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Friday, 10 February 2017

*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #145
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_सूरतुल बक़रह, आयत ①⑨⑦_*
     हज के कई महीने हैं जाने हुए  (1) तो जो उनमें हज की नियत करे  (2) तो न औरतों के सामने सोहबत (संभोग) का तज़किरा (चर्चा) हो न कोई गुनाह न किसी से झगड़ा  (3) हज के वक़्त तक और तुम जो भलाई करो अल्लाह उसे जानता है (4) और तोशा परहेज़गारी है (5) और मुझसे डरते रहो  ऐ अक़्ल वालो (6)

*तफ़सीर*
     (1) शव्वाल, ज़िल्काद और दस तारीख़े ज़िल्हज की, हज के काम इन्हीं दिनों में दुरूस्त हैं, अगर किसी ने इन दिनों से पहले हज का इहराम बाँधा तो जायज़ है लेकिन कराहत के साथ.
     (2) यानी हज को अपने ऊपर लाज़िम व वाजिब करे इहराम बाँधकर, या तलबियह कहकर, या क़ुरबानी का जानवर चलाकर. उसपर ये चीज़ें लाज़िम हैं, जिनका आगे ज़िक्र फ़रमाया जाता है.
     (3) “रिफ़स” सहवास या औरतों के सामने हमबिस्तरी का ज़िक्र या गन्दी और अश्लील बातें करना है. निकाह इसमें दाख़िल नहीं. इहराम वाले मर्द और इहराम वाली औरत का निकाह जायज़ है अलबत्ता सहवास यानी हमबिस्तरी जायज़ नहीं.
     “फ़ुसूक़” से गुनाह और बुराईयाँ और “जिदाल” से झगड़ा मुराद है, चाहे वह अपने दोस्तों या ख़ादिमों के साथ हो या ग़ैरों के साथ.
     (4) बुराइयों या बुरे कामों से मना करने के बाद नेकियों और पुण्य की तरफ़ बुलाया कि बजाय गुनाह के तक़वा और बजाय झगड़े के अच्छे आचरण और सदव्यवहार अपनाओ.
     (5) कुछ यमन के लोग हज के लिये बेसामानी के साथ रवाना होते थे और अपने आपको मुतवक्किल कहते थे और मक्कए मुकर्रमा पहुंचकर सवाल शुरू करते और कभी दूसरे का माल छीनते या अमानत में ख़यानत करते, उनके बारे में यह आयत उतरी और हुक्म हुआ कि तोशा लेकर चलो, औरों पर बोझ न डालों, सवाल न करो, कि बेहतर तोशा परहेज़गारी है.
     एक क़ौल यह है कि तक़वा का तोशा साथ लो जिस तरह दुनियावी सफ़र के लिये तोशा ज़रूरी है, ऐसे ही आख़िरत के सफ़र के लिये परहेज़गारी का तोशा लाज़िम है.
     (6) यानी अक़्ल का तक़ाज़ा अल्लाह का डर है, जो अल्लाह से न डरे वह बेअक़्लों की तरह है.
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मिट जाए गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाये यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*सिरते मुस्तफाﷺ*
*_दसवा बाब_* #23
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*​जंगे खन्दक*​ #08
*_नौफिल की लाश_*
     नौफिल गुस्से में बिफरा हुवा मैदान में निकला और पुकारने लगा की मेरे मुकाबले के लिये कौन आता है ? हज़रते ज़ुबैर बिन अल अव्वामرضي الله تعالي عنه उस पर बिजली की तरह झपटे और ऐसी तलवार मारी की वो दो तुकड़े हो गया और तलवार ज़ीन को काटती हुई घोड़े की कमर तक पहुच गई, लोगो ने कहा की ऐ ज़ुबैर ! तुम्हारी तलवार की तो मिषाल नही मिल सकती। आप ने फ़रमाया की तलवार क्या चीज़ है ? कलाई में दम खम और ज़र्ब में कमाल चाहिए।
     हबीरा और जरार भी बड़े तन तने से आगे बढ़े मगर जब ज़ुल्फ़ीक़ार का वार देखा तो लरज़ा बर अंदाम हो कर फिरार हो गए। कुफ्फार के बाक़ी शह सुवार भी जो खन्दक को पार कर के आ गए थे वो सब भी भाग खड़े हुए और अबू जहल का बेटा इकराम तो इस क़दर बद हवास हो गया की अपना नेजा फेक कर भागा और खन्दक के पार जा कर उस को क़रार आया।

