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Thursday, 17 August 2017

*नमाज़ के मकरुहाते तन्ज़िहा* #04
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

★ नमाज़ में सना, तअव्वुज़, तस्मिया और आमीन ज़ोर से कहना।
*✍🏼आलमगिरी, 1/107*

★ बिगैर उज़्र दिवार वगैरा पर टेक लगाना

★ रूकू में गुटनो पर और सजदों में ज़मीन पर हाथ न रखना, दाए बाए झूमना। और कभी दाए पाउ पर और कभी बाए पाउ पर ज़ोर देना के सुन्नत है।
*✍🏼बहारे शरीअत, 3/202*

★ और सज्दे के लिए जाते हुए सीधी तरफ ज़ोर देना और उठते वक़्त उलटी तरफ ज़ोर देना मुस्तहब है
*✍🏼बहारे शरीअत, 3/101*

★ नमाज़ में आँखे बंद रखना। हा अगर खुशुअ आता हो तो आँखे बंद रखना अफज़ल है।
*✍🏼दुर्रेमुखतार, रद्दलमोहतार, 2/499*

बाक़ी अगली पोस्ट में..ان شاء الله
*✍🏼नमाज़ के अहकाम, स.199*
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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
*___________________________________*
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*कैदखाना*
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اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : दुन्या मोमिन के लिये कैदखाना है और काफ़िर के लिये जन्नत।
*✍🏼صحيح مسلم*

     यानी मोमिन दुन्या में कितना ही आराम में हो, मगर उस के लिये आख़िरत की नेअमतों के मुक़ाबले में दुन्या जेलखाना है, जिस में वो दिल नहीं लगता। जेल अगरचे A क्लास हो, फिर भी जेल है। और काफ़िर ख्वाह कितनी ही तकलीफ में हो, मगर आख़िरत के अज़ाब के मुक़ाबिल उस के लिये दुन्या बाग़ और जन्नत है। वो यहाँ दिल लगा कर रहता है। लिहाज़ा हदिष पर ये ऐतराज़ नहीं की बाज़ मोमिन दुन्या में आराम से रहते है, और बाज़ काफ़िर तकलीफ में।
*✍🏼मीरअतुल मनाजिह्, 7/4*
*✍🏼40 फरमाने मुस्तफा, 50*
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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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Wednesday, 16 August 2017

*83 आसान नेकियां* #29
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_3-ज़िकरुल्लाह करना_* #27

*_नेकी की दावत देना_*
     किसी को नेकी की दावत देना और बुराई से रोकना अहम तरीन नेकियों में से एक है और इस के बेशुमार फ़ज़ाइल है।
     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : अगर अल्लाह तुम्हारे ज़रीए किसी एक शख्स को हिदायत अता फरमाए तो ये तुम्हारे लिये इस से अच्छा है की तुम्हारे पास सुर्ख ऊंट हो।
*✍🏼مسلم*

     हज़रते अल्लामा यहया बिन शरफ नववी عليه رحمه इस हदिष की शर्ह में लिखते है : सुर्ख ऊंट अहले अरब का बेश क़ीमत माल समझा जाता था, इस लिये कहावत के तौर पर सुर्ख ऊँटो का ज़िक्र किया गया। उखरवि उमूर को दुनयावी चीज़ों से मिषाल देना सिर्फ समझाने के लिये है वरना हक़ीक़त येही है की हमेशा बाक़ी रहने वाली आख़िरत का एक ज़र्रा भी दुन्या और इस जैसी जितनी दुन्याए तसव्वुर की जा सकें, उन सब से बेहतर है।
*✍🏼شرح مسلم للنووى*

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*✍🏼आसान नेकियां, 92*
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*नमाज़ के मकरुहाते तन्ज़िहा* #03
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★ नमाज़ में बिला उज़्र चार जानू यानी चोकड़ी मार कर बैठना।
*✍🏼गुन्यातुल मुस्तमलि, 339*

