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Tuesday, 26 July 2016

अब्लाक़ घोड़े सुवार

*क़ुरबानी वाजिब होने के लिये कितना माल होना चाहिये*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     हर बालिग़, मुकीम, मुसलमान मर्द व औरत, मालिक निसाब पर क़ुरबानी वाजिब है।
*✍🏽आलमगिरी, 5/292*

     मालिके निसाब होने से मुराद ये है कि उस शख्स के पास साढ़े बावन तोले चांदी या उतनी मालिययत की रक़म या उतनी मालिय्यत का तिजारत का माल या उतनी मालिय्यत का हाजते अस्लिय्या के इलावा सामान हो और उस पर अल्ला या बन्दों का इतना कर्ज़ा न हो जिसे अदा करके ज़िक्र करदा निसाब बाक़ी न रहे।
     फ़ुक़हाए किराम फरमाते है हाजते अस्लिय्या (यानी ज़रुरिय्याते ज़िन्दगी) से मुराद वो चीज़ है जिन की उमुमन इन्सान को ज़रूरत होती है जैसे रहने का घर, पहनने के कपड़े, सुवारि, इल्मे दिन से मुतअल्लिक़ किताबे, और पेशे से मुतअल्लिक़ औज़ार वगैरा।
*✍🏽अलहिदायह, 1/96*

     अगर हाजते अस्लिय्या की तारीफ़ पेशे नज़र रखी जाए तो बखूबी मालुम होगा की हमारे घरो में बे शुमार चीज़े ऐसी है कि जो हाजते अस्लिय्या में दाखिल नही, चुनांचे अगर इनकी कीमत साढ़े बावन टोला चादी के बराबर पहुच गई तो क़ुरबानी वाजिब होगी।
     आला हज़रत अलैरहमा से सुवाल किया गया की अगर ज़ैद के पास मक़ामे सुकुनत (यानी रिहाइशी मकान) के इलावा एक और मकान हो तो उस पर क़ुरबानी वाजिब होगया नही ?
     अल जवाब : वाजिब है, जब की वो मकान तन्हा या इस के माल से हाजते अस्लिय्या से ज़ाइद हो।
*✍🏽अब्लाक़ घोड़े सुवार, 6*
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तफ़सीरे अशरफी


हिस्सा-48
*सूरए बक़रह, पारह 01*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*आयत ④⑥, तर्जुमह*
जो समझे के बेशक वो मिलने वाले है अपने परवरदिगार से, और बेशक वो उसीकी तरफ लोटनेवाले है।

*तफ़सीर*
     ये खुशूअ वाले वो है, जो खूब अच्छी तरहसे समझे बुझे, यकीन  करे के बेशक उन्हें मरना है, फिर हशर के दिन उठना है, और उस दिन वो मिलनेवाले है लज्ज़ते दीदार पाने के लिये अपने परवरदिगार के हुज़ूर।
     और उन्हें इस दुन्याकि तंगी में हमेशा गिरफ्तार रहना नही है। बल्कि खुदा के फ़ज़ल से बेशक वो बिल आखिर उसी अल्लाह की तरफ लौटनेवाले है।
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मदनी पंजसुरह

*सूरए मुल्क के फ़ज़ाइल*
हिस्सा-01
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     हज़रते अबू हुरैराرضي الله تعالي عنه से रिवायत है कि हुज़ूरﷺ ने फ़रमाया : बेशक कुरानमें तीस आयतो पर मुश्तमिल एक सूरत है जो अपने क़ारी के लिये शफ़ाअत करती रहेगी यहां तक कि उस कि मग्फिरत कर दी जाएगी और ये सूरए मुल्क है।
*✍🏽तिर्मिज़ी 4/408*

     हज़रते अनसرضي الله تعالي عنه से रिवायत है की हुज़ूरﷺ ने फ़रमाया : क़ुरआन में एक सूरत है जो अपने क़ारी के बारे में झगड़ा करेगी यहां तक कि उसे जन्नत में दाखिल करा देगी और वो सूरए मुल्क है।
*✍🏽दुर्रेमन्सूर 8/233*
*✍🏽मदनी पंजसुरह 82*
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फुतूह अल ग़ैब