*_हज़रते ज़ुबैर को खिताब मिला_*
     हुज़ूरﷺ ने जंगे खन्दक के मौके पर जब की कुफ्फार मदीने का मुहासरा किये हुए थे और किसी के लिये शहर से बाहर निकलना दुश्वार था, तिन मर्तबा इरशाद फ़रमाया की कौन है जो क़ौमे कुफ्फार की खबर लाए। तीनो बार हज़रते ज़ुबेरرضي الله تعالي عنه ने जो हुज़ूरﷺ की फूफी हज़रते स्फिय्याرضي الله تعالي عنها के फ़रज़न्द है ये कहा की "या रसूलुल्लाहﷺ ! में खबर लाऊंगा।" हज़रते ज़ुबेरرضي الله تعالي عنه की इस जा निषारि से खुश हो कर हुज़ूरﷺ ने फ़रमाया की : हर नबी के लिये हवारी (मददगारे ख़ास) होते है और मेरा हवारी ज़ुबेर है।
     इसी तरह हज़रते ज़ुबेरرضي الله تعالي عنه को बारगाहे रिसालत से हवारी का खिताब मिला जो किसी दूसरे सहाबी को नही मिला।
*✍🏽सिरते मुस्तफा, 338*
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*जुम्मा को रुहो का अपने घर आना*
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     हजरत शाह अब्दुल हक मुहद्दिस (रहमतुल्लाह अलैह) नक्ल करते है की:-
"बाज रिवायतो मे आया है की मय्यत की रुह सबे जुम्मा को अपने घर आती है और देखती है की उसकी तरफ से कोई सदका करता है या नही??
*✍🏽अशहतुल लमआत शरहे मिश्कात बाब : किताबुल जनैज जियारते कुबुर जिल्द-2, सफा-924-925*
*✍🏽फत्वा रिजवीया जिल्द-9, सफा-652*

     मोमीन की रुह हर सबे जुम्मा, ईद के दिन, आशुरह के दिन, और शबे बरात, अपने घर आकर बाहर खड़ी होती है और हर रुह गमनाक बुलन्द अवाज से निदा करती है की ऐ मेरे घर वालो ऐ मेरे औलाद ऐ मेरे रिश्तेदारो सदका करके हम पे मेहरबानी करो।
*✍🏽कशफुल गैत बाब : अहकामे दुआ सफा-66*
*✍🏽फत्वा रिजवीया जिल्द-9, सफा-652*

     कम से कम जुम्मा के दिन अपने घर इन्तेकाल कर चुके घरवालो को इसाले सवाब जरुर कर दिया करे। क्योंकी हम जो पढ़कर या करके इसाले सवाब करेंगे ओ उनको पहुंचेगा जिससे उनको फायदा हासिल होगा।
     अगर वो मय्यत गुनाहगार थी तो गुनाह माफ होंगे और नेकियां मिलेगी और मय्यत नेक थी तो उसके जन्नत मे दर्जे बुलन्द होंगे।
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मिट जाए गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
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*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*99 अस्माए हुस्ना और इन के फ़ज़ाइल* #
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

हर विर्द के अव्वल व आखिर एक बार दुरुद शरीफ पढ़ लीजिये, फाएदा ज़ाहिर न होने की सूरत में शिकवा करने के बजाए अपनी कोताहियो की शामत तसव्वुर कीजिये और अल्लाह की मस्लहत पर नज़र रखिये।

*يٙا بٙاقِىْ*
जो सूरज निकलने से पहले 100 बार रोज़ पढ़ेगा ان شاء الله दुःख से महफूज़ रहेगा।

*✍🏽मदनी पंजसुरह, 259*
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*नमाज़े वित्र् के मदनी फूल*
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     नमाज़े वित्र् वाजिब है, अगर ये छूट जाए तो इसकी क़ज़ा लाज़िम है।
*✍🏽दुर्रेमुखतार, रद्दलमोहतार, 2/532*

     वित्र् का वक़्त ईशा के फर्ज़ो के बाद से सुबह सादिक़ तक है, जो सो कर उठने पर क़ादिर हो उस के लिये अफज़ल है कि पिछली रात में उठ कर पहले तहज्जुद अदा करे फिर वित्र्।
*✍🏽गुन्यातुल मुस्तमली, 403*

     इसकी 3 रकअत है, इसमें क़ादए ऊला वाजिब है सिर्फ तशह्हुद पढ़ कर खड़े हो जाइये।
     तीसरी रकअत में किराअत के बाद तकबीरे क़ुनूत कहना वाजिब है।
     जिस तरह तकबीरे तहरिमा कहते है इसी तरह पहले हाथ कानो तक उठाये फिर अल्लाहु अक्बर कहिये, फिर हाथ बांध कर दुआए क़ुनूत पढ़िये।
     दुआए क़ुनूत के बाद दुरुद शरीफ पढ़ना बेहतर है
*✍🏽गुन्यातुल मुस्तमली, 402*

जो दुआए क़ुनूत न पढ़ सके वो ये पढ़े
*अल्लाहुम्म रब्बना आतिना फिद-दुन्या हसनतव वफिल आखिरती हसनतव वक़ीन अज़ाबन्नार*

