐ हमारे प्यारे अल्लाह ! हमे कम सोने और सुन्नत के मुताबिक़ सोने की तौफ़ीक़ मर्हमत फरमा।
اٰمِيْن بِـجٙـاهِ النّٙـبِـىِّ الْاٙ مِيْن

*✍🏼सुन्नते और आदाब, 107*

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Tuesday, 11 July 2017

*अज़ाब से छुटकारे के असबाब* #03
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ
★ एक शख्स को अज़ाब के मख़्सूस फरिश्तों ने चारो तरफ से घेर लिया लेकिन उस का नेकी का हुक्म करने और बुराई से मना करने की नेकी आई और इस ने उसे बचा लिया और रहमत के फरिश्तों के हवाले कर दिया।

★ एक शख्स को देखा जो घुटनो के बल बैठा है लेकिन उस के और अल्लाह के दरमियान पर्दा है मगर उस का *हुस्ने अख़लाक़* आया, इस नेकी ने उस को बचा लिया और अल्लाह से मिला दिया।

★ एक शख्स को उसका आमाल नामा उलटे हाथ में दिया जाने लगा तो उस का *खौफे खुदा* आ गया और इस अज़ीम नेकी की बरकत से उस का नामए आमाल सीधे हाथ में दे दिया गया।

★ एक शख्स की नेकियों का वज़न हल्का रहा मगर उस की *सखावत* आ गई और नेकियों का वज़न बढ़ गया।

★ एक शख्स जहन्नम के किनारे पर खड़ा था मगर उस का *खौफे खुदा* आ गया और वो बच गया।

★ एक शख्स जहन्नम में गिर गया लेकिन उस के *खौफे खुदका में बहाए हुवे आंसू* आ गए और इन आसुओ की बरकत से वो बच गया।

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*नमाज़ की सुन्नते* #05
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*_सज्दे की सुन्नते_*
★ सज्दे में जाने के लिये और सज्दे से उठने के लिये अल्लाहु अक्बर कहना

★ सज्दे में कम अज़ कम 3 बार "सुब्हान रब्बियल आला" कहना

★ सज्दे में हथेलिया ज़मीन पर रखना, हाथो की उंगलिया मिली हुई किब्ला रुख रखना।

★ सज्दे में जाए तो ज़मीन पर पहले घुटने फिर हाथ फिर नाक फिर पेशानी रखना।

★ जब सज्दे से उठे तो इस का उल्टा करना यानी पहले पेशानी फिर नाक फिर हाथ फिर घुटने उठाना।

*मर्द :*
◆ सज्दे में सुन्नत ये है कि बाज़ू करवटों से और राने पेट से जुदा हो
◆ कलाइयां ज़मीन पर न बिछाइये हा जब सफ में हो तो बाज़ू करवटों से जुदा न रखिये।
◆ सज्दे में दोनों पाउ की उंगलियो पेट इस तरह ज़मीन पर लगाइये के दसो उनगलिया किब्ला रुख रहे।

*औरत :*
◆ सिमट कर सज्दा करे यानि बाज़ू करवटों से पेट रानो राने पिंडलियों से और पिंडलियां ज़मीन से मिला देना।

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اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     नींद भी एक तरह की मौत है। जब भी हम सो इ लगे तो हमे डर जाना चाहिये की कहि ऐसा न हो की आँख ही न खुले और हमेशा हमेशा के लिये ही सोते रह जाए। लिहाज़ा रोज़ाना सोने से पहले भी अपने गुनाहो से तौबा कर लेनी चाहिये।
     अगर हम सुन्नत के मुताबिक़ दुआए वगैरा पढ़ कर सोए तो أن شاء الله हमे सोने का भी कुछ न कुछ फायदा हासिल हो ही जाएगा।

★ *सोने से पहले बिस्मिल्लाह शरीफ पढ़ कर बिस्तर को तिन बार झाड़ ले* ताकि कोई मुजी शै या कीड़ा वगैरा हो तो निकल जाए।

★ *सोने से पहले ये दुआ पढ़ लेना सुन्नत है।* اللّٰهُمّٙ بِاِسْمِكٙ اٙمُوْتُ وٙاٙحْىٰ
तर्जमा : ऐ अल्लाह ! में तेरे नाम के साथ ही मरता हु और जीता हु। (यानी सोता और जागता हु)

★ *उल्टा यानी पेट के बल न सोए* हज़रते अबू हुरैरा رضي الله عنه से मरवी है की हुज़ूर صلى الله عليه وسلم ने एक शख्स को पेट के बल लेटे हुए देखा तो फ़रमाया : इस तरह लेटने को अल्लाह पसन्द नही फ़रमाता।

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Monday, 10 July 2017

*अज़ाब से छुटकारे के असबाब* #02
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★ एक शख्स को देखा की प्यास की शिद्दत से ज़बान निकाले हुवे था और एक हौज़ पर पानी पिने जाता था मगर लौटा दिया जाता था की इतने में उस के *रोज़े* आ गए और नेकी ने उसे सैराब कर दिया।

★ एक शख्स को देखा की जहां अम्बियाए किराम हल्के बनाए हुवे तशरीफ़ फरमा थे, वहा उन के पास जाना चाहता था लेकिन धुत्कार दिया जाता था की इतने में उस का *ग़ुस्ले जनाबत* आया और इस नेकी ने उस को मेरे पास बिठा दिया।

★ एक शख्स को देखा की उस के आगे पीछे, दाए बाए, ऊपर निचे अँधेरा ही अँधेरा है और वो उस अँधेरे में हैरानो परेशान है तो उस के *हज व उमरा* आ गए और इन नेकियों ने उस को अँधेरे से निकाल कर रौशनी में पंहुचा दिया।

★ एक शख्स को देखा की वो मुसलमानो से गुफ्तगू करना चाहता है लेकिन कोई उस को मुह नही लगाता तो *सीलए रहमी* (यानी रिश्तेदारो से हुस्ने सुलूक करने की नेकी) ने मोअमिनिन से कहा की तुम इस से बात चित करो। तो मुसलमानो ने उस से बात करना शुरू की।

★ एक शख्स के जिस्म और चेहरे की तरफ आग बढ़ रही है और वो अपने हाथ से बचा रहा है तो उस का *सदक़ा* आ गया और उस के आगे ढाल बन गया और उस के सर पर साया फिगन हो गया।

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*_क़ौमा की सुन्नते_*
★ रूकू से जब उठे तो हाथ लटका दीजिये