*क़ुरबे इलाही के मरहले*
हिस्सा-02
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     अल्लाह तबारक-व-तआला ने अपने बरगुज़ीदा नबी ﷺ  को फरमाया : हमने दुनिया के जो ज़ाहिरी अमवाल-व-अस्बाब कुफ्फार को दे रख्खे हैं, आप उनकी तरफ नज़र भर के न देखिये। क्योंके ये तो उनको फितना व इम्तेहान में मुब्तेला करने के लिये हैं और आपके रबका अता करदा रिज़्क आपके लिये बेहतर और बाकी रेहनेवाला है।
     इस कौले खुदावन्दीमें हुज़ूर पूर नूर ﷺ के पैरवों के लिये हफज़े हाल, सब्रो, शुक्र और अताकरदाह नेअमतों पर राज़ी रेहनेकी तलकीन की गई है। इसका मतलब ये है के खैर, मन्सबे नबुव्वत, इल्म, किनाअत, तवहीद-व-मआरिफत, जेहाद, सब्र, विलायत और फतुह गैबी वगैरह जो चीज़ें दिलके मुतल्लिक हबीबेपाक ﷺ को अता की गई हैं, वो इनकी ज़ात के लिये मखसूस हैं।
     दुनियाके माल और सामाने इशरत से बेहतर और दाएमी हैसियत की हैं और मुकम्मिल खैर का मतलब भी यही है के खुदाकी रज़ा पर राज़ी हो कर अपने हालकी हिफाज़त की जाए और फानी चीज़ोंकी तरफ मुल्तफिन (इल्तेफात करनेवाला) न होना ही नेकीयों और बरकतों की अस्ल हैं।
    दुनिया की तमाम अशयाको (चीज़ोंको) खुदावंद तआला ने बन्दोंकी आज़माइश के लिये पैदा किया है।

बाक़ी कल की पोस्ट में...इन्शा अल्लाह
*फुतूह अल ग़ैब 18*
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Monday, 25 July 2016

मुर्दे की बेबसी

*चार बे बुन्याद दावे*
हिस्सा-02
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_पहला दावा "में अल्लाह का बन्दा हु"_*
     वाक़ई मक़ामे गौर है यक़ीनन हर मुसलमान ये इक़रार करता है कि में अल्लाह का बन्दा हु, और ज़ाहिर है बन्दा "पाबन्द" होता है, मगर आज कल अक्सर मुसलमानो के काम आज़ादो वाले है।
     देखिये ! जो किसी का मुलाज़िम होता है वो उस की मर्ज़ी के मुताबिक़ ही काम करता है, यक़ीनन हम अल्लाह के बन्दे है और उसी का रिज़्क़ खा रहे है, मगर अफ़सोस हमारे काम कामिल बन्दों वाले नही,
     उसका हुक्म है नमाज़ पढ़ो, मगर सुस्ती कर जाते है, रमज़ान के रोज़े का हुक्म है, लेकिन हमारी एक तादाद है जो नही रखती। इसी तरह दीगर अहकामाते खुदा वन्दी की बजा आवरी में सख्त कोताहिया है।
*✍🏽मुर्दे की बेबसी 9*
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*इस्लाम का दुष्प्रचार ही इस्लाम के फैलने की वजह बना जानें कैसे*

     जितना इस्लाम का दुष्प्रचार किया गया शायद ही किसी और मजहब या धर्म का किया गया हो और ये सिलसिला आज से नहीं जब से जब इस्लाम के शांतिदूत मोहम्मदﷺ को नावुवत मिली थी उस दिन से था जिसके बाद सबसे पहले खुद कुरैश कवीले वालों ने इस्लाम का दुष्प्रचार किया  यहाँ तक की इस्लाम को बदनाम करने के साधनों को जुटाया गया.