★ अंगड़ाई लेना और इरादतन खाँसना, खनकारना।
*✍🏼गुन्यातुल मुस्तमलि, 340"*
● अगर तबीअत चाहती हो तो हरज नही

★ सज्दे में जाते हुए घुटने से पहले बिला उज़्र हाथ से क़ब्ल घुटने ज़मीन से उठना।
★ रूकू में सर को पीठ से उचा निचा करना।
*✍🏼गुन्यातुल मुस्तमलि, 335,338*

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*✍🏼नमाज़ के अहकाम, स.198*
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*अज़ाबे क़ब्र*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
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     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : क़ब्र का अज़ाब हक़ है।
*✍🏼صحيح البخاري*

     अज़ाबे क़ब्र में मुतअल्लिक़ चन्द मसाइल याद रखने चाहिएं
(1) यहाँ क़ब्र से मुराद आलमे बरज़ख है। जिस की इब्तिदा हर शख्स की मौत से है इन्तिहा क़यामत पर, उर्फी क़ब्र मुराद नहीं लिहाज़ा जो मुर्दा दफ़्न न हुवा बल्कि जला दिया गया या डुबो दिया गया या उसे शेर खा गया उसे भी क़ब्र का हिसाब व अज़ाब है।
(2) हिसाबे क़ब्र और है अज़ाबे क़ब्र कुछ और बाज़ लोग हिसाबे क़ब्र में कामयाब होंगे मगर बाज़ गुनाहों की वजह से अज़ाब में मुब्तला, जैसे चुगल खोर और पेशाब के छीटों से न बचने वाला।
(3) काफ़िर को अज़ाबे क़ब्र दाइमी होगा गुनाहगार मोमिन को आरिज़ि।
(4) अज़ाबे क़ब्र रूह को है जिस्म इस के ताबे मगर हशर के बाद वाला अज़ाब व षवाब रूह व जिस्म दोनों को होगा।
*✍🏼मीरआतुल मनाजिह्, 1/125*
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Tuesday, 15 August 2017

*83 आसान नेकियां* #28
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*_3-ज़िकरुल्लाह करना_* #26

*_क़ब्रस्तान वालों के लिये दुआ करना_*
     जो क़ब्रस्तान में दाखिल हो कर ये कहे :
اٙللّٰهُمّٙ رٙبّٙ الْاٙجْسٙادِ الْبٙالِيٙةِ وٙالْعِظٙامِ النّٙخِرٙةِ الّٙتِىْ خٙرٙجٙتْ مِنٙ الدُّنْيٙا وٙهِىٙ بِكٙ مُؤْمِنٙةٌ اٙدْخِلْ عٙلٙيْهٙا رٙوْحًا مِّنْ عِنْدِكٙ وٙسٙلٙامًا
तर्जमा : ऐ अल्लाह ! ऐ गल जाने वाले जिस्मों और बोसीदा हड्डियों के रब ! जो दुन्या से ईमान की हालत में रुख्सत हुवे तू उन पर अपनी रहमत और मेरा सलाम पहुंचा दे।
     तो हज़रते आदम عليه السلام से ले कर इस वक़्त तक जितने मोमिन फौत हुवे सब उस (दुआ पढ़ने वाले) के लिये दुआए मगफिरत करेंगे।

*_आयत या सुन्नत सिखाना_*
     हज़रते अनस رضي الله عنه से रिवायत है की जिस शख्स ने क़ुरआन की एक आयत या दीन की कोई सुन्नत सिखाई क़यामत के दिन अल्लाह उस के लिये ऐसा षवाब तैयार फ़रमाएगा की उस से बेहतर षवाब किसी के लिये भी नही होगा। जब की हज़रते उष्मान इब्ने अफ्फान رضي الله عنه से रिवायत है की हुज़ूर صلى الله عليه وسلم ने इर्शाद फ़रमाया : जिस ने क़ुरआन की एक आयत सिखाई उस के लिये सिखने वाले से दुगना षवाब है।
*✍🏼جمع الجوامع*

