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Thursday, 16 March 2017

*क़ज़ा नमाज़ का तरीका* #12/15
*بِسْــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ*

*_क़ज़ा का लफ्ज़ कहना भूल गया तो?_*
     आला हज़रत फरमाते है : हमारे उलमा तसरिह फरमाते है : क़ज़ा ब निययते अदा और अदा ब निययते क़ज़ा दोनों सहीह है।
*✍🏽फतावा रज़विय्या 8/161*

*_क़ज़ा नमाज़े नवाफ़िल की अदाएगी से बेहतर_*
     क़ज़ा नमाज़े नवाफ़िल की अदाएगी से बेहतर और अहम है मगर सुन्नते मुअक्क्दा, नमाज़े चाश्त, स्लातुत्तस्बीह और वो नमाज़े जिन के बारे में अहादीस मरवी है यानी जेसे तहिय्यतुल मस्जिद असर से पहले की चार रकअत (सुन्नते गैर मुअक्कदा) और मगरिब के बाद 6 रकअत पढ़ी जाएगी।
*✍🏽रद्दुलमोहतार 2/646*

     याद रहे क़ज़ा नमाज़ के बिना पर सुन्नते मुअक्कदा छोड़ना जाइज़ नहीं, अलबत्ता सुन्नते गैर मुअक्कदा और अहादिसो में वारिद शुदा मुखसुस नवाफ़िल पढ़े तो षवाब का हक़दार है मगर इन्हें न पड़ने पर कोई गुनाह नही।
*✍🏽नमाज़ के अहकाम 253*
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मिट जाए गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*गौष किसे कहते है ?*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     गौषियत बुज़ुर्गी का एक ख़ास दर्जा है लफ्ज़ "गौष" के लुग्वि माना है : *"फरियाद रस यानी फरियाद को पहुचने वाला".*
     चुकी हज़रत शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी رضي الله تعالي عنه गरीबो, बेकसों और हाजत मन्दो के मदद गार है इसी लिए आप को *"गौषे आज़म"* के खिताब से सरफ़राज़ किया गया। और बाज़ अक़ीदत मन्द आप को *"पीराने पिर दस्तगीर"* के लक़ब से भी याद करते है।

*✍🏽गौषे पाक के हालात, 15*
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मिट जाए गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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Wednesday, 15 March 2017

*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #171
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_सूरतुल बक़रह, आयत ②②⑥_*
     और वो जो क़सम खा बैठते हैं अपनी औरतों के पास न जाने की उन्हें चार महीने की मोहलत है तो अगर इस मुद्दत में फिर आए तो अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है.

*_सूरतुल बक़रह, आयत ②②⑦_*
     और अगर छोड़ देने का इरादा पक्का कर लिया तो अल्लाह सुनता जानता है.
*तफ़सीर*
     जाहिलियत के दिनों में लोगों का यह तरीक़ा था कि अपनी औरतों से माल तलब करते, अगर वह देने से इन्कार करतीं तो एक साल, दो साल, तीन साल या इससे ज़्यादा समय तक उनके पास ना जाते और उनके साथ सहवास न करने की क़सम खा लेते थे और उन्हें परेशानी में छोड़ देते थे. न वो बेवा ही थीं कि कहीं अपना ठिकाना कर लेतीं, न शौहर वाली कि शौहर से आराम पातीं.
     इस्लाम ने इस अत्याचार को मिटाया और ऐसी क़सम खाने वालों के लिये चार महीने की मुद्दत निश्चित फ़रमादी कि अगर औरत से चार माह के लिये सोहबत न करने की क़सम खाले जिसको ईला कहते हैं तो उसके लिये चार माह इन्तिज़ार की मोहलत है. इस अर्से में ख़ूब सोच समझ ले कि औरत को छोड़ना उसके लिये बेहतर है या रखना. अगर रखना बेहतर समझे और इस मुद्दत के अन्दर रूजू करले तो निकाह बाक़ी रहेगा और क़सम का कफ़्फ़ारा लाज़िम आएगा, और अगर इस मुद्दत में रूजू न किया और क़सम न तोड़ी तो औरत निकाह से बाहर हो गई और उस पर तलाक़े बायन वाक़े हो गई. अगर मर्द सहवास की क्षमता रखता हो तो रूजू हमबिस्तरी से ही होगा और अगर किसी वजह से ताक़त न हो तो ताक़त आने के बाद सोहबत का वादा रूजू है. (तफ़सीरे अहमदी)
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मिट जाए गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*क़ज़ा नमाज़ का तरीका* #11/15
*بِسْــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ*

*_जमानए इर्तिदाद की नमाज़े_*
     जो शख्स मआजअल्लाह मुर्तद हो गया फिर इस्लाम लाया तो जमानए इर्तिदाद की नमाज़ की क़ज़ा नही और मुर्तद होने से पहले जमानए इस्लाम में जो नमाज़े जाती रही थी उनकी क़ज़ा वाजिब है।
*✍🏽रद्दुलमोहतार 2/647*

