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Wednesday, 8 March 2017

*_जिस्म के आज़ा की फरियाद_*
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

     हदीशे पाक में है : इब्ने आदम जब सुबह करता है तो तमाम आज़ा ज़बान के सामने आज़िज़ाना ये कहते है, के तुम खुदा से डर, की हम सब तेरे साथ वा बस्ता है अगर तू सीधी रही तो हम भी सीधे रहेंगे, और अगर तू टेडी हो गई तो हम सब टेड़े हो जाएंगे।

*✍🏽जामेउत तिर्मिज़ी, 4/183, हदिष : 2415*
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मिट जाए गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*कुर्ब-व-वस्ले खुदावन्दी*   #2
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*
   
        तुम्हारा एक बाज़ू हराम-व-मुबाह, तमाम लिज़्ज़त-व-शेहवत और हर तरहकी आसाइशोंको तज देना है और दुसरा बाज़ू अज़ीयतों, महरुहात और तकालिफ को बर्दास्त करने, फराइज़की अदाइमें सख्तियां सहने, मख्लूक़ और ख्वाहिशाते नफ़स और दुनिया-व-आख़िरतके इरादे-व-आरज़ूसे निकल जानेका नाम है।
          इसी उडानके बाइस तुम्हें कुरबत और विसाल हासिल हो सकता है। और इसीकी वजहसे तमन्नाए पूरी हो सकती है। फिर तुम्हें बड़ी करामतें और इज़्ज़त-व-अज़मत अता होगी और तुम्हें मुकरबीन वसालेलीने खुदावन्दी में शुमार किया जाने लगेगा। जिन पर इनायते रब्बानी हुई और मराआत जिनके शामिले हाल है और जिनको महोब्बते खुदावन्दीने खींच कर रहेमत में छुपा लिया।
        इस आलम में अदबको मल्हूज़ रख्खो और अपने हाल पर इतने मगरूर न हो जाओ के खिदमत अदा करनेमें कोताही करो। रउनत जहल-व-ज़ुल्म और उजलतकी असास (बुनियाद) है।

बाक़ी कल की पोस्ट में... इंसा अल्लाह

*✍🏽फुतूहल ग़ैब*  पेज 114
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Tuesday, 7 March 2017

*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #166
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_सूरतुल बक़रह, आयत ②②①_*
     और  शिर्क वाली औरतों से निकाह न करो जब तक मुसलमान न हो जाएं (14) और बेशक मुसलमान लौंडी मुश्रिका औरत से अच्छी है (15) अगरचे वह तुम्हें भाती हो और मुश्रिको के निकाह में न दो जब तक वो ईमान न लाएं (16) और बेशक मुसलमान ग़ुलाम मुश्रिकों से अच्छा है अगरचे वो तुम्हें भाता हो, वो दोज़ख़ की तरफ़ बुलाते हैं (17) और अल्लाह जन्नत और बख़्शिश की तरफ़ बुलाता है अपने हुक्म से और अपनी आयतें लोगों के लिये बयान करता है कि कहीं वो नसीहत मानें.