★ रूकू से उठने में इमाम के लिये समी-अल्लाहु-लीमन-हामिदह कहना

★ मुक्तदि के लिये रब्बना-लकल-हम्द या अल्लाहुम्म- रब्बना-व-लकल-हम्द कहना

★ तन्हा नमाज़ पढ़ने वाले के लिये दोनों कहना सुन्नत है

★ तनहा नमाज़ पढ़ने वाला समी-अल्लाहु-लीमन-हामिदह कहता हुवा रूकू से उठे जब सीधा खड़ा हो चुके तो अब अल्लाहुम्म- रब्बना-व-लकल-हम्द कहे।

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*जूता पहनने की सुन्नते और आदाब*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     नालैन पहनना सरकार صلى الله عليه وسلم की सुन्नत है।

★ *किसी भी रंग का जूता पहनना अगर्चे जाइज़ है लेकिन पिले रंग के जूते पहनना बेहतर है* की मौला अलिय्युल मुर्तज़ा كرم الله وجهه الكريم फ़रमाते है जो पिले जूते पहनेगा उस की फिक्रो में कमी होगी।

★ *पहले सीधा जूता पहने फिर उल्टा और उतारते वक़्त पहले उल्टा जूता उतारे फिर सीधा।* हज़रते अबू हुरैरा رضي الله عنه से मरवी है की अल्लाह के हबीब صلى الله عليه وسلم ने फ़रमाया : कोई शख्स जब जूता पहने तो पहले दाहिने पाउ में पहने और जब उतारे तो पहले बाए पाउ का उतारे।

★ जब बैठे तो जूता उतार लेना सुन्नत है। हज़रते इब्ने अब्बास رضي الله عنه फ़रमाते है की जब बन्दा बैठे तो सुन्नत है की अपने जूते उतार ले।

★ *जूता पहनने से पहले झाड़ ले* ताकि कीड़ा या कंकर वगैरा हो तो निकल जाए।

★ *इस्तिमाली जूता उल्टा पड़ा हो तो सीधा कर दीजिये* वरना फ़क़रो तंग दस्ती का अन्देशा है।
*✍🏼सुन्नते और आदाब, 104*

*___________________________________*
मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
*___________________________________*
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Sunday, 9 July 2017

*नमाज़ की सुन्नते* #03
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

_*रूकू की सुन्नते*_
"◆ रूकू के लिये "अल्लाहु अक्बर" कहना।
◆ रूकू में 3 बार "सुब्हान रब्बियल अज़ीम" कहना

*मर्द :*
◆ घुटनो को हाथ से पकड़ना और उंगलिया खूब खुली रखना
◆ रूकू में टांगे सीधी रखना (बज़ लोग कमान की तरह टेढ़ी कर लेते है ये मकरूह है)
◆ रूकू में पीठ अच्छी तरह बिछी हो हत्ता की अगर पानी का प्याला पीठ पर रख दिया जाए तो ठहर जाए
◆ सर उचा निचा न हो पीठ की सीध में हो। सरकारे मदीना صلى الله عليه وسلم  फरमाते है " उसकी नमाज़ नाकाफी है जो रूकू व सुजूद में पीठ सीधी नही करता।
     एक और हदिष में फरमाते है की रूकू व सुजूद को पूरा करो खुदा की क़सम में तुम्हे अपने पीछे से देखता हु।

*औरत :*
◆ घुटनो पर हाथ रखना और उंगलिया कुशादा न करना
रूकू में थोडा झुके यानि सिर्फ इतना की हाथ घुटनो तक पहुच जाए
◆ पीठ सीधी न करे और घुटनो पर ज़ोर न दे फक्त हाथ रख दे और हाथो की उनगलिया मिली हुई रखे और पाउ झुके हुए रखे इस्लामी भाइयो की तरह सीधे न कर दे।

◆ बेहतर ये है की "अल्लाहु अक्बर" कहता हुआ रूकू को जाए यानि जब रूकू के लिए झुकना शुरू करे और खत्मे रूकू पर तकबीर खत्म करे।
◆ इस मसाफत को पूरा करने के लिये अल्लाह عزوجل की लाम को बढ़ाए अक्बर की बा वग़ैरा किसी हर्फ़ को न बढ़ाए।

बाक़ी अगली पोस्ट में..ان شاء الله
*✍🏼नमाज़ के अहकाम, सफा 175*

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*लिबास पहनने की सुन्नते और आदाब* #02
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

★ *पहनते वक़्त सीधी तरफ से शुरू करे* मसलन जब कुर्ता पहने तो पहले सीधी आस्तीन में सीधा हाथ दाखिल करे फिर उलटी में, इसी तरह पाजामा में पहले सीधे पाइचे में सीधा पाउ दाखिल करे और जब उतारने लगे तो इस के बर अक्स करे यानी उल्टी तरफ से शुरू करे। हज़रते अबू हुरैरा رضي الله عنه से मरवी है की हुज़ूर صلى الله عليه وسلم जब कुर्ता पहनते तो दाहिनी तरफ से शुरू फ़रमाते।

★ पहले कुर्ता पहने फिर पजामा।

★ *इमामा बांधने की आदत डालिये* की हज़रते उबादा رضي الله عنه से मरवी है की हुज़ूर صلى الله عليه وسلم ने फ़रमाया : इमामा ज़रूर बांधा करो की ये फरिश्तों का निशान है और इस के शिम्ले को पीठ के पीछे लटका लो।
इमामे के साथ 2 रकअत बगैर इमामा की 70 रकअतो से अफ़्ज़ल है।
*كنزالعمال*

ऐ हमारे प्यारे अल्लाह ! हमे फैशन वाले लिबास से बचा और महबूब صلى الله عليه وسلم की सुन्नत के मुताबिक़ लिबास पहनने की तौफ़ीक़ मर्हमत फरमा।
اٰمِيْن بِـجٙـاهِ النّٙـبِـىِّ الْاٙ مِيْن
*✍🏼सुन्नते और आदाब, 103*

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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Saturday, 8 July 2017

*नेकी की किसी बात को हक़ीर न जानो*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : नेकी की किसी बात को हक़ीर न समझो चाहे वो तुम्हारा अपने भाई से खन्दा पेशानी से मुलाक़ात करना हो।
*मुस्लिम*
     जिज वक़्त किसी नेकी की तौफ़ीक़ मिले मौक़ाए गनीमत जान कर षवाब कमाना चाहिये, क्या बईद वही नेकी हमारे लिये ज़रीआए नजात बन जाए। चुनान्चे...