     अगर दुआए क़ुनूत पढ़ना भूल गए और रूकू में चले गए तो वापस न लौटीये बल्कि सजदए सहव कर लीजिये।
     वित्र् जमाअत से पढ़ी जा रही हो और मुक्तदि क़ुनूत से फारिग न हुवा था कि इमाम रूकू में चला गया तो मुक्तदि भी रूकू में चला जाए।
*✍🏽आलमगिरी 1/110*
 *✍🏽नमाज़ के अहकाम स.206*
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*99 अस्माए हुस्ना और इन के फ़ज़ाइल* #94
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*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

हर विर्द के अव्वल व आखिर एक बार दुरुद शरीफ पढ़ लीजिये, फाएदा ज़ाहिर न होने की सूरत में शिकवा करने के बजाए अपनी कोताहियो की शामत तसव्वुर कीजिये और अल्लाह की मस्लहत पर नज़र रखिये।

*يٙا بٙدِيْعُ*
जिस को कोई सख्त मुहीम दरपेश हो 70,000 बार पढ़े, ان شاء الله कामयाब होगा।

*✍🏽मदनी पंजसुरह, 259*
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Thursday, 9 February 2017

*उरफा (वलीलोग)की दुआऐं कुबूल न होनेकी वजह* #1
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

              हज़रत मोहियुद्दीन अब्दुल कादर जीलानी  رضي الله تعالي عنهने इर्साद फ़रमाया : एहले मआरिफतकी दुआओंकी कबूलियत और उनसे किये गए वादों की तकमील इस लिये नहीं होती के कहीं उन पर उम्मीद ग़ालिब न हो जाए। क्यों के उम्मीद व बीम (डर) हर हालत और हर मकाम पर मौजूद है और ये खौफ व रिजा परिन्दे के परों की तरह है के उसकी परवाज़ दोनों बाज़ुओं की मरहुने मिन्नत होती है। चुनान्चे बीम व रिजा के बगैर ईमानकी तकमील भी मुमकिन नहीं और हाल व मकाम के बगैर कोई आदमी उरूज़ व कमाल की मंज़िलको नहीं पा सकता।
      हर हालत और हर मकामके मुताबिक बीम व रजा लाज़मी है और आरीफ चूंके तकर्रुब खुदावन्दी का हामिल होता है इसलिये इसका हाल व मकाम ये है के वो खुदा के सिवा किसी तरफ माइल ना हो ना किसी और से आराम व सुकून ले, ना किसी और से उन्स करे।
       पस, अगर आरिफ अपनी दुआकी कबूलियत चाहता है और ख़ुदावन्द तआला से वफाए अहद तलब करता है तो ये उसके मनसब (दरजा) से कमतर बात है और इसके लिये ज़ेबा नहीं।
बाक़ी कल की पोस्ट में... इंसा अल्लाह

*✍🏽फुतूहल ग़ैब*  पेज 102,103
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Wednesday, 8 February 2017