*जितना ज़्यादा इस्लाम का दुष्प्रचार किया ये उतनी तेज़ी से फैलता चला गया*
     लोगों ने सोचा इस्लाम को वक़्त रहते ख़त्म कर दिया जाये मगर इसका असर उसके विपरीत हुआ उस ज़माने में जिस जगह इस्लाम को ज्यादा बदनाम किया गया इस जगह इस्लाम उतनी ही तेजी से फैला जब उस समय लोगो द्वारा इस्लाम को और मोहम्मदﷺ  को झूठा कहा गया
     जब लोगों को इस्लाम को करीब से जानने की उत्सुकता बढ़ती चली गई जिसके बाद जो इस्लाम को करीब से जान लेता था तो वह इस्लाम कुबूल कर लेता था.
     क्योकि बात थी सत्य और असत्य की क्योकि इस्लाम शांति और अमन का मजहब है इस्लाम एक ऐसा मजहब धर्म है जिसमे मर्द, औरत, बच्चा, बूढा, जवान, दोस्त, रिश्तेदार, सभी को इस्लाम ने हक़ दिया गया है इस्लाम अपने आप ने संपुर्ण है.
     आज जिस तरह इस्लाम को बदनाम करने के लिए कुछ लोगों द्वारा भरपूर कोशिश की जा रही है इस्लाम को बदनाम करने के लिए सभी साधनों का उपयोग किया जा रहा है जिसके फलस्वरूप आज अपनी तेजी से इस्लाम फ़ैल रहा है, क्योकि सोशल मिडिया पर सबसे ज्यादा इस्लाम का दुष्प्रचार देखने में आया है.

*इस्लाम को जानने की उत्सुकता लोगों के अंदर बड़ी*
     इस्लाम को जानने की उत्सुकता लोगों के अंदर बड़ी जिस तरह बार बार हर बुरी घटना का जिम्मेदार इस्लाम को ठहराया गया है उस से लोगो के अंदर इस्लाम को करीब से जानने की उत्सुकता बड़ी है और जिसने इस मजहब को समझा, दीवान होता नज़र आया है.

राजेंद्र नारायण लाल
M. A (इतिहास)
अपने एक लेख में इन सब बातों का उल्लेख करते हुए
इस्लाम को सिद्ध ईश्वरीय व्यबस्था बताया
*mytodayweb.com, hindi news*
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सिरते मुस्तफाﷺ


*_सरीय्यए अबू सलमह_*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     यकुम मुहर्रम सि.4 हि. को ना गहा एक शख्स ने मदीने में ये खबर पहुचाई कि तुलैहा बिन खुवैलद और सलमह बिन खुवैलद दोनों भाई कुफ्फार का लश्कर जमा करके मदीने पर चढ़ाई करने के लिये निकल पड़े है।
     हुज़ूरﷺ ने इस लश्कर के मुक़ाबले में हज़रते अबू सलमह को 150 मुजाहिदीन के साथ वाला फ़रमाता जिस में हज़रते अबू सबरह और हज़रते अबू उबैदाرضي الله تعالي عنهم जैसे मुअज़्ज़ज़् मुहाजिरिन व अन्सार भी थे।
     लेकिन कुफ्फार को जब पता चला कि मुसलमानो का लश्कर आ रहा है तो वो लोग बहुत से ऊंट क्र बक़रीया छोड़ कर भाग गए जिन को मुसलमान मुजाहिदीन ने माले गनीमत बना लिया और लड़ाई की नौबत ही नही आई।
*✍🏽सिरते मुस्तफा 288*
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अब्लाक़ घोडा

*क़ुरबानी के मसाइल*
*_मुस्तहब काम के लिये गुनाह की इजाज़त नही_*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     याद रहे ! 40 दिन के अंदर नाख़ून तराशना, बगलो और नाफ के निचे के बाल साफ़ करना ज़रूरी है, 40 दिनसे ज़्यादा ताखीर गुनाह है।
     आला हज़रत अलैरहमा फरमाते है : जुल हिज्जा के इब्तिदाई 10 दिन में नाख़ून वगैरा न काटने का हुक्म सिर्फ इस्तिहबाबी है, करे तो बेहटरहै न करे तो मुज़ायक़ा नही, न इस को हुक्म ना फ़रमानी कह सकते है, न क़ुरबानी में खामी आने की कोई वजह,
     बल्कि अगर किसी शख्स ने 31 दिन से किसी उज़्र के सबब ख्वाह बिला उज़्र नाख़ून न तराशे हो की चाँद ज़िल हिज्जा का हो गया तो वो अगरचे क़ुरबानी का इरादा रखता हो इस मुस्तहब पर अमल नही कर सकता की अब 10वी तक रखेगा तो नाख़ून तरशवाए हुए 41 दिन हो जाएगा और 40 दिन से ज़्यादा न बनवाना गुनाह है। फेल मुस्तहब के लिये गुनाह नही कर सकता।
*✍🏽फतावा रज़विय्या 20/353*
*✍🏽अब्लाक़ घोडा, 5,6*
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तफ़सीरे अशरफी