*अज़ाब से छुटकारे के असबाब* #01
     एक तवील हदिष में मूतअद्दिद ऐसे लोगो का बयान है की किसी न किसी नेकी के सबब रहमते खुदावन्दी ने उन्हें अपनी आगोश में ले लिया, चुनान्चे हज़रते अब्दुर्रहमान बिन सुमरह رضي الله عنه से रिवायत है की एक बार हुज़ूर صلى الله عليه وسلم तशरीफ़ लाए और इर्शाद फ़रमाया : आज रात में ने एक अजीब ख्वाब देखा की...
◆ एक शख्स की रूह क़ब्ज़ करने के लिये मलकुल मौत तशरीफ़ लाए लेकिन उस का *माँ बाप की इताअत* करना सामने आ गया और वो बच गया।
◆ एक शख्स पर अज़ाबे क़ब्र छा गया लेकिन उस के वुज़ू (की नेकी) ने उसे बचा लिया।
◆ एक शख्स को शयातीन ने घेर लिया लेकिन ज़िकरुल्लाह कर ने की (करने की नेकी) ने उसे बचा लिया।
◆ एक शख्स को अज़ाब के फरिश्तों ने घेर लिया लेकिन उसे उसकी नमाज़ ने बचा लिया।

बाक़ी अगली पोस्ट में..أن شاء الله
*✍🏼आसान नेकियां, 5*

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मिट जाये गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*नमाज़ की सुन्नते* #02
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_क़याम की सुन्नते_*
     मर्द नाफ़ के निचे सीधे हाथ की हथेली उलटे हाथ की कलाई के जोड़ पर, छुनगलिया और अंगूठा कलाई के अगल बगल और बाक़ी उंगलिया हाथ की कलाई की पुश्त पर रखे

*औरत :*
उलटी हथेली सीने पर छाती के निचे रख कर उस के ऊपर सीधी हथेली रखिये।

◆ फिर सना
◆ फिर तअव्वुज़ यानी आऊज़ो और तस्मिया यानि बिस्मिल्लाह पढ़ना।
◆ इन तीनो को एक दूसरे के फौरन बाद कहना।
◆ इन सब को आहिस्ता पढ़ना। आमीन कहना, इसे भी आहिस्ता कहना।
◆ तकबीरे ऊला के फौरन बाद सना पढ़ना (नमाज़ में तअव्वुज़ व तस्मिया किराअत के ताबे है और मुक्तदि पर किराअत नहीं लिहाज़ा तअव्वुज़ व तस्मिया भी मुक्तदि के लिये सुन्नत नहीं। हा जिस मुक्तदि की रकअत फौत हो गई हो वो अपनी बाक़ी रकअत अदा करते वक़्त दोनों को पढ़े।
◆ तअव्वुज़ सिर्फ पहली रकअत में है और तस्मिया हर रकअत के शुरू में सुन्नत है।
*✍🏼नमाज़ के अहकाम, सफा 174*

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*लिबास पहनने की सुन्नते और आदाब* #01
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     अल्लाह का ये एहसाने अज़ीम है की उस ने हमे लिबास की दौलत अता की। लिबास से हम सर्दी गर्मी के असरात से अपनी हिफाज़त कर सकते है, ये लिबास हमारी ज़ीनत का सबब भी है और सबबे वक़ार भी है। हर क़ौम का जुदा जुदा लिबास होता है, मगर मुसलमान का लिबास सब से मुमताज़ है।

★ *सफेद लिबास हर लिबास से बेहतर है और सरकारे मदीना صلى الله عليه وسلم ने इस को पसन्द फ़रमाया है।* हज़रते समुरह رضي الله عنه से मरवी है की हुज़ूर صلى الله عليه وسلم ने फ़रमाया : सफेद लिबास पहनो क्यू की ये ज़यदा साफ़ और पाकीज़ा है और अपने मुर्दो को भी इसी में कफनाओ।

★ *जब कपड़ा पहनने लगे तो ये दुआ पढ़े, अगले पिछले गुनाह मुआफ़ हो जाएंगे*
اٙلْحٙمْدُلِلّٰهِ الّٙذِىْ كٙسٙانِىْ هٰذٙا وٙرٙزٙقٙنِـيْـهِ مِنْ غٙيْرِ حٙوْلٍ مِّنِّىْ وٙلٙا قُوّٙةٙ
तर्जमा : अल्लाह का शुक्र है जिस ने मुझे ये पहनाया और बगैर मेरी क़ुव्वत व ताक़त के मुझे ये अता किया।

बाक़ी अगली पोस्ट में..أن شاء الله
*✍🏼सुन्नते और आदाब, 102*

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Friday, 7 July 2017

*बरोज़े क़यामत नेकी खुशखबरिया सुनाएगी*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     क़यामत के दिन नेकियां करने वाले शादा व फरहा जब की बुराइयों के आदी हैरान व परेशान होंगे, रसूले अकरम صلى الله عليه وسلم ने इर्शाद फ़रमाया : बरोज़े क़यामत नेकी और बदी को लोगो के सामने खड़ा किया जाएगा। नेकी अपने करने वालो को बिशारते देगी और उन से भलाई का वादा करेगी जब की बुराई कहेगी : मुझ से दूर हो जाओ, मगर वो इस की ताक़त नही रखेगे बल्कि बुराई के साथ चिमटेंगे।
     *गुनाहो ने मेरी करम तोड़ डाली*
          *मेरा हशर में होगा क्या या इलाही*
     *इबादत में गुज़रे मेरी ज़िंदगानी*
          *करम हो करम या खुदा या इलाही*

*_शेर दहाड़ते वक़्त क्या कहता है ?_*
     हज़रते अबू हुरैरा से रिवायत है की हुज़ूर صلى الله عليه وسلم ने इर्शाद फ़रमाया : तुम्हे मालुम है शेर दहाड़ते वक़्त क्या कहता है ? सहाबए किराम ने अर्ज़ की, अल्लाह और उस का रसूल बेहतर जानते है। इर्शाद फ़रमाया : शेर कहता है, ऐ अल्लाह मुझे किसी नेक शख्स पर मुसल्लत न फरमाना।
*✍🏼आसान नेकियां, 3*

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*नमाज़ की सुन्नते* #01
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_तकबीरे तहरिमा की सुन्नते_*

★ तकबीरे तहरिमा के लिये हाथ उठाना।
★ हाथो की उनगलिया अपने हाल पर (normal) छोड़ना, यानि बिलकुल मिलाइये न इन में तनाव पौदा कीजिये।
★ हथेलियो और उंगलियो का पेट किब्ला रु होना।

★ तकबीर के वक़्त सर न झुकाना।
★ तकबीर शुरू करने से पहले ही दोनों हाथ कानो तक उठा लेना।
★ तकबीरे क़ुनूत और तकबीरे इदैन में भी येही सुन्नते है।