*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #144
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_सूरतुल बक़रह, आयत ①⑨⑥_*
     और हज व उमरा अल्लाह के लिये पूरा करो(19)
फिर अगर तुम रोके जाओ (20)
तो क़ुरबानी भेजो जो मयस्सर (उपलब्ध) आए (21)
और अपने सर न मुडाओ जब तक क़ुरबानी अपने ठिकाने न पहुंच जाए (22)
फिर जो तुममें बीमार हो उसके सर में कुछ तकलीफ़ है  (23)
तो बदला दे रोज़े (24) या ख़ैरात (25) या क़ुरबानी,
फिर जब तुम इत्मीनान से हो तो जो हज से उमरा मिलाने का फ़ायदा उठाए (26)
उस पर क़ुरबानी है जैसी मयस्सर आए (27)
फिर जिसकी ताक़त न हो तीन रोज़े हज के दिनों में रखे  (28)
और सात जब अपने घर पलट कर जाओ, ये पूरे दस हुए यह हुक्म उसके लिये है जो मक्के का रहने वाला न हो, (29)
और अल्लाह से डरते रहो और जान रखो कि अल्लाह का अज़ाब सख़्त है.
*तफ़सीर*
     (19) और इन दोनों को इनके फ़रायज़ और शर्तों के साथ ख़ास अल्लाह के लिये बे सुस्ती और बिला नुक़सान पूरा करो. हज नाम है इहराम बाँधकर 9वीं ज़िलहज को अरफ़ात में ठहरने और काबे के तवाफ़ का. इसके लिये ख़ास वक़्त मुक़र्रर है, जिसमें ये काम किये जाएं तो हज है.
     हज सन नौ हिजरी में फ़र्ज़ हुआ. इसकी अनिवार्यता निश्चित है.
     हज के फ़र्ज़ ये हैं : (1) इहराम (2) नौ ज़िल्हज को अरफ़ात के मैदान में ठहरना (3) तवाफ़े ज़ियारत.
     हज के वाजिबात ये हैं : (1) मुज़्दलिफ़ा में ठहरना, (2) सफ़ा मर्वा के बीच सई, (3) शैतानों को कंकरियाँ मारना. (4) बाहर से आने वाले हाजी के लिये काबे का तवाफ़े रूख़सत और (5) सर मुंडाना या बाल हल्के कराना.
     उमरा के रूक्न तवाफ़ और सई हैं और इसकी शर्त इहराम और सर मुंडाना है. हज और उतरा के चार तरीक़े हैं. (1) इफ़राद बिलहज : वह यह है कि हज के महीनों में या उनसे पहले मीक़ात से या उससे पहले हज का इहराम बाँध ले और दिलसे उसकी नियत करे चाहे ज़बान से. लब्बैक पढ़ते वक़्त चाहे उसका नाम ले या न ले. (2) इफ़राद बिल उमरा : वह यह है कि मीक़ात से या उससे पहले हज के महीनों में या उनसे पहले उमरे का इहराम बाँधे और दिल से उसका इरादा करे चाहे तलबियह यानी लब्बैक पढ़ते वक़्त ज़बान से उसका ज़िक्र करे या न करे और इसके लिये हज के महीनों में या उससे पहले तवाफ़ करे चाहे उस साल में हज करे न करे मगर हज और उमरे के बीच सही अरकान अदा करे इस तरह कि अपने बाल बच्चों की तरफ़ हलाल होकर वापस हो. (3) क़िरान : यह है कि हज और उमरा दोनो को एक इहराम में जमा करे. वह इहराम मीक़ात से बाँधा हो या उससे पहले, हज के महीनों में या उनसे पहले. शुरू से हज और उमरा दोनों की नियत हो चाहे तलबियह या लब्बैक कहते वक़्त ज़बान से दोनों का ज़िक्र करे या न करे. पहले उमरे के अरकान अदा करे फिर हज के. (4) तमत्तो : यह है कि मीक़ात से या उससे पहले हज के महीने में या उससे पहले उमरे का इहराम बाँधे और हज के माह में उतरा करे या अकसर तवाफ़ उसके हज के माह में हो और हलाल होकर हज के लिये इहराम बाँधे और उसी साल हज करे और हज और उमरा के बीच अपनी बीवी के साथ सोहबत न करे. इस आयत से उलमा ने क़िरान साबित किया है.
     (20) हज या उमरे से बाद शुरू करने और घर से निकलने और इहराम पहन लेने के, यानी तुम्हें कोई रूकावट हज या उमरे की अदायगी में पेश आए चाहे वह दुश्मन का ख़ौफ़ हो या बीमारी वग़ैरह, ऐसी हालत में तुम इहराम से बाहर आजाओ.
     (21) ऊट या गाय बकरी, और यह क़ुरबानी भेजना वाजिब है.
     (22) यानी हरम में जहाँ उसके ज़िब्ह का हुक्म है. यह क़ुरबानी हरम के बाहर नहीं हो सकती.
     (23) जिससे वह सर मुंडाने के लिये मजबूर हो और सर मुंडाले.
     (24) तीन दिन के. (25) छ मिस्कीनों का खाना, हर मिस्कीन के लिये पौने दो सेर गेहूँ. (26) यानी तमत्तो करे.
     (27) यह क़ुरबानी तमत्तो की है, हज के शुक्र में वाजिब हुई, चाहे तमत्तो करने वाला फ़कीर हो. ईदुज़ जु़हा की क़ुरबानी नहीं, जो फ़क़ीर और मुसाफ़िर पर वाजिब नहीं होती.
     (28) यानी पहली शव्वाल से 9वीं ज़िल्हज तक इहराम बांधने के बाद इस दरमियान में जब चाहे रखले, चाहे एक साथ या अलग अलग करके. बेहतर यह है कि सात, आठ, नौ ज़िल्हज को रखे.
     (29) मक्का के निवासी के लिये न तमत्तो है न क़िरान. और मीक़ात की सीमाओं के अन्दर रहने वाले, मक्का के निवासियों में दाख़िल हैं.
     मीक़ात पाँच है : जुल जलीफ़ा, ज़ाते इर्क़, जहफ़ा, क़रन, यलमलम. जु़ल हलीफ़ा मदीना निवासियों के लिये, जहफ़ा शाम के लोगों के लिये, क़रन नज्द के निवासियों के लिये, यलमलम यमन वालों के लिये.  (हिन्दुस्तान चूंकि यमन की तरफ़ से पड़ता है इसलिये हमारी मीक़ात भी यलमलम ही है)
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_*कुफ़्र पर खातिमे का खौफ*_
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     इफ्तार पार्टी, दावत, नियाज़ और नात ख्वानी वग़ैरा की वजह से फ़र्ज़ नमाज़ों की मस्जिद की जमाअते ऊला तर्क करने की हरगिज़ इजाज़त नहीं,