हिस्सा-47
*सूरए बक़रह, पारह 01*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*आयत ④⑤_तर्जुमह*
और मदद मांगो सब्र से और नमाज़ से। और बेशक वो ज़रूर बोज़ है, एमजीआर खुशुअवालो पर।

*तफ़सीर*
और याद रख्खो के तुमको हर हाल में मददगार की ज़रूरत है। तुम को हुक्म दिया जाता है के हर हाल में मदद मांगो...
ख्वाहिश को दबा कर,
पाबन्दी ए शरीअत को बर्दास्त कर के,
गुनाहो से बचने की तक़लीफ़ क़ुबूल कर के,
रोज़ा रख कर,  और
हर किस्म के सब्र से और नमाज़ की पाबंदी से।
     ख्वाह कितना ही गिरा गुज़रे, अगर सब्र व नमाज़ को अपनाडगर बना लिया और ऐसे साबिर और नमाज़ी हो गये के तुम सब्र व नमाज़ के पैकर बन गये, तो अब तुमको मददगार की तलाश न होगी। बल्कि मदद चाहने वाले तुमको तलाश करेंगे।
     और नमाज़ में तकलीफ कौनसी है ? हा ! बेशक वो ज़रूर भारी गुज़रती है और बोज़ है सुस्त लोगो और बे-खौफो के हक़ में। मगर खुशूअ (एकाग्रता) वालो पर बिलकुल आसान और फुल की तरह है। उनकी बंदगी आजिज़ी व जिज्ज़ पसंदी को भली लगती है।
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मदनी पंजसुरह

*सूरए कहफ़ के फ़ज़ाइल*
हिस्सा-02
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     हज़रते अबू सईद खुदरीرضي الله تعالي عنه से रिवायत है कि नबीﷺ ने फ़रमाया : जो जुमुआ के दिन सूरए कहफ़ पढ़े उसके लिये दो जुमुआ के दरमियान एक नूर रोशन कर दिया जाता है।
     एक रिवायत में है : जो शबे जुमुआ को लढ़े उसके और बैतूल अतीक़ (यानी काबा शरीफ) के दरमियान एक नूर रोशन कर दिया जाता है।
*शोएबुल ईमान 2/474*

     हज़रते अबू दरदाرضي الله تعالي عنه से रिवायत है, हुज़ूरﷺ ने फ़रमाया : जो सूरए कहफ़ की पहली 10 आयते याद करेगा दज्जाल से महफूज़ रहेगा।
     और एक रिवायत में है, जो सूरए कहफ़ की आखरी 10 आयते याद करेगा दज्जाल से महफूज़ रहेगा।
*✍🏽सहीह मुस्लिम 8/404*
*✍🏽मदनी पंजसुरह 37*

बेहतर यही है की पहली 10 और आखरी 10 आयते याद करले।
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Sunday, 24 July 2016

मुर्दे की बेबसी

*चार बे बुनयादी दावे*
हीस्सा-01
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     हज़रते शक़ीक़ बल्कि अलैरहमा फरमाते है : लोग चार चीज़ों माँ दावा करते है मगर उनका अमल उन के दावे के खिलाफ है,
(1) उनका ज़बानी क़ौल तो ये है कि हम अल्लाह के बन्दे है मगर उन के अमल आज़ादो जैसे है।
(2) कहते है कि अल्लाह तआला ही हमारी रोज़ी का कफ़ील है मगर वो बहुत कुछ मालो दौलत जमा कर लेने के बाद भी मुतमइन नही होते।
(3) कहते है कि दुन्या से आख़िरत बेहतर है मगर वो सिर्फ दुन्या ही की बेहतरी के लिये कोशा है।
(4) कहा करते है कि हमे एक दिन ज़रूर मरना पड़ेगा मगर ज़िन्दगी का अंदाज़ ऐसा है कि गोया कभी मारना ही नही।
*✍🏽उयुनुल हिकायत 70*