★ इमाम का बुलंद आवाज़ से "अल्लाहु अक्बर" "समीअल्लाहु-लीमन-हामिदह" और सलाम कहना (हाजत से ज्यादा बुलंद आवाज़ करना मकरूह है)

★ तकबीर के फौरन बाद हाथ बांध लेना सुन्नत है (बाज़ लोग तकबीरे ऊला के बाद हाथ लटका देते है या खोनिया पीछे की तरफ झुलाने के बाद हाथ बांधते है उन का ये फ़ैल सुन्नत से हट कर है)
*✍🏼दुर्रे मुख्तार, जी.2 स.208, 229*
*✍🏼नमाज़ के अहकाम, सफा 173-174*

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*बैठने की सुन्नते और आदाब* #02
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

★ बुज़ुर्गो की निशस्त पर बैठना अदब के खिलाफ है। हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान عليه رحما लिखते है : पीर व उस्ताज़ की निशस्त पर उन की गैर मोजुदगी में भी न बेठे।

★ कोशिश करे की उठते बैठते वक़्त बुज़ुर्गाने दिन की तरफ पीठ न होने पाए और पाउ तो उन की तरफ न ही करे।

★ जब कभी इज्तिमाअ या मजलिस में आए तो लोगो को फलांग कर आगे न जाए जहां जगह मिले वही बैठ जाए।

★ मजलिस से फारिग हो कर ये दुआ 3 बार पढ़ ले तो गुनाह मुआफ़ हो जाएंगे। और इस्लामी भाई मजलिसे खैर व मजलिसे ज़िक्र में पढ़े तो उस के लिये उस खैर पर मोहर लगा दी जाएगी।
سُبْحٙانٙكٙ اللّٰهُمّٙ وٙبِحٙمْدِكٙ لٙا اِلٰه اِلّٙا اٙنْتٙ اٙسْتٙغْفِرُكٙ وٙاٙتُوْبُ اِلٙيْكٙ
तर्जमा : तेरी ज़ात पाक है और ऐ अल्लाह ! तेरे ही लिये तमाम खुबिया है, तेरे सुवा कोई माबूद नही, तुझ से बख्शीश चाहता हु और तेरी तरफ तौबा करता हु।

★ जब कोई आलिमे बा अमल या मुत्तक़ी शख्स या सय्यिद सहाब या वालिदैन आए तो ताज़िमन खड़े हो जाना षवाब है। मुफ़्ती अहमद यार खान عليه رحما लिझते है : बुज़ुर्गो की आमद पर ये दोनों काम यानी ताज़िमी क़याम और इस्तिक़बाल जाइज़ बल्कि सुन्नते सहाबा है बल्कि हुज़ूर की सुन्नते कौली है।

ऐ हमारे प्यारे अल्लाह ! हमे उठने बैठने की सुन्नतो और आदाब पर अमल पैरा होने की तौफिके रफ़ीक़ मर्हमत फरमा।
اٰمِيْن بِـجٙـاهِ النّٙـبِـىِّ الْاٙ مِيْن
*✍🏼सुन्नते और आदाब, 101*

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*दुरुद शरीफ काम आ गया*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
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     क़यामत के दिन किसी मुसलमान की नेकियां तराज़ू में हल्की हो जाएगी तो हुज़ूर صلى الله عليه وسلم एक पर्चा अपने पास से निकाल कर नेकियों के पलड़े में रख देंगे तो इस से नेकियो का पलड़ा बजनी हो जाएगा। वो अर्ज़ करेगा : मेरे माँ बाप आप पर क़ुर्बान, आप कौन है ? हुज़ूर صلى الله عليه وسلم फरमाएंगे : में तेरा नबी मुहम्मद हु और ये तेरा दुरुदे पाक है जो तू ने मुझ पर पढ़ा था।

*आसान नेकियां, 1*

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Thursday, 6 July 2017

*सिर्फ एक नेकी चाहिये*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     हज़रते इकराम رضي الله عنه से मरवी है, क़यामत के दिन एक शख्स अपने बाप के पास आ कर कहेगा : अब्बू जान !
क्या में आप का फरमा बरदार न था ?
क्या में आप से महब्बत भरा सलूक न करता था ?
क्या में आप के साथ भलाई न करता था ?
आप देख रहे है की में किस मुसीबत में गिरफ्तार हु ! मुझे अपनी नेकियों में से सिर्फ एक नेकी अता कर दीजिये या मेरे गुनाह का बोझ उठा लीजिये।

     बाप कहेगा : मेरे बेटे ! तूने मुझ से जो चीज़ मांगी वो आसान तो है लेकिन में भी उसी चीज़ से डरता हु जिस से तुम डर रहे हो।
     इसके बाद बाप भी बेटे को अपने ऐहसानात याद दिला कर येही मुतालबा करेगा तो बेटा जवाब देगा : आप ने बहुत थोड़ी चीज़ का सुवाल किया है लेकिन मुझे भी उसी बात का खौफ है जिस का आप को डर है।
*✍🏼आसान नेकियां, 1*

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*नमाज़ के वाजिबात* #06
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

★ हर फ़र्ज़ व वाजिब का उस की जगह होना।

★ रूकू हर रकअत में एक ही बार करना।

★ सज्दा हर रकअत में दो बार करना।

★ दूसरी रकअत से पहले क़ादह न करना।

★ 4 रकअत वाली नमाज़ में तीसरी रकअत पर क़ादह न करना।

★ आयते सज्दा पढ़ी हो तो सज्दए तिलावत करना।

★ सज्दए सहव वाजिब हुवा हो तो सज्दए सहव करना।

★ दो फर्ज़ो  या दो वाजिब या फ़र्ज़ व वाजिब के दरमियान तिन तस्बीह की क़दर (यानि तिन बार सुब्हान अल्लाह कहने के मिक़दार) वक़्फ़ा न होना।

★ इमाम जब किराअत करे ख्वाह बुलंद आवाज़ से हो या आहिस्ता आवाज़ से, मुक्तदि का चुप रहना।

★ किराअत के सिवा तमाम वाजिबात में इमाम की पैरवी करना।
*✍🏼नमाज़ के अहकाम, सफा 173*

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*बैठने की सुन्नते और आदाब* #01
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     हमारा उठना बैठना भी सुन्नत के मुताबिक़ होना चाहिये। हुज़ूर صلى الله عليه وسلم अक्सर किबला शरीफ की तरफ रुए अनवर कर के बैठा करते थे। ज़हे नसीब हम भी कभी कभी किबला रु हो कर बैठे तो कभी मदीना की तरफ मुह कर के बैठे।