*_मरीज़ को नमाज़ कब मुआफ़ है?_*
     ऐसा मरीज़ कि इशारे से भी नमाज़ नही पढ़ सकता अगर ये हालत पुरे 6 वक़्त तक रही तो इस हालत में जो नमाज़े हुई उनकी क़ज़ा वाजिब नही।
*✍🏽आलमगिरी 1/121*
*✍🏽नमाज़ के अहकाम 252*
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मिट जाए गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*मुबारक महीने* #09
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*रमज़ानुल मुबारक* #01

     खुदाए रहमान का करोड़ हा करोड़ एहसान की उस ने हमे माहे रमज़ान जेसी अज़ीमुश्शान नेअमत से सरफ़राज़ फ़रमाया। माहे रमज़ान के फैजान के क्या कहने ! इस की तो हर घड़ी रहमत भरी है। इस महीने में अज्रो षवाब बहुत ही बढ़ जाता है। नफ्ल का षवाब फ़र्ज़ के बराबर और फ़र्ज़ का षवाब 70 गुना कर दिया जाता है। बल्कि इस महीने में तो रोज़ादार का सोना भी इबादत में शुमार किया जाता है।
     अर्श उठाने वाले फ़रिश्ते रोज़ादारो की दुआ पर आमीन कहते है और एक हदिष के मुताबिक़ "रमज़ान के रोज़ादार के लिये दरिया की मछलिया इफ्तार तक दुआए मगफिरत करती रहती है।

*✍🏽मदनी पंजसुरह, 337*
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Tuesday, 14 March 2017

*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #170
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_सूरतुल बक़रह, आयत ②②⑤_*
     अल्लाह तुम्हें नहीं पकड़ता उन क़स्मों में जो बेईरादा ज़बान से निकल जाएं, हाँ उसपर पकड़ फ़रमाता है जो काम तुम्हारे दिलों ने किये और अल्लाह बख़्शने वाला हिल्म (सहिष्णुता) वाला है.

*तफ़सीर*
     क़सम तीन तरह की होती है : (1) लग्व (2) ग़मूस (3) मुनअक़िदा. लग्व यह है कि किसी गुज़री हुई बात पर अपने ख़याल में सही जानकर क़सम खाए और अस्ल में वह उसके विपरीत हो, यह माफ़ है, और इस पर कफ़्फ़ारा नहीं. ग़मूस यह है कि किसी गुज़री हुई बात पर जान बूझकर झूठी क़सम खाए, इसमें गुनाहगार होगा. मुनअक़िदा यह है कि किसी आने वाली बात पर इरादा करके क़सम खाए. क़सम को अगर तोड़े तो गुनाहगार भी है और कफ़्फ़ारा भी लाज़िम.
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*क़ज़ा नमाज़ का तरीका* #10/15
*بِسْــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ*

*_क़ज़ाए उम्री का तरीका_*
     क़ज़ा हर रोज़ की 20 रकअत होती है।
2 फ़र्ज़ फ़ज्र की, 4 ज़ोहर की, 4 असर की, 3 मगरिब की, 4 ईशा की और 3 वित्र।
निय्यत इस तरह कीजिये
*सबसे पहली फ़ज्र जो मुझ से क़ज़ा हुई उसको अदा करता हु* हर नमाज़ में इसी तरह नियत कीजिये।

*_नमाज़े क़सर की क़ज़ा_*
     अगर हालते सफर की क़ज़ा नमाज़ हालते इक़ामत में पढ़ेंगे तो क़सर ही पढ़ेंगे और हालते इक़ामत की क़ज़ा हालते सफर में पढ़ेंगे तो पूरी पढ़ेंगे।
*✍🏽आलमगिरी 1/121*
*✍🏽नमाज़ के अहकाम 251*
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Monday, 13 March 2017

*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #169
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_सूरतुल बक़रह, आयत ②②④_*
     और अल्लाह को अपनी क़िस्मतों का निशाना न बना लो कि एहसान और परहेज़गारी और लोगों में सुलह करने की क़सम कर लो और अल्लाह सुनता जानता है.