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*✍🏼आसान नेकियां, 90*
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*नमाज़ के मकरुहाते तन्ज़िहा* #02
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
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     रूकू या सज्दे में बिला ज़रूरत 3 बार से कम तस्बीह कहना (अगर वक़्त तांग हो या ट्रेन चल पड़ने के खौफ से हो तो हरज नहीं। अगर मुक्तदि 3 तस्बीह न कहने पाया था कि इमाम ने सर उठा लिया तो इमाम का साथ दे)

     नमाज़ में पेशानी से ख़ाक या घास छुड़ाना। हा अगर इन की वजह से नमाज़ में ध्यान बटता हो तो छुड़ाने में हरज नही।
*✍🏼आलमगिरी, 1/106*

     सज्दे वग़ैरा में उंगलिया किब्ले से फेर देना।
*✍🏼आलमगिरी, 1/119*

     मर्द का सज्दे में रान को पेट से चिपका देना।
*✍🏼आलमगिरी, 1/109*

     नमाज़ में हाथ या सर के इशारे से सलाम का जवाब देना।

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*✍🏼नमाज़ के अहकाम, स.198*
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*रौज़ए अक़दस की हाज़री*
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     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : जिस ने मेरी क़ब्र की ज़ियारत की, उस के लिये मेरी शफ़ाअत लाज़िम हो गई।
*✍🏼شعب الايمان*

     क़ुरआने पाक में अल्लाह इर्शाद फ़रमाता है :
_और अगर जब वो अपनी जानों पर ज़ुल्म करें तो ऐ महबूब तुम्हारे हुज़ूर हाज़िर हों और फिर अल्लाह से मुआफ़ी चाहें और रसूल उन की शफ़ाअत फरमाए तो ज़रूर अल्लाह को बहुत तौबा क़बूल करने वाला मेहरबान पाएं।_

     हज़रत नईमुद्दीन मुरादआबादी عليه رحما इस आयत के तहत लिखते है : इस से मालुम हुवा की बारगाहे इलाही में रसूलुल्लाह صلى الله عليه وسلم का वसीला और आप की शफ़ाअत कार-बरआरी (काम बन जाने) का ज़रीआ है सैय्यिदे आलम صلى الله عليه وسلم की वफ़ात शरीफ के बाद एक देहाती शख्स रैज़ाए अक़दस पर हाज़िर हुवा और रौज़ए शरीफा की खाके पाक कपने सर पर डाली और अर्ज़ करने लगा : या रसूलुल्लाह जो आप ने फ़रमाया हम ने सुना और जो आप पर नाज़िल हुवा उस में ये आयत भी है وٙلٙوْ اٙنّٙهُمْ اِذْ ظّٙلٙمُوْا में ने बेशक अपनी जान पर ज़ुल्म किया और में आप के हुज़ूर में अल्लाह से अपने गुनाह की बख्शिश चाहने हाज़िर हुवा तो मेरे रब से मेरे गुनाह की बख्शीश कराइये। इस पर क़ब्र शरीफ से निदा आई की तेरी बख्शीश की गई।
*✍🏼40 फरमाने मुस्तफा, 46*
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Monday, 14 August 2017

*83 आसान नेकियां* #27
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
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*_3-ज़िकरुल्लाह करना_* #25

*_दुआ करना_*
     दुन्या के बड़े से बड़े अमीर शख्स से जब बार बार कुछ माँगा जाता है तो वो उकता कर नाराज़ हो जाता है लेकिन इस दुन्या का खालीक़ो मालिक अल्लाह ऐसा जव्वाद और करीम है की उसे अपने बन्दों का मांगना बहुत पसन्द है, इन में से जो जितना ज़्यादा दुआ मांगेगा अल्लाह उस से उतना ही खुश होगा।।
     हमारे आक़ा صلى الله عليه وسلم कषरत से दुआ माँगा करते थे हत्ता की सोने जागने, खाने पिने, कपड़े पहनने उतारने, बैतूल खला जाने आने के वक़्त और वुज़ू करने के दौरान भी दुआ माँगा करते थे।
     दुकान किसी भी वक़्त किसी भी जाइज़ व मुमकिन चीज़ के लिये मांगी जा सकती है अलबत्ता दुआ के आदाब का ख़याल रखना ज़रूरी है। बहर हाल दुआ दुन्यवी मक़ासिद के लिये मांगी जाए या उखरवी, इबादत में शुमार होती है।
     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم दुआ इबादत का मग्ज़ है।
*✍🏼خامه ترمزى*