★ सुरीन ज़मीन पर रखे और दोनों घुटनो को खड़ा करके दोनों हाथो से घेर ले और एक हाथ से दूसरे को पकड़ ले, इस तरह बेठना सुन्नत है (लेकिन इस दौरान घुटनो पर कोई चादर वगैरा ओढ़ लेना बेहतर है।

★ चार जानू (यानि पालती मार कर) बेठना भी नबिय्ये करीम صلى الله عليه وسلم से साबित है।

★ जहां कुछ धूप और कुछ छाव हो वहा न बेठे। हज़रते अबू हुरैरा رضي الله عنه से रिवायत है की हुज़ूर صلى الله عليه وسلم ने फ़रमाया : जब तुम में से कोई साए में हो और उस पर से साया रुखसत हो जाए और वो कुछ धुप कुछ छाऊ में रह जाए तो उसे चाहिये की वहा से उठ जाए।

बाक़ी अगली पोस्ट में..أن شاء الله
*✍🏼सुन्नते और आदाब, 99*

*तमाम मोमिनो के इसले षवाब के लिये*
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*बन्दों के हुक़ूक़* #16
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
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*_बन्दों के हुक़ूक़ अदा करने के तरीके_* #02
★ *एहसासे जिम्मेदारी पैदा कीजिये :* अपने अंदर एहसासे जिम्मेदारी पैदा कीजिये और बन्दों के हुक़ूक़ को भी अपनी ज़िम्मेदारी समझिये, बन्दों के हुक़ूक़ अदा करना भी हर मुसलमान की ज़िम्मेदारी ही है। हमारे अस्लाफ भी इसे अपनी ज़िम्मेदारी समझते और इसी सोच में कुढ़ते रहते। हज़रते उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ رحمة الله عليه की ज़ौजा का बयान है की जब उन्हें मर्तबए खिलाफत फाइज़ किया गया तो घर आ कर मुसल्ले पर बैठ कर रोने लगे, यहाँ तक की दाढ़ी आसुओ से तर हो गई, मेरे पूछने पर इर्शाद फ़रमाया : मेरी गर्दन पर उम्मते सरकार का बोझ डाल दिया गया है, जब में भूके, फ़क़ीरों, मरीज़ों, मुसाफिरों, बुढो, बच्चों अल ग़रज़ ! तमाम दुन्या के मुसीबत ज़दो की खबर गिरी के मुतअल्लिक़ सोचता हु तो डरता हु की कहि इन के मुतअल्लिक़ अल्लाह बाज़ पूर्स न फरमाए और मुझ से जवाब न बन पड़े, बस इस भारी ज़िम्मेदारी का एहसास और इसी की फ़िक्र मुझे रुला रही है।

★ *नेकियों पर हरिस बन जाइये :* बन्दों के हुक़ूक़ की अदाएगी अपनाने का एक तरीक़ा ये भी है की मालो दौलत की हिर्स को छोड़ कर नेकियों पर खुद को हरिस बनाने की कोशिश की जाए, हमे नही मालुम की हमारी कौन सी नेकी अल्लाह की दाइमी रिज़ा का सबब बन जाए, इस लिये छोटी से छोटी नेकी भी न छोड़ी जाए। लोगो से अच्छा सुलूक करने के फ़ज़ाइल पढ़े जाए और षवाब की निय्यत से बन्दों के हुक़ूक़ की अदाएगी पर कमर बस्ता रहा जाए। फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : लोगो से अच्छा सुलूक करना सदक़ा है।

★ *खौफे खुदा का जाम पीजिये ! :* बन्दों के हुक़ूक़ की अदाएगी के साथ साथ दीगर अच्छे औसाफ को अपनाने और बुरी आदतो से पीछा छुड़ाने का एक अहम ज़रीआ खौफे खुदा भी है। हज़रते अबुल हसन ज़रीर رحمة الله عليه फ़रमाते है : किसी शख्स की सआदत मन्दी की अलामत ये है की उसे बद बख्ती का खौफ लाहिक़ रहे, क्यू की खौफे खुदा और बन्दे के दरमियान लगाम है, जब किसी बन्दे की लगाम टूट जाए तो वो हलाक होने वालो के साथ हलाकत का शिकार हो जाता है। लिहाज़ा इस नेमते उज़्मा के हुसूल की कोशिश की जाए, أن شاء الله इस की बरकत से बन्दों के हुक़ूक़ की अदाएगी के साथ साथ दीगर नेक काम भी हमारी ज़िन्दगी का हिस्सा बन जाएंगे।
*✍🏼बन्दों के हुक़ूक़, 23*

मुकम्मल

*तमाम मोमिनो के इसले षवाब के लिये*
*___________________________________*
मिट जाये गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
*___________________________________*
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Wednesday, 5 July 2017

*नमाज़ के वाजिबात* #05
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

★ दोनों तरफ सलाम फेरते वक़्त लफ्ज़ "अस्सलामु" दोनों बार वाजिब है। लफ्ज़ "अलैकुम" वाजिब नहीं बल्कि सुन्नत है।

★ वित्र् में तकबीरे क़ुनूत कहना।
★ वित्र् में दुआए क़ुनूत पढ़ना।

★ इदैन की 6 तकबीरे।
★ इदैन में दूसरी रकअत की तकबीरे रूकू और इस तकबीर के लिए लफ़्ज़े "अल्लाहु अक्बर" होना।

★ जहरी नमाज़ मसलन मगरिब व ईशा की पहली और दूसरी रकअत और फ़ज्र, जुमुआ, इदैन, तरावीह और रमज़ान के वित्र् की हर रकअत में इमाम को जहर (यानि इतनी बुलंद आवाज़ की दूसरे लोग यानि वो कि सफे अव्वल में है सुन सके) से किराअत करना।

★ गैर जहरी (मसलन जोहर व असर) में आहिस्ता किराअत करना।

बाक़ी अगली पोस्ट में..ان شاء الله
*✍🏼नमाज़ के अहकाम, सफा  172-173*

*तमाम मोमिनो के इसले षवाब के लिये*
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मिट जाये गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*चलने की सुन्नते और आदाब*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     हुज़ूर صلى الله عليه وسلم की हयाते तय्यिबा ज़िन्दगी के हर शोबे में हमारी रहनुमाई करती है। मुसलमान की चाल भी इम्तियाज़ी होनी चाहिये। गरीबान खोल कर, गले में ज़न्जीर सजाए, सीना तान कर, क़दम पछाड़ते हुए चलना अहमक़ो और और मगरुरो की चाल है। मुसलमानो को दर्मियाना और पुर वक़ार तरीके पर चलना चाहिये।