*तफ़सीर*
     हज़रत अब्दुल्लाह बिन रवाना ने अपने बेहनोई नोमान बिन बशीर के घर जाने और उनसे बात चीत करने और उनके दुश्मनों के साथ उनकी सुलह कराने से क़सम खाली थी. जब इसके बारे में उनसे कहा जाता था तो कह देते थे कि मैं क़सम खा चुका हूँ इसलिये यह काम कर ही नहीं सकता. इस सिलसिले में यह आयत नाज़िल हुई और नेक काम करने से क़सम खा लेने को मना किया गया. अगर कोई व्यक्ति नेकी से दूर रहने की क़सम खाले तो उसको चाहिये कि क़सम को पूरा न करे बल्कि वह नेक काम ज़रूर करे और क़सम का कफ़्फ़ारा दे.
     मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में है, रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया जिस शख़्स ने किसी बात पर क़सम खाली फिर मालूम हुआ कि अच्छाई और बेहतरी इसके ख़िलाफ़ में है तो चाहिये कि उस अच्छे काम को करे और क़सम का कफ़्फ़ारा दे.
     कुछ मुफ़स्सिरों ने यह भी कहा है कि इस आयत से बार बार क़सम खाने की मुमानिअत यानी मनाही साबित होती है.
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*मुबारक महीने* #08
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*शाबानुल मुअज़्ज़म* #01
*_आक़ा का महीना_*
     हुज़ूर ﷺ का शाबानुल मुअज़्ज़म के बारे में फरमाने मुकर्रम है, शाबान मेरा महीना है और रमज़ानुल मुबारक अल्लाह का महीना है।
*✍🏽अल-जामेउ सगीर, 103, हदिष : 4889*

*_रमज़ान के बाद कौनसा महीना अफज़ल है ?_*
     हज़रते अनस رضي الله تعالي عنه फरमाते है, दो आलम के मालिको मुख्तार ﷺ की बारगाह में अर्ज़ की गई की रमज़ान के बाद कौनसा रोज़ा अफज़ल है ? इरशाद फ़रमाया : ताज़िमे रमज़ान के लिये शाबान का। फिर अर्ज़ की गई, कौनसा सदक़ा अफज़ल है ? फ़रमाया : रमज़ान के माह में सदक़ा करना।
*✍🏽तिर्मिज़ी, 2/146, हदिष:663*

*_15वी शब् में तजल्ली_*
     हज़रते आइशा सिद्दोका رضي الله تعالي عنها से रिवायत है, हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया : अल्लाह शाबान की 15वी शब् में तजल्ली फ़रमाता है। इस्तिग़फ़ार (तौबा) करने वालो को बख्श देता और तालिबे रहमत पर रहम फ़रमाता और अदावत वालो को जिस हाल पर है उसी पर छोड़ देता है।
*✍🏽शोएबुल ईमान, 3/383, हदिष:3835*

*_भलाइयों वाली राते_*
     हज़रते आइशा رضي الله تعالي عنها रिवायत फरमाती है की मेने हुज़ूर ﷺ को फरमाते सुना, अल्लाह (खास तौर पर) 4 रातो में भलाइयों के दरवाज़े खोल देता है :
(1) बकरी ईद की रात (2) ईदुल फ़ित्र की रात (3) शाबान की 15वी रात की इस रात में मरने वालो के नाम और लोगो का रिज़्क़ और (इस साल) हज करने वालो के नाम लिखे जाते है (4) अरफा (9 जुल हिज्जा) की रात, अज़ान फज्र तक।
*✍🏽दुर्रू मन्सूर, 7/402*
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 332*
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Sunday, 12 March 2017

*क़ज़ा नमाज़ का तरीका* #08/15
*بِسْــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ*

*_अदा, क़ज़ा और वाजीबुल इआदा की तारीफ़_*
     जिस चीज़ का बन्दों को हुक्म है उसे वक़्त में बजा लाने को अदा कहते है और वक़्त खत्म होने के बाद अमल में लाना क़ज़ा है और अगर उस हुक्म के बाज लाने में कोई खराबी पैदा हो जाए तो उस खराबी को दूर करने के लिये वो अमल दोबारा बजा लाना इआदा कहलाता है।
     वक़्त के अंदर अंदर अगर तहरिमा बांध ली तो नमाज़ क़ज़ा न हुई बल्कि अदा है।
*✍🏽दुर्रे मुख़्तार 2/627*
     नमाज़े फ़ज्र, जुमुआ और इदैन में वक़्त के अंदर सलाम फिरना लाज़िम है वरना नमाज़ न होगी
*✍🏽बहारे शरीअत 1/701*
     बिला उज़्रे शरई नमाज़ क़ज़ा कर देना सख्त गुनाह है, इस पर फ़र्ज़ है कि उसकी क़ज़ा पढ़े और सच्चे दिल से तौबा भी करे, तौबा या हज्जे मक़बूल से इन्शा अल्लाह ताखीर का गुनाह मुआफ़ हो जाएगा
*✍🏽दुर्रे मुख्तार 2/626*
     तौबा उसी वक़्त सहीह है जब कि क़ज़ा पढ़ ले उसको अदा किये बगैर तौबा किये जाना तौबा नही कि, जो नमाज़ इस के ज़िम्मे थी उसको पढ़ना तो अब भी बाक़ी है और जब गुनाह से बाज़ न आया तो तौबा कहा हुई ?
*✍🏽रद्दल मोहतार 2/627*

     हज़रते इब्ने अब्बास رضي الله تعالي عنه से मरवी है, हुज़ूर ﷺ ने इरशाद फ़रमाया : गुनाह पर क़ाइम रह कर तौबा करने वाला उस की मिस्ल है जो अपने रब से ठठा यानी मज़ाक करता है।
*✍🏽शोएबुल ईमान 5/436*
*✍🏽नमाज़ के अहकाम 246*
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*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #167
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_सूरतुल बक़रह, आयत ②②②_*
     और तुमसे पूछते हैं हैज़ का हुक्म तुम फ़रमाओ वह नापाकी है तो औरतों से अलग रहो हैज़ के दिनों और उनके क़रीब न जाओ जब तक पाक न हो लें फिर जब पाक हो जाएं तो जहां से तुम्हें अल्लाह ने हुक्म दिया बेशक अल्लाह पसन्द करता है बहुत तौबह करने वालों को और पसन्द रखता है सुथरों को.

