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Sunday, 1 October 2017

*मुसाफिर की नमाज़* #04
ﺑِﺴْـــــــﻢِﷲِﺍﻟﺮَّﺣْﻤَﻦِﺍلرَّﺣِﻴﻢ
الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ

*_सफर के दो रस्ते_*
     किसी जगह जाने के दो रस्ते है एक से मसाफ़ते सफर है दूसरे से नही (यानी नजदीक वाले रस्ते से जाए तो 90 k.m और दूर वाले रस्ते से 92k.m है) तो जिस रस्ते से ये जाएगा उस का ऐतिबार है, नज़दीक वाले रस्ते से गया तो मुसाफिर नही और दूर वाले से गया तो है अगर्चे इस रस्ते के इख़्तियार करने में इस की कोई गरजे सहीह न हो।
*✍🏽आलमगिरी 1/138*
*✍🏽दुर्रेमुखतर मअ रद्दलमोहतर 2/603*

*_मुसाफिर कब तक मुसाफिर है_*
     मुसाफिर उस वक़्त तक मुसाफिर है जब तक अपनी बस्ती में पहुच न जाए या आबादी में पुरे 15 दिन ठहर ने की निय्यत न करले, ये उस वक़्त है जब पुरे 92 k.m चल चूका हो अगर 92 k.m पहले वापसी का इरादा कर लिया तो मुसाफिर न रहा अगर्चे जंगल में हो।
*✍🏽दुर्रेमुखतार मअ रद्दलमोहतर 2/605*
*✍🏽नमाज़ के अहकाम 226*

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*​DEEN-E-NABI ﷺ*
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*83 आसान नेकियां* #47
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*मरीज़ की इयादत करना* #01
     बीमार की इयादत करना भी बड़े अज़्रो षवाब का काम है, हुज़ूर صلى الله عليه وسلم ने फ़रमाया : जिस ने मरीज़ की इयादत की अल्लाह उस पर 75 हज़ार मलाइका के ज़रीए साया फ़रमाएगा और घर वापसी आने तक उस के हर क़दम उठाने पर उस के लिये एक नेकी लिखी जाएगी और उस के हर क़दम रखने पर उस का एक गुनाह मिटा दिया जाएगा और एक दर्जा बुलन्द किया जाएगा, जब वो मरीज़ के साथ बैठेगा तो रहमत उसे ढांप लेगी और अपने घर वापस आने तक रहमत उसे ढाँपे रहेगी।
*✍🏼الترغيب والترهيب*

*_फ़रिश्ते इयादत करेंगे_*
     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : हज़रते मूसा عليه السلام ने अल्लाह से अर्ज़ की, कि मरीज़ की इयादत करने वाले को क्या अज्र मिलेगा ? अल्लाह ने इर्शाद फ़रमाया : उस के लिये दो फ़रिश्ते मुक़र्रर किये जाएंगे जो क़यामत तक उस की क़ब्र में रोज़ाना उस की इयादत करेंगे।
*✍🏼شرح الصرور*
बाक़ी अगली पोस्ट में..ان شاء الله
*✍🏼आसान नेकियां, 130*

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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Saturday, 30 September 2017

*DEEN-E-NABI ﷺ*

*ग्रुप के रूल्स ये है की मेम्बर ग्रुप में पोस्ट नही करेगा। और ना ही सलाम करेगा। रूल्स फॉलो न करने पर रिमूव किया जाएगा।*
     नॉट : सलाम न करने की वजह ये है की जवाब में 10-15 मेसेज आ आते है। हाला की मसअला ये है की कोसो एक के जवाब से सब बरीउ जिम्मे हो जाते है।

*अगर कोई मसअला है या पोस्ट पे कुछ ऐतराज़ है तो ऐडमिन को पर्सनल में मेसेज करे।*

गर ये रूल्स पर अमल कर सकते है तो इस लिन्क के जरये से ऐड हो जाईये।

https://chat.whatsapp.com/HM1TdumUSwsKIGax5EZrqQ
*गुनाहे कबीरा नंबर 12* #01
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_ज़िना करना_*
     अल्लाह ज़िना की मज़म्मत करते हुवे इर्शाद फ़रमाता है :
_और बदकारी के पास न जाओ बेशक वो बे हयाई है और बहुत ही बुरी राह।_
*✍🏼بنى إسرائيل ٣٢*

_और वो जो अल्लाह के साथ किसी दूसरे मअबूद को नही पूजते और उस जान को जिस की अल्लाह ने हुरमत रखी नाहक़ नही मारते और बदकारी नही करते और जो ये काम करे वो सज़ा पाएगा।_
*✍🏼الفرقان ٦٨*

_जो औरत बदकार हो और जो मर्द तो उन में हर एक को सौ कोड़े लगाओ और तुम्हें उन पर तरस न आए अल्लाह के दीन में।_
*✍🏼النور ٢*

_बदकार मर्द निकाह न करे मगर बदकार औरत या शिर्क वाली से और बदकार औरत से निकाह न करे मगर बदकार मर्द या मुशरिक और ये काम ईमान वालों पर हराम है।_
*✍🏼النور ٣*

बाक़ी अगली पोस्ट में..أن شاء الله
*✍🏼76 कबीरा गुनाह* 55

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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Friday, 29 September 2017

*डेली दुआ*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

इस किताब में सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक की ان شاء الله सभी दुआए है। pdf इस वजह से बनाई है की ये हमेशा आप के पास रहे ताकि आप हर काम करते वक़्त उस दुआ को पढ़ सके। इसे खुद भी रखे और दुसरो तक भी पोहचाए।
किताब निचे दी हुई लिंक से डाऊनलोड करे।
*दुआए खैर का तालिब*
جزاك الله

https://drive.google.com/file/d/0BxNzOp0x1IN_WmFvU295ZUlsUVk/view?usp=drivesdk
*📮षवाब की निय्यत से शेर करे*
*___________________________________*
मिट जाये गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
*___________________________________*
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*मुसाफिर की नमाज़* #02
بسم الله الرحمن الرحيم
الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ

_*शरई सफर की मसाफत*_
शरअन मुसाफिर वो शख्स है जो साठे 57 मिल (तकरीबन 92 किलो मीटर) के फासिल तक जाने के इरादे से अपने मक़ामे इक़ामत मसलन शहर या गाउ से बाहर हो गया।
*✍🏼फतावा रज़विय्या 8/270*

*_मुसाफिर कब होगा_*
महज़ निययते सफर से मुसाफिर न होगा बल्कि मुसाफिर का हुक्म उस वक़्त है कि बस्ती की आबादी से बाहर हो जाए शहर में है तो शहर से, गाउ है तो गाउ से, और शहर वालो के लिये ये भी ज़रूरी है की शहर के आस पास जो आबादी शहर से मुत्तसिल है उससे भी बाहर आ जाए।
*✍🏼दुर्रेमुखतार, रद्दलमोहतार 2/599*

*_आबादी खत्म होने का मतलब_*
आबादी से बाहर होने से मुराद ये है कि जिधर जा रहा है उस तरफ आबादी खत्म हो जाए अगर्चे उसकी बराबर दूसरी तरफ खत्म न हुई हो
*✍🏼गुन्यातल मुस्तमली 536*
*✍🏼नमाज़ के अहकाम 224*

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
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*83 आसान नेकियां* #46
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_जानवरों पर रहम खाना_*
     इस्लाम इतना प्यारा मज़हब है कि इस में इन्सान तो इन्सान जानवरों के भी हुक़ूक़ मौजूद है, चुनान्चे, जो जानवर सांप, बिच्छु वगैरा की तरह मुज़ी (अज़िय्यात पहुचाने वाले) न हो उन को बिला वजह तकलीफ पहुचाना मना है, यहाँ तक की जिन जानवरों को खाने के लिये ज़बह किया जाता है उन्हें भी ऐसे तरीके से ज़बह करने की ताकीद है जिस में उन्हें कम से कम तकलीफ हो, चुनान्चे मदनी आक़ा صلى الله عليه وسلم ने हुक्म दिया कि जब तुम ज़बह करो तो अहसन (खूब उम्दा) तरीके से ज़बह करो और तुम अपनी छुरी को अच्छी तरह तेज़ कर लिया करो और ज़बीहा को आराम दिया करो।
*✍🏼صحيح مسلم*

     ब वक़्ते ज़बह रिज़ाए इलाही की निय्यत से जानवर पर रहम खाना कारे षवाब है जैसा कि एक सहाबी ने बारगाहे रिसालत में अर्ज़ की या रसूलुल्लाह صلى الله عليه وسلم मुझे बकरी ज़बह करने पर रहम आता है। फ़रमाया : अगर उस पर रहम करोगे तो अल्लाह भी तुम पर रहम फ़रमाएगा।
*✍🏼مسند أمام احمد بن حنبل*
*✍🏼आसान नेकियां, 125*

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Thursday, 28 September 2017

*गुनाहे कबीरा नंबर 11*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_मैदाने जिहाद से भाग जाना_*
     अल्लाह इर्शाद फ़रमाता है : _और जो उस दिन उन्हें पीठ देगा मगर लड़ाई का हुनर करने या अपनी जमाअत में जा मिलने को तो वो अल्लाह के गज़ब में पलटा और उस का ठिकाना दोज़ख है और क्या बुरी जगह है पलटने की।_
*✍🏼الأنفال ١٦*

     हुज़ूर صلى الله عليه وسلم ने इर्शाद फ़रमाया : सात हलाक करने वाले गुनाहों से बचो। इन में से आप ने एक मैदाने जिहाद से भाग जाने को भी ज़िक्र किया।

*✍🏼76 कबीरा गुनाह, 54*

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*मुसाफिर की नमाज़* #01
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     अल्लाह तआला सुरतुन्निसाअ की आयत 101 में इरशाद फ़रमाता है :
*और जब तुम ज़मीन में सफर करो तो तुम पर गुनाह नही कि बाज़ नमाज़े कसर से पढ़ो। अगर तुम्हे अंदेशा हो कि काफ़िर तुम्हे इज़ा देंगे, बेशक कुफ्फार तुम्हारे खुले दुश्मन है*

     हज़रत मुहम्मद नईमुद्दीन मुरादाबादी अलैरहमा फरमाते है : खौफे कुफ्फार कसर के लिये शर्त नही, हज़रत याला बिन उमय्या ने हज़रत उमर رضي الله تعالي عنه से अर्ज़ की, कि हमतो अमन में है, फिर हम क्यू क़सर करते है ? फ़रमाया : इसका मुझे भी तअज्जुब हुवा था तो मेने हुज़ूर ﷺ से दरयाफ़्त किया। हुज़ूर ﷺ ने इरशाद फ़रमाया : तुम्हारे लिए ये अल्लाह की तरफसे सदक़ा है तुम उसका सदक़ा क़बूल करो।
*✍🏼सहीह मुस्लिम 1/231*

     हज़रते अब्दुल्लाह बिन उमर से रिवायत है, अल्लाह के रसूल ﷺ ने सफर की दो रकअते मुक़र्रर फ़रमाई और ये पूरी है कम नही यानी अगर्चे ब ज़ाहिर दो रकअत कम हो गई मगर षवाब में चार के बराबर है।
*✍🏼सुनन इब्ने माजह 2/59*
*✍🏼नमाज़ के अहकाम 222*

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*83 आसान नेकियां* # 45
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_रस्ते से तकलीफ देह चीज़ को हटाना_*
     अगर रस्ते में कोई ऐसी चीज़ पड़ी हो जिस से गुज़रने वालों को तकलीफ पहुंचने का अन्देशा हो मषलन कोई कांटा या छिलका या पथ्थर वगैरा, तो ज़रा सी मेहनत से उसे वहां से हटा दीजिये और अज़ीमुश्शान षवाब के हक़दार बनिये, चुनांचे हज़रते अबू दरदा رضي الله عنه से रिवायत है कि जिस ने मुसलमानों के रास्ते से इज़ा पहुंचाने वाली चीज़ हटा दी उस के लिये एक नेकी लिखी जाएगी और जिस के लिये अल्लाह के पास एक नेकी लिखी जाए तो अल्लाह इस नेकी के सबब उसे जन्नत में दाखिल फरमा देगा।
*✍🏼المعجم الاوسط*

*_जन्नत में दाखिला मिल गया_*
     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم ने फ़रमाया : एक शख्स किसी रास्ते से गुज़र रहा था, उस ने उस रास्ते पर एक कांटेदार शाख को पाया तो उसे रस्ते से हटा दिया, अल्लाह को उस शख्स का ये अमल पसन्द आया और उस बन्दे की मगफिरत फरमा दी।
     एक रिवायत में है कि एक शख्स रास्ते के बिच में पड़ी हुई दरख्त की शाख के क़रीब से गुज़रा तो उस ने कहा : खुदा की क़सम ! में मुसलमानों के रास्ते से इसे ज़रूर हटा दूंगा ताकि ये उन्हें तकलीफ न पहुंचाए तो उसे जन्नत में दाखिल कर दिया गया।
     एक रिवायत में है की में ने एक शख्स को जन्नत में फिरता हुवा देखा क्यू की उस ने रास्ते में गिरे हुवे एक दरख्त को काट दिया था जो लोगों को तकलीफ पहुंचा रहा था।
*✍🏼صحيح مسلم*
*✍🏼आसान नेकियां, 124*