★ अगर कोई रुकावट न हो तो दरमियानी रफ़्तार से रस्ते के कनारे कनारे चले, न इतना तेज़ की लोगो की निगाहें आप पर जम जाए और न इतना आहिस्ता की आप बीमार महसूस हो।

★ लफंगों की तरह गरीबान खोल कर अकड़ते हुए हरगिज़ न चले की ये अहमक़ो और मगरुरो की चाल है बल्कि नीची नज़रे किये पुर वक़ार तरीके पर चले। हज़रते अनस رضي الله عنه से मरवी है की जब हुज़ूर صلى الله عليه وسلم चलते तो झुके हुए मालुम होते थे।

★ राह चलने में परेशान नज़री से बचे और सड़क उबूर करते वक़्त गाडियो वाली सम्त देख कर सड़क उबूर करे। अगर गाडी आ रही हो तो बे तहाशा भाग न पड़े बल्कि रुक जाए की इस में हिफाज़त का ज़्यादा इम्कान है।

     ऐ हमारे अल्लाह ! हमे प्यारे हबीब صلى الله عليه وسلم की सुन्नत के मुताबिक़ दर्मियाना, तकब्बुर से बिलकुल पाक चाल चलने की तौफ़ीक़ अता फरमा। और हमे रास्ते के एक तरफ इधर उधर ताके झांके बगैर, सर झुका कर शरीफाना चाल चलने की तौफ़ीक़ मर्हमत फरमा।
اٰمِيْن بِـجٙـاهِ النّٙـبِـىِّ الْاٙ مِيْن
*✍🏼सुन्नते और आदाब, 97*

*तमाम मोमिनो के इसले षवाब के लिये*
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मिट जाये गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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Tuesday, 4 July 2017

*बन्दों के हुक़ूक़* #15
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_बन्दों के हुक़ूक़ अदा करने के तरीके_* #01
     जो चीज़ जिस क़दर अहम हो, उस के हुसूल के लिये भी उतनी ही कोशिश की जाती है, अगर मुसलमान, बन्दों के हुक़ूक़ की अदाएगी करे, तो इस से दुन्या व आख़िरत सवर सकती है और इस की अदाएगी में कोताही से काम लिया तो दुन्या व आख़िरत दोनों ही बर्बाद हो सकती है। लिहाज़ा किसी भी ज़ी शऊर शख्स से इस की अहमिय्यत ढकी छुपी नही। बन्दों के हुक़ूक़ का ख्याल रखने, बन्दों के हुक़ूक़ अदा करने की आदत किस तरह बनाई जाए ? आइये ! इस के चन्द तरीके भी देखते है :

★ *हुक़ूक़ का इल्म हासिल कीजिये :* सब से पहले बन्दों के हुक़ूक़ का इल्म हासिल करना होगा, किसी भी चीज़ की सहीह मालूमात के बगैर उस और अमल पैरा होना तक़रीबन न मुमकिन होता है।

★ *हमेशा मुरबत सोचिये :* किसी के बारे में मन्फ़ी सोच को दिलो दिमाग में जगह देने और उस के ना पसन्दीदा औसाफ याद करने के बजाए मुस्बत सोच क़ाइम कीजिये और उस के अच्छे औसाफ को याद रखिये।
     मन्कुल है की एक शख्स अपनी बीवी की शिकायत करने के लिये हज़रते उमर رضي الله عنه के पास पहुचा, दरवाज़े पर पहुच कर उस ने आप की ज़ौजा की बुलन्द आवाज़ से गुफ्तगू सुनी, वो ये कहते हुवे लौट गया की आप खुद इस मसअले का शिकार है, बाद में आप ने उसे बुलवा कर आने और फिर लौट जाने की वजह पूछी, उसने मुकम्मल वाक़ीआ अर्ज़ किया तो आप رضي الله عنه ने फ़रमाया : बीवी के चन्द हुक़ूक़ के सबब में उस से दर गुज़र करता हु। (1) वो मुझे जहन्नम से बचाने का ज़रीआ है, उस की वजह से मेरा दिल हराम की ख्वाहिश से बचा रहता है। (2) मेरी घर से गैर मौजूदगी में वो मेरे माल की हिफाज़त करती है। (3) मेरे कपड़े धोती है। (4) मेरे बच्चों की परवरिश करती है। (5) मेरे लिये खाना पकाती है। उस ने कहा ये औसाफ तो मेरी बीवी में भी मौजूद है, लिहाज़ा अब में भी उस से दर गुज़र किया करूँगा।

बाक़ी अगली पोस्ट में..أن شاء الله
*✍🏼बन्दों के हुक़ूक़, 23*

*तमाम मोमिनो के इसले षवाब के लिये*
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*नमाज़ के वाजिबात* #04
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
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★ फ़र्ज़ वित्र् और सुन्नते मुअक्कदा में अत्तहिय्यात के बाद कुछ न पढ़ना।

★ दोनों क़ादो में अत्तहिय्यत मुकम्मल पढ़ना। अगर एक लफ्ज़ भी छूटा तो वाजिब तर्क हो जाएगा और सज्दए सहव वाजिब होगा।

★ फ़र्ज़, वित्र् और सुन्नते मुअक्क़दा के क़ादए ऊला में अत्तहिय्यत के बाद अगर बे ख्याली में "अल्लाहुम्म सल्ले आला मुहम्मदीन या अल्लाहुम्म सल्ले आला सय्यिदिना" कह लिया तो सज्दए सहव वाजिब हो गया और अगर जानबुझ कर कहा तो नमाज़ लैंटाना वाजिब है।

बाक़ी अगली पोस्ट में..ان شاء الله
*✍🏼नमाज़ के अहकाम, सफा 172*

*तमाम मोमिनो के इसले षवाब के लिये*
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*पानी पिने की सुन्नते और आदाब*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     पानी बैठ कर, उजाले में देख कर, सीधे हाथ से बिस्मिल्लाह पढ़ कर इस तरह पिये की हर मर्तबा ग्लास को मुह से हटा कर साँस ले, पहली और दूसरी बार एक एक घूंट पिये और तीसरी साँस में जितना चाहे पिये।
     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : पानी ऊंट की तरह एक ही घूंट में न पी जाया करो बल्कि दो या तिन बार पिया करो और जब पिने लगो तो बिस्मिल्लाह पढ़ा करो और जब पि चूको तो अल्हम्दु लिल्लाह कहा करो।
*✍🏼तिर्मिज़ी*