इन चारो की तफ़सीर इन्शा अल्लाह अगली पोस्ट में....
*✍🏽मुर्दे की बेबसी 9*
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*नमाज़ है एक बेहतरीन किस्म का योग – वैज्ञानिकों का दावा*

     हाल ही में हुए एक शोध में एक वैज्ञानिक ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि नमाज़ लोगों के संपुर्ण स्वस्थ के लिए एक कारगर योग है. वैज्ञानिकों ने इस बात को मान लिया है कि नमाज़ में बहुत सारे फायदे छुपे हुए है जिसको मुस्लमान अपनी ड्यूटी (फ़र्ज़) समझ कर अदा करता है. नमाज़ के दौरान की जाने वाली हरकतों में दुनिया का एक सबसे अच्छा योग छुपा हुआ है जिसमे आप के स्वस्थ के कई फायदे छुपे हुए है.

*_नमाज़ पड़ने से मानसिक और शारीरिक स्वास्थ अच्छा होता है_*
     नमाज़ पड़ने के दौरान आपकी मांशपेशियों की गति बाद जाती है, जिसकी वजह से इंसान की रक्तवाहिनियों में रक्तचाप जरुरी गति से बड़ जाता है जिससे आज के समय में होने वाली लो ब्लड प्रैशर की समस्या इंसान के शरीर से पूरी तरह ख़त्म हो जाती है इसकी वजह से हृदय में रक्त भरपूर मात्रा में पहुचने लगता है जिसकी वजह से हार्ट अटेक जैसी समस्याओं से छुटकारा पाया जा सकता है.
     रमजान के दौरान पड़ी जाने वाली नमाज़ जिसे तराबीह कहा जाता है जिसे मुस्लिम समुदाय के लोग ख़ास तौर पर रमजान में अदा करते है इस खास नमाज़ को पड़ने की वजह से इंसान की मासपेशियां अपना सही रूप ले लेती है. जिसकी वजह से सालभर आप को मांशपेशियों में खिंचाब की समस्या से निजात मिल जाता है. तराहबी अदा करने वाले इंसान का शरीर फिट बना रहता है. तराबीह अदा करने वाले इंसान के अंदर सहन शक्ति बाद जाती है नमाज़ अदा करने वाले इंसान के अंदर लचीलापन आ जाता है.

*_पांच वक़्त की नमाज पढ़ना मतलब तीन मील पैदल चलना_*
     अमेरिका की एक यूनिवरसिटी के एक स्टूडेंट ने अपने अध्यन के दौरान बताया कि पांच वक़्त की नमाज तीन मील प्रतिघंटे के बराबर है. तो फिर इतनी कसरत आप के स्वस्थ को सही रखने के लिए बहुत काफी है.
     नमाज़ को दुनिया का सबसे बड़ा योग बी कहा गया है. इसी प्रकार नमाज़ में की जाने वाली रुकू में इंसान की पीठ और कमर की कसरत हो जाती है. नमाज़ में सजदा किया जाता है जिसमे इंसान का सर उसके शरीर से नीचे हो जाता है जिससे मस्तिस्क की रक्तवाहिनियों में दबाब पड़ता है जिससे रक्त मस्तिस्क में भरपूर मात्रा में पहुच जाता है जिससे ब्रेन हेम्रेज़ होने का ख़तरा नहीं रहता.
     इसी तरह नमाज़ की हर अदायगी को रिसर्च किया गया जिसका उल्लेख कही न कही बैज्ञानिकों द्वारा किया जाता रहा है.
*✍🏽mytodayweb.com, hindi news*
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अब्लाक़ घोडा