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Wednesday, 27 September 2017

*गुनाहे कबीरा नंबर 10*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_रमज़ान के रोज़े बिला उज़्र छोड़ देना_*

*तारीके रोज़ा की मज़म्मत में फरमाने मुस्तफा*
     जिस ने बगैर किसी उज़्र और रुख्सत के रमज़ान का रोज़ा छोड़ दिया तो सारी ज़िन्दगी के रोज़े भी उस के बराबर नहीं हो सकते अगर्चे बाद में रख भी ले।
*✍🏼ابوداود*

     पंचो नमाज़े, एक जुमाआ दूसरे जुमुआ तक और एक रमज़ान दूसरे रमज़ान तक दरमियान में होने वाले तमाम गुनाहों का कफ़्फ़ारा है जब की कबीरा गुनाहों से बचा जाए।
*✍🏼مسلم*

     जो झूट बोलना और उस पर अमल करना न छोडे तो अल्लाह उस के खाने और पिने को तर्क करने की कुछ परवा नहीं फ़रमाता।
*✍🏼بخاري*

     उस शख्स की नाक ख़ाक आलूद हो जिस ने रमज़ान का महीना पाया फिर उस की बख़्शिश न हुई।
*✍🏼ترمذى*
*✍🏼76 कबीरा गुनाह, 53*

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*नमाज़ी के आगे से गुज़रने के अहकाम*​ #03
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     अगर कोई इस क़दर उची जगह पर नमाज़ पढ़ रहा है कि गुज़रने वाले के आज़ा नमाज़ी के सामने नही हुए तो गुज़रने वाला गुनाहगार नही।

     दो शख्स नमाज़ी के आगे से गुज़रना चाहते है इसका तरीक़ा ये है कि इन में से एक नमाज़ी के सामने पीठ कर के खड़ा हो जाए। अब इसको आड़ बना कर दूसरा गुज़र जाए। फिर दूसरा पहले की पीठ के पीछे नमाज़ी की तरफ पीठ कर के खड़ा हो जाए। अब पहला गुज़र जाए फिर वो दूसरा जिधर से आया था उसी तरफ हट जाए।

     कोई नमाज़ी के आगे से गुज़रना चाहता है तो नमाज़ी को इजाज़त है कि वो उसे गुज़रने से रोके ख्वाह "सुब्हानअल्लाह" कहे या ज़हर (यानी बुलन्द आवाज़ से) किरआत करे या हाथ या सर या आँख के इशारे से मना करे। इससे ज़्यादा की इजाज़त नही। मसलन कपड़ा पकड़ कर झटकना या मारना बल्कि अगर अमले कसीर हो गया तो नमाज़ ही जाती रही।

     तस्बीह व इशारा दोनों को बिला ज़रूरत जमा करना मकरूह है।

औरत के सामने से गुज़रे तो औरत तस्फीक़ से मना करे यानी सीधे हाथ की उंगलिया उलटे हाथ की पुश्त पर मारे। अगर मर्द ने तस्फीक़ की और औरत ने तस्बीह कहि तो नमाज़ फासिद् न हुई मगर खिलाफे सुन्नत हुवा।

     तवाफ़ करने वाले को दौराने तवाफ़ नमाज़ी के आगे से गुज़रना जाइज़ है।
*✍🏼नमाज़ के अहकाम 217*

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Tuesday, 26 September 2017

*कबीरा गुनाह नंबर 9*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
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*_रसूलुल्लाह पर झूट बांधना_*
     रसूले अकरम صلى الله عليه وسلم पर झूट बांधना कुफ़्र है और ये अमल बन्दे को खारिज अज़ इस्लाम कर देता है। बिलाशुबा हराम को हलाल और हलाल को हराम क़रार देने के मुआमले में क़सदन अल्लाह और उस के रसूल صلى الله عليه وسلم पर झूट बांधना खालिस कुफ़्र है।

     बिला शुबा हुज़ूर صلى الله عليه وسلم पर झूट बांधने का मुआमला दूसरे पर झूट बांधने की तरह नहीं खुद रसूले करीम صلى الله عليه وسلم ने इर्शाद फ़रमाया :
     मुझ पर झूट बांधना, मेरे गैर पर झूट बांधने की तरह नहीं है जो जान बुझ कर मुझ पर झूट बांधे उसे चाहिये कि अपना ठिकाना जहन्नम में बना ले।
*✍🏼مسلم*

     जो शख्स मुझ पर झूट बांधेगा उस के लिये जहन्नम में घर बनाया जाएगा।
*✍🏼مسند احمد، مسند عبد الله بن عمر*

     जो मेरे हवाले से ऐसी बात करे जो में ने नहीं कही उसे चाहिये कि वो अपना ठिकाना जहन्नम में बना ले।
*✍🏼ابن ماجة*

     झूट और खियानत के इलावा मोमिन की तबीअत में हर बात हो सकती है।
*✍🏼مسند احمد*

     जिस ने मेरे हवाले से कोई हदिष रिवायत की हालांकि उस का झूट होना उसे मालुम हो तो वो झूटों में से एक झुटा है।
*✍🏼مسلم*

     पस आप पर इन अहादिष के ज़रीए ज़ाहिर हो गया कि मौज़ूअ हदिष को रिवायत करना जाइज़ नहीं है।
(जो झूटी बात घड़ कर सरकार صلى الله عليه وسلم की तरफ बतौरे हदिष मन्सूब कर दी गई हो उसे मौज़ूअ हदिष कहते है।
*✍🏼76 कबीरा गुनाह ,51*

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*नमाज़ी के आगे से गुज़रने के अहकाम*​ #02
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
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     दरख्त, आदमी और जानवर वगैरा का भी आड़ हो सकता है।

     आदमी को इस हालत में आड़ किया जाए जब कि उसकी पीठ नमाज़ी की तरफ हो। (अगर नमाज़ पढ़ने वाले के ऍन रुख की तरफ किसी ने मुह किया तो अब कराहत नमाज़ी पर नही उस मुह करने वाले पर है, लिहाज़ा इमाम के सलाम फेरने के बाद मुड़ कर पीछे देखने में एहतियात ज़रूरी है कि आप के ऍन पीछे की जानिब अगर कोई नमाज़ पढ़ रहा होगा और उस की तरफ आप अपना मुह करेंगे तो गुनाहगार होंगे)

     एक शख्स नमाज़ी के आगे से गुज़रना चाहता है और दूसरा शख्स उसी को आड़ बना कर उसके चलने की रफ़्तार के ऍन मुताबिक़ उसके साथ ही गुज़र जाए तो पहला शख्स गुनाहगार हुवा और दूसरे के लिये यहि पहला शख्स आड भी बन गया।

     नमाज़े बा जमाअत में अगली सफ में जगह होने के बा वुजूद किसी ने पीछे नमाज़ शुरू कर दी तो आने वाला उसकी गर्दन फलांगता हुवा जा सकता है कि उसने अपनी हुरमत अपने आप खोई।

बाक़ी कल की पोस्ट में..ان شاء الله
*✍🏼नमाज़ के अहकाम 216*

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Monday, 25 September 2017

*नमाज़ी के आगे से गुज़रने के अहकाम* #01
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     मैदान और बड़ी मस्जिद में नमाज़ी के क़दम से मौज़ए सुजूद तक गुज़रना ना जाइज़ है। *मौज़ए सुजूद* से मुराद ये है कि क़याम की हालत में सज्दे की जगह नज़र जमाए तो जितनी दूर तक निगाह फेले वो मौज़ए सुजूद है। उस के दरमियान से गुज़रना जाइज़ नहीं।
_मौज़ए सुजूद का फ़ासिला अंदाज़न क़दम से ले कर 3 गज़ तक है_
लिहाज़ा मैदान में नमाज़ी के क़दम के 3 गज़ के बाद से गुज़रने में हरज नही।

     मकान और छोटी मस्जिद में नमाज़ी के आगे अगर सुतरा (आड़) न हो तो क़दम से दीवारे किबला तक कही से गुज़रना जाइज़ नही।
नमाज़ी के आगे कोई आड़ हो तो उस आड़ के बाद से गुज़रने में कोई हरज नही।

     आड़ कम अज़ कम एक हाथ (तकरीबन आधा गज़) उचा और ऊँगली बराबर मोटा होना चाहिये।

     इमाम की आड़ मुक्तदि के लिये भी आड़ है। यानी इमाम के आगे आड़ हो तो अगर कोई मुक्तदि के आगे से गुज़र जाए तो गुनाहगार न होगा।

बाक़ी अगली पोस्ट में..ان شاء الله
*✍🏼नमाज़ के अहकाम 215*

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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Sunday, 24 September 2017

*कबीरा गुनाह नंबर 8*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

_*ज़ुल्मन यतीम का माल खाना*_
     अल्लाह इर्शाद फ़रमाता है :
     _वो जो यतीमों का माल नाहक़ खाते है वो तो अपने पेट में निरी आग भरते है और कोई दम जाता है कि भड़कते धड़े (भड़कती आग) में जाएंगे।_
*✍🏼النساء ١٠*

     _और यतीमों के माल के पास न जाओ मगर बहुत अच्छे तरीके से।_
*✍🏼الانعام ١٥٢*
     यानी यतीमों के माल के पास इस तरीके से जाओ जिस से उस का फायदा हो और जब वो अपनी जवानी की उम्र को पहुँच जाए उस वक़्त उस का माल उस के सुपुर्द कर दो।
*✍🏼सिरतुल जिनान*

     रसूले अकरम صلى الله عليه وسلم ने इर्शाद फ़रमाया : सात हलाक करने वाले गुनाहों से बचो। इन में एक आप صلى الله عليه وسلم ने यतीम के माल को खाना भी ज़िक्र किया।
     यतीम का वली (सरपरस्त) फ़क़ीर हो तो उस के लिये ब क़दरे मारूफ़ (हस्बे दस्तूर) यतीम का माल खाने में हरज नहीं अलबत्ता ब क़दरे मारूफ़ से ज़्यादा खाना शदीद हराम है। ब क़दरे मारूफ़ की मिक़दार जानने के लिये मुसलमानों के उर्फ़ को देखा जाएगा जो बुरे मक़ासिद न रखते हों।
*✍🏼76 कबीरा गुनाह, 50*

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*नमाज़ी के आगे से गुज़रना सख्त गुनाह है*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     सरकार मदीना ﷺ ने फ़रमाया : अगर कोई जानता कि अपने भाई के सामने नमाज़ में आड़े हो कर गुज़रने में क्या है तो 100 बरस खड़ा रहना उस एक क़दम चलने से बेहतर समझता।
*✍🏼सुनन इब्ने मजह 1/506*

     हज़रते इमाम मालिक رضي الله تعالي عنه फरमाते है कि हज़रते काबुल अहबार का इरशाद है, नमाज़ी के आगे से गुज़रने वाला अगर जानता कि इस पर क्या गुनाह है तो ज़मीन में धस जाने को गुज़रने से बेहतर जानता।

     नमाज़ी के आगे से गुज़रने वाला बेशक गुनाहगार है मगर खुद नमाज़ी की नमाज़ में इस से कोई फर्क नही पड़ता।
*✍🏼फतवा रज़विय्या 7/254*
*✍🏼नमाज़ के अहकाम 214*

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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Saturday, 23 September 2017

*कबीरा गुनाह नम्बर 7*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

_*सूद*_
     अल्लाह का फरमान है :
     _ऐ ईमान वालो अल्लाह से डरो और छोड़ दो जो बाक़ी रह गया है सूद अगर मुसलमान हो फिर अगर ऐसा न करो तो यकीन कर लो अल्लाह और अल्लाह के रसूल से लड़ाई का।_
*✍🏼البقرة ٢٧٨، ٢٧٩*

     _वो जो सूद खाते है क़यामत के दिन न खड़े होंगे मगर जैसे खड़ा होता है वो जिसे आसेब ने छु कर मखबूत बना दिया हो ये इस लिये कि उन्हों ने कहा बैअ भी तो सूद ही के मानिन्द है और अल्लाह ने हलाल किया बैअ और हराम किया सूद तो जिसे उस के रब के पास से नसीहत आई और वो बाज़ रहा तो उसे हलाल है जो पहले ले चूका और उस का काम खुदा के सुपुर्द है और जो अब ऐसी हरकत करेगा तो वो दोज़ख है वो उस में मुद्दतों रहेंगे।_
*✍🏼البقرة ٢٨٥*

     हमेशा जहन्नम में रहने की ये सख्त वईद उस शख्स के लिये है जो नसीहत आ जाने के बाद दोबारा सूद की तरफ लौटे।