     हज़रते अनस رضي الله عنه से रिवायत है की हुज़ूर صلى الله عليه وسلم पिने में तीन बार साँस लेते थे और फ़रमाते थे : इस तरह पिने में ज़्यादा सैराबी होती है और सिह्हत के लिये मुफीद व खुश गवार है।
*✍🏼सहीह मुस्लिम*

      हज़रते इब्ने अब्बास رضي الله عنه से रिवायत है की हुज़ूर صلى الله عليه وسلم ने बर्तन में साँस लेने और फुंकने से मना फ़रमाया है।
*✍🏼अबू दाऊद*
*✍🏼सुन्नते और आदाब, 95*

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Monday, 3 July 2017

*बन्दों के हुक़ूक़* #14
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
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*_हुक़ुक़ुल इबादत की अदाएगी के फ़वाइद_*
     बन्दों के हुक़ूक़ की अदाएगी से दुन्या व आख़िरत में कसीर फ़वाइद हासिल होते है और इस को तर्क करना दुन्या व आख़िरत में बे शुमार नुक्सानात का सबब बन सकता है। इस की अदाएगी से इन्सान को ज़ेहनी व क़ल्बी सुकून मिलता और यू बन्दा बहुत सी बीमारियो से बच जाता है।

◆ बन्दों के हुक़ूक़ की अदाएगी से हर शख्स को उस का हक़ मिलना शुरू हो जाता है, जिस से मुआशरे में अम्न व सुकून आम होता और लड़ाई झगड़ो का खातिमा हो जाता है।
◆ लोगो के हुक़ूक़ अदा करने वाला शख्स उन के दरमियान इज़्ज़त, वक़ार और पसन्दीदगी की निगाह से देख जाता है।
◆ हुक़ूक़ की अदाएगी से आपस की महब्बतो को फ़रोग़ मिलता है, जिस से रिश्ते मज़बूत होते है।
◆ अदाएगीये हुक़ूक़ से बन्दों के हुक़ूक़ की पामाली पर मिलने वाले गुनाहो से बचत होती है।
◆ इस गुनाहो के सबब होने वाले अज़ाब से भी छुटकारा हासिल हो जाता है।
◆ बन्दों के हुक़ूक़ की अदाएगी का सब से बड़ा फायदा ये होता है की बन्दे को अल्लाह और उसके हबीब صلى الله عليه وسلم की रिज़ा हासिल होती है।
*✍🏼बन्दों के हुक़ूक़, 21*

*तमाम मोमिनो के इसले षवाब के लिये*
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*नमाज़ के वाजिबात* #03
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
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★ क़ादए ऊला वाजिब है अगर्चे नमाज़े नफ्ल हो।

★ (दर अस्ल दो नफ्ल का हर क़ादह "क़ादए आखिरह" है और फ़र्ज़ है, अगर क़ादह न किया और भूल कर खड़ा हो गया तो जब तक उस रकअत का सज्दा न कर ले लौट आए और सज्दए सहव करे)
*✍🏼बहारे शरीअत, ही.4 स.52*

★ अगर नफ्ल की तीसरी रकअत का सज्दा कर लिया तो चार पूरी कर के सज्दए सहव करे।

★ सज्दए सहव इस लिये वाजिब हुवा कि अगर्चे नफ्ल में हर दो रकअत के बाद क़ादह फ़र्ज़ है मगर तीसरी या पांचवी रकअत का सज्दा करने के बाद क़ादए ऊला फ़र्ज़ के बजाए वाजिब हो गया।

बाक़ी अगली पोस्ट में..ان شاء الله
*✍🏼नमाज़ के अहकाम, सफा 171-172*

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*खाने की सुन्नते और आदाब* #03
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
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★ *सीधे हाथ से खाए* हुज़ूर صلى الله عليه وسلم ने फ़रमाया जब तुम में से कोई खाना खाए तो सीधे हाथ से खाए और जब पिये तो सीधे हाथ से पिये की शैतान उलटे हाथ से खाता पीता है।

★ *अपने सामने से खाए* हुज़ूर صلى الله عليه وسلم ने फ़रमाया हर शख्स बर्तन की उसी जानिब से खाए जो उस के सामने हो।

★ *खाने में किसी किस्म का एब न लगाए* मसलन ये न कहे की मज़ेदार नही, कच्चा रह गया है, फीका रह गया है क्योंकि खाने में ऐब निकलना मकरूह व खिलाफे सुन्नत है बल्कि जी चाहे तो खाए वरना हाथ रोक ले।
     हज़रते अबू हुरैरा رضي الله عنه ने फ़रमाया की नूर के पैकर صلى الله عليه وسلم ने कभी किसी खाने को ऐब नही लगाया (यानी बुरा नही कहा) अगर ख्वाहिश होती तो खा लेते और ख्वाहिश न होती तो छोड़ देते।

*✍🏼सुन्नते और आदाब , 90*

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Sunday, 2 July 2017

*बन्दों के हुक़ूक़* #12
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_कमज़ोर और गरीबो से शफ़क़त_*
     गरीबो, नादरो और मिस्कीनों से भी हर मुसलमान को हुस्ने सुलूक से पेश आना चाहिये, उन की मुश्किल में मदद करने के साथ साथ मुमकिन हो तो मुस्तकिल उन के अखराजात भी उठाने चाहिये और हमेशा उन से शफ़क़त व प्यार का बर्ताव करना चाहिये।
     मन्कुल है की हमारे आक़ा صلى الله عليه وسلم ये दुआ माँगा करते : "ऐ अल्लाह ! मुझे मिस्कीन ज़िन्दा रख और मिस्कीनि की हालात में मौत अता फरमा और बरोज़े क़यामत मुझे मिस्कीनों के ज़ुमरे में उठा।"

*_छोटे बहन भाइयो से शफ़क़त_*
     इसी तरह बड़े बहन भाइयो को छोटो के हुक़ूक़ अदा करते हुवे, उन पर शफ़क़त करनी चाहिये। वालिदैन की वफ़ात के बाद छोटे बहन भाइयो की परवरिश करना, उन की मुश्किल घड़ी में उन का साथ देना और जितना हो सके उन की हाजत रवाई व दिल दारी करना, वालिदैन की हयात में भी उन से शफ़क़त व महब्बत से पेश आना, गीबत, चुगली, बद गुमानी और हसद आम मुसलमान से हराम है, तो उन से ब दर्जए औला नाजाइज़ है, ब तक़ाज़ाए बशरीययत उन से सरज़द होने वाली खताओं को मुआफ़ करना और हमेशा उन से नरमी का बर्ताव करना।
*✍🏼बन्दों के हुक़ूक़, 20*

