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Tuesday, 31 January 2017

*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #140
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_सूरतुल बक़रह, आयत ①⑨ⓞ_*
     और अल्लाह की राह में लड़ो(5)
उनसे जो तुमसे लड़ते हैं (6)
और हद से न बढ़ो(7)
अल्लाह पसन्द नहीं रखता हद से बढ़ने वालों को.

*तफ़सीर*
     (5) सन छ हिजरी में हुदैबिया का वाक़िआ पेश आया. उस साल सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम मदीनए तैय्यिबह से उमरे के इरादे से मक्कए मुकर्रमा रवाना हुए. मुश्रिकों ने हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को मक्कए मुकर्रमा में दाख़िल होने से रोका और इस पर सुलह हुई कि आप अगले साल तशरीफ़ लाएं तो आपके लिये तीन रोज़ मक्कए मुकर्रमा ख़ाली कर दिया जाएगा. अगले साल सन सात हिजरी में हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम क़ज़ा उमरे के लिये तशरीफ़ लाए. अब हुज़ूर के साथ एक हज़ार चार सौ की जमाअत थी. मुसलमानों को यह डर हुआ कि काफ़िर अपने वचन का पालन न करेंगे और हरमे मक्का में पाबन्दी वाले महीने यानी ज़िलक़ाद के माह में जंग करेंगे और मुसलमान इहराम की हालत में हैं. इस हालत में जंग करना भारी है क्योंकि जाहिलियत के दिनों से इस्लाम की शुरूआत तक न हरम में जंग जायज़ थी न माहे हराम में, न हालते इहराम में. तो उन्हें फ़िक्र हुई कि इस वक़्त जंग की इजाज़त मिलती है या नहीं. इस पर यह आयत उतरी.
     (6) इसके मानी या तो ये हैं कि जो काफ़िर तुमसे लड़े या जंग की शुरूआत करें तुम उनसे दीन की हिमायत और इज़्ज़त के लिये लड़ो. यह हुक्म इस्लाम की शुरूआत में था, फिर स्थगित कर दिया गया और काफ़िरों से क़िताल या जंग करना वाजिब हुआ, चाहे वो शुरूआत करें या न करें. या ये मानी हैं कि जो तुम से लड़ने का इरादा रखते हैं, यह बात सारे ही काफ़िरों में है क्योंकि वो सब दीन के दुश्मन और मुसलमानों के मुख़ालिफ़ हैं, चाहे उन्होंने किसी वजह से जंग न की हो लेकिन मौक़ा पाने पर चूकने वाले नहीं. ये मानी भी हो सकते हैं कि जो काफ़िर मैदान में तुम्हारे सामने आएं और तुम से लड़ने वाले हों, उनसे लड़ो. उस सूरत में बूढ़े, बच्चे, पागल, अपाहिज, अन्धे, बीमार, औरतें वग़ैरह जो जंग की ताक़त नहीं रखते, इस हुक्म में दाख़िल न होंगे. उनका क़त्ल करना जायज़ नहीं.
     (7) जो जंग के क़ाबिल नहीं उनसे न लड़ो या जिनसे तुमने एहद किया हो या बगै़र दावत के जंग न करो क्योंकि शरई तरीक़ा यह है कि पहले काफ़िरों को इस्लाम की दावत दी जाए, अगर इन्कार करें तो जिज़िया माँगा जाए, उससे भी इन्कारी हों तो जंग की जाए. इस मानी पर आयत कर हुक्म बाक़ी है, स्थगित नहीं. (तफ़सीरे अहमदी)
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मिट जाए गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाये यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*नमाज़ के मकरुहाते तन्ज़िहा* #03
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

जलती आग के सामने नमाज़ पढ़ना, शमा या चराग सामने हो तो हर्ज़ नहीं।
*✍🏽आलमगिरी, 1/108*

ऐसी चीज़ के सामने नमाज़ पढ़ना जिससे ध्यान बटे मसलन ज़ीनत और लहवो लअब वग़ैरा।
*✍🏽रद्दलमोहतर, 1/439*

नमाज़ के लिए दौड़ना।
कूड़ा डालने की जगह।
मज़्बह यानी जहा जानवर जबह किये जाते हो वहा।
इस्तबल यानी घोड़े बंधने की जगह।
गुस्ल खाना, मवेशी खाना खुसुसन जहां ऊंट बांधे जाते हो।
इस्तिन्जा खाने की छत।
सहरा में बिला सुतरा के जब कि आगे से लोगो के गुज़रने का इम्कान हो इन जगहों पर नमाज़ पढ़ना।
*✍🏽गुन्यातुल मुस्तमली 339*

बिगैर उज़्र हाथ से माखी मच्छर उड़ाना (नमाज़ में जू या मच्छर इज़ा देते हो तो पकड़ कर मार डालने में कोई हरज नही जब की अमले कसीर से न हो)
*✍🏽बहारे शरीअत*

हर वो अमले कलिल जो नमाज़ी के लिये मुफीद हो, जाइज़ है और जो मुफीद न हो वो मकरूह
*✍🏽आलमगिरी, 1/109*

उल्टा कपड़ा पहनना या ओढ़ना।
*✍🏽फतावा रज़विय्या, 7/358*
*✍🏽नमाज़ के अहकाम, स.199*
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मिट जाए गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाये यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*99 अस्माए हुस्ना और इन के फ़ज़ाइल* #87
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

हर विर्द के अव्वल व आखिर एक बार दुरुद शरीफ पढ़ लीजिये, फाएदा ज़ाहिर न होने की सूरत में शिकवा करने के बजाए अपनी कोताहियो की शामत तसव्वुर कीजिये और अल्लाह की मस्लहत पर नज़र रखिये।