_*सूद की मज़म्मत में फरमाने मुस्तफा*_
     सात हलाक करने वाले गुनाहों से बचो। सहाबए किराम ने अर्ज़ की या रसूलल्लाह صلى الله عليه وسلم ! वो कौन से गुनाह है ? फ़रमाया (1) शिर्क (2) जादू करना (3) नाहक किसी जान को क़त्ल करना (4) यतीम का माल खाना (5) सूद खाना (6) मैदाने जिहाद से भाग जाना (7) पाक दामन औरत को ज़िना की तोहमत लगाना।

     अल्लाह ने सूद लेने और देने वाले पर लानत फ़रमाई है।
   
     एक रिवायत में ये अलफ़ाज़  ज़ाइद है : सूद के गवाहों और सूद की तहरीर लिखने वाले पर भी लानत फ़रमाई है।
*✍🏼مسلم*

*✍🏼76 कबीरा गुनाह, 48*

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*सज्दए शुक्र का बयान*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     औलाद पैदा हुई या माल पाया या गुम हुई चीज़ मिल गई या मरीज़ ने शिफ़ा पाई या मुसाफिर वापस आया अल गरज़ किसी नेमत के हुसूल पर सज्दए शुक्र करना मुस्तहब है। इसका तरीक़ा वही है जो सज्दए तिलावत का है।
*✍🏼आलमगिरी 1/136*

     इसी तरह जब भी कोई खुश खबरी या नेमत मिले तो सज्दए शुक्र करना कारे सवाब है, मसलन हज़ का वीज़ा लग गया, किसी सुन्नी आलिमे बा अमल की ज़ियारत हो गई, मुबारक ख्वाब नज़र आया, तालिबे इल्मे दीन इम्तिहान में कामयाब हुवा, आफत टली या कोई दुश्मने इस्लाम मरा वगैरा वगैरा।
*✍🏼नमाज़ के अहकाम 214*

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
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Friday, 22 September 2017

*गुनाहे कबीरा 6* #05
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_ना फ़रमानी के सबब उम्र में कमी_*
     हज़रते वहब बिन मुनब्बेह رحمه الله عليه से मन्कुल है कि अल्लाह ने हज़रते मूसा कलीमुल्लाह से इर्शाद फ़रमाया : ऐ मूसा ! अपने वालिदैन की इज़्ज़त कर, बिलाशुबा जो औने वालिदैन की इज़्ज़त करेगा में उस की उम्र में इज़ाफ़ा कर दूंगा और उसे ऐसी औलाद दूंगा जो उस के साथ भलाई करेगी और जो अपने वालिदैन की ना फ़रमानी करेगा में उस की उम्र में कमी कर दूंगा और उसे ऐसी औलाद दूंगा जो उस की ना फ़रमानी करेगी।

     हज़रते काबुल अहबार رضي الله عنه ने फ़रमाया : अल्लाह बन्दे को हलाक करने में जल्दी करता है जब कि वो अपने वालिदैन का ना फरमान हो, वो ज़रूर उसे जल्द अज़ाब देता है और बिलाशुबा अल्लाह बन्दे की उम्र में इज़ाफ़ा फरमा देता है जब कि वो अपने वालिदैन के साथ नेकी करने वाला हो, वो ज़रूर उस की भलाई और खैर में इज़ाफ़ा फरमाता है।

     हज़रते अबू बक्र बिन अबू मरयम رحمه الله عليه फ़रमाते है : में ने तौरात में पढ़ा कि जो शख्स अपने बाप को मारता हो उस को क़त्ल कर दिया जाए।

     हज़रते वहब बिन मुनब्बेह رحمة الله عليه फ़रमाते है : तौरात में है कि जिस ने अपने वालिद को थप्पड़ मारा उसे रज्म किया जाएगा।
*✍🏼الزواجر عن اقتراف الكباىٔر*
*✍🏼76 कबीरा गुनाह, 46*

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
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*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*सज्दए तिलावत का तरीक़ा*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     खड़ा हो कर अल्लाहुअकबर कहता हुवा सज्दे में जाए और कम से कम 3 बार सुब्हान रब्बिअल अअला कहे फिर अल्लाहुअकबर कहता हुवा खड़ा हो जाए। पहले पीछे दोनों बार अल्लाहुअकबर कहना सुन्नत है और खड़े हो कर सज्दे में जाना और सज्दे के बाद खड़ा होना ये दोनों क़याम मुस्तहब है।
*✍🏼आलमगिरी 1/135*

     सज्दए तिलावत के लिये अल्लाहुअकबर कहते वक़्त न हाथ उठाना है न इसमें तशह्हुद है न सलाम है।
*✍🏼नमाज़ के अहकाम स.213*

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Thursday, 21 September 2017

*मुहर्रम कैसे मनाये* #08
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     मुहर्रम में हरा या कला कपडा गम या शोक मनाने के लिए पहनते है। ऐसा शोक इस्लाम में हराम है।
     उसके अलावा भी कई और बातो को रिवाज बना दिया है, जेसे की मुहर्रम के शुरू के 10 दिन कपडे न बदलना, दिन को रोटी न पकानी, मटन न खाना, पलंग पे न सोना, इस माह में शादी को बुरा जानना वगैरा, ये सब बे बुनियादी और जहालत की बाते है।

     आला हज़रत फरमाते है : मुहर्रम के 10 दिनों में ताज्या की सवारी निकली जाती है और उसके साथ तमाशे व ड्रामा होते है ये सब नाजाइज़ और गुनाह है।
     अल्लाह तआला हमें इस्लामको सही मानोमे समझने और उस पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता करे। आमीन....

     भाइयो ! ये दिल है इसे हम जिसमे लगाएंगे उसमे लग जायेगा। गाना बजाना, मेलो तमाशो में लगाएंगे तो उसमे लगेगा और अगर इस दिल को नमाज़, रोज़ा व क़ुरआन की तिलावत में लगाएंगे तो उसमे लगजयेगा।
     अफ़सोस ! हमने अपने दिल को गानो, मेलो तमाशो में लगा दिया है, और मौत नजदीक आ रही है, मरने से पहले अपने दिलोको नमाज़, रोज़े, क़ुरआन की तिलावत व दिनी किताबो और अछि बातो में लगाने की कोशिस करे।
☝🏽अल्लाह हमें कामयाबी अता करे।
 आमीन....

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*दौराने नमाज़ दूसरे से आयते सज्दा सुनली तो ?*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     रमज़ानुल मुबारक में तरावीह या शबीना में अगर्चे शरीक न हो बेशक अपनी ही अलग नमाज़ पढ़ रहे हो या नमाज़ में भी न हो तो आयते सज्दा सुन लेने से आप पर भी सज्दए तिलावत वाजिब हो जाएगा।

     काफिर या ना बालिग से आयते सज्दा सुनी तब भी सज्दए तिलावत वाजिब हो गया।

     नमाज़ में आयते सज्दा पढ़ी तो उसका सज्दा नमाज़ ही में वाजिब है बैरूने नमाज़ नही हो सकता और क़सदन न किया तो गुनाहगार हुवा तौबा लाज़िम है।

     अलबत्ता बालिग़ होने के बाद बैरूने नमाज़ जितनी बार भी आयाते सज्दा पढा या सुन कर सज्दा वाजिब हुवा और अभी तक सज्दा न किया हो उन का गलबए ज़न के एतिबार से हिसाब लगा कर उतनी बार बा वुज़ू सज्दए तिलावत करना लाज़िम है।
*✍🏼नमाज़ के अहकाम* स.213

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Wednesday, 20 September 2017

*मुहर्रम कैसे मनाये* #07
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_ताज्यादारी और उलमा ए एहले सुन्नत_* #01
     कुछ लोग समजते है की ताज्यादारी सुन्नियो का काम है और उससे रोकना, मना करना वहाबियों का काम है। जब की जबसे ये ताज्यादारी सुरु हुई है तबसे कोई भी जिम्मेदार सुन्नी उल्माने उसे अच्छा नहीं कहा।

     हिन्दुस्तान में वहाबियत से पहले के उलमा व बुज़ुर्ग हज़रत शाह अब्दुलअजीज मुहदिशे दहेल्वी फरमाते है : मुहर्रम के 10 दिनो में जो ताज्यादारी होती है वो सब नाजाइज़ है।
*✍🏼फतावा अजीजिया, 1/75*

     आला हज़रत जो इमामे एहले सुन्नत कहलाते है जिनका फतवा सारे जहा में माननीय है वो फरमाते है : आज कल ताज्यादारी वो नापसंदीदा तरीके का नाम है, जो बिदअत, नाजाइज़ और हराम है।
*✍🏼फतावा राज़वीययह, 24/513*

     जो कहते है ताज्या बनाना एहले सुन्नत का काम है वो आला हज़रत की किताबोका मुताअला करे, एक पूरी किताब आप ने इस बारे में लिखी है जिसका नाम है
_"आलिल इफ़ादा फि ताजियतील हिंद व बयाने शहादत"_

     मुफ़्ती आजमे हिंद मौलाना शाह मुस्तफा रज़ाखा फरमाते है : ताज्यादारी शरीअत की बिना पर नाजायज़ है।
*✍🏼फतावा मुस्तफविय्यह, 534*

     सदरूश्शरीअह हज़रत मौलाना अमजदअलि साहब फरमाते है : ये बिलकुल खुराफात है। इन सब से हज़रत सैयदना हुसैन की रूह खुश नहीं। ये घटना तुम्हारे लिए नसीहत था और तुमने उसे खेल तमाशा बना लिया।
*✍🏼बहारे शरीअत, 16/248*

बाक़ी अगली पोस्ट में..ان شاء الله

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*सज्दए तिलावत के मदनी फूल* #02
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     सज्दा वाजिब होने के लिये पूरी आयत पढ़ना ज़रूरी है लेकिन बाज़ उल्माए मूतअख्खिर के नज़्दीक वो लफ्ज़ जिसमे सज्दे का माद्दा पाया जाता है उसके साथ क़ब्ल या बाद का कोई लफ्ज़ मिला कर पढ़ा तो सज्दए तिलावत वाजिब हो जाता है लिहाज़ा एहतियात येही है कि दोनों सूरतो में सज्दए तिलावत किया जाए।
*✍🏼मूलख्खसन फतावा रज़विय्या* 8/223

     आयते सज्दा बैरूने नमाज़ पढ़ी तो फौरन सज्दा कर लेना वाजिब नहीं है अलबत्ता वुज़ू हो तो ताख़ीर मकरुहे तन्ज़ीहि है।

     सज्दए तिलावत नमाज़ में फौरन करना वाजिब है मगर ताख़ीर की यानी तिन आयात से ज़्यादा पढ़ लिया तो गुनाहगार होगा और जब तक नमाज़ में है या सलाम फेरने के बाद कोई नमाज़ के मुनाफि फेल नही किया तो सज्दए तिलावत करके सज्दए सहव बजा लाए।
*✍🏼दुर्रेमुखतार मअ रद्दलमोहतार* 2/584
*✍🏼नमाज़ के अहकाम* स.212

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Tuesday, 19 September 2017

*मुहर्रम कैसे मनाये* #06
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_ताज्यादारी और क़ुरआन व हदिष_*
     और उनलोगो से दूर रहो जिन्होंने अपने दिन को खेल तमाशा बना दिया है और उनको दुनिया की ज़िन्दगी ने धोका दे दिया है।
*परा~7, रुकूअ~14*

     जिन लोगोने अपने दिनको खेल तमाशा बना लिया और दुनिया की ज़िन्दगी ने उनको धोकेइ डाल दिया, आज हम उनको छोड़ देंगे जेसे उन्होंने ये दिन (क़यामत) का ख्याल छोड़ रखा है और जो हमारी आयतो से इन्कार करते थे।
*परा~8, रुकूअ~13*

     इन आयतो को देखे तो आज के ताज्यादारी और उर्स के नाम पे जो नाच, तमाशा और कव्वालियां हो रही है वो सब याद आयेगा और इंसाफ की नज़र कहेगी की ये वही लोग है जो इस्लाम को तमाशा बना रख्खा है और मजहब को हँसी खेल का रूप दे दिया है।

     क़ुरआने करीम में अल्लाह ताला जगह जगह पर दर्द और मुसीबत के वक़्त सब्र करने का हुक्म दिया है। ना की रोना, पीटना, चिल्लाना और मातम मनाना।

     हदिष शरीफ में है रसूल صلى الله عليه وسلم ने फ़रमाया ; जो मैयत के गाममे गाल पिटे, गरेवान् फाडे और ज़माने जाहिलियत की तरह चिल्लाये तो वो हम मेसे नहीं।
*सहीह बुखारी 1/173*

     एक और हदिष में आप फरमाते है : अल्लाह ताला ने मुझे ढोल, बाजे और बंसरिओ को मिटाने का हुक्म दिया।
*मिश्कात, 318*
*किताबुल अमारत 3*

     और एक हदिष में आप फरमाते है : मेरी उम्मत में ऐसे लोग होंगे जो ढोल बाजो को हलाल कर लेंगे।
*सहीह बुखारी, 2/387*
*किताबुल अशरीबा*

अल्लाह ताला हमें इन सब बातो से बचाये।
अमिन.......