     जो लोग बिल उज़्रे शरई बा वुजूद कुदरत फ़र्ज़ नमाज़ मस्जिद में जमाअते ऊला के साथ अदा नहीं करते उनको डर जाना चाहिये कि नबी ﷺ का फरमान है : जिसको ये पसन्द हो की कल अल्लाह तआला से मुसलमान हो कर मिले तो वो इन पांच नमाज़ों की जमाअत के साथ वहां पाबन्दी करे जहा अज़ान दी जाती है क्यूकी अल्लाह ने तुम्हारे नबी के लिये सुनने हुदा मशरू की और ये नमाज़े भी सुनने हुदा से है और अगर तुम अपने नबी की सुन्नत छोड़ दोगे तो गुमराह हो जाओगे।
 *✍🏽मुस्लिम शरीफ 1/232*

     इस हदिष से इशारा मिलता है कि जमाअते ऊला की पाबन्दी करने वाले का खातिमा बिलखैर होगा और जो बिला शरई मजबूरी के मस्जिद की जमाअते ऊला तर्क करता है उसके लिये मआज़अल्लाह कुफ़्र पर खातिमे का खौफ है।

*या रब्बे मुस्तफा ! हमें पाचो नमाज़े मस्जिद की जमाअते ऊला में पहली सफ में तकबीरे ऊला के साथ अदा करने की हमेशा सआदत नसीब फ़रमा।*
_*आमीन बिजाहिन्नबीय्यिल अमिन*_

 *✍🏽नमाज़ के अहकाम स.204*
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*99 अस्माए हुस्ना और इन के फ़ज़ाइल* #93
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हर विर्द के अव्वल व आखिर एक बार दुरुद शरीफ पढ़ लीजिये, फाएदा ज़ाहिर न होने की सूरत में शिकवा करने के बजाए अपनी कोताहियो की शामत तसव्वुर कीजिये और अल्लाह की मस्लहत पर नज़र रखिये।

*يٙا هٙادِى*
जो कोई आस्मान की तरफ मुह कर के हाथ उठा कर इस इस्म को कसरत से पढ़े और वो हाथ मुह और आँखों पर मल ले ان شاء الله अहले मारिफ़त का मर्तबा पाएगा।

*✍🏽मदनी पंजसुरह, 259*
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Saturday, 4 February 2017

*इमामत का बयान* #02
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     इक़ामत के बाद इमाम साहिब एलान करे, अपनी एड़िया, गर्दने और कंधे एक सीध में कर के सफ सीधी कर लीजिये। दो आदमियो के बिच में जगह छोड़ना गुनाह है,
     कंधे से कंधा मस यानि टच किया हुवा रखना वाजिब, सफ सीधी रखना वाजिब और जब तक अगली सफ कोने तक पूरी न हो जाए जानबुझ कर पीछे नमाज़ शुरू कर देना तर्के वाजिब, हराम और गुनाह है।
     15 साल से छोटे ना बालिग़ बच्चों को स्फो में खड़ा न रखिये, इन्हें कोने में भी न भेजिये छोटे बच्चों की सफ सद से आखिर में बनाइये।
*✍🏽फतावा रज़विय्या, 7/219 ता 225*

_*जमाअत का बयान*_
     आकिल, बालिग़, आज़ाद  और क़ादिर पर मस्जिद की जमाअते ऊला वाजिब है बिला उज़्र एक बार भी छोड़ने वाला गुनाहगार और मुसरहिके सज़ा है
     और कई बार तर्क करे तो फासिद् मर्दुदुश्शहादह (यानी उसकी गवाही क़ाबिले क़बूल नहीं) और उसको सख्त सज़ा दी जाए अगर पड़ोसियों ने खामोशी इख्तियार की तो वो भी गुनाहगार।
*✍🏽दुर्रे मुख्तार व रद्दलमोहतार, 2/287*

     बाज़ फ़ुक़हाए किराम फरमाते है कि जो शख्स अज़ान सुन कर घर में इक़ामत का इंतज़ार करता है तो वो गुनाहगार होगा और उसकी गवाही क़बूल नहीं।
*✍🏽नमाज़ के अहकाम, स.203*
*___________________________________*
मिट जाए गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाये यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
*___________________________________*
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*99 अस्माए हुस्ना और इन के फ़ज़ाइल* #91
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