*يٙا غٙنِىُّ*
रिठ की हड्डी, घुटनो, जोड़ो या जिस्म में कही भी दर्द हो, चलते फिरते उठते बैठते पढ़ते रहिये ان شاء الله दर्द जाता रहेगा।

*✍🏽मदनी पंजसुरह, 258*
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Monday, 30 January 2017

*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #139
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_सूरतुल बक़रह, आयत ①⑧⑨_*
     तुमसे नए चांद को पूछते हैं (1)
तुम फ़रमादो वो वक़्त की अलामतें (चिन्ह) हैं लोगों और हज के लिये (2)
और यह कुछ भलाई नहीं कि (3)
घरों में पछैत और (पिछली दीवार) तोड़कर आओ हाँ भलाई तो परहेज़गारी है, और घरों में दरवाज़ों से आओ (4)
और अल्लाह से डरते रहो इस उम्मीद पर कि फ़लाह (भलाई) पाओ*

*तफ़सीर*
     (1) यह आयत हज़रत मआज़ बिन जबल और सअलबा बिन ग़िनम अन्सारी के जवाब में उतरी. उन दोनों ने दर्याफ़्त किया, या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम, चाँद का क्या हाल है, शुरू में बहुत बारीक निकलता है, फिर दिन ब दिन बढ़ता है यहाँ तक कि पूरा रौशन हो जाता है फिर घटने लगता है और यहां तक घटता है कि पहले की तरह बारीक हो जाता है. एक हालत में नहीं रहता. इस सवाल का मक़सद चाँद के घटने बढ़ने की हिकमत जानना था.
     कुछ मुफ़स्सिरीन का ख़याल है कि सवाल का मक़सद चाँद के इख़्तिलाफ़ात का कारण मालूम करना था.
     (2) चाँद के घटने बढ़ने के फ़ायदे बयान फ़रमाए कि वह वक़्त की निशानियाँ हैं और आदमी के हज़ारों दीनी व दुनियावी काम इससे जुड़े हैं. खेती बाड़ी, लेन देन के मामले, रोज़े और ईद का समय, औरतों की इद्दतें, माहवारी के दिन, गर्भ और दूध पिलाने की मुद्दतें और दूध छुड़ाने का वक़्त और हज के औक़ात इससे मालूम होते है क्योंकि पहले जब चाँद बारीक होता है तो देखने वाला जान लेता है कि यह शुरू की तारीख़ें हैं. और जब चाँद पूरा रौशन हो जाता है तो मालूम हो जाता है कि यह महीने की बीच की तारीख़ है, और जब चाँद छुप जाता है तो यह मालूम होता है कि महीना ख़त्म पर है. इसी तरह उनके बीच दिनों में चाँद की हालतें दलालत किया करती हैं. फिर महीनों से साल का हिसाब मालूम होता है. यह वह क़ुदरती जनतरी है जो आसमान के पन्ने पर हमेशा खुली रहती है. और हर मुल्क और हर ज़बान के लोग, पढ़े भी और बे पढ़े भी, सब इससे अपना हिसाब मालूम कर लेते हैं.
     (3) जाहिलियत के दिनों में लोगों की यह आदत थी कि जब वो हज का इहराम बांधते तो किसी मकान में उसके दरवाज़े से दाख़िल न होते. अगर ज़रूरत होती तो पिछैत तोड़ कर आते और इसको नेकी जानते. इस पर यह आयत उतरी.
     (4) चाहे इहराम की हालत हो या ग़ैर इहराम की.
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*नमाज़ के मकरुहाते तन्ज़िहा* #02
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

नमाज़ में बिला उज़्र चार जानू यानी चोकड़ी मार कर बैठना।
*✍🏽गुन्यातुल मुस्तमलि, 339*

अंगड़ाई लेना और इरादतन खाँसना, खनकारना।
*गुन्यातुल मुस्तमलि, 340*
अगर तबीअत चाहती हो तो हरज नही

सज्दे में जाते हुए घुटने से पहले बिला उज़्र हाथ से क़ब्ल घुटने ज़मीन से उठना।
रूकू में सर को पीठ से उचा निचा करना।
*✍🏽गुन्यातुल मुस्तमलि, 335,338*

नमाज़ में सना, तअव्वुज़, तस्मिया और आमीन ज़ोर से कहना।
बिगैर उज़्र दिवार वगैरा पर टेक लगाना
*✍🏽आलमगिरी, 1/107*ज

रूकू में गुटनो पर और सजदों में ज़मीन पर हाथ न रखना, दाए बाए झूमना।
कभी दाए पाउ पर और कभी बाए पाउ पर ज़ोर देना के सुन्नत है।
*✍🏽बहारे शरीअत, 3/202*

सज्दे के लिए जाते हुए सीधी तरफ ज़ोर देना और उठते वक़्त उलटी तरफ ज़ोर देना मुस्तहब है
*✍🏽बहारे शरीअत, 3/101*

नमाज़ में आँखे बंद रखना।
हा अगर खुशुअ आता हो तो आँखे बंद रखना अफज़ल है।
*✍🏽दुर्रेमुखतार, रद्दलमोहतार, 2/499*
*✍🏽नमाज़ के अहकाम, स.199*
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*99 अस्माए हुस्ना और इन के फ़ज़ाइल* #86
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

हर विर्द के अव्वल व आखिर एक बार दुरुद शरीफ पढ़ लीजिये, फाएदा ज़ाहिर न होने की सूरत में शिकवा करने के बजाए अपनी कोताहियो की शामत तसव्वुर कीजिये और अल्लाह की मस्लहत पर नज़र रखिये।