*_दुआ मोमिन का हथियार_*
     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : दुआ मोमिन का हथियार, दीन का सुतून और ज़मीनो आसमान का नूर है।

*_दुआ के फायदे_*
     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : जो मुसलमान कोई ऐसी दुआ मांगता है जिस में कोई गुनाह या कतए रहमी न हो तो अल्लाह उसे तिन में से एक खसलते अता फ़रमाता है।
(1) या तो उस की दुआ जल्द क़बूल कर ली जाती है।
(2) या उसे आख़िरत के लिये ज़खीरा कर दिया जाता है।
(3) या फिर उस से इसी की मिष्ल कोई बुराई दूर कर दी जाती है।
सहाबए किराम ने अर्ज़ की फिर तो हम बहुत ज़्यादा दुआए माँगा करेंगे। फ़रमाया अल्लाह ज़्यादा दुआए क़बूल फरमाने वाला है।

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*✍🏼आसान नेकियां, 89*
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*नमाज़ के मकरुहाते तन्ज़ीहा* #01
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     दूसरे कपड़े मुयस्सर होने के बा वुजूद कामकाज के लिबास में नमाज़ पढ़ना।
*✍🏼गुण्यतुल मुस्तमलि, 337*

     मुह में कोई चीज़ लिये हुए होना। अगर इस की वजह से किराअत ही न हो सके या ऐसे अलफ़ाज़ निकले कि जो क़ुरआन के न हो तो नमाज़ ही फासिद हो जाएगी।
*✍🏼दुर्रेमुख्तार, रद्दलमोहतार*

     सुस्ती से नंगे सर नमाज़ पढ़ना।
*✍🏼आलमगिरी, 1/106*

     नमाज़ में टोपी या इमाम शरीफ गिर पड़े तो उठा लेना अफज़ल है जब कि अमले कसीर की हाजत न पड़े वरना नमाज़ फासिद् हो जाएगी। और बार बार उठाना पड़े तो छोड़ दे और उठाने से खुशुओ ख़ुज़ूअ मक़सूद हो तो उठाना अफज़ल है।
*✍🏼दुर्रेमुखतार, रद्दलमोहतार 2/194*

     अगर कोई नंगे सर नमाज़ पढ़ रहा हो या उसकी टोपी गिर पड़ी हो तो उसको दूसरा शख्स टोपी न पहनाए।

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*✍🏼नमाज़ के अहकाम, स.197*
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*नमाज़ की अहमिय्यत*
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     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : नमाज़ दीन का सुतून है।
*✍🏼شعب الايمان*

     नमाज़ दीन की अस्ल और बुन्याद है, इसे उम्मुल इबादत, मेराजुल मुअमिनिन भी कहा जाता है।
*✍🏼فيض القدير*

*_मछली अपनी जगह पर थी_*
     शैख़ अबू अब्दुल्लाह जिला رضي الله عنه की वालिदा ने एक रोज़ अपने शौहर से मछली लाने की फरमाइश की। शैख़ के वालिद बाज़ार गए और अपने फ़रज़न्द को भी हमराह ले गए। बाज़ार से मछली खरीदी, और एक मज़दूर तलाश करने लगे ताकि वो मछली घर तक पहुचा दे। एक लड़का मिला और उस ने मछली सर पर उठा ली और साथ चला, रास्ते में मुअज्ज़िन की अज़ान सुनाई दी। उस मज़दूर लड़के ने कहा : नमाज़ के लिये मुझे तहारत की हाजत है और अज़ान हो रही है, अगर आप राज़ी हो तो मेरा इन्तिज़ार कर लें, वरना अपनी मछली ले कर जाएं। इतना कह कर उस ने मछली वहीं छोड़ी और मस्जिद चला गया। शैख़ के वालिद ने कहा : इस लड़के का अल्लाह पर तवक़्क़ुल है, हमें ब दर्जए औला तवक़्क़ुल करना चाहिये। चुनान्चे मछली छोड़ कर हम लोग नमाज़ पढ़ने चके गए। हम लोग नमाज़ पढ़ कर निकले तो मछली अपनी जगह थी, लड़के ने उठा ली और हम लोग घर पहुचे।
*✍🏼روض الرياحين*
*✍🏼40 फरमाने मुस्तफा, 44*
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Sunday, 13 August 2017