हर विर्द के अव्वल व आखिर एक बार दुरुद शरीफ पढ़ लीजिये, फाएदा ज़ाहिर न होने की सूरत में शिकवा करने के बजाए अपनी कोताहियो की शामत तसव्वुर कीजिये और अल्लाह की मस्लहत पर नज़र रखिये।

*يٙا نٙافِعُ*
जो किसी काम को शुरू करने से क़ब्ल 20 बार पढ़ ले ان شاء الله वो काम उसकी मर्ज़ी के मुताबिक़ पूरा होगा।

*✍🏽मदनी पंजसुरह, 258*
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मिट जाए गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाये यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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Friday, 3 February 2017

*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #142
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_सूरतुल बक़रह, आयत ①⑨③_*
     और उनसे लड़ो यहाँ तक कि कोई फ़ितना न रहे और एक अल्लाह की पूजी हो, फिर अगर वो बाज़ आएं तो ज़्यादती नहीं मगर ज़ालिमों पर.
*तफ़सीर*
     क़ुफ्र और बातिल परस्ती से.

*_सूरतुल बक़रह, आयत ①⑨④_*
     माहे हराम के बदले माहे हराम और अदब के बदले अदब है जो तुमपर ज़ियादती करे उसपर ज़ियादती करो उतनी ही जितनी उसने की, और अल्लाह से डरते रहो और जान रखो कि अल्लाह डरने वालों के साथ है.
*तफ़सीर*
     जब पिछले साल ज़िल्क़ाद सन छ हिजरी में अरब के मुश्रिको ने माहे हराम की पाकी और अदब का लिहाज़ न रखा और तुम्हें उमरे की अदायगी से रोका तो ये अपमान उनसे वाक़े हुआ और इसके बदले अल्लाह के दिये से सन सात हिजरी के ज़िल्क़ाद में तुम्हें मौक़ा मिला कि तुम क़ज़ा उमरे को अदा करो.
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मिट जाए गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाये यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*इमामत का बयान* #01
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_मर्द गैर माज़ूर के इमाम के लिये 6 शर्ते है_*
सहीहुल अक़ीदा मुसलमान होना.
बालिग़ होना.
आकिल होना.
मर्द होना.
किराअत सहीह होना.
माज़ूर न होना.
*✍🏽दुर्रेमुखतार मअ रद्दलमोहतार, 2/284*

*_इक़्तिदा की शराइत_*
निय्यत करना.
     इक़्तिदा और इस निय्यते इक़्तिदा का तहरिमा के साथ होना या तकबीरे तहरिमा से पहले होना बशर्ते कि पहले होने की सूरत में कोई अजनबी काम निय्यत व तहरिमा में जुदाई करने वाला न हो।
     इमाम व मुक्तदि दोनो का एक मकान में होना। दोनी की नमाज़ एक हो या इमाम की नमाज़, नमाज़े मुक्तदि को अपने ज़िम्न में लिये हुए हो।
     इमाम की नमाज़ का मज़्हबे मुक्तदि पर सहीह होना और इमाम व मुक्तदि दोनों का इसे सहीह समझना।
     शराइत की मौजूदगी में औरत का बराबर न होना।
     मुक्तदि का इमाम से मुक़द्दम (यानी आगे) न होना।
     इमाम के इन्तिक़ालात का इल्म होना, इमाम का मुक़ीम या मुसाफिर होना मालुम होना।
     अरकान की अदाएगी में शरीक होना, अरकान की अदाएगी में मुक्तदि इमाम के मिस्ल हो या कम
     युही शराइत में मुक्तदि का इमाम से ज़ाइद न होना।
*✍🏽रद्दलमोहतार, 2/684*
*✍🏽नमाज़ के अहकाम, स.202*
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गर होजाये यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*99 अस्माए हुस्ना और इन के फ़ज़ाइल* #90
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

हर विर्द के अव्वल व आखिर एक बार दुरुद शरीफ पढ़ लीजिये, फाएदा ज़ाहिर न होने की सूरत में शिकवा करने के बजाए अपनी कोताहियो की शामत तसव्वुर कीजिये और अल्लाह की मस्लहत पर नज़र रखिये।

*يٙا ضٙآرُّ*
जिसे कोई मनसब मिले और वो उस पर क़ाइम रहना चाहे तो वो हर शबे जुमुआ और अय्यामे बिज़ (यानि हर इस्लामी माह की 13, 14, 15 तारीख) में 100 बार पढ़े।

*✍🏽मदनी पंजसुरह, 258*
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मिट जाए गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाये यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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Thursday, 2 February 2017