*يٙا جٙامِعُ*
जिसके अज़ीज़ व अक़ारिब जुदा हो गए हो, चाश्त के वक़्त गुस्ल कर के आसमान की तरफ मिह करके 10 बार इस इसमें पाक को पढ़े और हर बार में एक ऊँगली बन्द करता जाए दिर अपने मुह पर हाथ फेरे ان شاء الله थोड़े अरसे में सब जमा हो जाएंगे।

*✍🏽मदनी पंजसुरह, 258*
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Sunday, 29 January 2017

*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #138
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
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*_सूरतुल बक़रह, आयत ①⑧⑧_*
     और आपस में एक दूसरे का माल नाहक़ ना खाओ और ना हाक़िमों के पास उनका मुक़दमा इसलिये पहुंचाओ कि लोगों का कुछ माल नाज़ायज़ तौर पर खालो जानबूझकर.

*तफ़सीर*
     इस आयत में बातिल तौर पर किसी का माल खाना हराम फ़रमाया गया है, चाहे वह लूट कर छीन कर या चोरी से या जुए से या हराम तमाशों से या हराम कामों या हराम चीज़ों के बदले या रिशवत या झूटी गवाही या चुग़लख़ोरी से, यह सब मना और हराम है.
     इससे मालूम हुआ कि नाजायज़ फ़ायदे के लिये किसी पर मुक़दमा बनाना और उसको हाकिम तक लेजाना हराम और नाजायज़ है.
     इसी तरह अपने फ़ायदे के लिये दूसरे को हानि पहुंचाने के लिये हाकिम पर असर डालना, रिशवत देना हराम है. हाकिम तक पहुंच वाले लोग इन आदेशों को नज़र में रख़ें. हदीस शरीफ़ में मुसलमानों को नुक़सान पहुंचाने वाले पर लानत आई है.
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*सिरते मुस्तफाﷺ*
*_दसवा बाब_* #20
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*​जंगे खन्दक*​ #05
*_बनू करीज़ा की गद्दारी_*
     क़बिलाए बनू करीज़ा के यहूदी अब तक गैर जानिब दार थे लेकिन बनू नज़ीर के यहूदियो ने उन को भी अपने साथ मिला कर लश्करे कुफ्फार में शामिल कर लेने की कोशिश शुरू कर दी, चुनांचे हुयय बिन अख्तब के मशवरे से बनू करीज़ा के सरदार काब बिन असद के पास गया। पहले तो उस ने अपना दरवाज़ा नही खोल और कहा की मुहम्मद के हलिफ् है और हम ने उन को हमेशा अपने अहद का पाबन्द पाया है इस लिये हम उन से अहद शिकनी करना ख़िलाफे मुरव्वत समझते है मगर बनू नज़ीर के यहूदियो ने इस क़दर शदीद इसरार किया और तरह तरह से वर गलाया की बिल आखिर काब बिन असद मुआह्दा तोड़ने के लिये राज़ी हो गया, बनू करीज़ा ने जब मुआह्दा तोड़ दिया और कुफ्फार से मिल गए तो कुफ़्फ़ारे मक्का और अबू सुफ़यान ख़ुशी से बाग़ बाग़ हो गए।
     हुज़ूरे अक़दसﷺ को जब इस की खबर मिली तो आप ने हज़रते साद बिन मुआज़ और हज़रते साद बिन उबादाرضي الله تعالي عنهم को तहक़ीक़ के लिये बनू करीज़ा के पास भेजा, वहा जा कर मालुम हुवा की वाक़ई बनू करीज़ा ने मुआह्दा तोड़ दिया है। जब इन दोनों मुअज़्ज़ज़् सहाबियों ने बनू करीज़ा को उन का मुआह्दा याद दिलाया तो उन बाद ज़ात यहूदियो ने इंतिहाई बे हयाई के साथ यहाँ तक कह दिया की हम कुछ नही जानते की मुहम्मद कौन है ? और मुआह्दा किस को कहते है ? हमारा कोई मुआह्दा हुवा नही था, ये सुन कर दोनों हज़रात वापस आ गए और सूरत हाल से हुज़ूरﷺ को मुत्तलअ किया तो आप ने बुलन्द आवाज़ से "अल्लाहु अकबर" कहा और फ़रमाया की मुसलमानो ! तुम इस से न घबराओ न इस का गम करो इस में तुम्हारे लिये बिशारत है।
     कुफ्फार का लश्कर जब आगे बढ़ा तो सामने खन्दक देख कर  ठहर गया और शहरे मदीना का मुहासरा कर लिया और तक़रीबन एक महीने तक कुफ्फार शहरे मदीना के गिर्द घेरा डाले हुए पड़े रहे और ये मुहासरा इस सख्ती के साथ क़ाइम रहा की हुज़ूर और सहाबा पर कई कई फाके गुज़र गए।
     कुफ्फार ने एक तरफ तो खन्दक का मुहासरा कर रखा था और दूसरी तरफ इस लिये हमला करना चाहते थे की मुसलमानो की औरते और बच्चे किल्ले में थे, मगर हुज़ूरﷺ ने जहा खन्दक के मुख़्तलिफ़ हिस्सों पर सहाबा को मुक़र्रर फरमा दिया था की वो कुफ्फार के हमलो का मुक़ाबला करते रहे इसी तरह औरतो और बच्चों की हिफाज़त के लिये भी कुछ सहाबा को मूतअय्यन कर दिया था।
*✍🏽सिरते मुस्तफा, 331*
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*नमाज़ के मकरुहाते तन्ज़ीहा* #01
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दूसरे कपड़े मुयस्सर होने के बा वुजूद कामकाज के लिबास में नमाज़ पढ़ना।
*✍🏽गुण्यतुल मुस्तमलि, 337*