*तफ़सीर*
     अरब के लोग यहूदियों और मजूसीयों यानी आग के पुजारियों की तरह माहवारी वाली औरतों से सख़्त नफ़रत करते थे. अरब खाना पीना, एक मकान में रहना गवारा न था, बल्कि सख़्ती यहाँ तक पहुँच गई थी कि उनकी तरफ़ देखना और उनसे बात चीत करना भी हराम समझते थे, और ईसाई इसके विपरीत माहवारी के दिनों में औरतों के साथ बड़ी महब्बत से मशग़ूल होते थे, और सहवास में बहुत आगे बढ़ जाते थे.
     मुसलमानों ने हुज़ूर से माहवारी का हुक्म पूछा. इस पर यह आयत उतरी और बहुत कम तथा बहुत ज़्यादा की राह छोड़ कर बीच की राह अपनाने की तालीम दी गई और बता दिया गया कि माहवारी के दिनों में औरतों से हमबिस्तरी करना मना है.
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मिट जाए गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
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Saturday, 11 March 2017

*आदाबे_सोहबत (जिमाअ) ताल्लुक़ात के बयान*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

मियां बीवी के ताल्लुक़ से कुछ ऐसे मसले मसायल हैं जिनका जानना उनको ज़रूरी है मगर वो नहीं जानते,क्यों,क्योंकि दीनी किताब हम पढ़ते नहीं और आलिम से पूछने में शर्म आती है मगर अजीब बात है कि मसला पूछने में तो हमें शर्म आती है मगर वही ग़ैरत उस वक़्त मर जाती है जब दूल्हा अपने दोस्तों को और दुल्हन अपनी सहेलियों को पूरी रात की कहानी सुनाते हैं,खैर ये msg सेव करके रखें और अपने दोस्तों और अज़ीज़ो में जिनकी शादियां हों उन्हें तोहफे के तौर पर ये msg सेंड करें

* हज़रत इमाम गज़ाली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि जिमअ यानि सोहबत करना जन्नत की लज़्ज़तों में से एक लज़्ज़त है
📕 कीमियाये सआदत,सफह 496

* हज़रत जुनैद बग़दादी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि इंसान को जिमअ की ऐसी ही ज़रूरत है जैसी गिज़ा की क्योंकि बीवी दिल की तहारत का सबब है
📕 अहयाउल उलूम,जिल्द 2,सफह 29

* हदीसे पाक में आता है कि जिस तरह हराम सोहबत पर गुनाह है उसी तरह जायज़ सोहबत पर नेकियां हैं
📕 मुस्लिम,जिल्द 1,सफह 324

* उम्मुल मोमेनीन सय्यदना आयशा सिद्दीका रज़ियल्लाहु तआला अंहा से मरवी है कि हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं कि जब एक मर्द अपनी बीवी का हाथ पकड़ता है तो उसके नामये आमाल में एक नेकी लिख दी जाती है और जब उसके गले में हाथ डालता है तो दस नेकियां लिखी जाती है और जब उससे सोहबत करता है तो दुनिया और माफीहा से बेहतर हो जाता है और जब ग़ुस्ले जनाबत करता है तो पानी जिस जिस बाल पर गुज़रता है तो हर बाल के बदले एक नेकी लिखी जाती है और एक गुनाह कम होता जाता है और एक दर्जा बुलंद होता जाता है
📕 गुनियतुत तालेबीन,सफह 113

* हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से एक शख्स ने अर्ज़ किया कि मैंने जिस लड़की से शादी की है मुझे लगता है कि वो मुझे पसंद नहीं करेगी तो आप फरमाते हैं कि मुहब्बत खुदा की तरफ से होती है और नफरत शैतान की तरफ से तो ऐसा करो कि जब तुम पहली बार उसके पास जाओ तो दोनों वुज़ु करो और 2 रकात नमाज़ नफ्ल शुकराना इस तरह पढ़ो कि तुम इमाम हो और वो तुम्हारी इक़्तिदा करे तो इन शा अल्लाह तुम उसे मुहब्बत और वफा करने वाली पाओगे
📕 गुनियतुत तालेबीन,सफह 115