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*सज्दए तिलावत के मदनी फूल* #01
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
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     आयते सज्दा पढ़ने या सुनने से सज्दा वाजिब हो जाता है। पड़ने में ये शर्त है कि इतनी आवाज़ में हो कि अगर कोई उज़्र न हो तो खुद सुन सके, सुनने वाले के लिये ये ज़रूरी नही कि बिला क़स्द सुनी हो बिला क़स्द सुनने से भी सज्दा वाजिब हो जाता है।

     किसी भी ज़बान में आयत का तर्जमा पड़ने और सुनने वाले पर सज्दा वाजिब हो गया, सुनने वाले ने ये समझा हो या न समझा हो कि आयते सज्दा का तर्जमा है। अलबत्ता ये ज़रूरी है कि उसे न मालुम हो तो बता दिया गया हो की ये आयते सज्दा का तर्जमा था और आयत पढ़ी गई हो तो इसकी ज़रूरत नहीं की सुनने वाले को आयते सज्दा होना बताया गया हो।
*✍🏼आलमगिरी* 1/133

बाक़ी अगली पोस्ट में..ان شاء الله
*✍🏼नमाज़ के अहकाम* स.212

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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Monday, 18 September 2017

*मुहर्रम कैसे मनाये* #05
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_ताजिया के बारे में गलत फहमी_* #02
    कुछ लोग कहते है ताजियादारी और ढोल तमासे और मातम करते हुए गुमने से इस्लाम और मुसलमान की शान जाहिर होती है। लेकिन ये फ़ुज़ूल बात है।
     पाँच वक़्त की अज़ान और महोल्ला, बस्ती और सभी मुसलमानो का मस्जिद में नमाज़े बा-जमाअत से ज्यादा मुसलमानो की शान बढ़ा ने वाली कोई चीज नहीं।
      ताजियादारी व उसके साथ ढोल तमासे और नाचना, कूदना और मातम मनाना और बुज़ुर्गोके नाम पर गैर शरई उर्स, मेला और आजकी कव्वालियों की महफिले देख के गैर मुस्लिम ऐसा समजते है के ये भी हमारे मज़हब के जैसा तमाशेवाला मज़हब है।
     और नमाज़, रोज़ा, ईमानदारी और सच्चाई, शरीअतके हुक्मो की पाबन्दी और दीनदारी देख के गैर मुस्लिम ऐसा कहते है की "अगर मज़हब कोई है तो वो इस्लाम ही है"
     कोई मज़बूरी की वजह से वो मुसलमान नहीं बनते पर उनका दिल मुसलमान बनने को तड़पता है।  और कितने तो मुसलमान हो भी जाते है, और होते रहते है।
     ज़रा सोचे 1400 साल में मुसलमान की तादाद कितनी हो चुकी है।
     ये सब नमाज़, रोज़े, इस्लाम की सीधी सच्ची बाते देख के बने है, ना की ताजियादारी, मेले तमासे देख के बनते है।
     और ताजियादारी इस्लाम की शान नहीं बल्कि बदनामी है। आज वहाबी के उलमा यही सब दिखाके सुन्नियो को वहाबी बनाते है। यानी वो हमारे ये गैर मज़हबी रश्मो रिवाज़ दिखा के वहाबी बनाते है।
     मुसलमान का अक़ीदा और ईमान इतना मजबूत होना चाहिए की दुनियाइ नफ़ा हो या नुकशान पर हम तो वही करेंगे जिससे अल्लाह और रसूल राज़ी होते है।

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*सज्दए तिलावत और शैतान की शामत*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     अल्लाह के महबूब صلى الله عليه وسلم ने फ़रमाया : जब जब आदमी आयते सज्दा पढ़ कर सज्दा करता है, शैतान हट जाता है और रो कर कहता है, हाय मेरी बर्बादी ! इब्ने आदम को सज्दे का हुक्म हुवा उसने सज्दा किया उसके लिये जन्नत है और मुझे हुक्म हुवा मेने इन्कार किया मेरे लिये दोज़ख है।
*✍🏼सहीह मुस्लिम* 1/61

*_इन शा अल्लाह हर मुराद पूरी हो_*
     जिस मक़सद के लिये एक मजलिस में सज्दे की सब (यानी 14) आयते पढ़ कर सज्दे करे अल्लाह उसका मक़सद पूरा फ़रमा देगा। ख्वाह एक एक आयत पढ़ कर उसका सज्दा करता जाए या सब पढ़ कर आखिर में 14 सजदे करले।
*✍🏼गुन्या, दुर्रेमुखतार*
*✍🏼नमाज़ के अहकाम* स.211

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*गुनाहे कबीरा 6* #04
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_वालिदैन की ना फ़रमानी की सज़ा जल्द मिलती है_*
     तमाम गुनाहों में से जिस गुनाह की सज़ा अल्लाह चाहता है क़यामत तक मुअख्खर फरमा देता है सिवाए वालिदैन की ना फ़रमानी के, कि इस की सज़ा वो जल्द देता है।
*شعب الإيمان*

     बेटा अपने बाप का बदला नहीं चूका सकता मगर ये कि वो अपने बाप को ममलुक (गुलाम) बाए तो उसे खरीद कर आज़ाद कर दे।
*مسلم*

     अल्लाह ने वालिदैन के ना फरमान पर लानत फ़रमाई है।
*مستدرك حاكم*

     खाला माँ के मर्तबे में है।
*✍🏼ترمذى*

*✍🏼76 कबीरा गुनाह, 45*

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Sunday, 17 September 2017

*मुहर्रम कैसे मनाये*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_ताजिया के बारे में गलत फहमी_* #01
     आज कल जो ताजिया बनाते है उसमे पहली बात ये की वो हज़रत इमाम हुसैन के रोज़ा मुबारक की तरह नहीं होता। अजब कज़ब तरीके के ताजिये बनाये जाते है। और फिर उसे गुमाते हे गस्त लगाते है। एक दुसरो से मुकाबला करते है और ऐसे मुकाबले में कभी कभी जगडे फसाद भी हो जाते है। और ये सब इमाम हुसैन की मुहब्बत के नाम पर होता है।

     अफ़सोस! ये मुसलमानो को क्या हो गया है? वो कहा से चला था और कहा पहोच गया? कोई समजाये तो मानने के लिए राज़ी नहीं, बल्के समजाने वाले को ही भला बुरा कहते है।

     मतलब के अभी के वक़्त में जो ताजिया और उसके साथ होने वाली सब बिदअते और बुराइया और वाहियात बाते सब नाजाइज़ और गुनाह है।

    जेसे के मातम करना, ताजिया पे चढ़ावा चढ़ाना, उसके सामने खाना रख के वहा फातिहा चढ़ाना, उनसे मन्नते मुरादे मांगना, उनके निचे से बच्चों को निकालना, ताजिया देखने जाना, उसको जुक जुक कर सलाम करना, सवारिया निकलना ये सब जाहिलाना और नाजाइज़ बाते है। इसे इस्लाम के साथ कोई वास्ता नहीं। और जो लोग इस्लाम को अच्छे से जानते है उनका दिल खुद ही कहेगा के इस्लाम जिस सीधा और शराफत वाला मज़हब ये तमाशा और वहेम परस्ती भरी बातोंको कैसे कबुल कर शकता है।

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*सज्दए सहव का तरीक़ा*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     अत्तहिय्यात पढ़ कर बल्कि अफज़ल ये है की दुरुद शरीफ भी पढ़ लीजिये, फिर सीधी तरफ सलाम फेर कर दो सज्दे कीजिये, फिर तशह्हुद, दुरुद शरीफ और दुआ पढ़ कर सलाम फेर दीजिये।

*सज्दए सहव करना भूल जाए तो..?*
     सज्दए सहव करना था और भूल कर सलाम फेरा तो जब तक मस्जिद से बहार न हुवा सज्दा करले।
     मैदान में हो तो जब तक सफों से मुतजाविज़ न हो या आगे को सज्दे की जगह से न गुज़रा, सज्दा करले,
     जो चीज़ मानए बिना है मसलन कलाम वग़ैरा मुनाफिये नमाज़ अगर सलाम के बाद पाई गई तो अब सज्दए सहव नही हो सकता।
*✍🏽दुर्रेमुखतार*
*✍🏽नमाज़ के अहकाम* स.211

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Saturday, 16 September 2017

*मुहर्रम कैसे मनाये* #03
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     नियाज़ फातिहा कोई भी हलाल और जाइज़ खाने पिनेकी चीज़ों पे हो शकता है, इसके लिए शरबत, खिचड़ा, मलीदा यही होना ज़रूरी है ये समजना जहालत है।

     नियाज़ और फातेहा करने में बड़ाई नहीं करनी चाहिए, और खाने पिने की चीज़ों में एक दूसरो से मुकाबला नहीं करना चाहिए। बल्कि जो कुछ भी और जितना हो सब सिर्फ अल्लाह वालोंके ज़रिये अल्लाह की नज़दीकी और रिजा हासिल करने के लिए और अल्लाह के नेक बन्दों की मुहब्बत इसलिए करते है के उनसे मोहब्बत करना और उनके नाम पर खिलाना और उनकी रूहो को अछे कामो का सवाब पोहचाने से अल्लाह खुश् होता है, और अल्लाह को खुश करना ही हमारी ज़िन्दगी का मकसद है।

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*सजदए सहव* #03
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

_*निहायत अहम मसअला*_
     कसीर इस्लामी भाई ना वाकिफिय्यत की बिना पर अपनी नमाज़ ज़ाए कर बैठते है लिहाज़ा ये मसअला खूब तवज्जोह से पढ़िये।

     मसबुक (यानी जो एक या कई रकअते छूट जाने के बाद नमाज़ में शामिल हुवा) को इमाम के साथ सलाम फेरना जाइज़ नहीं, अगर क़सदन फिरेगा तो नमाज़ जाती रहेगी और अगर भूल कर इमाम के साथ बिला वक़्फ़ा फौरन सलाम फेरा तो हरज नहीं लेकिन ऐसा बहुत ही कम होता है और अगर भूल कर सलाम इमाम के कुछ भी बाद फेरा तो खड़ा हो जाए अपनी नमाज़ पूरी करके सज्दए सहव करे।

     मसबुक इमाम के साथ सज्दए सहव करे अगर्चे उसके शरीक होने से पहले इमाम को सहव हुवा और अगर इमाम के साथ सज्दए सहव न किया और अपनी बाक़ी नमाज़ पढ़ने खड़ा हो गया तो आखिर में सज्दए सहव करे और इस मसबुक से अपनी नमाज़ में भी सहव हुवा तो आखिर में येही सज्दे इस इमाम वाले सहव के लिये भी काफी है।

     क़ायदाए ऊला में तशह्हुद के बाद इतना पढ़ा *अल्लाहुम्म सल्ली अला मुहम्मदीन* तो सज्दए सहव वाजिब है।
     इस की वजह ये नहीं कि दुरुद शरीफ पढ़ा बल्कि उस की वजह ये है कि तीसरी रकअत के क़याम में ताख़ीर हुई। लिहाज़ा अगर इतनी देर खामोश रहा जब भी सज्दए सहव वाजिब है।

     किसी कायदे में तशह्हुद में कुछ रह गया तो सज्दए सहव वाजिब है नमाज़ फ़र्ज़ हो या नफ्ल।
*✍🏽नमाज़ के अहकाम स.209*

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Friday, 15 September 2017

*मुहर्रम कैसे मनाए* #02
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_नियाज़ और फातेहा_*
     हज़रत इमाम हुसैन और जो लोग उनके साथ शहीद हुए है उनके इसाले सवाब के लीये सदका, खैरात करे, गरीबो मिस्नकिनो , दोस्तों, पड़ोसीओ, रिस्तेदारो को शरबत या खिचड़ा या मलीदा वगैरा कोई भी जाइज़ खाने पिने वाली चीज़े खिलाना और पिलाना जाइज़ है और उसके साथ अगर क़ुरआन की आयते तिलावत करे तो और बेहतर है।

     इन सब बातो को नियाज़ हातेहा कहते है। ये सब बिना सूबा जाइज़ और मुस्त हसन है और बुजुर्गो की अकीदत पेश करने का अच्छा तरिका है।

     लेकिन इन सब बातो में कुछ चीज़ों का ध्यान रखना ज़रूरी है।

✔उन बातो का खुलासा अगली post में होगा।
ان شاء الله


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*सजदए सहव* #02
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     नमाज़ में अगर्चे 10 वाजिब तर्क हुए हो, सहव के दो ही सज्दे सब के लिये काफी है।