मुह में कोई चीज़ लिये हुए होना। अगर इस की वजह से किराअत ही न हो सके या ऐसे अलफ़ाज़ निकले कि जो क़ुरआन के न हो तो नमाज़ ही फासिद हो जाएगी।
*✍🏽दुर्रेमुख्तार, रद्दलमोहतार*

सुस्ती से नंगे सर नमाज़ पढ़ना।
*✍🏽आलमगिरी, 1/106*

नमाज़ में टोपी या इमाम शरीफ गिर पड़े तो उठा लेना अफज़ल है जब कि अमले कसीर की हाजत न पड़े वरना नमाज़ फासिद् हो जाएगी। और बार बार उठाना पड़े तो छोड़ दे और उठाने से खुशुओ ख़ुज़ूअ मक़सूद हो तो उठाना अफज़ल है।
*✍🏽दुर्रेमुखतार, रद्दलमोहतार 2/194*

अगर कोई नंगे सर नमाज़ पढ़ रहा हो या उसकी टोपी गिर पड़ी हो तो उसको दूसरा शख्स टोपी न पहनाए।

रूकू या सज्दे में बिला ज़रूरत 3 बार से कम तस्बीह कहना (अगर वक़्त तांग हो या ट्रेन चल पड़ने के खौफ से हो तो हरज नहीं। अगर मुक्तदि 3 तस्बीह न कहने पाया था कि इमाम ने सर उठा लिया तो इमाम का साथ दे)

नमाज़ में पेशानी से ख़ाक या घास छुड़ाना। हा अगर इन की वजह से नमाज़ में ध्यान बटता हो तो छुड़ाने में हरज नही।
*✍🏽आलमगिरी, 1/106*

सज्दे वग़ैरा में उंगलिया किब्ले से फेर देना।
*✍🏽आलमगिरी, 1/119*

मर्द का सज्दे में रान को पेट से चिपका देना।
*✍🏽आलमगिरी, 1/109*

नमाज़ में हाथ या सर के इशारे से सलाम का जवाब देना।
*✍🏽नमाज़ के अहकाम, स.198*
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*يٙا مُـقْسِطُ*
शैतानी वसवसों से बचने के लिये 100 मर्तबा पढ़ना बहुत मुफीद है, ان شاء الله

*✍🏽मदनी पंजसुरह, 257*
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Saturday, 28 January 2017

*नमाज़ के मकरुहाते तहरीमि* #07
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_नमाज़ और तस्वीर_*
     जानदार की तस्वीर वाला लिबास पहन कर नमाज़ पढ़ना मकरुहे तहरीमि है, नमाज़ के इलावा भी ऐसा कपड़ा पहनना जाइज़ नहीं।
*✍🏽दुर्रेमुखतार 2/502*

     नमाज़ी के सर पर यानी छत पर या सज्दे की जगह पर या आगे या दाए या बाए जानदार की तस्वीर आवेज़ा होना मकरुहे तहरीमि है और पीछे होना भी मकरूह है, मगर गुज़श्ता सूरतो से कम। अगर तस्वीर फर्श पर है और उस और सज्दा नहीं होता तो कराहत नहीं। अगर तस्वीर गैर जानदार की है जेसे दरिया पहाड़ वगैरा तो इस में कोई मुज़ायक़ा नहीं। इतनी छोटी तस्वीर हो जिसे ज़मीन पर रख कर खड़े हो कर देखे तो आज़ा की तफ़सील न दिखाई दे (जैसा के उमुमन तवाफ़े काबा के मंज़र की तस्वीरें बहुत छोटी होती है ये तसावीर) नमाज़ के लिये बाइसे कराहत नहीं है।
*✍🏽गुण्यतुल मुस्तमलि, 347*
*✍🏽दुर्रेमुखतर, 2/503*

     तवाफ़ की भीड़ में एक भी चेहरा वाज़ेह हो गया तो मुमानअत बाक़ी रहेगी। चेहरे के इलावा मसलन हाथ, पाउ, पीठ, चेहरे का पिछला हिस्सा या ऐसा चेहरा जिस की आँखे, नाक, होठ वग़ैरा सब आज़ाए मिटे हुए हो ऐसी तसावीर में कोई हर्ज़ नही।

*✍🏽नमाज़ के अहकाम, स.196*
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*99 अस्माए हुस्ना और इन के फ़ज़ाइल* #84
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

हर विर्द के अव्वल व आखिर एक बार दुरुद शरीफ पढ़ लीजिये, फाएदा ज़ाहिर न होने की सूरत में शिकवा करने के बजाए अपनी कोताहियो की शामत तसव्वुर कीजिये और अल्लाह की मस्लहत पर नज़र रखिये।

*يٙا ذٙاالْجٙلٙالِ وٙالْاِكْرٙام*
इस की कसरत से खुशहाली नसीब होगी। इस के साथ दुआ करने से दुआ मक़बूल होगी ان شاء الله

*✍🏽मदनी पंजसुरह, 257*
*___________________________________*
मिट जाए गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाये यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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Friday, 27 January 2017