*क़ुरबानी करने वाले बाल, नाख़ून न काटे*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     हज़रते मुफ़्ती अहमद यार खान अलैरहमा एक हदिष, "जब अशरा आ जाए और तुम में से कोई क़ुरबानी करना चाहे तो अपने बाल व खाल को बिलकुल हाथ न लगाए", के तहत फरमाते है : यानी अमीर वुजुबन या फ़क़ीर नफ़्लन क़ुरबानी का इरादा करे वो जुल हिज्जतील हराम का चाँद देखने से क़ुरबानी करने तक नाख़ून, बाल और (अपने बदन की) मुर्दार खाल वगैरा न काटे न कटवाए ताकि हाजियो से क़दर (यानी थोड़ी) मुशा-बहत हो जाए की वो लोग ऐहराम में हजामत नही करा सकते और ताकि क़ुरबानी हर बाल, नाख़ून के लिये जहन्नम से आज़ादी का फिदया बन जाए।
     ये हुक्म वाजिब नही, मुस्तहब है और हत्तल इम्कान मुस्तहब पर भी अमल करना चाहिए अलबत्ता किसी ने बाल या नाख़ून काट लिये तो गुनाह भी नही और ऐसा करने से क़ुरबानी में खलल भी नही आता, क़ुरबानी दुरुस्त हो जाती है। लिहाज़ा क़ुरबानी वाले का हजामत न करना बेहतर है लाज़िम नही।
     इस से मालुम हुवा की अच्छो की मुशा-बहत (यानी नकल) भी अच्छी है।

*_गरीबो की क़ुरबानी_*
     मुफ़्ती साहब मज़ीद फरमाते है : बल्कि जो क़ुरबानी न कर सके वो भी इस अशरह में हजामत न कराए, बक़रह ईद के दिन बादे  नमाज़े ईद हजामत कराए तो इन्शा अल्लाह क़ुरबानी का षवाब पाएगा।
*✍🏽मीरआतुल मनाजिह 2/370*
*✍🏽अब्लाक़ घोडा 4*
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हिस्सा-46
*सूरए बक़रह, पारह 01*
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*आयत ④④_तर्जुमह*
क्या हुक्म देते हो लोगो को नेकीका और भूल जाते हो खुद अपने को, हालांके तुम तिलावत करो किताब की। तो क्या अक्ल से काम नही लेते ?

*तर्जुमह*
     तुम लोग भी अजीब हो। जब अय क़अब इब्ने अशरफ और सारे यहूदियो ! तुमसे पूछा गया रसूले पाक के बारेमे, तो पहला जवाब तुम्हारा ये था के लोगो ! ये रसूल बरहक़ है। उनकी पैरवी करो।
     और जब तुम्हारे पैरवी करने की नोबत आई, तो मुकर गये। तो क्या हुक्म देते हो दूसरे लोगो को नेकी की के पैरवी करे रसूल की और नेक हो जाए और अपने हक़ में भूल जाते हो खुद अपने को और पैरवी के बजाए इनकार करते हो। हालांके तुम अन्जान नही हो। बल्कि तुम तिलावत किया करो अपनी किताब तौरेत की। इस नादानी का क्या ठिकाना है ? तो क्या अक्ल से काम नही लेते ? मामूली इन्सान की समज बुझ भी खो चुके हो ?
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फुतूह अल ग़ैब

*एअतेराफे तकसीर और इस्तिगफार*
(हिस्सा...5)
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     हुज़ूरﷺ को कुर्बकी मंज़िलो और गैब के मेदानो की सैर कराइ जाती थी और आपकी नूरानी खिलअतें तब्दील होती रेहती थी और हर नइ हालत बेहतर और रोशन होति थी और पेहली हालत में रवद अदबकी हिफाज़त करनेमें नुक्शान ज़ाहिर होता था।
     आपﷺ को इस्तिगफारकी तालीम दी जाती थी और बन्दे के लिय इस्तिगफारकी हालत सबसे बेहतर है। क्यों के इस तहर बन्दा कुसूरका एअतेराफ करता है और तौबा व इस्तिगफार बन्दे की दोनों सिफते अबुल बशर हज़रते आदम की मीरास (विरसा) है।
    जब एहद-व-पयमान भूल जाने और जन्नतमें हंमेशा रेहने, रेहमान व मन्नान मेहबूब की हमसायगी और अपने सामने मलाएका की तहयत (दुआ) व-सलाम की हाज़रीकी ख्वाहिशने उनकी हालतकी खूबियों पर परदा डाल दिया और खुदाके इरादेके बजाए उनकी अपनी ख्वाहिश ज़ाहिर हो गइ तो उनका शिकस्ता हो गया और उनकी पेहली हालत तबदील कर के उनकी विलायत माअज़ूल (मौकूफ) कर दी गइ।
     उनकी वो मंज़िलत न रही और उनकी हालते अनवार को मकद्दर (मेला) कर दिया गया। फिर खुदाने उन्हें मतनबह (खबरदार, आगाह) किया। उन्हें अपनी पाकिज़गी याद आइ और उन्हें एअतेराफकी तालीम और इकदारकी तल्कीन की गई।
     इस वक्त हज़रत आदमने अलैहिस्सलामने कहा – अय हमारे रब ! हमने अपने नफ्स पर ज़ुल्म किया अगर तू हमें माफ नहीं फरमाएगा तो हम खसारे में (नुक्सानमें) रेह जाएंगे। - फिर अन्वारे हिदायत, उलूमे तौबा और इसके गवामिज़ (भेद)-व-मसालह और जो चीज़ें उंनशे पोशीदा थीं और अभी ज़ाहीर ही न हुइ थीं, हजरत आदम अलैहिस्सलाम को दे दी गई। उनके इरादोंको खुदा तआलाने अपने इरादों में तब्दील कर दिय।