     रूकू के बाद सीधा खड़ा होना या दो सजदों के दरमियान एक बार *सुब्हान अल्लाह* कहने की मीक़दार सीधा बेठना भूल गए तो सज्दए सहव वाजिब है।

     क़ुनूत या तकबीरे क़ुनूत भूल गए तो सज्दए सहव वाजिब है।

     किराअत वग़ैरा किसी मौक़ा पर सोचने में *3 बार सुब्हान अल्लाह* कहने का वक़्फ़ा गुज़र गया तो सज्दए सहव वाजिब हो गया।

     सज्दए सहव के बाद भी अत्तहिय्यात पढ़ना वाजिब है।

     इमाम से सहव हुवा और सज्दए सहव किया तो मुक्तदि पर भी सज्दा वाजिब है।

     अगर मुक्तदि से ब हालते इक़्तिदा सहव वाके हुवा तो सज्दए सहव वाजिब नहीं।
और नमाज़ लौटने की भी हाजत नहीं।

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*✍🏽नमाज़ के अहकाम स.208*

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Thursday, 14 September 2017

*मुहर्रम कैसे मनाये* #01
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     हुसैनी दिन यानी 10 मुहर्रम. मुहर्रम में कुछ लोग इमाम हुसैन के किरदार को भूल गये और इस दिन को खेल तमाशो, गैर शरई रस्मो नाचगाना, मेले और गुमने फिरने का दिन बना दिया। और ऐसा लगने लगा की जेसे इस्लाम मजहब भी दूसरे मजहबो की तरह खेल तमाशो, गुमने फिरने और रंग रलिया वाला मजहब है।

     मुसलमान कहलाने वालो में सिर्फ एक फिरका जिसको राफजी यानी शिया कहते है उनके वहा नमाज़, रोज़ा वगैरा शरीअत के हुक्मो का और दीनदारी के मुआमले में कोई अहमियत देने में नहीं आता। बस मुहर्रम आते ही रोना, पीटना, चिल्लाना यही उनका मज़हब है। जाने की अल्लाह ने उसके रसूल को यही सब करने और सिखाने भेजा था और यही सब बेतुकी बातो का नाम इस्लाम है।

     जबकी हदीसे पाक में है : हुज़ूर ﷺ फरमाते है जो कोई गममे गाल पिटे, गला फाडे, जाहिलियत के ज़माने जैसा चिल्लाये वो हम में से नहीं है।
*✍🏼मिश्कात शरीफ, स. 150*

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Wednesday, 13 September 2017

*गुनाहे कबीरा 6* #03
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_वालिदैन की ना फ़रमानी की मज़म्मत में फरमाने मुस्तफा_* #03

वालिदैन का न फरमान, एहसान जताने वाला, शराब का आदी और जादू की तस्दीक़ करने वाला जन्नत में दाखिल न होगा।
*مسند احمد، مسند أبى سعيد الخدري*

     वालिदैन का ना फरमान और तक़दीर को झुटलाने वाला जन्नत में दाखिल न होगा।
*مسند احمد، ومن حديث ابى الدرداء*

     एक शख्स ने बारगाहे रिसालत में अर्ज़ की या रसूलुल्लाह صلى الله عليه وسلم आप क्या फ़रमाते है कि अगर में पाचों नमाज़ें पढूं, रमज़ान के रोज़े रखूं, ज़कात अदा करू नीज़ बैतुल्लाह का हज करूँ तो मेरे लिये क्या जज़ा होगी ? इर्शाद फ़रमाया : जो ये कम अन्जाम देगा वो अम्बिया, सिद्दीक़ीन, शुहदा और सालिहीन के साथ होगा मगर ये कि वो वालिदैन का ना फरमान हो (तो वो इस सआदत से महरूम रहेगा)।
*✍🏼غاية المقصود فى زواىٔد المسند*

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*✍🏼76 कबीरा गुनाह, 45*

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*सजदए सहव* #01
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     वाजीबाते नमाज़ में से अगर कोई वाजिब भूले से रह जाए या फराइज़ व वाजीबाते नमाज़ में भूले से ताख़ीर हो जाए तो सज्दए सहव वाजिब है।

     अगर सज्दए सहव वाजिब होने के बा वुजूद न किया तो नमाज़ लौटाना वाजिब है।

     कोई ऐसा वाजिब तर्क हुवा जो वाजीबाते नमाज़ से नहीं बल्कि इसका वुजुब अम्रे खारिज से हो तो सज्दए सहव वाजिब नहीं..
मसलन ख़िलाफे तरतीब क़ुरआन पढ़ना तर्के वाजिब (और गुनाह) है मगर इसका तअल्लुक़ वाजीबाते नमाज़ से नहीं बल्कि वाजीबाते तिलावत से है लिहाज़ा सज्दए सहव नहीं (अलबत्ता इससे तौबा करे)

     फ़र्ज़े तर्क होने से नमाज़ जाती रहती है सज्दए सहव से इसकी तलाफि नहीं हो सकती लिहाज़ा दोबारा पढ़िये।

     सुन्नते या मुस्तहब्बात मसलन *सना,* *तअव्वुज़,* *तस्मिया,* *आमीन,* *तकबिराने इन्तिक़ालात* और *तस्बिहात* के तर्क से सज्दए सहव वाजिब नहीं होता, नमाज़ हो गई, मगर दोबारा पढ़ लेना मुस्तहब है भूल कर तर्क किया हो या जानबुझ कर।

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Tuesday, 5 September 2017

*गुनाह कबीरा 6* #02
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_वालिदैन की ना फ़रमानी की मज़म्मत में फरमाने मुस्तफा_* #02

*_बाप जन्नत का दरमियानी दरवाज़ा है_*
     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم :
     बाप जन्नत के दरवाज़ों में से दरमियानी दरवाज़ा है अगर तू चाहे तो उस की हिफाज़त कर और अगर चाहे तो उसे ज़ाएअ कर।
*✍🏼ترمذى*
   
     जन्नत माओं के कदमों तले है
*✍🏼مسند الشهاب*

     बारगाहे रिसालत में एक शख्स हाज़िर हुवा जो आप صلى الله عليه وسلم के साथ जिहाद करने के लिये आप से इजाज़त तलब कर रहा था। आप صلى الله عليه وسلم ने इर्शाद फ़रमाया : क्या तेरे वालिदैन ज़िन्दा है ? उस ने कहा जी हाँ ! इर्शाद फ़रमाया : उन दिनों की खिदमत की कोशिश कर।
*✍🏼بخارى*

     तेरे हुस्ने सुलूक की ज़्यादा मुस्तहिक़ तेरी माँ, तेरा बाप, तेरी बहन और तेरा भाई है फिर जो रिश्तें में जितना क़रीब हो उस का मर्तबा है।
*✍🏼نساىٔى*

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*✍🏼76 कबीरा गुनाह, 43*

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*नमाज़े वित्र् के मदनी फूल*
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     नमाज़े वित्र् वाजिब है, अगर ये छूट जाए तो इसकी क़ज़ा लाज़िम है।
*✍🏼दुर्रेमुखतार, रद्दलमोहतार, 2/532*

     वित्र् का वक़्त ईशा के फर्ज़ो के बाद से सुबह सादिक़ तक है, जो सो कर उठने पर क़ादिर हो उस के लिये अफज़ल है कि पिछली रात में उठ कर पहले तहज्जुद अदा करे फिर वित्र्।
*✍🏼गुन्यातुल मुस्तमली, 403*

     इसकी 3 रकअत है, इसमें क़ादए ऊला वाजिब है सिर्फ तशह्हुद पढ़ कर खड़े हो जाइये।

     तीसरी रकअत में किराअत के बाद तकबीरे क़ुनूत कहना वाजिब है।

     जिस तरह तकबीरे तहरिमा कहते हो इसी तरह पहले हाथ कानो तक उठाये फिर अल्लाहु अक्बर कहिये, फिर हाथ बांध कर दुआए क़ुनूत पढ़िये।

     दुआए क़ुनूत के बाद दुरुद शरीफ पढ़ना बेहतर है
*✍🏼गुन्यातुल मुस्तमली, 402*

     जो दुआए क़ुनूत न पढ़ सके वो ये पढ़े 👇🏽
*अल्लाहुम्म रब्बना आतिना फिद-दुन्या हसनतव वफिल आखिरती हसनतव वक़ीन अज़ाबन्नार*

     अगर दुआए क़ुनूत पढ़ना भूल गए और रूकू में चले गए तो वापस न लौटीये बल्कि सजदए सहव कर लीजिये।
*✍🏼आलमगिरी 1/110*

     वित्र् जमाअत से पढ़ी जा रही हो और मुक्तदि क़ुनूत से फारिग न हुवा था कि इमाम रूकू में चला गया तो मुक्तदि भी रूकू में चला जाए।
*✍🏼आलमगिरी 1/110*
*✍🏼नमाज़ के अहकाम स.206*

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*नमाज़ क़ज़ा करने का वबाल*
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اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : जो कोई जान बुझ कर एक नमाज़ भी क़ज़ा कर देता है, उस का नाम जहन्नम के उस दरवाज़े पर लिख दिया जाएगा जिस से वो जहन्नम में दाखिल होगा।
*✍🏼حلية الأولياء*

     अल्लाह ने जहन्नमियो के बारे में इर्शाद फ़रमाया : _तुम्हें क्या बात दोज़ख में ले गई वो बोले हम नमाज़ न पढ़ते थे और मिसकीन को खाना न देते थे और बेहूदा फ़िक्र वालों के साथ बेहूदा फ़िक्रे करते थे।_
*✍🏼المدثر ٤٢ -٤٥*

*_कुछ दिन के लिये नमाज़ छोड़ सकते है ?_*
     हज़रते इब्ने अब्बास رضي الله عنه इर्शाद फ़रमाते है कि जब मेरी आँखों की सियाही बाक़ी रहने के बा वुजूद मेरी बिनाई जाती रहि तो मुझ से कहा गया : हम आप का इलाज करते है क्या आप कुछ दिन नमाज़ छोड़ सकते है ? तो में ने कहा : नहीं, क्यू कि हुज़ूर صلى الله عليه وسلم ने फ़रमाया : जिस ने नमाज़ छोड़ी तो वो अल्लाह से इस हाल में मिलेगा कि वो उस पर गज़ब फ़रमाएगा।
*✍🏼مجمع الزوائد*
*✍🏼40 फरमाने मुस्तफा, 81*

*मुक्कमल*

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
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*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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Monday, 4 September 2017

*83 आसान नेकियां* #43
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_मजलिस बर्खास्त होने की दुआ पढ़ना_*
     मजलिस से फारिग हो कर ये दुआ 3 बार पढ़ ले तो गुनाह मुआफ़ हो जाएंगे और जो इस्लामी भाई मजलिसे खैर व मजलिसे ज़िक्र में पढ़े तो उस के लिये उस खैर पर मुहर लगा दी जाएगी।
سُبْحٰنٙكٙ اللّٰهُمّٙ وٙ بِحٙمْدِكٙ لٙآاِلٰهٙ اِلّٙآ اٙنْتٙ اٙسْتٙغْفِرُكٙ وٙاٙتُوْبُ اِلٙيْكٙ
तर्जमा : तेरी ज़ात पाक है और ऐ अल्लाह तेरे ही लिये तमाम खुबिया है, तेरे सिवा कोई मअबूद नहीं, तुझ से बख्शीश चाहता हूँ और तेरी तरफ तौबा करता हूँ।
*✍🏼سنن ابوداود*

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*✍🏼आसान नेकियां, 119*

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*गुनाहे कबीरा 6*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_वालिदैन की न फ़रमानी करना_*
     अल्लाह इर्शाद फ़रमाता है : _और तुम्हारे रब ने हुक्म फ़रमाया कि उस के सिवा किसी को न पुजो और माँ बाप के साथ अच्छा सुलूक करो अगर तेरे सामने उन में एक या दोनों बुढ़ापे को पहुच जाए तो उन से हूँ (उफ़ तक) न कहना और उन्हें न झिड़कना और उन से ताज़ीम की बात कहना और उन के लिये आजिज़ी का बाज़ू बिछा नर्म दिली से और अर्ज़ कर कि ऐ मेरे रब तू इन दोनों ने मुझे छुटपन (छोटी उम्र) में पाला।
*✍🏼بناسراىٔيل*

_और हम ने आदमी को ताकीद की अपने माँ बाप के साथ भलाई की।
*✍🏼العنكبوت ٨*

*_वालिदैन की ना फ़रमानी की मज़म्मत में फरमाने मुस्तफा_*
     रसूले अकरम صلى الله عليه وسلم ने इर्शाद फ़रमाया : क्या में तुम्हें बड़े कबीरा गुनाहों के बारे में खबर न दूँ ? फिर आप ने उन गुनाहों में वालिदैन की ना फ़रमानी को भी ज़िक्र फ़रमाया।
*✍🏼مسلم*