*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #137
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_सूरतुल बक़रह, आयत ①⑧⑦_*
     रोज़ों की रातों में अपनी औरतों के पास जाना तुम्हारे लिये हलाल (वेद्य) हुआ (12)
वो तुम्हारी लिबास हैं और तुम उनके लिबास, अल्लाह ने जाना कि तुम अपनी जानों को ख़यानत (बेईमानी) में डालते थे तो उसने तुम्हारी तौबह क़ुबूल की और तुम्हें माफ़ फ़रमाया (13)
तो अब उनसे सोहबत करो (14)
और तलब करो जो अल्लाह ने तुम्हारे नसीब में लिखा हो (15)
और खाओ और पियो (16)
यहां तक कि तुम्हारे लिये ज़ाहिर हो जाए सफ़ेदी का डोरा सियाही के डोरे से पौ फटकर (17)
फिर रात आने तक रोज़े पूरे करो (18)
और औरतों को हाथ न लगाओ जब तुम मस्जिदों में एतिक़ाफ़ में हो  (यानि दुनिया से अलग थलग बैठे हो ) (19)
ये अल्लाह की हदें हैं, इनके पास न जाओ अल्लाह यूं ही बयान करता है लोगों से अपनी आयतें की कहीं उन्हें परहेज़गारी मिले.
*तफ़सीर*
     (12) पिछली शरीअतों में इफ़्तार के बाद खाना पीना सहवास करना ईशा की नमाज़ तक हलाल था, ईशा बाद ये सब चीज़ें रात में भी हराम हो जातीं थी. यह हुक्म सरकार सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के ज़मानए अक़दस तक बाक़ी था. कुछ सहाबा ने रमज़ान की रातों में नमाज़ ईशा के बाद सहवास किया, उनमें हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो भी थे. इसपर वो हज़रात लज्जित हुए और रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से अपना हाल अर्ज़ किया. अल्लाह तआला ने माफ़ फ़रमाया और यह आयत उतरी और बयान कर दिया गया कि आयन्दा के लिये रमज़ान की रातों में मग़रिब से सुबह सादिक़ तक अपनी पत्नी के साथ सहवास हलाल किया गया.
     (13) इस ख़यानत से वह सहवास मुराद है जो इजाज़त मिलने से पहले के रमज़ान की रातों में मुसलमानों ने किया. उसकी माफ़ी का बयान फ़रमाकर उनकी तसल्ली फ़रमा दी गई.
     (14) यह बात इजाज़त के लिये है कि अब वह पाबन्दी उठाली गई और रमज़ान की रातों में सहवास हलाल कर दिया गया.
     (15) इसमें हिदायत है कि सहवास नस्ल और औलाद हासिल करने की नियत से होना चाहिये, जिससे मुसलमान बढ़ें और दीन मज़बूत हो. मुफ़स्सिरीन का एक क़ौल यह भी है कि मानी ये है कि सहवास शरीअत के हुक्म के मुताबिक़ हो जिस महल में जिस तरीक़े से इजाज़त दी गई उससे आगे न बढ़ा जाए. (तफ़सीरे अहमदी). एक क़ौल यह भी है जो अल्लाह ने लिखा उसको तलब करने के मानी हैं रमज़ान की रातों में इबादत की कसरत (ज़्यादती) और जाग कर शबे-क़द्र की तलाश करना.
     (16) यह आयत सरमआ बिन क़ैस के बारे में उतरी. आप महनती आदमी थे. एक दिन रोज़े की हालत में दिन भर अपनी ज़मीन में काम करके शाम को घर आए. बीवी से खाना माँगा. वह पकाने में लग गई यह थके थे आँख लग गई. जब खाना तैयार करके उन्हें बेदार किया उन्होंने खाने से इन्कार कर दिया क्योंकि उस ज़माने में सोजाने के बाद रोज़ेदार पर खाना पीना बन्द हो जाता था और उसी हालत में दूसरा रोज़ा रख लिया. कमजोरी बहुत बढ गई. दोपहर को चक्कर आ गया. उनके बारे में यह आयत उतरी और रमज़ान की रातों में उनके कारण खाना पीना हलाल किया गया, जैसे कि हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो की अनाबत और रूजू के सबब क़ुर्बत हलाल हुई.
     (17) रात को सियाह डोरे से और सुबह सादिक़ को सफ़ेद डोरे से तशबीह दी गई. मानी ये हैं कि तुम्हारे लिये खाना पीना रमज़ान की रातों में मग़रिब से सुबह सादिक़ तक हलाल कर दिया गया. (तफ़सीरे अहमदी). सुबह सादिक़ तक इजाज़त देने में इशारा है कि जनाबत या शरीर की नापाकी रोज़े में रूकावट नहीं है. जिस शख़्स को नापाकी के साथ सुबह हुई, वह नहाले, उसका रोज़ा जायज़ है. (तफ़सीरे अहमदी). इसी से उलमा ने यह मसअला निकाला कि रमज़ान के रोज़े की नियत दिन में जायज़ है.
     (18) इससे रोज़े की आख़िरी हद मालूम होती है और यह मसअला साबित होता है कि रोज़े की हालत में खाने पीने और सहवास में से हर एक काम करने से कफ़्फ़ारा लाज़िम हो जाता है (मदारिक). उलमा ने इस आयत को सौमे विसाल यानी तय के रोज़े यानी एक पर एक रोज़ा रखने की मनाही की दलील क़रार दिया है.
     (19) इस में बयान है कि रमज़ान की रातों में रोज़ेदार के लिये बीवी से हमबिस्तरी हलाल है जब कि वह मस्जिद में एतिकाफ़ में न बैठा हो. एतिकाफ़ में औरतों से कुरबत और चूमा चाटी, लिपटाना चिपटाना सब हराम हैं. मर्दों के एतिकाफ़ के लिये मस्जिद ज़रूरी है. एतिकाफ़ में बैठे आदमी को मस्जिद में खाना पीना सोना जायज़ है. औरतों का एतिकाफ़ उनके घरों में जायज़ है. एतिकाफ़ हर ऐसी मस्जिद में जायज़ है जिसमें जमाअत क़ायम हो. एतिकाफ़ में रोज़ा शर्त है.
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*सिरते मुस्तफाﷺ*
*_दसवा बाब_* #19
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
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*​जंगे खन्दक*​ #04
*_इस्लामी अफ्वाज की मोर्चा बन्दी_*
     हुज़ूरﷺ ने खन्दक तैयार हो जाने के बाद औरतो और बच्चों को मदीने के महफु किल्ले में जमा फरमा दिया और मदीने पर हज़रते इब्ने उम्मे मकतूम को अपना खलीफा बना कर 3000 अंसार व मुहाजिरिन की फ़ौज के साथ मदीने से निकल कर सलअ पहाड़ के दामन में ठहरे। सलअ आपﷺ की पुश्त पर था और आप के सामने खन्दक थी। मुहाजिरिन का झंडा हज़रते ज़ैद बिन हारिषा के हाथ में दिया और अंसार का आलम बरदार हज़रते साद बिन उबादा को बनाया।