बाक़ी कल की पोस्ट में..इन्शा अल्लाह
*फुतूह अल ग़ैब, सफा,16* ___________________________________
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Saturday, 23 July 2016

मुर्दे की बेबसी

*वज़ारते काम नही आएगी*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     अल्लाह ने इन्सान को अपनी इबादत के लिये पैदा किया है, अगर इस ने अपनी ज़िन्दगी के मक़सद में काम्याबी हासिल नही की और बरोज़े महशर गुनाहो का अम्बार ले कर अपने परवरदिगार के दरबार में पेश हुवा तो रब तआला की नाराज़ी की सूरत में इसकी दुन्या की बे शुमार दौलत भी इसे अपने रब्बे क़ह्हार के क़हरो गज़ब से नही बचा सकेगी।
     इकतिदार के नशे में मस्त हो कर एक दूसरे के ऐबो को उछालने वालो, दहशत गर्दीयो का बाज़ार गर्म करने वालो और मुसलमानो के हुक़ूक़ पामाल करने वालो के लिये लमहाए फ़िक्रिया है, अगर मासियत के सबब अल्लाह तआला नाराज़ हो गया, उस के प्यारे हबीबﷺ रूठ गए और ईमान बर्बाद हो गया तो वो वो मुश्किलात दरपेश होगी जो कभी भी हल नही होगी।
     रब्बुल इबाद पारह 30 सूरए हुमज़ह में इरशाद फ़रमाता है :
अल्लाह के नाम से शुरू जो निहायत महेरबान रहम वाला। खराबी है उस उसके लिये जो लोगो के मुह पर ऐब करे पीठ पीछे बदी करे, जिसने माल जोड़ा और गिन गिन कर रखा, क्या ये समझता है कि उसका माल उसे दुन्या में हमेशा रखेगा, हरगिज़ नही ज़रूर वो रौंदने वाली में फेका जाएगा और तू ने क्या जाना क्या रौंदने वाली, अल्लाह की आग की भड़क रही है, वो जो दिलो पर चढ़ जाएगी, बेशक वो उन पर बन्द कर दी जाएगी लम्बे लम्बे सुतुनो में।
*✍🏽मुर्दे की बेबसी 8*
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सिरते मुस्तफाﷺ


*_सि 3. हि. के वाक़ीआते मुतफ़र्रिका_*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     हिजरत के तीसरे साल में मुन्दरीजए ज़ैल वाक़ीआत भी जूहुर पज़ीर हुए।
     15 रमज़ान सि.3 हि. को हज़रते इमामे हसनرضي الله تعالي عنه की विलादत हुई।
     इसी साल हुज़ूरﷺ ने हज़रते बीबी हफ्साرضي الله تعالي عنها से निकाह फ़रमाया। हज़रते हफ्सा हज़रते उमरرضي الله تعالي عنه की साहब ज़ादि है जो गज़्वए बद्र के ज़माने में बेवा हो गई थी। इनके मुफ़स्सल हालात अज़्वाजे मुतह्हरात के ज़िक्र में आगे तहरीर किये जाएंगे।
     इसी साल हज़रते उष्मानرضي الله تعالي عنه ने हुज़ूरﷺ की साहब ज़ादि हज़रते उम्मे कुलषुमرضي الله تعالي عنها से निकाह किया।
     मिराष् के अहकाम व क़वानीन भी इसी साल नाज़िल हुए। अब तक मिराष् में ज़विल अरहाम का कोई हिस्सा न था। इन के हुक़ूक़ का मुफ़स्सल बयान नाज़िल हो गया।
     अब तक मुशरिक औरतो का निकाह मुसलमानो से जाइज़ था मगर सि.3 हि. में इस की हुरमत नाज़िल हो गई और हमेशा के लिये मुशरिक औरतो का निकाह मुसलमानो से हराम कर दिया गया।
*✍🏽सिरते मुस्तफा 286*
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अब्लाक़ घोडा