*83 आसान नेकियां* #26
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*_3-ज़िकरुल्लाह करना_* #24

*_खन्दा पेशानी से सलाम करना_*
     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم तुम्हारा लोगो को खन्दा परशानी से सलाम करना भी सदक़ा है।
*✍🏼شعب الايمان*

*_मुसाफहा करना_*
     दो मुसलमानो का ब वक़्ते मुलाक़ात सलाम कर के दोनों हाथो से मुसाफहा करना यानी दोनों हाथ मिलाना सुन्नत है।
     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم जब दो मुसलमान मुलाक़ात करते हुवे मुसाफहा करते है और एक दूसरे से खैरिय्यत दरयाफ़्त करते है तो अल्लाह उन के दरमियान सो रहमते नाज़िल फ़रमाता है जिन में से 99 रहमतें ज़्यादा पुर तपाक तरीके से मिलने वाले और अच्छे तरीके से अपने भाई से खैरिय्यत दरयाफ़्त करने वाले के लिये होती है।

*_गुनाह झड़ते है_*
     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم जब कोई मुसलमान कपने भाई से मुलाक़ात करते हुवे उस हाथ पकड़ता है तो उस के गुनाह ऐसे झड़ते है जेसे तेज़ आंधी में खुश्क दरख्त के पत्ते झड़ते है और इन दोनों की मगफिरत कर दी जाती है अगर्चे इन के गुनाह समन्दर की झाग के बराबर हों।

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*नमाज़ के मकरुहाते तहरीमि* #13
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*_नमाज़ और तस्वीर_*
     जानदार की तस्वीर वाला लिबास पहन कर नमाज़ पढ़ना मकरुहे तहरीमि है, नमाज़ के इलावा भी ऐसा कपड़ा पहनना जाइज़ नहीं।
*✍🏼दुर्रेमुखतार 2/502*

     नमाज़ी के सर पर यानी छत पर या सज्दे की जगह पर या आगे या दाए या बाए जानदार की तस्वीर आवेज़ा होना मकरुहे तहरीमि है और पीछे होना भी मकरूह है, मगर गुज़श्ता सूरतो से कम। अगर तस्वीर फर्श पर है और उस और सज्दा नहीं होता तो कराहत नहीं। अगर तस्वीर गैर जानदार की है जेसे दरिया पहाड़ वगैरा तो इस में कोई मुज़ायक़ा नहीं। इतनी छोटी तस्वीर हो जिसे ज़मीन पर रख कर खड़े हो कर देखे तो आज़ा की तफ़सील न दिखाई दे (जैसा के उमुमन तवाफ़े काबा के मंज़र की तस्वीरें बहुत छोटी होती है ये तसावीर) नमाज़ के लिये बाइसे कराहत नहीं है।
*✍🏼गुण्यतुल मुस्तमलि, 347*
*✍🏼दुर्रेमुखतर, 2/503*

     तवाफ़ की भीड़ में एक भी चेहरा वाज़ेह हो गया तो मुमानअत बाक़ी रहेगी। चेहरे के इलावा मसलन हाथ, पाउ, पीठ, चेहरे का पिछला हिस्सा या ऐसा चेहरा जिस की आँखे, नाक, होठ वग़ैरा सब आज़ाए मिटे हुए हो ऐसी तसावीर में कोई हर्ज़ नही।
*✍🏼नमाज़ के अहकाम, स.196*
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Saturday, 12 August 2017