     अल्लाह की रिज़ा वालिद की रिज़ा में है और अल्लाह की नाराज़ी वालिद की नाराज़ी में है।
*✍🏼ترمذى*

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*✍🏼76 कबीरा गुनाह, 42*

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*अल्लाह के लिये महब्बत करना*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
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     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : सब से बेहतरीन अमल अल्लाह के लिये महब्बत करना और अल्लाह के लिये दुश्मनी करना है।
*✍🏼سنن ابن داود*

     अल्लाह के लिये महब्बत का मतलब ये है की किसी से इस लिये महब्बत की जाए की वो दीनदार है और अल्लाह के लिये अदावत का मतलब ये है की किसी से अदावत हो तो इस बिना पर हो की वो दीन का दुश्मन है या दीनदार नहीं।
*✍🏼نزهت القارى*

     इमाम ग़ज़ाली عليه رحما फ़रमाते है : अगर कोई शख्स बावर्ची से इस लिये महब्बत करता है की इस से अच्छा खाना पकवा कर फुकरा को बांटे तो ये अल्लाह के लिये महब्बत है और अगर आलिमे दीन से इस लिये महब्बत करता है की इस से इल्में दीन सिख कर दुन्या कमाए तो ये दुन्या के लिये महब्बत है।
*✍🏼मीरआतुल मनाजिह्, 1/54*

     इमाम नववी عليه رحما फ़रमाते है :अल्लाह और रसूल की महब्बत में ज़िन्दा और इन्तिक़ाल कर जाने वाले औलिया व सालिहिन की महब्बत भी शामिल है और अल्लाह व रसूल की अफ़्ज़ल तरीन महब्बत ये है उन के अहकाम पर अमल और नवाहि से इजतिनाब किया जाए।
*✍🏼شرح مسلم النووى*
*✍🏼40 फरमाने मुस्तफा, 78*

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Friday, 1 September 2017

*कुफ़्र पर खातिमे का खौफ*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     इफ्तार पार्टी, दावत, नियाज़ और नात ख्वानी वग़ैरा की वजह से फ़र्ज़ नमाज़ों की मस्जिद की जमाअते ऊला तर्क करने की हरगिज़ इजाज़त नहीं, जो लोग बिल उज़्रे शरई बा वुजूद कुदरत फ़र्ज़ नमाज़ मस्जिद में जमाअते ऊला के साथ अदा नहीं करते उनको डर जाना चाहिये कि

     नबी ﷺ का फरमान है : जिसको ये पसन्द हो की कल अल्लाह तआला से मुसलमान हो कर मिले तो वो इन पांच नमाज़ों की जमाअत के साथ वहां पाबन्दी करे जहा अज़ान दी जाती है क्यूकी अल्लाह ने तुम्हारे नबी के लिये सुनने हुदा मशरू की और ये नमाज़े भी सुनने हुदा से है और अगर तुम अपने नबी की सुन्नत छोड़ दोगे तो गुमराह हो जाओगे।
*✍🏼मुस्लिम शरीफ 1/232*

     इस हदिष से इशारा मिलता है कि जमाअते ऊला की पाबन्दी करने वाले का खातिमा बिलखैर होगा और जो बिला शरई मजबूरी के मस्जिद की जमाअते ऊला तर्क करता है उसके लिये मआज़अल्लाह कुफ़्र पर खातिमे का खौफ है।

*या रब्बे मुस्तफा ! हमें पाचो नमाज़े मस्जिद की जमाअते ऊला में पहली सफ में तकबीरे ऊला के साथ अदा करने की हमेशा सआदत नसीब फ़रमा।*
_*आमीन बिजाहिन्नबीय्यिल अमिन*_

 *✍🏼नमाज़ के अहकाम स.204*

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Thursday, 31 August 2017

*83 आसान नेकियां* #42
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_किब्ला रुख बैठना_*
     बिल खुसुस तिलावत, दिनी मुतालआ, तस्नीफ व तालीफ़, दुआ व अज़कार और दुरुदो सलाम वगैरा के मवाकेअ पर और बिल उमुम जब बैठे या खड़े हों और कोई रुकावट न हो तो अपना चेहरा किब्ला रुख करने की आदत बना कर आख़िरत के लिये षवाब का ज़खीरा इकठ्ठा कीजिये। हुज़ूर صلى الله عليه وسلم उमुमन किब्ला रु हो कर बैठते थे। (किबले की दाई या बाई जानिब 45 डिग्री के ऐंगल के अंदर अंदर हो तो किब्ला रुख ही शुमार होगा)
*احياء العلوم*

*_3 फरमाने मुस्तफा_*
     मजालिस में सब से मुकर्रम (इज़्ज़त वाला) मजलिस (बैठक) वो है जिस में किबले की तरफ मुह किया जाए।
*المعجم الاوسط*

     हर शै के लिये शरफ (बुज़ुर्गी) है और मजलिस का शरफ ये है कि इस में किबले को मुह किया जाए।
*المعجم الكبير*

     हर शै के लिये सरदारी है और मजालिस की सरदारी इस में है की क़िबले को मुह करना।
*✍🏼المعجم الاوسط*
*✍🏼आसान नेकियां, 117*

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आप सभी हज़रात से गुज़ारिश है की जब भी आप किसी को लिख के सलाम करे तो सिर्फ *salam* इस तरह लिख के ही सलाम करे।

और जब जवाब देना है तो *salam* या *w. salam* इस तरह लिख के जवाब दे।

इस तरह लिख ने से आप का सलाम भी हो जायेगा और माना भी नही बदलेगा।

जब أن شاء الله लिखना है तो *in sha allah* इस तरह लिखे। इस से बेहतर ये है की आप *allah ne chaha to* ऐसा ही लिख दे।

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*कबीरा गुनाह 5*
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*_ज़कात न देना_*
     और खराबी है शिर्क वालों को वो जो ज़कात नहीं देते और वो आख़िरत के मुनकिर है।
*حم السجدة ٧، ٦*

     और वो की जोड़ कर रखते है सोना और चांदी और उसे अल्लाह की राह में खर्च नहीं करते उन्हें खुश खबरी सुनाओ दर्दनाक अज़ाब की जिस दिन वो तपाया जाएगा जहन्नम की आग में फिर उस से दागेंगे उन की पेशानियां और करवटें और पीठें ये है वो जो तुम ने अपने लिये जोड़ कर रखा था अब चखो मज़ा उस जोड़ने का।
*التوبة ٣٤، ٣٥*

*_ज़कात न देने की मज़म्मत में फरमाने मुस्तफा_*
     ऊंट गए और बकरियों का जो मालिक है उन की ज़कात अदा नहीं करेगा उसे क़यामत के दिन एक चटयल मैदान में लिटाया जाएगा जहाँ ये चौपाए उसे अपने सींगों से मारेंगे और अपने खुरों से रौंदेंगे जब उस पर उन में से आखरी जानवर गुज़र जाएगा तो दोबारा पहले गुज़रने वाला जानवर आ जाएगा। ये उस दिन होता रहेगा जिस की मिक़दार 50 हज़ार बरस है हत्ता की बन्दों के दरमियान फैसला कर दिया जाए तो ये अपना रास्ता जन्नत या दोज़ख की तरफ देखे।
     और जो खज़ाने का मालिक अपने खज़ाने की ज़कात अदा नहीं करेगा बरोज़े क़यामत उस के लिये उस के खज़ाने को गंजे सांप की सूरत में कर के उस पर मुसल्लत कर दिया जाएगा।
*✍🏼مسلم*

     जिन्होंने ज़कात को रोक लिया था रसूले पाक صلى الله عليه وسلم ने उन लोगों के हक़ में इर्शाद फ़रमाता : जिसने ज़कात को रोका हम उस से ज़कात भी लेंगे और उस के निस्फ़ ऊंट भी और ये हमारे रब के वाजिब करदा उमूर में से एक वाजिब है।
*✍🏼نساىٔى*

     पहले 3 अशखास जो जहन्नम में दाखिल होंगे वो ये है : (1) (जबरदस्ती) मुसल्लत होने वाला अमीर (2) मालदार शख्स जो अपने माल के बारे में अल्लाह का हक़ अदा न करता हो (3) मुतकब्बिर फ़क़ीर।
*✍🏼مصنف ابن أبى شيبة*

     हज़रते अब्दुल्लाह बिन मसऊद رضي الله عنه फ़रमाते है : तुम्हें नमाज़ और ज़कात का हुक्म दिया गया है तो जो ज़कात अदा नहीं करता उस की कोई नमाज़ नहीं है।
*✍🏼معجم الكبير*
*✍🏼76 कबीरा गुनाह, 40*

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*तकबीर तशरीक़*
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9 ज़िल हज्जा की फ़ज्र से 13 ज़िल हज्जा की अस्र तक हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद बुलन्द आवाज़ से एक मर्तबा तकबीर कहना वाजीब है [और तीन मर्तबा कहना अफ़ज़ल है] मर्द बुलन्द आवाज़ से कहें और औरतें धीरी आवाज़ से कहें ।
*✍🏼अल औसत - इब्न मंजर: 2209*

तीन मर्तबा कहना इस लिए अफ़ज़ल है के इन दिनों मे कसरत से ला इलाहा इल्लल्लाह, अल्लाहु अकबर और अल्हम्दुलिल्लाह कहने का हुक्म है ।
*✍🏼अहमद: 5445*

तकबीर तशरीक़ यह हैं: *अल्लाहु अकबर अल्लाहु अकबर ला इलाहा इल्लल्लाह, वल्लाहु अकबर अल्लाहु अकबर वलिल्लाहिल हम्द*
الله اکبر الله اکبر لا اله الا الله,
والله اکبر  الله اکبر ولله الحمد
*✍🏼अल मुसन्नफ़ - इब्न अबीशैबा: 5652*

*_जन्नत की ख़ुशख़बरी_*
जब भी कोई तकबीर कहने वाला तकबीर कहता है तो उसे ख़ुशख़बरी दी जाती है, पुछा गया जन्नत की? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: हाँ! ।
*✍🏼अल औसत - तबरानी: 7775*

ऐ अल्लाह! हमें ज़्यादा से ज़्यादा तकबीरात कहने की तौफ़ीक अता फ़रमा । आमीन

जुमुआ फज्र से लेकर मंगल की अस्र तक इस तकबीर को पढ़ना है।

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*फितना बाज़ की मज़म्मत*
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     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : फितना सो रहा है, इस के जगाने वाले पर अल्लाह की लानत।
*الجامع الصغير*

     किसी दिनी फायदे के बगैर लोगों को इज़्तिराब, इख़्तिलाफ़, मुसीबत और आज़माइश में मुब्तला कर के निज़ामे ज़िन्दगी को बिगाड़ देना "फितना" कहलाता है।
*الحديقة الندية*
     लिहाज़ा हर वो चीज़ जो मुसलमानों के दरमिया फ़ितने, शर, अदावत और बुग्ज़ का बाइस बने, हमें उस से बचना चाहिए। फ़ितने को क़ुरआन में क़त्ल से ज़्यादा सख्त कहा गया है, अगर इसी बात और गौर कर लिया जाए तो फ़ितने से बचने के लिये काफी है।
_और इन का फसाद तो क़त्ल से भी सख्त है।_
*البقرة ١٩١*

     इमाम बैज़ावी عليه رحما फ़ितने के क़त्ल से ज़्यादा सख्त व बुरा होने की वजह ये बयान करते है कि चूँकि क़त्ल के मुक़ाबले में फ़ितने की तकलीफ ज़्यादा सख्त और इस का रन्जो अलम ज़्यादा देर तक क़ाइम रहता है इसी लिये इस को क़त्ल से ज़्यादा सख्त फ़रमाया गया।
*✍🏼الحديقة الندية*
*✍🏼40 फरमाने मुस्तफा, 77*

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Wednesday, 30 August 2017

*तर्के जमाअत के आज़ार*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     मरीज, जिसे मस्जिद तक जाने में मशक़्क़त हो। अपाहज, जिसका पाउ कट गया हो, जिस पर फालिज गिरा हो.