* नमाज़ के बाद शौहर अपनी दुल्हन की पेशानी के थोड़े से बाल नर्मी और मुहब्बत से पकड़कर ये दुआ पढ़े अल्लाहुम्मा इन्नी असअलोका मिन खैरेहा वखैरे मा जबलतहा अलैहे व आऊज़ोबेका मिन शर्रेहा मा जबलतहा अलैह तो नमाज़ और इस दुआ की बरकत से मियां बीवी के दरमियान मुहब्बत और उल्फत क़ायम होगी इन शा अल्लाह
📕 अबु दाऊद,सफह 293

* खास जिमा के वक़्त बात करना मकरूह है इससे बच्चे के तोतले होने का खतरा है उसी तरह उस वक़्त औरत की शर्मगाह की तरह नज़र करने से भी बचना चाहिये कि बच्चे का अंधा होने का अमकान है युंही बिल्कुल बरहना भी सोहबत ना करें वरना बच्चे के बे हया होने का अंदेशा है
📕 फतावा रज़वियह,जिल्द 9,सफह 46

* हमबिस्तरी के वक़्त बिस्मिल्लाह शरीफ पढ़ना सुन्नत है मगर याद रहे कि सतर खोलने से पहले पढ़ें और सबसे बेहतर है कि जब कमरे में दाखिल हो तब ही बिस्मिल्लाह शरीफ पढ़कर दायां क़दम अन्दर दाखिल करें अगर हमेशा ऐसा करता रहेगा तो शैतान कमरे से बाहर ही ठहर जाएगा वरना वो भी आपके साथ शरीक होगा
📕 तफसीरे नईमी,जिल्द 2,सफह 410

* आलाहज़रत फरमाते हैं कि औरत के अंदर मर्द के मुकाबले 100 गुना ज़्यादा शहवत है मगर उस पर हया को मुसल्लत कर दिया गया है तो अगर मर्द जल्दी फारिग हो जाये तो फौरन अपनी बीवी से जुदा ना हो बल्कि कुछ देर ठहरे फिर अलग हो
📕 फतावा रज़वियह,जिल्द 9,सफह 183

* जिमअ के वक़्त किसी और का तसव्वुर करना भी ज़िना है और सख्त गुनाह और जिमअ के लिए कोई वक़्त मुकर्रर नहीं हां बस इतना ख्याल रहे कि नमाज़ ना फौत होने पाये क्योंकि बीवी से भी नमाज़ रोज़ा एहराम एतेकाफ हैज़ व निफास और नमाज़ के ऐसे वक़्त में सोहबत करना कि नमाज़ का वक़्त निकल जाये हराम है
📕 फतावा रज़वियह,जिल्द 1,सफह 584

* मर्द का अपनी औरत की छाती को मुंह लगाना जायज़ है मगर इस तरह कि दूध हलक़ से नीचे ना उतरे ये हराम है लेकिन ऐसा हो भी गया तो तौबा करे मगर इससे निकाह पर कोई फर्क नहीं आता
📕 दुर्रे मुख्तार,जिल्द 2,सफह 58
📕 फतावा रज़वियह,जिल्द ,सफह 568

* मर्द व औरत को एक दूसरे का सतर देखना या छूना जायज़ है मगर हुक्म यही है कि मक़ामे मख़सूस की तरफ ना देखा जाये कि इससे निस्यान का मर्ज़ होता है और निगाह भी कमज़ोर हो जाती है
📕 रद्दुल मुख्तार,जिल्द 5,सफह 256

* मर्द नीचे हो और औरत ऊपर,ये तरीका हरगिज़ सही नहीं है इससे औरत के बांझ हो जाने का खतरा है
📕 मुजरबाते सुयूती,सफह 41

* फरागत के बाद मर्द व औरत को अलग अलग कपड़े से अपना सतर साफ करना चाहिए क्योंकि दोनों का एक ही कपड़ा इस्तेमाल करना नफरत और जुदायगी का सबब है
📕 कीमियाये सआदत,सफह  266

* एहतेलाम होने के बाद या दूसरी मर्तबा सोहबत करना चाहता है तब भी सतर धोकर वुज़ु कर लेना बेहतर है वरना होने वाले बच्चे को बीमारी का खतरा है
📕 क़ुवतुल क़ुलूब,जिल्द 2,सफह 489

* ज़्यादा बूढ़ी औरत से या खड़े होकर सोहबत करने से जिस्म बहुल जल्द कमज़ोर हो जाता है उसी तरह भरे पेट पर सोहबत करना भी सख्त नुकसान देह है
📕 बिस्तानुल आरेफीन,सफह 139

* जिमअ के बाद औरत को दाईं करवट पर लेटने का हुक्म दें कि अगर नुत्फा क़रार पा गया तो इन शा अल्लाह लड़का ही होगा
📕 मुजरबाते सुयूती,सफह 42

* जिमअ के फौरन बाद पानी पीना या नहाना सेहत के लिए नुकसान देह है हां सतर धो लेना और दोनों का पेशाब कर लेना सेहत के लिए फायदे मंद है
📕 बिस्तानुल आरेफीन,सफह 138