*83 आसान नेकियां* #25
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_3-ज़िकरुल्लाह करना_* #23

*_सलाम के अल्फ़ाज़ बढ़ाना_*
     अगर्चे सलाम की सुन्नत सिर्फ السلام عليكم कहने से अदा तो हो जाएगी लेकिन अगर इस के साथ ورحمة الله وبركاته बढ़ा लिया जाए तो ज़्यादा षवाब है, चुनान्चे السلام عليكم कहने से 10 नेकियां मिलती है। साथ में ورحمة الله भी कहेंगे तो 20 नेकियां हो जाएंगी और وبركاته शामिल करेंगे तो 30 नेकियां हो जाएंगी। इसी तरह जवाब में وعليكم السلام والرحمة و بركاته कह कर 30 नेकियां हासिल की जा सकती है।
     एक शख्स ने हुज़ूर صلى الله عليه وسلم की बारगाह में हाज़िर हो कर अर्ज़ की السلام عليكم आप ने सलाम का जवाब इर्शाद फ़रमाया। फिर वो शख्स बैठ गया तो नबी صلى الله عليه وسلم ने फ़रमाया : 10 नेकियां है। फिर एक दूसरा शख्स हाज़िर हुवा और अर्ज़ की السلام عليكم و رحمه الله आप ने उसे भी जवाब दिया। फिर वो बैठ गया तो नबी صلى الله عليه وسلم ने फ़रमाया 20 नेकियां है। फिर एक और शख्स ने हाज़िर हो कर अर्ज़ किया السلام عليكم و رحمه الله و بركاته फिर वो बैठ गया तो रसूलुल्लाह صلى الله عليه وسلم ने फ़रमाया 30 नेकियां है।
*✍🏼سنن ابن داود*

बाक़ी अगली पोस्ट में..ان شاء الله
*✍🏼आसान नेकियां, 84*
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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*नमाज़ के मकरुहाते तहरीमि* #12
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     दूसरा कपड़ा होने के बा वुजूद सिर्फ पाजामा या तहबन्द में नमाज़  पढ़ना।

     किसी आने वाले शनासा की खातिर इमाम का नमाज़ को तूल देना (आलमगिरी, 1/107) अगर उस की नमाज़ पर इआनत (मदद) के लिये एक दो तस्बीह की क़दर तूल दिया तो हरज नहीं।

     ऐसी ज़मीन जिस पर ना जाइज़ क़ब्ज़ा किया हो या पराया खेत जिस में ज़राअत मौजूद है या जूते हुए खेत में या क़ब्र के सामने जब कि क़ब्र और नमाज़ी के बिच में कोई चीज़ हाइल न हो नमाज़ पढ़ना।
*✍🏼आलमगिरी, 1/107*

     कुफ़्फ़ार के इबादत खाने में नमाज़ पढ़ना बल्कि इन में जाना भी मम्नुअ है।
*✍🏼रद्दलमोहतार, 2/53*

     कुरते वग़ैरा के बटन खुले होना जिस से सीना खुला रहे मकरुहे तहरीमि है, हा अगर निचे कोई और कपड़ा है जिस से सीना नहीं खुला तो मकरुहे तन्ज़ीहि है।

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*✍🏼नमाज़ के अहकाम, 196*
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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
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Friday, 11 August 2017

*83 आसान नेकियां* #24
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_3-ज़िकरुल्लाह करना_* #22

*_सलाम में पहल करना_*
     एक दूसरे को सलाम करने से षवाब प भी मिलता है और आपस में महब्बत बढ़ती है लेकिन सलाम में पहल करने वाला ज़्यादा फायदा पाता है। सलाम में पहल करने वाला अल्लाह का मुक़र्रब है, सलाम में पहल करने वाले पर 90 रहमतें और जवाब देने वाले पर 10 रहमतें नाज़िल होती है।
*✍🏼الخامه الصغير*