     इतना बुढा कि मस्जिद तक जाने से आजिज़ हो, अँधा, अगर्चे अंधे के लिये कोई ऐसा हो की हाथ पकड़ कर मस्जिद तक पहुचा दे।

     सख्त बारिश और सदिद कीचड़ का हाइल होना, सख्त सर्दी, सख्त अँधेरा, आंधी।

     माल या खाने के ज़ाए होने का अंदेशा हो, क़र्ज़ ख्वाह का खौफ है और ये तंगदस्त है, ज़ालिम का खौफ।

     पखाना, पेशाब या रीह की हाजते शदीद है,
     खाना हाज़िर है और नफ़्स को इस की ख्वाहिश है।

     काफिला चले जाने का अंदेशा है।

     मरीज़ की तिमार दारी, कि जमाअत के लिये जाने से इसको तकलीफ होगी और घबराएगा।

👆🏽ये सब तर्के जमाअत के लिये उज़्र है।
*दुर्रेमुखतार मअ रद्दलमोहतर, 2/292*
*नमाज़ के अहकाम, स.203*

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*कबीरा गुनाह 4* #03
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_आमाल में सब से पहला सुवाल_*
     हुज़ूर صلى الله عليه وسلم ने इर्शाद फ़रमाया : क़यामत के दिन बन्दे के आमाल में सब से पहले नमाज़ के मुतअल्लिक़ सुवाल होगा। अगर ये दुरुस्त हुई तो उस ने फलाह व कामयाबी पाई और इस में कमी हुई तो वो ना मुराद हुवा और उस ने नुक़्सान उठाया।
*ترمذى*

     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : मुझे हुक्म दिया गया है कि में लोगों से जिहाद करूँ यहाँ तक कि वो ये गवाही दे कि अल्लाह के इलावा कोई मअबूद नहीं और मुहम्मद (صلى الله عليه وسلم) अल्लाह के रसूल है, नमाज़ क़ाइम करें और ज़कात दे। जब ये कर लेंगे मुझ से अपने खून व माल बचा लेंगे सिवाए इस्लामी हक़ के और उन का हिसाब अल्लाह के ज़िम्मे है।
*بجارى*

     हज़रते अबू सईद رضي الله عنه बयान करते है की एक शख्स ने कहा : या रसूलुल्लाह صلى الله عليه وسلم ! अल्लाह से डरिये ! रसूले करीम صلى الله عليه وسلم ने इर्शाद फ़रमाया : तेरी हलाकत हो !क्या में अहले ज़मीन में अल्लाह से सब से ज़्यादा डरने का हक़दार नहीं हूँ ? हज़रते खालिद बिन वलीद رضي الله عنه ने अर्ज़ की : या रसूलुल्लाह صلى الله عليه وسلم  !क्या में इस शख्स की गर्दन न मार दूँ ? ये सुन कर रसूले पाक ने फ़रमाया : नहीं कि हो सकता है ये नमाज़ पढ़ता हो।
*بجارى*

*_कारुन, फ़िरऔन, हमान और उबय बिन खल्फ़ के साथ हशर_*
     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : जो नमाज़ की हिफाज़त नहीं करेगा तो नमाज़ उस के लिये क़यामत के दिन नूर, दलील और नजात का बाइस नहीं होगी और वो बरोज़े क़यामत कारून, फ़िरऔन, हामान और उबय बिन खल्फ़ के साथ होगा।
*76 कबीरा गुनाह, 36*

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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Tuesday, 29 August 2017

*कबीरा गुनाह 4* #02
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_नमाज़ तर्क व क़ज़ा करने की मज़म्मत में रिवायत_*
     रसूलुल्लाह صلى الله عليه وسلم ने इर्शाद फ़रमाया हमारे और कुफ्फार के दरमियान फ़र्क़ नमाज़ है तो जिस ने नमाज़ तर्क कर दी, बिलाशुबा उस ने कुफ़्र किया।
*✍🏼ابن ماجة*

     जिस की नमाज़े असर फौत हो गई, उस के अमल ज़ब्त हो गए।

     बन्दे और शिर्क के दरमियान (फर्क) नमाज़ छोड़ देना है।

     जिस ने जान बुझ कर नमाज़ को तर्क किया तो बिलाशुबा अल्लाह का ज़िम्मा उस से बरी है।

     हज़रते उमर फ़ारूक़ رضي الله عنه ने इर्शाद फ़रमाया जिस ने नमाज़ ज़ाएअ की उस का इस्लाम में कोई हिस्सा नहीं।

     हज़रत अबू हुरैरा رضي الله عنه से मरवी है कि सहाबा आमाल में से नमाज़ छोड़ने के इलावा किसी अमल को कुफ़्र ख़याल नहीं करते थे।

आमाल में सबसे पहला सुवाल أن شاء الله अगली पोस्ट में..
*✍🏼76 कबीरा गुनाह, 35*

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*साकिये कौषर का फरमान*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : क़ौम को पानी पिलाने वाला, सब से आखिर में पिता है।
*صحيح مسلم*

     क़ानून ये है कि पिलाने वाला पीछे पिये, खिलाने वाला पीछे खाए। हम है पिलाने वाले इस लिये हम तुम्हारे बाद पियेंगे। ख्याल रहे कि रब तआला की तरफ से क़ासिम हुज़ूर صلى الله عليه وسلم थे और ता क़यामत है।
*✍🏼मीरआतुल मनाजिह्, 8/224*
*✍🏼40 फरमाने मुस्तफा, 75*

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
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*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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Monday, 28 August 2017

*83 आसान नेकियां* #41
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_बेचीं हुई चीज़ वापस लेना_*
     बाज़ अवक़ात एक इस्लामी भाई कोई चीज़ खरीदने के बाद किसी मजबूरी से वापस करना चाहता है हालाकिं उस शै में कोई ऐब भी नहीं होता और न ही कोई और शरई वजह होती है जिस से बेचने वाले पर उस चीज़ का वापस लेना वाजिब हो, लेकिन ऐसी सूरत में अगर वो खरीदार की परेशानी खत्म करने की निय्यत से वो चीज़ वापस ले ले तो उसे ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ेगा लेकिन फ़ज़ीलत बहुत बड़ी मिलेगी।
     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : जिसने किसी मुसलमान को बेचीं हुई चीज़ उस के वापस करने पर वापस ले ली अल्लाह क़यामत के दिन उस की परेशानी को उठा देगा।
*سنن ابن ماجة*

बाक़ी अगली पोस्ट में..ان شاء الله
*✍🏼आसान नेकियां, 116*

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
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*इमामत का बयान* #04
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

_*जमाअत का बयान*_
★ आकिल, बालिग़, आज़ाद  और क़ादिर पर मस्जिद की जमाअते ऊला वाजिब है बिला उज़्र एक बार भी छोड़ने वाला गुनाहगार और मुसरहिके सज़ा है। और कई बार तर्क करे तो फासिद्।मर्दुदुश्शहादह (यानी उसकी गवाही क़ाबिले क़बूल नहीं) और उसको सख्त सज़ा दी जाए, अगर पड़ोसियों ने खामोशी इख्तियार की तो वो भी गुनाहगार।
*✍🏼दुर्रे मुख्तार व रद्दलमोहतार, 2/287*

★ बाज़ फ़ुक़हाए किराम फरमाते है कि जो शख्स अज़ान सुन कर घर में इक़ामत का इंतज़ार करता है तो वो गुनाहगार होगा और उसकी गवाही क़बूल नहीं।
*✍🏼नमाज़ के अहकाम, स.203*

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*कबीरा गुनाह 4* #01
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
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*_नमाज़ छोड़ देना_*
     _तो उन के बाद उन की जगह वो ना खल्फ़ आए जिन्होंने नमाज़ें गवाई (जाएअ कि) और अपनी ख्वाहिशों के पीछे हुवे तो अन क़रीब वो दोज़ख में गय्य का जंगल पाएंगे मगर जो ताइब हुवे।_
*✍🏼مريم ٥٩، ٦٠*

     _तो उन नमाज़ियों की खराबी है जो अपनी नमाज़ से भूले बैठे है वो जो दिखावा करते है और बरतने की चीज़ मांगे नहीं देते।_
*✍🏼الماعون ٤ تا ٧*

     _तुम्हें क्या बात दोज़ख में ले गई ? वो बोले हम नमाज़ न पढ़ते थे और मिस्कीन को खाना न देते थे और बेहूदा फ़िक्र वालों के साथ बेहूदा फ़िक्रें करते थे और हम इंसाफ के दिन को झुटलाते रहे यहाँ तक की हमें मौत आई तो उन्हें सिफारिशियों की सिफारिश काम न देगी।_
*✍🏼المدثر ٤٢، ٤٧*

नमाज़ तर्क व क़ज़ा करने की मज़म्मत में रिवायत أن شاء الله अगली पोस्ट में..
*✍🏼76 कबीरा गुनाह ,34*

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*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*हया ईमान से है*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
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     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : हया ईमान से है।
*✍🏼صحيح مسلم*

     शर्मो हया ईमान का रुकने आला है। दुन्या वालों से हया दुन्यवी बुराइयों से रोक देती है। दीन वालों से हया दीनी बुराइयों से रोक देती है। अल्लाह रसूल से शर्मो हया तमाम बद अक़ीदगियों बद अमलियों से बचा लेती है। ईमान की इमारत इसी शर्मो हया पर क़ाइम है। दरख्ते ईमान की जड़ मोमिन के दिल में रहती है (जब कि) इस की शाखें जन्नत में है।
*✍🏼मीरआतुल मनाजिह्, 6/641*
*✍🏼40 फरमाने मुस्तफा, 72*

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Sunday, 27 August 2017

*83 आसान नेकियां* #40
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_मुसलमान भाई के लिये मुस्कुराना_*
     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : अपने भाई से मुस्कुरा कर मिलना तुम्हारे लिये सदक़ा है और नेकी की दावत देना और बुराई से मना करना सदक़ा है।
*✍🏼سنن ترمزى*

*_मगफिरत करदी जाती है_*
     हज़रते नुफैअ आमी رضي الله عنه फ़रमाते है कि हज़रते बरा बिन आज़िब رضي الله عنه से मेरी मुलाक़ात हुई तो उन्हों ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझ से मुसाफहा फ़रमाया और मुस्कुराने लगे, फिर पूछा : जानते हो में ने ऐसा क्यू किया ? में ने अर्ज़ की : नहीं। तो फरमाने लगे कि हुज़ूर صلى الله عليه وسلم ने मुझे शरफे मुलाक़ात बख्शा तो मेरे साथ ऐसे ही किया फिर मुझ से पूछा : जानते हो में ने ऐसा क्यू किया ? में ने अर्ज़ की नहीं। आप صلى الله عليه وسلم ने फ़रमाया कि जब दो मुसलमान मुलाक़ात करते वक़्त मुसाफहा करते है और दोनों एक दूसरे के सामने अल्लाह के लिये मुस्कुराते है तो उन के जुदा होने से पहले ही उन की मगफिरत कर दी जाती है।
*✍🏼المعجم الوسيط*

     मज़कूरा हदिष में लफ्ज़ "अल्लाह के लिये" अच्छी निय्यत की सराहत करता है। बहर हाल किसी मुसलमान से हाथ मिलाना और दौराने गुफ्तगू मुस्कुराना सिर्फ इसी सूरत में बाइषे षवाबे आख़िरत व मगफिरत है जब की ये हाथ मिलाना और मुस्कुराना सिर्फ अल्लाह की रिज़ा पाने की निय्यत से हो। अपनी मिलनसारी का सिक्का जमाने, किसी मालदार या सियासी शख्शिययत की ख़ुशनूदी पाने, दुन्यवी मज़मुम मफाद परस्ती वाली जाती दोस्ती बढ़ाने और معاذ الله अम्रद के हाथों के छूने और उस की जवाबी मुस्कुराहट के ज़रीए गुनाहों भरी लज़्ज़त पाने वगैरा बुरी निय्यतो के साथ न हो।
*✍🏼नेकी की दावत, 248*

बाक़ी अगली पोस्ट में..ان شاء الله
*✍🏼आसान नेकियां, 115*

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*इमामत का बयान* #03
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
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★ इक़ामत के बाद इमाम साहिब एलान करे
◆ अपनी एड़िया, गर्दने और कंधे एक सीध में कर के सफ सीधी कर लीजिये।

★ दो आदमियो के बिच में जगह छोड़ना गुनाह है,

★  कंधे से कंधा मस यानि टच किया हुवा रखना वाजिब, सफ सीधी रखना वाजिब और जब तक अगली सफ कोने तक पूरी न हो जाए जानबुझ कर पीछे नमाज़ शुरू कर देना तर्के वाजिब, हराम और गुनाह है।

★ 15 साल से छोटे ना बालिग़ बच्चों को सफो में खड़ा न रखिये, इन्हें कोने में भी न भेजिये छोटे बच्चों की सफ सब से आखिर में बनाइये।
*✍🏼फतावा रज़विय्या, 7/219 ता 225*
*✍🏼नमाज़ के अहकाम, स.202*

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*रज़्ज़ाक़ का करम*
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     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : रोज़ी बन्दे को ऐसे तलाश करती है जैसे उसे उस की मौत तलाश करती है।
*✍🏼حلية الأولياء*

    मक़सद ये है की मौत को तुम तलाश करो या न करो बहर हाल तुम्हें पहुंचेगी यूँही तुम रिज़्क़ को तलाश करो या न करो ज़रूर पहुचेंगा। हाँ ! रिज़्क़ की तलाश सुन्नत है और मौत की तलाश मम्नुअ, मगर है दोनों यक़ीनी।
*✍🏼मीरआतुल मनाजिह्, 7/126*
*✍🏼40 फरमाने मुस्तफा, 69*