* तबीब कहते हैं कि हफ्ते में दो बार से ज़्यादा सोहबत करना हलाकत का बाईस है,शेर के बारे में आता है कि वो अपनी मादा से साल में एक मर्तबा ही जिमअ करता है और उसके बाद उस पर इतनी कमजोरी लाहिक़ हो जाती है अगले 48 घंटो तक वो चलने फिरने के काबिल भी नहीं रहता और 48 घंटो के बाद जब वो उठता है तब भी लड़खड़ाता है
📕 मुजरबाते सुयूती,सफह 41

* औरत से हैज़ की हालत में सोहबत करना जायज नहीं अगर चे शादी की पहली रात ही क्यों ना हो और अगर इसको जायज़ जाने जब तो काफिर हो जायेगा युंही उसके पीछे के मक़ाम में सोहबत करना भी सख्त हराम है
📕 बहारे शरीयत,हिस्सा 2,सफह 78

* मगर हैज़ की हालत में वो अछूत भी नहीं हो जाती जैसा कि बहुत जगह रिवाज है कि फातिहा वगैरह का खाना भी नहीं बनाने देते ये जिहालत है,बल्कि उसके साथ सोने में भी हर्ज नहीं जबकि शहवत का खतरा ना हो वरना अलग सोये
📕 फतावा मुस्तफविया,जिल्द 3,सफह 13

* क़यामत के दिन सबसे बदतर मर्द व औरत वो होंगे जो अपनी राज़ की बातें अपने दोस्तों को सुनाते हैं
📕 मुस्लिम,जिल्द 1,सफह 464

* औरत से जुदा रहने की मुद्दत 4 महीना है इससे ज़्यादा दूर रहना मना है
📕 तारीखुल खुलफा,सफह 97

* आलाहज़रत फरमाते हैं कि हमल ठहरने से रोकने के लिए दवा या कोई और तरीका इस्तेमाल करना या हमल ठहरने के बाद उसमें रूह फूकने की मुद्दत 120 दिन है तो अगर किसी उज़्रे शरई मसलन बच्चा अभी छोटा है और ये दूसरा बच्चा नहीं चाहता तो हमल साकित करना जायज़ है मगर रूह पड़ने के बाद हमल गिराना हराम और गोया क़त्ल है
📕 फतावा रज़वियह,जिल्द 9,सफह 524

* अगर तोगरे में क़ुरान की आयत लिखी है तो जब तक उस पर कोई कपड़ा ना डाला जाए उस कमरे में सोहबत करना या बरहना होना बे अदबी है हां क़ुरान अगर जुज़दान में है तो हर्ज नहीं युंही किबला रु होना भी मना है
📕 फतावा रज़वियह,जिल्द 9,सफह 522

* जो बच्चा समझदार हो उसके सामने सोहबत करना मकरूह है
📕 अलमलफूज़,हिस्सा 1,सफह 14

* किसी की दो बीवियां हैं अगर चे उसका किसी से पर्दा नहीं मगर औरत का औरत से पर्दा है तो एक के सामने दूसरे से सोहबत करना जायज़ नहीं
📕 फतावा रज़वियह,जिल्द 9,सफह २०७

याद रहे पहली रात खून आना कोई ज़ुरूरी नही है...जो जाहिल इस तरह की बात सोचते है वो कमिलमि है क्योंकि आज के दौर में जिस झिल्ली के फटने से वो खून ऑर्ट की शर्मगाह से आता है वो बचपन में खेल,कूद,साइकल चलाने हटता के और भी चीज़ों से फट सकती है...लिहाज़ा अक़्ल से काम लिया कीजिये....
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मिट जाए गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
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*क़ज़ा नमाज़ का तरीका* #07/15
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*الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ*

*_रात के आखरी हिस्से में सोना केसा ?_*
     नमाज़ का वक़्त दाखिल हो जाने के बाद सो गया फिर वक़्त निकल गया और नमाज़ क़ज़ा हो गई तो गुनाहगार हुवा जब की जागने पर सहीह ऐतिमाद या जगाने वाला मौजूद न हो, बल्कि फ़ज्र में दुखुले वक़्त से पहले भी सोने की इजाज़त नही हो सकती जब की अक्सर हिस्सा रात का जागने में गुज़रा और ज़न्ने ग़ालिब है कि अब सो गया तो वक़्त में आँख न खुलेगी।
*✍🏽बहारे शरीअत 1/701*