*_सिर्फ सलाम करने के लिये बाज़ार जाया करते_*
     हज़रते तुफैल बिन उबय्य बिन काब رضي الله عنه से रिवायत है की में सुबह के वक़्त हज़रते अब्दुल्लाह बिन उमर رضي الله عنه के पास जाता तो वो मुझे अपने साथ बाज़ार ले जाते जहाँ वो मामूली चीजें बेचने वाले, दुकानदार और मिसकीन या किसी और के सामने से गुज़रते तो सब को सलाम करते।
     एक दिन जब उन्हों ने मुझे बाज़ार चलने को कहा तो में ने पूछा : आप बाज़ार जा कर क्या करेंगे ! आप वहां खड़े होते है न सौदे के मुतअल्लिक़ कुछ दरयाफ़्त करते है, किसी चीज़ का नर्ख चुकाते है न बाज़ार की मजलिसों में बैठते है। आप यहीं बैठे बैठे हमें हदिशे सुना दिया करें। उन्हों ने फ़रमाया : हम सलाम करने के लिये ही बाज़ार जाते है कि जो मिलेगा, उसे सलाम करेंगे।

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*✍🏼आसान नेकियां, 82*
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गर होजाए यक़ीन के.....
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*नमाज़ के मकरुहाते तहरीमि* #11
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_गधे जैसा मुंह_*
     हज़रते इमाम न-ववी अलैरहमा हदिष लेने के लिये एक बड़े मशहूर शख्स के पास दिमश्क़ गए। वो पर्दा डाल कर पढ़ाते थे, मुद्दतो तक उन के पास बहुत कुछ पढ़ा मगर उन का मुंह न देखा, जब ज़मानए दराज़ गुज़रा और उन मुहद्दिस साहिब ने देखा कि इन को इल्मे हदिष की बहुत ख्वाहिश है तो एक रोज़ पर्दा हटा दिया !

     देखते क्या है कि उनका गधे जैसा मुंह है !! उन्होंने फ़रमाया, साहिब ज़ादे ! दौराने जमाअत इमाम पर सबक़त करने से डरो कि ये हदिष जब मुझ को पहुची मेने इसे मुस्तबअद जाना और मेने इमाम पर क़सदन सबक़त की तो मेरा मुह ऐसा हो गया जैसा तुम देख रहे हो।
*✍🏼बहारे शरीअत, जी.3 स.95*

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*✍🏼नमाज़ के अहकाम, स.195*
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Thursday, 10 August 2017

*83 आसान नेकियां* #23
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
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*_3-ज़िकरुल्लाह करना_* #21

*_रोज़ा इफ्तार करवाना_*
     किसी का रोज़ा इफ्तार करवाना भी बहुत बड़ी मगर आसान नेकी है, इस के लिये समोसों, पकड़ो, फलो और तरह तरह की डिशो का होना ज़रूरी नही बल्कि सिर्फ पानी से रोज़ा इफ्तार करवा के भी षवाब कमाया जा सकता है।

     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : जो हलाल कमाई से किसी रोज़ेदार को इफ्तार करवाए तो फ़रिश्ते पूरा रमज़ान उस के लिये दुआए मगफिरत करते रहते है और शबे क़द्र में हज़रते जिब्राइल उस से मुसाफहा फरमाएंगे और जिस शख्स से हज़रते जिब्राइल मुसाफहा फ़रमाते है उस का दिल नर्म और आसूं कषिर हो जाते है। एक शख्स ने अर्ज़ की या रसूलुल्लाह صلى الله عليه وسلم अगर किसी के पास इतना न हो तो ? इर्शाद फ़रमाया : चाहे पानी मिला हुवा थोडा सा दूध ही हो। एक और शख्स ने अर्ज़ की अगर इतना भी न हो तो ? फ़रमाया : पानी के एक घूंट से ही इफ्तार करवा दे।
*✍🏼तिबरानी*