*तफ़सीर*
     (14) हज़रत मरसद ग़नवी एक बहादुर सहाबी थे. हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उन्हें मक्कए मुकर्रमा रवाना किया ताकि वहाँ से तदबीर के साथ मुसलमानों को निकाल लाएं. वहाँ उनाक़ नामक एक मुश्रिक औरत थी जो जाहिलियत के ज़माने में इनसे महब्बत रखती थी. ख़ूबसूरत और मालदार थी. जब उसको इनके आने की ख़बर हुई तो वह आपके पास आई और मिलने की चाह ज़ाहिर की. आपने अल्लाह के डर से उससे नज़र फेर ली और फ़रमाया कि इस्लाम इसकी इजाजत नहीं देता. तब उसने निकाह की दरख़ास्त की. आपने फ़रमाया कि यह भी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की इजाज़त पर निर्भर है. अपने काम से छुट्टी पाकर जब आप सरकार की ख़िदमत में हाज़िर हुए तो हाल अर्ज़ करके निकाह के बारे में दर्याफ़्त किया. इस पर यह आयत उतरी. (तफ़सीरे अहमदी).
     कुछ उलमा ने फ़रमाया जो कोई नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के साथ कुफ़्र करे वह मुश्रिक है, चाहे अल्लाह को एक ही कहता हो और तौहीद का दावा रखता हो. (ख़ाज़िन)
     (15) एक रोज़ हज़रत अब्दुल्लाह बिन रवाहा ने किसी ग़लती पर अपनी दासी के थप्पड़ मारा फिर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर होकर उसका ज़िक्र किया. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उसका हाल दर्याफ़्त किया. अर्ज़ किया कि वह अल्लाह तआला के एक होने और हुज़ूर के रसूल होने की गवाही देती है, रमज़ान के रोज़े रखती है, ख़ूब वुज़ू करती है और नमाज़ पढ़ती है. हुज़ूर ने फ़रमाया वह ईमान वाली है. आप ने अर्ज़ किया, तो उसकी क़सम जिसने आपको सच्चा नबी बनाकर भेजा, मैं उसको आज़ाद करके उसके साथ निकाह करूंगा और आपने ऐसा ही किया. इस पर लोगों ने ताना किया कि तुमने एक काली दासी से निकाह किया इसके बावुजूद कि अमुक मुश्रिक आज़ाद औरत तुम्हारे लिये हाज़िर है. वह सुंदर भी है. मालदार भी है. इस पर नाज़िल हुआ “वला अमतुम मूमिनतुन”यानी मुसलमान दासी मुश्रिका औरत से अच्छी है. चाहे आज़ाद हो और हुस्न और माल की वजह से अच्छी मालूम होती हो.
     (16) यह औरत के सरपस्तों को सम्बोधन है. मुसलमान औरत का निकाह मुश्रिक व काफ़िर के साथ अवैध व हराम है.
     (17) तो उनसे परहेज़ ज़रूरी है और उनके साथ दोस्ती और रिश्तेदारी ना पसन्दीदा.
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*मुबारक महीने* #02
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_मुहर्रमुल हराम_* #02
 *_आशूरा को वाकेअ होने वाले अहम वाक़यात_*
     10 मुहर्रम के रोज़ *हज़रते आदम अलैहिस्सलाम* की तौबा क़बूल की गई।
     इसी दिन उन्हें पैदा किया गया। इसी दिन उन्हें जन्नत में दाखिल किया गया।
     इसी दिन अर्श, कुर्सी, आसमान, ज़मीन, सूरज, चाँद, सितारे और जन्नत पैदा किये गए।
     इसी दिन *हज़रते इब्राहिम अलैहिस्सलाम* पैदा हुए। इसी दिन उन्हें आग से नजात मिली।
     इसी दिन *हज़रते मूसा अलैहिस्सलाम* और आप की उम्मत को नजात मिली और फिरऔन अपनी क़ौम समेत ग़र्क़ हुवा।
     इसी दिन *हज़रते ईसा अलैहिस्सलाम* पैदा किये गए। इसी दिन उन्हें आसमानों की तरफ उठाया गया।
     इसी दिन *हज़रते नूह अलैहिस्सलाम* की कश्ती कोहे जुदी पर ठहरी।
     इसी दिन *हज़रते सुलैमान अलैहिस्सलाम* को मुल्क अज़ीम अता किया गया।
     इसी दिन *हज़रते युनुस अलैहिस्सलाम* पछली के पेट से निकाले गए।
     इसी दिन *हज़रते याक़ूब अलैहिस्सलाम* की बिनाई का ज़ोफ़् दूर हुवा।
     इसी दिन *हज़रते युसूफ अलैहिस्सलाम* गहरे गए से निकाले गए।
     इसी दिन *हज़रते अय्यूब अलैहिस्सलाम* की तकलीफ रफअ की गई।
     आसमान से ज़मीन पर *सबसे पहली बारिश* इसी दिन नाज़िल हुई।
     इसी दिन का रोज़ा उम्मतों में मशहूर था यहाँ तक की ये भी कहा गया की इसी दिन का रोज़ा रमज़ान से पहले फ़र्ज़ था फिर मनसुख कर दिया गया।
     *इमामें हुसैन رضي الله تعالي عنه* को मअ शाहज़ादगान व रुफ़क़ा 3 दिन भूका रखने के बाद इसी आशूरा के रोज़ दश्ते कर्बला में इंतिहाई सफ़्फ़ाक़ी के साथ शहीद किया गया।
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 317*
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*कुर्ब-व-वस्ले खुदावन्दी*   #1
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*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*
           