*_रात देर तक जागना_*
     नात ख्वानी, ज़िक्रो फ़िक्र की महफ़िलो नीज़ सुन्नतो भव इज्तेमाअ वगैरा में रात देर तक जागने के बाद सोने के सबब अगर नमाज़े फ़ज्र क़ज़ा होने का अंदेशा हो तो ब निययते एतिकाफ मस्जिद में क़याम करे या वहा सीए जहा कोई क़ाबिले एतिमाद इस्लामी भाई जगाने वाला मौजूद हो। या अलार्म लगाले इससे आँख खुल जाती हो।
     फ़ुक़हाए किराम फरमाते है : जब ये अंदेशा हो की नमाज़ जाती रहेगी तो बिला ज़रूरते शरईय्या उसे रात देर तक जागना ममनुअ है।
*✍🏽रद्दलमुहतार 2/33*
*✍🏽नमाज़ के अहकाम 245*
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*मुबारक महीने* #06
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*रबीउल अव्वल (रबिउन्नूर शरीफ)* #03
*_शबे क़द्र से भी अफज़ल रात_*
     हज़रते शैख़ अब्दुल हक़ मुहद्दिस देहलवी अलैरहमा फरमाते है : बेशक सरवरे आलम ﷺ की शबे विलादत शबे क़द्र से भी अफज़ल है क्यू की शबे विलादत सरकारे मदीना ﷺ के इस दुन्या में जल्वा गर होने की रात है जब की शबे क़द्र सरकार ﷺ को अता करदा शब् है। और जो रात ज़ुहूरे जाते सरवरे काएनात ﷺ की वजह से मुशर्रफ हो वॉ इस रात से ज़्यादा शर्फ व इज़्ज़त वाली है जो मलाएका के नुज़ूल की बिना पर मुशर्रफ है।

*_जशने विलादत मनाने का षवाब_*
     शैख़ अब्दुल हक़ मुहद्दिस देहलवी फरमाते है : हुज़ूर ﷺ की विलादत की रात ख़ुशी मनाने वालो की जज़ा ये है की अल्लाह उन्हें फ्ज़लो करम से जन्नतुन्नइम में दाखिल फ़रमाएगा। मुसलमान हमेशा से महफिले मिलाद मूनअक़ीद करते आए है और विलादत की ख़ुशी में दावते देते, खाने पक्वाते और खूब सदक़ा व खैरात देते आए है। खूब ख़ुशी का इज़हार करते और दिल खोल कर खर्च कर करते है नीज़ आप की विलादते बा सआदत के ज़िक्र का एहतिमाम करते है और अपने मकानों को सजाते है और इन तमाम अफआले हसना की बरकत से उन लोगो पर अल्लाह की रहमतो का नुज़ूल होता है।
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 328*
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*जहद (परहेजगारी)का सवाब*  #1
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        हज़रत शैख अब्दुलकादर जीलानी رضي الله تعالي عنه ने फरमया: ज़ाहिदोको दो सवाब मिलते है। पेहला तर्के असबाब के बाइस क्योंके नफ्सकी ख्वाहिशातसे मोहतरिज़ (परहेज़ करनेवाला) होकर सिर्फ हुकमका पाबन्द हो जाता है और जब नफससे उसकी मुखालेफत और दुश्मनी साबित हो जाती है, उसको हकीकत-व-विलायत की मन्ज़िल मिल जाती है और अब्दालों और आरिफों का मकाम हासिल हो जाता है।
    जो सिर्फ हुकम दे दिया जाता है के जो कुछ उसकी तकदीर में है, जो सिर्फ उसीके लिये तख़्लीक़ की गई है और खामए कुदरत से उसके लिये तेहरीर हो चुकी है और रोशनाई खुश्क हो चुकी और ऐसा ऐसा पहलेही से था, सिर्फ इसीसे ताल्लुक रखे।
बाक़ी कल की पोस्ट में... इंसा अल्लाह

*✍🏽फुतूहल ग़ैब*  पेज 115
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Friday, 10 March 2017

*मुबारक महीने* #05
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*रबीउल अव्वल (रबिउन्नूर शरीफ)* #02
_*मोजिज़ात*_
     12 रबीउल अव्वल को अल्लाह के नूर की दुन्या में जलवा गरी होते ही क़ुफ़्रो ज़ुल्मत के बादल छत गए, शाहे ईरान किसरा के महल पर ज़लज़ला आया, 14 कुंगूरे गिर गए। ईरान का जो आतश कदा 1000 साल से शोला जन था वो बुझ गया, दरियाए सावह खुश्क हो गया, काबे को वज्द आ गया और बूत सर के बल गिर पड़े।
     ताजदारे रिसालत ﷺ जहां में फ़ज़लो रहमत बन कर तशरीफ़ लाए और यक़ीनन अल्लाह की रहमत के नुज़ूल का दिन ख़ुशी व मुसर्रत का दिन होता है। चुनांचे अल्लाह इरशाद फ़रमाता है :
    *तुम फ़रमाओ अल्लाह ही के फ़ज़ल और इसी की रहमत और उसी लर चाहिये की ख़ुशी करे। वो उन के सब धन दौलत से बेहतर है।* (पारह 11)