*_कुफ्फार का हमला_*
     कुफ्फार कुरैश और उन के इत्तिहादियो ने 10000 के लश्कर के साथ मुसलमानो पर हल्ला बोल दिया और तिन तरफ से काफिरो का लश्कर इस ज़ोरो शोर के साथ मदीने पर उमड़ पड़ा की शहर की फ़ज़ाओं में गर्दो गुबार का तूफ़ान उठ गया इस खौफनाक चढ़ाई और लश्करे कुफ्फार के दल बादल की मारीका आराई का नक़्शा क़ुरआन की ज़बान से देखे :
     जब काफ़िर तुम पर आ गए तुम्हारे ऊपर से और तुम्हारे निचे से और जब की ठिठक कर रह गई निगाहें और दिल गलो के पास (खौफ से) आ गए और तुम *अल्लाह* पर (उम्मीद व यास से) तरह तरह के गुमान करने लगे उस जगह मुसलमान आज़माइश और इम्तिहान में डाल दिये गए और वो बड़े ज़ोर के ज़लज़ले में झंझोड़ कर रख दिये गए।
*पारह, 21*
     मुनाफिकिन जो मुसलमानो के साथ खड़े थे वो कुफ्फार के इस लश्कर को देखते ही बुज़दिल हो कर फिसल गए और उस वक़्त उनके निफ़ाक़ का पर्दा चाक हो गया। चुनांचे उन लोगो ने अपने घर जाने की इजाज़त मांगनी शुरू कर दी। जैसा की क़ुरआन में *अल्लाह* का फरमान है की...
     और एक गिरोह (मुनाफ़िक़ीन) उन में से नबी को इजाज़त तलब करता था मुनाफ़िक़ कहते है की हमारे घर खुले पड़े है हाला की वो खुले हुए नही थे उन का मक़सद भागने के सिवा कुछ भी न था।
*पारह, 21*
     लेकिन इस्लाम के सच्चे जा निषार मुहाजिरिन व अंसार ने जब लश्करे कुफ्फार की तूफानी यलगार को देखा तो इस तरह सीना सिपर हो कर डट गए की "सलअ" और "उहद" की पहाड़िया सर उठा उठा कर इन मुजाहिदीन की उलुल आज़मी को हैरत से देखने लगी इन जा निशारो की इमानी शुजाअत की तस्वीर क़ुरआन में इरशादे रब्बानी है की...
     और जब मुसलमानो ने क़बाइले कुफ्फार के लशकरो को देखा तो बोल उठे की ये तो वही मन्ज़र है जिस का अल्लाह और उस के रसूल ने हम से वादा किया था और खुदा और उस का रसूल दोनों सच्चे है और उस ने उन के ईमान व इताअत को और ज़्यादा बढ़ा दिया।
*पारह, 21*
*✍🏽सिरते मुस्तफा, 329*
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*नमाज़ के मकरुहाते तहरीमि* #06
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_गधे जैसा मुंह_*
     हज़रते इमाम न-ववी अलैरहमा हदिष लेने के लिये एक बड़े मशहूर शख्स के पास दिमश्क़ गए। वो पर्दा डाल कर पढ़ाते थे, मुद्दतो तक उन के पास बहुत कुछ पढ़ा मगर उन का मुंह न देखा, जब ज़मानए दराज़ गुज़रा और उन मुहद्दिस साहिब ने देखा कि इन को इल्मे हदिष की बहुत ख्वाहिश है तो एक रोज़ पर्दा हटा दिया !
     देखते क्या है कि उनका गधे जैसा मुंह है !! उन्होंने फ़रमाया, साहिब ज़ादे ! दौराने जमाअत इमाम पर सबक़त करने से डरो कि ये हदिष जब मुझ को पहुची मेने इसे मुस्तबअद जाना और मेने इमाम पर क़सदन सबक़त की तो मेरा मुह ऐसा हो गया जैसा तुम देख रहे हो।
*✍🏽बहारे शरीअत, जी.3 स.95*

     दूसरा कपड़ा होने के बा वुजूद सिर्फ पाजामा या तहबन्द में नमाज़  पढ़ना।

     किसी आने वाले शनासा की खातिर इमाम का नमाज़ को तूल देना.
*✍🏽आलमगिरी, 1/107*
अगर उस की नमाज़ पर इआनत (मदद) के लिये एक दो तस्बीह की क़दर तूल दिया तो हरज नहीं।

     ऐसी ज़मीन जिस पर ना जाइज़ क़ब्ज़ा किया हो या पराया खेत जिस में ज़राअत मौजूद है या जूते हुए खेत में या क़ब्र के सामने जब कि क़ब्र और नमाज़ी के बिच में कोई चीज़ हाइल न हो नमाज़ पढ़ना।
*✍🏽आलमगिरी, 1/107*