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*गुनाहे कबीरा 3*
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*_जादू करना_*
     ऍन मुमकिन है की जादूगर कुफ़्र में मुब्तला हो जाए। अल्लाह इर्शाद फ़रमाता है :
_हाँ शैतान काफ़िर हुवे लोगों को जादू सिखाते है।_
*✍🏼البقرة*

     शैतान मर्दुद की इन्सानों को जादू सिखाने से गर्ज़ उन्हें शिर्क में मुब्तला करना है। अल्लाह हारुत व मारुत के मुतअल्लिक़ इर्शाद फ़रमाता है :
_और वो दोनों किसी को कुछ न सिखाते जब तक ये न कह लेते की हम तो निरी आज़माइश है तू अपना ईमान न खो तो उन से सीखते वो जिस से जुदाई डाले मर्द और उस की औरत में और उस से ज़रर नही पहुचा सकते किसी को मगर खुदा के हुक्म से और वो सीखते है  जो उन्हें नुक़्सान देगा नफा न देगा और बेशक ज़रूर उन्हें मालुम है की जिस ने ये सौदा लिया आख़िरत में उस का कुछ हिस्सा नहीं।_

*_जादूगर की सज़ा_*
     जादूगर की सज़ा क़त्ल है क्यू की उस ने अल्लाह के साथ कुफ़्र या कुफ़्र से मुशाबहत इख़्तियार की।

*_जादू की मज़म्मत में फरमाने मुस्तफा_*
     सात हलाक करने वाले गुनाहों से बचो। इन में आप صلى الله عليه وسلم ने जादू को भी ज़िक्र किया।
     जादूगर की सज़ा उसे तलवार से मार देना है।
     दुरुस्त ये है की ये रसूले अकरम صلى الله عليه وسلم की हदिष नहीं बल्कि हज़रते जुन्दुब رضي الله عنه का क़ौल है।
     3 शख्स जन्नत में दाखिल न होंगे : (1) शराब का आदि (2) कतए रहमी करने वाला (3) जादू की तस्दीक़ करने वाला।
इस हदिष को इमाम अहमद عليه رحما ने अपनी मुस्नद में रिवायत किया है।
     दम, तमिमा और तौला शिर्क है।
इसे इमाम अहमद व इमाम अबू दाऊद رحمه الله عليهما ने रिवायत किया है।
*✍🏼76 कबीरा गुनाह, 29*

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Saturday, 26 August 2017

*83 आसान नेकियां* #39
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*_मुसलमान भाई को तकया पेश करना_*
     मजलिस में आने वाले मुसलमान को तकया पेश करना बाइषे मगफिरत है, हज़रते सलमान फ़ारसी رضي الله عنه अमीरुल मुअमिनिन हज़रते उमर फारूक़ رضي الله عنه के पास हाज़िर हुवे, उस वक़्त अमीरुल मुअमिनिन तकये पर टेक लगाए बैठे थे। आप ने वी तकया हज़रते सलामन رضي الله عنه को दे दिया तो उन्हों ने अर्ज़ की ! अल्लाहु अकबर ! रसूलुल्लाह صلى الله عليه وسلم ने सच फ़रमाया। अमीरुल मुअमिनिन ने फ़रमाया हमें भी बताओ की आप صلى الله عليه وسلم ने क्या फ़रमाया था ? अर्ज़ की में बारगाहे रिसालत में हाज़िर हुवा उस वक़्त हुज़ूर صلى الله عليه وسلم तकये से टेक लगाए तशरीफ़ फरमा थे तो आप ने वो तकये मुझे अता फरमा दिया और इर्शाद फ़रमाया : कोई मुसलमान औने भाई के पास जाए और वो उस की तकरिम करते हुवे अपना तकया उसे दे तो अल्लाह उस की मगफिरत फरमा देता है।

बाक़ी अगली पोस्ट में..ان شاء الله
*✍🏼आसान नेकियां, 113*

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*चुगलखोर की मज़म्मत* #02
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*_क्या हम चुगली से बचते है ?_*
     अफ़सोस ! अक्सर लोगों की गुफ्तगू में आज कल गीबत व चुगली का सिलसिला बहुत ज़्यादा पाया जाता है। दोस्तों की बैठक हो या मज़हबी इजत्माअ के बाद जमघट, शादी की तक़रीब हो या ताज़ियत की निशस्त, किसी से मुलाक़ात हो या फोन पर बात, चन्द मिनट भी अगर किसी से गुफ्तगू की सूरत बीने और दीनी मालूमात रखने वाला कोई हस्सास फर्द अगर उस गुफ्तगू की तशखिस करे तो शायद अक्सर मजालिस में दीगर गुनाहों भरे अलफ़ाज़ के साथ साथ वो दर्जनों चुगलिया भी साबित कर दे।
     हाए ! हाए ! हमारा क्या बनेगा !!!एक बार फिर इस हदिष पर गौर कर लीजिये : "चुगल खोर जन्नत में नहीं जाएगा।" काश !हमें हक़ीक़ी मानो में ज़बान का कुफले मदीना नसीब हो जाए, काश ! ज़रूरत के सिवा कोई लफ्ज़ ज़बान से न निकले, ज़्यादा बोलने वाले और दुन्यवी दोस्तों के झुरमट में रहने वाले का गीबत और बिल खुसुस चुगली से बचना बेहद दुश्वार है। आह ! हदिष में है : "जिस शख्स की गुफ्तगू ज़्यादा हो उसकी गलतियां भी ज़्यादा होती है और जिस की गलतियां ज़्यादा हो उस के गुनाह ज़्यादा होते है और जिस के गुनाह ज़्यादा हो वो जहन्नम के ज़्यादा लाइक है।
*✍🏼حلية الاولياء*
*✍🏼बुरे खात्मे के अस्बाब, 9*

*_चुगली से तौबा_*
     हज़रते उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ رضي الله عنه के बारे में मरवी है की एक शख्स उन के पास हाज़िर हुवा और उस ने किसी दूसरे के बारे में कोई बात ज़िक्र की। आप ने फ़रमाया अगर तुम चाहो तो हम तुम्हारे मुआमले में गौर करे अगर तुम झुटे हुए तो इस आयत के मिसदाक़ हो गए : _अगर कोई फ़ासिक़ तुम्हारे पास कोई खबर लाए तो तहक़ीक़ कर लो।_
*✍🏼الحجر ٦*
     और अगर तुम सच्चे हुए तो इस आयत के मिसदाक़ हो जाओगे : _बहुत ताने देने वाला बहुत इधर की उधर लगाता फिरने वाला।_
*✍🏼القلم ١١*
     और अगर तुम चाहो तो हम तुम्हें मुआफ़ कर दें। उस ने अर्ज़ की : अमीरुल मुअमिनिन ! मुआफ़ कर दीजिये आइन्दा में ऐसा नहीं करूँगा।
*✍🏼احياء علوم الدين*
*✍🏼40 फरमाने मुस्तफा, 67*

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*गुनाहे कबीरा 2*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_क़त्ले नाहक़_*
     अल्लाह क़त्ले नाहक़ की मज़म्मत में इर्शाद फ़रमाता है : _और जो कोई मुसलमान को जान बुझ कर क़त्ल करे तो उस का बदला जहन्नम है की मुद्दतों उस में रहे और अल्लाह ने उस पर लानत की और उस के लिये तैयार रखा बड़ा अज़ाब।_
*✍🏼النساء ٩٣*

_और वो जो अल्लाह के साथ किसी दूसरे माबूद को नहीं पूजते और उस जान को जिस की अल्लाह ने हुरमत रखी नाहक़ नहीं मारते और बदकारी नहीं करते और जो ये काम करे वो सज़ा पाएगा बढ़ाया जाएगा उस पर अज़ाब क़यामत के दिन और हमेशा उस में ज़िल्लत से रहेगा मगर जो तौबा करे और ईमान लाए।
*✍🏼الفرقان ٦٨ تا ٧٠*

_जिस ने कोई जान क़त्ल की बगैर जान के बदले या ज़मीन में फसाद के तो गोया उस ने सब लोगों को क़त्ल किया।_
*✍🏼الماىٔدة ٣٢*

_और जब ज़िन्दा दबाई हुई से पूछा जाए किस खता पर मारी गई।_
*✍🏼التكوير ٩،٨*
*✍🏼76 कबीरा गुनाह, 21*

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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Friday, 25 August 2017

*83 आसान नेकियां* #38
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_नर्म गुफ्तगू करना_*
     दूसरों से नर्म अलफ़ाज़ और नर्म लबो लहजे में गुफ्तगू करने की आदत रब्बुल आलमीन की बहुत ही बड़ी नेअमत है।
     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : क्या में तुम्हें उस शख्स के बारे में खबर न दूँ जो जहन्नम पर हराम है, (या ये फ़रमाया की) जिस पर जहन्नम हराम है ? जहन्नम हर नर्म खून, नर्म दिल और अच्छी खूं वाले शख्स पर हराम है।

     गुस्से से मगलुब हो कर सख्त अलफ़ाज़ या सख्त रवैय्या इख़्तियार कर के खुद को इस फ़ज़ीलत से महरूम न कीजिये, अगर किसी को कुछ समझना हो या इख्तिलाफे राए का इज़हार करना हो तो इस के लिये भी वो अन्दाज़ इख़्तियार किया जाए जिस में रूखे पन या सख्ती के बजाए खैर ख्वाहि और दिल सजी का पहलू नुमायां हो।

बाक़ी अगली पोस्ट में..ان شاء الله
*✍🏼आसान नेकियां, 109*

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*चुगल खोर की मज़म्मत* #01
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : चुगल खोर जन्नत में दाखिल नहीं होगा।
*✍🏼صحيح البخاري*

     क़त्तात् वो शख्स है जो दो मुखालीफों की बातें छुप कर सुने और फिर उन्हें ज़्यादा लड़ाने के लिये एक की बात दूसरे तक पहुंचाए। अगर ये शख्स ईमान पर मरा तो जन्नत में अव्वलन न जाएगा बाद में जाए तो जाए अगर कुफ़्र पर मरा तो कभी वहाँ न जाएगा। (मुस्लिम शरीफ में नम्माम् का लफ्ज़ इस्तिमाल हुवा है)
     जो दो तरफा झूटी बातें लगा कर सुल्ह करा दे वो नम्माम् नही मुस्लेह है, नम्माम् वो है जो लड़ाई व फसाद के लिये ये हरकत करे।
*✍🏼मीरआतुल मनाजिह्, 6/452*

*_चुगली किसे कहते है ?_*
     अल्लामा ऐनी رحمة الله عليه  ने इमाम नववी عليه رحما से नकल फ़रमाया की किसी की बात ज़रर (यानी नुक़्सान) पहुचाने के इरादे से दूसरों को पहुचाना चुगली है।
*✍🏼عمدة القارى*

बाक़ी अगली पोस्ट में أن شاء الله
*✍🏼40 फरमाने मुस्तफा, 66*

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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
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*गुनाहे कबीरा 1*
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*_शिर्क करना_*
     शिर्क ये है की तू किसी को अल्लाह का हमसर क़रार दे हलांकि उस ने तुझे पैदा किया है और अल्लाह के साथ तू उस के गैर मसलन पथ्थर, इंसान, चाँद, सूरज, नबी, वली, जिन्न, सितारे या फ़रिश्ते वगैरा की इबादत करे।

*_शिर्क की मज़म्मत में 3 फरामिने बरी तआला_*
     अल्लाह इर्शाद फ़रमाता है : _बेशक अल्लाह उसे नहीं बख्शता की उस के साथ कुफ़्र किया जाए और कुफ़्र से निचे जो कुछ है जिसे चाहे मुआफ़ फरमा देता है।_
*✍🏼النساء ٤٨*

_बेशक जो अल्लाह का शरीक ठहराए तो अल्लाह ने उस पर जन्नत हराम कर दी और उस का ठिकाना दोज़ख है।_
*✍🏼الماىٔدة*

_बेशक शिर्क बड़ा ज़ुल्म है।_
*✍🏼لقمان ١٣*
     इस बारे में मूतअद्दिद आयाते मुबारका वारिद है। लिहाज़ा जिस शख्स ने अल्लाह के साथ शिर्क किया फिर ब हालाते शिर्क ही मर गया तो वो क़तई जहन्नमी है जैसा की वो शख्स जन्नती है तो अल्लाह पर ईमान लाया और ईमान की हालत में दुन्या स3 रुख्सत हुवा अगर्चे (किसी गुनाह के सबब) अज़ाब दिया जाए।

*_शिर्क की मज़म्मत में दो फरमाने मुस्तफा_*
     क्या में तुम्हें सब से बड़े गुनाह के बारे में न बताउं ? अल्लाह के साथ शरीक ठहराना सब से बड़ा गुनाह है।
     सात हलाक करने वाले गुनाहों से बचो। इन में एक आप صلى الله عليه وسلم ने शिर्क को भी ज़िक्र फ़रमाया।
*✍🏼مسلم*
*✍🏼76 कबीरा गुनाह, 20*

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गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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