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*✍🏼आसान नेकियां, 81*
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*नमाज़ के मकरुहाते तहरीमि* #10
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★ किराअत रूकू में पहुच कर खत्म करना।

★ इमाम से पहले मुक्तदि ला रूकू व सुजूद वग़ैरा में चला जाना या इससे पहले सर उठाना।
*✍🏼रद्दलमोहतार, जी.2 स.513*

★ हज़रते इमाम मालिक, हज़रते अबू हुरैरा رضي الله عنه से रिवायत करते है कि नबी صلى الله عليه وسلم ने फ़रमाया : जो इमाम से पहले सर उठाता और झुकाता है उस की पेशानी के बाल शैतान के हाथ में है।

★ हज़रते अबू हुरैरा رضي الله عنه से रिवायत है, नबी صلى الله عليه وسلم फरमाते है : क्या जो शख्स इमाम से पहले सर उठाता है इस से डरता नहीं की अल्लाह उसका सर गधे का सर कर दे।
*✍🏼सहीह मुस्लिम, 1/181*

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*✍🏼नमाज़ के अहकाम, स.194-195*
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*तौबा की बुन्याद* #02
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     (2) गुनाहों के अन्जाम के तौर पर जहन्नम में दिये जाने वाले अज़ाबे इलाही की शिद्दत को पेशे नज़र रखे, हुज़ूर صلى الله عليه وسلم ने फ़रमाया :
     ◆ दोज़ख़ियों में सब से हल्का अज़ाब जिस को होगा उसे आग के जूते पहनाए जाएंगे जिन से उस का दिमाग खौलने लगेगा।
*✍🏼सहीह मुस्लिम*
     ◆ अगर उस ज़र्द पानी का एक डोल जो दोज़ख़ियों के ज़ख्मों से जारी होगा वो दुन्या में डाल दिया जाए तो दुन्या वाले बदबूदार हो जाएं।
*✍🏼तिर्मिज़ी*
     ◆ दोज़ख में बख्ती (बड़े ऊंट के बराबर सांप) ये सांप एक मर्तबा किसी को काटे तो उस का दर्द और ज़हर चालीस बारस तक रहेगा। और दोज़ख में पालान बंधे हुए खच्चरों के मिस्ल बिच्छु है जिन के एक मर्तबा काटने का दर्द चालीस साल तक रहेगा।
*✍🏼المسند للإمام احمد*
     ◆ तुम्हारी ये आग जिसे इब्ने आदम रोशन करता है, जहन्नम की आग से 70 दर्जे कम है। ये सुन कर सहाबए किराम ने अर्ज़ की या रसूलुल्लाह صلى الله عليه وسلم! वो इस से 69 दर्जे ज़्यादा है, हर दर्जे में यहाँ की आग के बराबर गर्मी है।
*✍🏼صحيح مسلم*
     ★ फिर अपने आप से यूँ मुखातिब हों। अगर मुझे जहन्नम में डाल दिया गया तो मेरा ये नरम व नाजुक बदन उस के हौलनाक अज़ाबात को किस तरह बर्दाश्त कर पाएगा ? जब की जहन्नम में पहुचने वाली तकालिफ् की शिद्दत के सबब इन्सान पर न तो बेहोशी तारी होगी और न ही उसे मौत आएगी। आह ! वो वक़्त कितनी बे बसी का होगा जिस के तसव्वुर से ही दिल कांप उठता है। क्या ये रोने का मक़ाम नही ? क्या अब भी गुनाहों से वहशत महसूस नहीं होगी और दिल में नेकियों की महब्बत नहीं बढ़ेगी ? क्या अब भी बारगाहे खुदा में सच्ची तौबा पर दिल माइल नहीं होगा ?
     उम्मीद है की बार बार इस अन्दाज़ से फ़िक्रे मदीना करने की बरकत से दिल में नदामत पैदा हो जाएगी और सच्ची तौबा की तौफ़ीक़ मिल जाएगी। أن شاء الله
*✍🏼40 फरमाने मुस्तफा, 38*
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गर होजाए यक़ीन के.....
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