     कुफ़्फ़ार के इबादत खाने में नमाज़ पढ़ना बल्कि इन में जाना भी मम्नुअ है।
*✍🏽रद्दलमोहतार, 2/53*

     कुरते वग़ैरा के बटन खुले होना जिस से सीना खुला रहे मकरुहे तहरीमि है, हा अगर निचे कोई और कपड़ा है जिस से सीना नहीं खुला तो मकरुहे तन्ज़ीहि है।
*✍🏽नमाज़ के अहकाम, 196*
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*99 अस्माए हुस्ना और इन के फ़ज़ाइल* #83
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*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

हर विर्द के अव्वल व आखिर एक बार दुरुद शरीफ पढ़ लीजिये, फाएदा ज़ाहिर न होने की सूरत में शिकवा करने के बजाए अपनी कोताहियो की शामत तसव्वुर कीजिये और अल्लाह की मस्लहत पर नज़र रखिये।

*يٙا مٙالِكٙ الْمُـلْكىِ*
जो इसकी कसरत करेगा ان شاء الله खुशहाल होगा

*✍🏽मदनी पंजसुरह, 257*
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Thursday, 26 January 2017

*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #136
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_सूरतुल बक़रह, आयत ①⑧⑥_*
     और  ऐ मेहबूब जब तुमसे मेरे बन्दे मुझे पूछें तो में नज़दीक हूँ  (10)
दुआ क़ुबूल करता हूं पुकारने वाले की जब मुझे पुकारते (11)
तो उन्हें चाहिये मेरा हुक़्म माने और मुझपर ईमान लाएं कि कहीं राह पाएं.

*तफ़सीर*
     (10) इसमें हक़ और सच्चाई चाहने वालों की उस तलब का बयान है जो अल्लाह को पाने की तलब है, जिन्हों ने अपने रब के इश्क़ में अपनी ज़रूरतों को क़ुरबान कर दिया, वो उसी के तलबगार हैं, उन्हें क़ुर्ब और मिलन की ख़ुशख़बरी सुनाकर खु़श किया गया. सहाबा की एक जमाअत ने अल्लाह के इश्क़ की भावना में सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से पूछा कि हमारा रब कहाँ है, इस पर क़ुर्ब की ख़ुशख़बरी दी गई और बताया गया कि अल्लाह तआला मकान से पाक है. जो चीज़ किसी से मकानी क़ुर्ब रखती हो वह उसके दूर वाले से ज़रूर दूरी रखती है. और अल्लाह तआला सब बन्दों से क़रीब है. मकानी की यह शान नहीं. क़ुर्बत की मन्ज़िलों में पहुँने के लिये बन्दे को अपनी ग़फ़लत दूर करनी होती है.
     (11) दुआ का मतलब है हाजत बयान करना और इजाबत यह है कि परवर्दिगार अपने बन्दे की दुआ पर“लब्बैका अब्दी” फ़रमाता है. मुराद अता फ़रमाना दूसरी चीज़ है. वह भी कभी उसके करम से फ़ौरन होती है, कभी उसकी हिकमत के तहत देरी से, कभी बन्दे की ज़रूरत दुनिया में पूरी फ़रमाई जाती है, कभी आख़िरत में, कभी बन्दे का नफ़ा दूसरी चीज़ में होता है, वह अता की जाती है. कभी बन्दा मेहबूब होता है, उसकी ज़रूरत पूरी करने में इसलिये देर की जाती है कि वह अर्से तक दुआ में लगा रहे, कभी दुआ करने वाले में सिद्क़ व इख़लास वग़ैरह शर्तें पूरी नहीं होतीं, इसलिये अल्लाह के नेक और मक़बूल बन्दों से दुआ कराई जाती है. नाजायज़ काम की दुआ कराना जायज़ नहीं. दुआ के आदाब में है कि नमाज़ के बाद हम्दो सना और दरूद शरीफ़ पढे़ फिर दुआ करे.
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*يٙا رٙءُوْفُ*
जो किसी मज़लूम का किसी ज़ालिम से पीछा छुड़ाना चाहे, 10 बार पढ़े फिर उस ज़ालिम से बात करे ان شاء الله वो ज़ालिम उस की सिफारिश क़बूल कर लेगा।

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Wednesday, 25 January 2017

*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #135
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
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*_सूरतुल बक़रह, आयत ①⑧⑤_*
     रमज़ान का महीना जिसमें क़ुरआन उतारा  (8)
लोगो के लिये हिदायत और राहनुमाई और फैसला की रौशन बातें, तो तुम में जो कोई यह महीना पाए ज़रूर इसके रोज़े रखे और जो बीमार या सफर में हो तो उतने रोज़े और दिनों में अल्लाह तुमपर आसानी चाहता है और तुमपर दुशवारी नहीं चाहता और इसलिये कि तुम गिनती पूरी करो (9)
और अल्लाह की बड़ाई बोलो इसपर की उसने तुम्हें हिदायत की और कहीं तुम हक़ गुज़ार हो.