*तमाम मोमिनो के इसले षवाब के लिये*
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*नमाज़ के वाजिबात* #02
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
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★ एक सज्दे के बाद बित्तरतिब दूसरा सज्दा करना।

★तादिले अरकान यानि रूकू, सुजूद, क़ौमा और जल्सा में कम अज़ कम एक बार "सुब्हान अल्लाह" कहने की मिक़दार ठहरना।

★ क़ौमा यानि रूकू से सीधे खड़े होना (बाज़ लोग कमर सीधी नहीं करते इस तरह उन का वाजिब छूट जाता है)

★ जल्सा यानि दो सजदों के दरमियान सीधा बैठना (बाज़ लोग जल्द बाज़ी की वजह से बराबर सीधे बैठने से पहले ही दूसरे सज्दे में चले जाते है इस तरह उन का वाजिब तर्क हो जाता है चाहे कितनी ही जल्दी हो सीधा बैठना लाज़िमी है वरना नमाज़ मकरुहे तहरीमि वाजीबुल इआदा होगी) यानि नमाज़ फिर से पढ़नी होगी।

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*✍🏼नमाज़ के अहकाम, सफा 171*

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*खाने की सुन्नते और आदाब* #02
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★ फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم: खाना खाने बेठो तो जूते उतार लो, इस में तुम्हारे लिये राहत है।

★ खाने से पहले बिस्मिल्लाह पढ़ ले... फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : जिस खाने पर बिस्मिल्लाह न पढ़ी जाए उस खाने को शैतान अपने लिये हलाल समझता है।

★ जब तुम में से कोई खाना खाए तो उस3 चाहिये की पहले बिस्मिल्लाह पढ़े। अगर शुरू में बिस्मिल्लाह पढ़ना भूल जाए तो ये कहे بِسْمِ اللّٰهِ اٙوّٙلٙهُ وٙاٰخِرٙهُ.

★ खाने से पहले ये दुआ पढ़ ली जाए तो अगर खाने में जहर भी होगा तो أن شاء الله असर नही करेगा,
بِسْمِ اللّٰهِ الّٙذِىْ لٙاٙيٙضُرُّ مٙعٙ اسْمِهِ شٙىْءٌ فِى الْاٙرْضِ وٙلٙاٙفِى السّٙمٙآءِ يٙاحٙيُّ يٙاقٙيُّوْمُ
"अल्लाह के नाम से शुरू करता हु जिस के नाम की बरकत से ज़मीन व आसमान की कोई चीज़ नुक़्सान नही पहुचा सकती। ऐ हमेशा से ज़िन्दा व क़ाइम रहने वाले।

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Saturday, 1 July 2017

*बन्दों के हुक़ूक़* #11
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_मुलाज़िमीन से शफ़क़त_*
     अपने रिश्तेदारो से सीलए रहमी करने के साथ साथ दीगर मुसलमानो के हुक़ूक़ का भी ख़ास ख्याल रखिये, ख़ास तौर पर अपने मुलाज़िमीन के हुक़ूक़ की अदाएगी में हरगिज़ कोताही नही करनी चाहिये, उमुमन बाज़ लोग छोटी गलतियों पर अपने मुलाज़ीमीन को ज़लील करते, गालिया देते और बाज़ नादान तो मार पीट पर उतर आते है, ऐसे अफ़राद इस अहादिश से इबरत हासिल करे।
     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : खादिमो से बुरा सुलूक करने वाला जन्नत में दाखिल न होगा।
*✍🏼مسند احمد*
*✍🏼مسند أبى بكر صديق*

     मलाज़िमीन से हमेशा शफ़क़त से पेश आइये और जितना हो सके उन की खताओं को दर गुज़र कीजिये की जो दुसरो पर रहम करता है, अल्लाह भी उस पर रहम फ़रमाता है, नीज़ उन के हुक़ूक़ का ख़ास ख्याल रखते हुवे हुस्ने सुलूक से पेश आना, उन्हें हक़ीर न जानना, तेज़ मिज़ाजी और गाली गलोच से बाज़ रहना, मुक़र्ररा वक़्त पर उन को उज्रत देना, उज्रत में बिला इजाज़ते शरई कमी न करना, बिमारी में उन को उज्रत देना, मुमकिन हो तो इलाज़ पर अख़लाक़ी तौर पर ज़रूरी है।
*✍🏼बन्दों के हुक़ूक़, 17*

*तमाम मोमिनो के इसले षवाब के लिये*
*___________________________________*
मिट जाये गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
*___________________________________*
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*नमाज़ के वाजिबात* #01
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

★ तकबीरे तहरिमा में लफ्ज़ "अल्लाहु अक्बर" कहना।

★ फर्ज़ो की तीसरी और चौथी रकअत के इलावा बाक़ी तमाम नमाज़ों की हर रकअत में अलहम्द शरीफ पढना, सूरत मिलाना या क़ुरआने पाक की एक बड़ी आयत जो छोटी तिन आयतो के बराबर हो या तिन छोटी आयते पढ़ना।

★ अलहम्द शरीफ का सूरत से पहले पढ़ना।

★ अलहम्द शरीफ और सूरत के दरमियान "आमीन" और बिस्मिलाह के इलावा कुछ और न पढ़ना।

★ किराअत के फौरन बाद रूकू करना।

बाक़ी अगली पोस्ट में..ان شاء الله
*✍🏼नमाज़ के अहकाम, सफा 171*

*तमाम मोमिनो के इसले षवाब के लिये*
*___________________________________*
मिट जाये गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*खाने की सुन्नते और आदाब* #01
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اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_हर खाने से पहले अपने हाथ पहुचो तक धो ले_*
     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : जो ये पसन्द करे की अल्लाह उस के घर में बरकत ज़्यादा करे तो उसे चाहिये की जब खाना हाज़िर किया जाए तो वुज़ू करे और जब उठाया जाए तब भी वुज़ू करे।
*✍🏼सुनने इब्ने माजह*

     मुफ़्ती अहमद यार खान नईमी عليه رحما लिखते है : खाने के वुज़ू के माना है हाथ व मुह की सफाई करना की हाथ धोना और कुल्ली कर लेना।
*✍🏼मीरआतुल मनाजिह्, 6/32*

     जब भी खाना खाए तो उल्टा पाउ बिछा दे और सीधा खड़ा रखे या सुरीन पर बैठ जाए और दोनों घुटने खड़े रखे।
*✍🏼बहारे शरीअत, 16/19*
*✍🏼सुन्नते और आदाब, 89*

*तमाम मोमिनो के इसले षवाब के लिये*
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मिट जाये गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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