     अल्लाहु अकबर ! रहमते खुदा वन्दी पर ख़ुशी मनाने का क़ुरआन हुक्म देता है। और क्या हमारे प्यारे आक़ा ﷺ से बढ़ कर भी कोई अल्लाह की रहमत है ? देखिये मुक़द्दस क़ुरआन में साफ साफ़ एलान है :
*وٙمٙآ اٙرْسٙلْنٰكٙ اِلّا رٙحْمٙةً لّٙلْعٰلٙمِيْنٙ o*
तर्जुमा : और हमने तुम्हे न भेजा मगर रहमत सारे जहान के लिये। (पारह, 17)

*✍🏽मदनी पंजसुरह, 327*
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Thursday, 9 March 2017

*शबे जुमुआ़ का दुरुद*
*بِسْــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ*

बुज़ुर्गो ने फ़रमाया की जो शख्स हर शबे जुमुआ़ (जुमुआ़ और जुमेरात की दरमियानी रात, जो आज है) इस दुरुद शरीफ को पाबंदी से कम अज़ कम एक मर्तबा पढेगा तो मौत के वक़्त सरकारे मदीना ﷺ की ज़ियारत करेगा और कब्र में दाखिल होते वक़्त भी, यहाँ तक की वो देखेगा की सरकारे मदीना ﷺ उसे कब्र में अपने रहमत भरे हाथो से उतार रहे है.
*بِسْــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*

*اللّٰھُمَّ صَلِّ وَسَلِّمْ وبَارِکْ عَلٰی سَیِّدِ نَا مُحَمَّدِنِ النَّبِیِّ الْاُمِّیِّ الْحَبِیْبِ الْعَالِی الْقَدْرِ الْعَظِیْمِ الْجَاھِ  وَعَلٰی  اٰلِہٖ  وَصَحْبِہٖ  وَسَلِّمْ*

*अल्लाहुम्म-सल्ली-वसल्लिम-व-बारीक-अ'ला-सय्यिदिना-मुहम्मदीन-नबिय्यिल-उम्मिय्यिल-ह्-बिबिल-आ'लिल-क़द्रील-अ'ज़िमील-जाहि-व-अ'ला आलिही व-स्ह्-बिहि व-सल्लिम*
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*क़ज़ा नमाज़ का तरीका* #05/15
*بِسْــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ*

*_अगर नमाज़ पढ़ना भूल जाए तो..?_*
     हुज़ूर ﷺ ने इरशाद फ़रमाया : जो नमाज़ से सो जाए या भूल जाए तो जब याद आए पढ़ ले कि वोही उसका वक़्त है।
*✍🏽मुस्लिम 346*

     फुक़हाए किराम फरमाते है : सोते में या भूले से नमाज़ क़ज़ा हो गई तो उसकी क़ज़ा पढ़नी फ़र्ज़ है अलबत्ता क़ज़ा का गुनाह उस पर नही मगर बेदार होने और याद आने पर अगर वक़्ते मकरूह न हो तो उसी वक़्त पढ़ ले ताखीर मकरूह है।
*✍🏽बहारे शरीअत 1/701*
*✍🏽नमाज़ के अहकाम 243*
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*मुबारक महीने* #04
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*रबीउल अव्वल (रबिउन्नूर शरीफ)* #01

     माहे रबीउल अव्वल तो क्या आता है हर तरफ मौसिमे बहार आ जाता है। मक्की मदनी मुस्तफा ﷺ के दीवानो में ख़ुशी की लहर दौड़ जाती है। हर हक़ीक़ी मुसलमान गोया दिल की ज़बान से बोल उठता है :
          *निसार तेरी चहल पहल पर हज़ार ईदे रबीउल अव्वल*
          *सिवाए इब्लीस के जहां में सभी तो खुशियां मना रहे है*
     जब काएनात में क़ुफ़्रो शिर्क और वहशतो बर-बरिय्यत का धुप अँधेरा छाया हुवा था। बारह रबीउल शरीफ को मक्का में हज़रते आमिना رضي الله تعالي عنها के मकाने रहमत निशान से एक ऐसा नूर चमका जिस ने सारे आलम को जगमग जगमग कर दिया। सिसकती हुई इंसानियत की आँख जिन की तरफ लगी हुई थी वो ताजदारे रिसालत ﷺ तमाम आलमीन के लिये रहमत बन कर मादरे गेती पर जल्वा गर हुए।

*✍🏽मदनी पंजसुरह, 325*
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Wednesday, 8 March 2017

*_जिस्म के आज़ा की फरियाद_*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     हदीशे पाक में है : इब्ने आदम जब सुबह करता है तो तमाम आज़ा ज़बान के सामने आज़िज़ाना ये कहते है, के तुम खुदा से डर, की हम सब तेरे साथ वा बस्ता है अगर तू सीधी रही तो हम भी सीधे रहेंगे, और अगर तू टेडी हो गई तो हम सब टेड़े हो जाएंगे।

*✍🏽जामेउत तिर्मिज़ी, 4/183, हदिष : 2415*
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