*तफ़सीर*
     (8) इसके मानी में तफ़सीर करने वालों के चन्द अक़वाल हैं : (1) यह कि रमज़ान वह है जिसकी शान व शराफ़त में क़ुरआने पाक उतरा (2) यह कि क़ुरआने करीम के नाज़िल होने की शुरूआत रमज़ान में हुई. (3) यह कि क़ुरआन करीम पूरा रमज़ाने मुबारक की शबे क़द्र में लौहे मेहफ़ूज़ से दुनिया के आसमान की तरफ़ उतारा गया और बैतुल इज़्ज़त में रहा. यह उसी आसमान पर एक मक़ाम है. यहाँ से समय समय पर अल्लाह की मर्ज़ी के मुताबिक़ थोड़ा थोड़ा जिब्रीले अमीन लाते रहे. यह नुज़ूल तेईस साल में पूरा हुआ.
     (9) हदीस में है, हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि महीना उनतीस दिन का भी होता है तो चाँद देखकर खोलो. अगर उनतीस रमज़ान को चाँद न दिखाई दे तो तीस दिन की गिनती पूरी करो.
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*_दसवा बाब_* #18
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*​जंगे खन्दक*​ #03
*_एक अजीब चट्टान_*
     हज़रते जाबिरرضي الله تعالي عنه ने बयान फ़रमाया की खन्दक खोदते वक़्त ना गहा एक ऐसी चट्टान नमूदार हो गई जो किसी से भी नही टूटी जब हम ने बारगाहे रिसालत में ये माजरा अर्ज़ किया तो आपﷺ उठे 3 दिन का फ़ाक़ा था और शिकमे मुबारक पर पथ्थर बाधा हुवा था आपﷺ ने अपने दस्ते मुबारक से फावड़ा मारा तो वो चट्टान रेत के भुरभुरे टीले की तरह बिखर गई।
*बुखारी, 2/588*
    और एक रिवायत ये है की आपﷺ ने उस चट्टान पर तिन मर्तबा फावड़ा मारा। हर ज़र्ब पर उस में से एक रौशनी निकलती थी और उस रौशनी में आप ने शाम व ईरान और यमन शहरों को देख लिया और इन तीनो मुल्को के फतह होने की सहाबए किराम को बिशारत दी।
*ज़ुर्क़ानी, 2/109*
     नसाई की रिवायत में है की आपﷺ ने मदाईने किसरा व मदाईने क़ैसर व मदाईने हबशा की फुतुहात का एलान फ़रमाया।
*नसाई, 2/63*

*_हज़रते जाबिर की दावत_*
     हज़रते जाबिरرضي الله تعالي عنه कहते है की फक़ो से शिकमे अक़दस पर पथ्थर बधा हुवा देख कर मेरा दिल भर आया चुनांचे में हुज़ूरﷺ से इजाज़त ले कर अपने घर आया और बीवी से कहा की मेने नबिय्ये करीमﷺ को इस क़दर शदीद भूक की हालत में देखा है की मुझ को सब्र की ताब नही रही क्या घर में कुछ खाना है ? बीवी ने कहा की घर में एक साअ जव के सिवा कुछ भी नही है, में ने कहा की तुम जल्दी से उस जव को पीस कर गूंध लो और अपने घर का पला हुवा एक बकरी का बच्चा में ने ज़बह करके उस की बोटियाँ बना दी और बीवी से कहा की जल्द से तुम गोश्त रोटी तैयार कर लो में हुज़ूरﷺ को बुला कर लाता हु, चलते वक़्त बीवी ने कहा की देखना सिर्फ हुज़ूर और चन्द ही असहाब को साथ में लाना। खाना कम ही है कही मुझे रुस्वा मत कर देना।
     हज़रते जाबिरرضي الله تعالي عنه ने खन्दक पर आ कर चुपके से अर्ज़ किया की या रसूलुल्लाह ! एक साअ आटे की रोटिया और एक बकरी के बच्चे का गोश्त में ने घर तैयार कराया है लिहाज़ा आप सिर्फ चन्द अशखास के साथ चल कर तनावुल फरमा ले, ये सुन कर हुज़ूरﷺ ने फ़रमाया की ऐ खन्दक वालो ! जाबिर ने दावते तआम दी है लिहाज़ा सब लोग इन के घर पर चल कर खाना खा ले, फिर मुझसे फ़रमाया की जब तक में न आ जाउ रोटी मत पक्वाना। चुनांचे जब हुज़ूरﷺ तशरीफ़ लाए तो गुंधे हुए आटे में अपना लूआबे दहन डाल कर बरकत की दुआ फ़रमाई और गोश्त की हांड़ी में भी अपना लूआबे दहन डाल दिया। फिर रोटी पकाने का हुक्म दिया और ये फ़रमाया की हांड़ी चूल्हे से न उतारी जाए फिर रोटी पकनी शुरू हुई और हांड़ी मेसे हज़रते जाबिरرضي الله تعالي عنه की बीवी ने गोश्त निकाल निकाल कर देना शुरू किया। 1000 आदमियो ने आसूदा हो कर खाना खा लिया मगर गुंधा हुवा आटा जितना पहले था उतना ही रह गया और हांड़ी चूल्हे पर ब दस्तूर जोश मारती रही।
*बुखारी, 2/589*

*_बा बरकत खजूर_*
     इसी तरह एक लड़की अपने हाथ में कुछ खजुरे ले कर आई, हुज़ूरﷺ ने पूछा की क्या है ? लड़की ने कहा की कुछ खजुरे है जो मेरी माँ ने मेरे बाप के नाश्ते के लिये भेजी है, आपﷺ ने उन खजूरों को अपने दस्ते मुबारक में ले कर एक कपडे पर बिखेर दिया और तमाम अहले खन्दक को बुला कर फ़रमाया की खूब सैर हो कर खाओ, चुनांचे तमाम खन्दक वालो ने शिकम सैर हो कर उन खजूरों को खाया।
*✍🏽मेराज, 2/169*
*✍🏽सिरते मुस्तफा, 327*
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मिट जाए गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाये यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*​DEEN-E-NABI ﷺ*
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