*पुल सिरात की सवारी*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     हुज़ूरﷺ ने फ़रमाया : इन्सान बक़रह ईद के दिन कोई ऐसी नेकी नही करता जो अल्लाह को खून बहाने से ज़्यादा प्यारी हो, ये क़ुरबानी क़यामत में अपने सींगो, बालो और खुरो के साथ आएगी, और क़ुरबानी का खून ज़मीन पर गिरने से पहले अल्लाह के हां क़बूल छ्प जाता है। लिहाज़ा खुश दिली से क़ुरबानी करो।
*✍🏽तिर्मिज़ी 3/162*

     शेख अब्दुल हक़ मुहद्दिस दहलवी अलैरहमा फरमाते है : क़ुरबानी अपने करने वाले के नेकियों के पल्ले में रखी जाएगी जिस से नेकियों का पलड़ा भारी होगा।

     हज़रते अल्लामा अली क़ारी अलैरहमा फरमाते है : फिर उस के लिये सुवारि बनेगी जिस के ज़रिए ये शख्स ब आसानी पुल सिरात से गुज़रेगा और उस (जानवर) का हर उज़्व मालिक (यानी क़ुरबानी पेश करने वाला) के हर उज़्व के लिये जहन्नम से आज़ादी का फिदया बनेगा।
*✍🏽मीराआत 2/375*
*✍🏽अब्लाक़ घोडा 3,4*
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तफ़सीरे अशरफी


हिस्सा-45
*सूरए बक़रह, पारह 01*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*आयत ④③_तर्जुमह*
और अदा करते रहो नमाज़को और देते रहो ज़कात को और रूकू करो रूकू करनेवालो के साथ।

*तफ़सीर*
     और अल्लाह के फराइज़ अबसे पूरा करते रहो। यु के अदा करते रहो पाबंदी के साथ नमाज़ को और साल बी साल देते रहो ज़कात को।
     नमाज़ तो पढ़ो और रूकू करो, मगर तन्हा मुनासिब नही, बल्कि रूकू करनेवालो की जमाअत के साथ।
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फुतूह अल ग़ैब

*एअतेराफे तकसीर और इस्तिगफार*
(हिस्सा-4)

*بِسْــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ*

     ये वाज़ेह है के अल्लाह तबारक व तआला हर शै पर कादिर है। उसको कुदरत से आजिज़ न समजना, तकदीरो तदबीर पर इतहाम (तोहमत लगाना) न तराशना, उसके वादों पर किसी शक-शुबाका इज़हार न करना। ताके हुजूरे अकरम ﷺ के अस्वए हुस्ना (अच्छे नमूने) की तकलीद कर शको।   हुज़ूर ﷺ  पर आयतें और सूरतें नाज़िल हुइ। इन्हें सफह में लिखा गया और मस्जिदो मेहराबमें पण्हा गया। फिर उन्हें मन्सूख करके दूसरी आयत लाइ गइ। ये हुज़ूर ﷺ  शरइ और ज़ाहिरी हालत थी। आपके बातिनी एहवाल और उलूमसे या आप खुद वाकिफ है। या आपका खुदा।
      हुजूर ﷺ  ने इरशाद फरमाया के जब मेरे दिल को ढांप लिया जाता तो में हर रोज सत्तर (70) मरतबा (एक और रिवायतमें है के सो-100 मरतबा) मगफेरत करता था और वो हालत दुसरी हालतमें तबदील कर दी जाती थी।

बाक़ी कल की पोस्ट में... इंसा अल्लाह

*✍🏽फुतूहल ग़ैब*  पेज 15
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