*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #141
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_सूरतुल बक़रह, आयत ①⑨①_*
     और काफ़िरों को जहाँ पाओ मारो (8)
और उन्हें निकाल दो (9)
जहाँ से उन्होंने तुम्हें निकाला था (10)
और उनका फ़साद तो क़त्ल से भी सख़्त है (11)
और मस्जिदे हराम के पास उनसे न लड़ो जब तक वो तुम से वहां न लड़े (12)
और अगर तुमसे लड़ें तो उन्हें क़त्ल करो (13)
काफ़िरों की यही सज़ा है.
*तफ़सीर*
     (8) चाहे हरम हो या ग़ैर हरम.
     (9) मक्कए मुकर्रमा से.
     (10) पिछले साल, चुनांचे फ़त्हे मक्का के दिन जिन लोगों ने इस्लाम क़ुबूल न किया उनके साथ यही किया गया.
     (11) फ़साद से शिर्क मुराद है या मुसलमानों को मक्कए मुकर्रमा में दाख़िल होने से रोकना.
     (12) क्योंकि ये हरम की पाकी के विरूद्ध है.
     (13) कि उन्होंने हरम शरीफ़ की बेहुरमती या अपमान किया.

*_सूरतुल बक़रह, आयत ①⑨②_*
     फिर अगर वो बाज़ (रूके) रहें तो बेशक अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है.
*तफ़सीर*
क़त्ल और शिर्क से.
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*ज़ोहर के आखिरी दो नफ्ल के भी क्या कहने*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     ज़ोहर के बाद चार रकअत पढ़ना मुस्तहब है कि हदीसे पाक में फ़रमाया जिसने ज़ोहर से पहले चार और बाद में चार पर मु हाफ़ज़त की अल्लाह तआला उस पर आग हराम फ़रमा देगा।

     अल्लामा सय्यिद तहतावी अलैरहमा फरमाते है कि सिरे से आग में दाखिल ही न होगा और उसके गुनाह मिटा दिये जाएंगे और उस पर (बन्दों की हक़ तलफियो के) जो मुतालबात है अल्लाह तआला उसके फरीक को राज़ी कर देगा या ये मतलब है कि ऐसे कामो की तौफ़ीक़ देगा जिन पर सज़ा न हो।

     अल्लामा शामी रहमतुल्लाह अलैह फरमाते है कि उसके लिये बिशारत ये है कि सआदत पर उस का खातिमा होगा और दोज़ख में न जाएगा।

*✍🏽शामी 2/542*
*✍🏽नमाज़ के अहकाम, स.200*
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*99 अस्माए हुस्ना और इन के फ़ज़ाइल* #89
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

हर विर्द के अव्वल व आखिर एक बार दुरुद शरीफ पढ़ लीजिये, फाएदा ज़ाहिर न होने की सूरत में शिकवा करने के बजाए अपनी कोताहियो की शामत तसव्वुर कीजिये और अल्लाह की मस्लहत पर नज़र रखिये।

*يٙا مٙا نِعُ*
बीवी अगर नाराज़ हो तो शौहर, और शौहर नाराज़ हो तो बीवी सोने से पहले बिछोने पर बेथ कर 20 बार पढ़े ان شاء الله सुलह हो जाएगी।
(मुद्दत : ता हुसुले मुराद)

*✍🏽मदनी पंजसुरह, 258*
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गर होजाये यक़ीन के.....
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Wednesday, 1 February 2017

*सिरते मुस्तफाﷺ*
*_दसवा बाब_* #22
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*​जंगे खन्दक*​ #07
*_अम्र बिन अब्दे वूद मारा गया_*
     सबसे आगे अम्र बिन अब्दे वूद था ये अगरचे 90 साल का खुर्राट बुढ्ढा था मगर एक हज़ार सुवरो के बराबर बहादुर माना जाता था, जंगे बदर ने ज़ख़्मी हो कर भाग निकला था और इसने ये क़सम खा रखी थी की जब तक मुसलमानो से बदला न ले लूंगा बालो में तेल न डालूँगा। ये आगे बढ़ा और चिल्ला चिल्ला कर मुकाबले की दावत देने लगा 3 मर्तबा इसने कहा की कौन है जो मेरे मुकाबले को आता है ? तीनो मर्तबा हज़रते अली शेरे खुदाكَرَّمَ اللّٰهُ تَعَالٰى وَجْهَهُ الْكَرِيْم  ने उठ कर जवाब दिया की में।
     हुज़ूरﷺ ने रोका की ऐ अली ! ये अम्र बिन अब्दे वूद है। हज़रते अलीكَرَّمَ اللّٰهُ تَعَالٰى وَجْهَهُ الْكَرِيْم ने अर्ज़ किया जी हा में जानता हु की ये अम्र बिन अब्दे वूद है लेकिन में इससे लड़ूंगा, ये सुन कर हुज़ूरﷺ ने अपनी ख़ास तलवार ज़ुल्फ़िकार अपने दस्ते मुबारक से हैदरे कर्रार के मुक़द्दस हाथ में दे दी और अपने मुबारक हाथो से उन के सरे अनवर पर इमामा बांधा और ये दुआ फ़रमाई की या अल्लाह ! तू अली की मदद फरमा।
     हज़रते अलीكَرَّمَ اللّٰهُ تَعَالٰى وَجْهَهُ الْكَرِيْم मुजाहिदाना शान से उस के सामने खड़े हो गए और दोनों में इस तरह मुकालमा शुरू हुवा :
हज़रते अली : ऐ अम्र ! तू मुसलमान हो जा !
अम्र : ये मुझसे कभी हरगिज़ हरगिज़ नही हो सकता !
हज़रते अली : लड़ाई से वापस चला जा !
अम्र : ये मंज़ूर नही !
हज़रते अली : तो फिर मुझ से जंग कर !
अम्र : है कर कहा की में कभी ये सोच भी नही सकता था की दुन्या में कोई मुझ को जंग की दावत देगा।
हज़रते अली : लेकिन में तुझसे लड़ना चाहता हु।
अम्र : आखिर तुम्हारा नाम क्या है ?
हज़रते अली : अली बिन अबी तालिब।
अम्र : ऐ भतीजे ! तुम अभी बहुत ही कम उम्र हो में तुम्हारा खून बहाना पसन्द नही करता।
हज़रते अली : लेकिन में तुम्हारा खून बहाने को बेहद पसन्द करता हु।
     खून खोला देने वाले गर्मा गर्म जुमले सुन कर अम्र मारे गुस्से के आपे से बाहर हो गया, हज़रते अलीكَرَّمَ اللّٰهُ تَعَالٰى وَجْهَهُ الْكَرِيْم पैदल थे और ये सुवार था इस पर जो गैरत सुवार हुई तो घोड़े से उतर पड़ा और अपनी तलवार से घोड़े के पाउ काट डाले और नंगी तलवार ले कर आगे बढ़ा और हज़रते अलीكَرَّمَ اللّٰهُ تَعَالٰى وَجْهَهُ الْكَرِيْم पर तलवार का भरपूर वार किया, हज़रते अलीكَرَّمَ اللّٰهُ تَعَالٰى وَجْهَهُ الْكَرِيْم ने तलवार के उस वार को अपनी ढाल पर रोका, ये वार इतना सख्त था की तलवार ढाल और इमामे को काटती हुई पेशानी पर लगी, गो बहुत गहरा ज़ख्म नही लगा मगर फिर भी ज़िन्दगी भर ये तुगार आप की पेशानी पर यादगार बन कर रह गया।
     हज़रते अलीكَرَّمَ اللّٰهُ تَعَالٰى وَجْهَهُ الْكَرِيْم ने तड़प कर ललकारा की ऐ अम्र ! सँभल जा अब मेरी बारी है ये कह कर आप ने ज़ुल्फ़िकार का ऐसा जचा तुला हाथ मारा की तलवार दुश्मन के शाने को काटती हुई कमर से पार हो गई और वो तिलमिला कर ज़मीन पर गिरा और दम जदन में मर कर फिन्नार हो गया, मैदाने कारज़ार ज़बाने हाल से पुकार उठा
          *शाहे मर्दा, शेरे यज़दा क़ुव्वते परवर्दगार*
     हज़रते अलीكَرَّمَ اللّٰهُ تَعَالٰى وَجْهَهُ الْكَرِيْم ने उस को क़त्ल किया और मुह फेर कर चल दिये, हज़रते उमरرضي الله تعالي عنه ने कहा की ऐ अली ! आप ने अम्र की ज़िरह क्यू नही उतार ली ? सारे अरब में इससे अच्छी कोई ज़िरह नही है, आपكَرَّمَ اللّٰهُ تَعَالٰى وَجْهَهُ الْكَرِيْم ने फ़रमाया की ऐ उमर ! ज़ुल्फ़िकार की मार से वो इस तरह बे क़रार हो कर ज़मीन पर गिरा की उस की शर्मगाह खुल गई इस लिये हया की वजह से में ने मुह फेर लिया।
*✍🏽सिरते मुस्तफा, 335*
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*हाफ आस्तीन में नमाज़ पढ़ना कैसा ?*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     आधी आस्तीन वाला कुरता या क़मीज़ पहन कर नमाज़ पढ़ना मकरुहे तन्ज़ीहि है जब कि उसके पास दूसरे कपड़े मौजूद हो।

     मुफ़्ती अमजद अली आज़मी अलैरहमा फरमाते है : जिसके पास कपड़े मौजूद हो और सिर्फ आधी आस्तीन या बनियान पहन कर नमाज़ पढ़ता है तो कराहते तन्ज़ीहि है और कपड़े मौजूद नहीं तो कराहत भी नहीं।

*✍🏽फतवा रज़विय्या, 1/193*
*✍🏽नमाज़ के अहकाम, स.200*
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