       हज़रत गौसुल आज़म رضي الله تعالي عنه ने फ़रमाया : तुम्हारा मआमला दो हालतों से बहेरहाल खाली नहीं है, या अल्लाह इज़्ज़ो-जलका कुर्ब नहीं होगा, या अल्लाह का कुर्ब और वसाल होगा। अगर तुम इससे दूर हो तो कुरबत हासिल करनेकी ख्वाहिश में सुस्ती और काहिलीकी कैफियत में रेहना दीन-व-दुनियाकी नेअमत और दाएमी इज़्ज़त, सलामती और तवंगरी, किफायत और नफा और मेहबूबियतका वाफिर हिस्सा हासिल करने में पीछे रेह जाना क्यों?
         उठो और अपने दोनों बाज़ुओं के साथ कुर्बे खुदावन्दी की मंज़िल पाने की खातिर तेज़ी से परवाज़ करो। तुम्हारा एक बाज़ू हराम-व-मुबाह, तमाम लिज़्ज़त-व-शेहवत और हर तरहकी आसाइशोंको तज देना है और दुसरा बाज़ू अज़ीयतों, महरुहात और तकालिफ को बर्दास्त करने, फराइज़की अदाइमें सख्तियां सहने, मख्लूक़ और ख्वाहिशाते नफ़स और दुनिया-व-आख़िरतके इरादे-व-आरज़ूसे निकल जानेका नाम है।

बाक़ी कल की पोस्ट में... इंसा अल्लाह

*✍🏽फुतूहल ग़ैब*  पेज 113,14
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Monday, 6 March 2017

*क़ज़ा नमाज़ का तरीक़ा* #02/15
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_जहन्नम की खौफनाक वादी_*
     हज़रते मौलाना मुहम्मद अमजद अली आज़मी अलैरहमा फरमाते है : जहन्नम में वैल नामी एक खौफनाक वादी है जिस की सख्ती से खुद जहन्नम भी पनाह मांगता है। जान बुझ कर नमाज़ क़ज़ा करने वाले उसके मुस्तहिक़ है।
*✍🏽बहारे शरीअत, 1/347*

*_पहाड़ गर्मी से पिघल जाए_*
     हज़रते इमाम मुहम्मद बिन अहमद ज़हबी अलैरहमा फरमाते है : अगर उसमे दुन्या के पहाड़ डाले जाए तो वो भी उस गर्मी से पिघल जाए और ये उन लोगो का ठिकाना है जो नमाज़ में सुस्ती करते और वक़्त के बाद क़ज़ा करके पढ़ते है मगर ये की वो अपनी कोताही पर नादिम हो और बारगाहे खुदा वन्दी में तौबा करे।
*✍🏽किताबुल कबाइर, 19*
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 241*

*नोट :* ख्याल रहे ये सज़ा नमाज़ क़ज़ा करने वालो की है...तो सोचे जो लोग नमाज़ तर्क करते है उनका क्या हाल होगा।
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*मुबारक महीने* #01
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
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*_मुहर्रामुल हराम_* #01
     इस्लामी साल माहे मुर्रहमूल हराम से शुरू होता है। ये बहुत ही अज़मत व बरकत वाला महीना है, जो हमें सब्रो ईसार का दर्स देता है। इस माह मुबारक में इबादत करने और रोज़ा रखने के बारे में मूतअद्दद् फ़ज़ाइल वारिद हुए है, नीज़ इसी माह में यौमे आशूरा जो अपनी खुसुसिय्यत में मुमताज़ है।

*_रमज़ान के बाद अफज़ल रोज़े_*
     हज़रते अबू हुरैरा رضي الله تعالي عنه से रिवायत है हुज़ूर ﷺ फरमाते है : रमज़ान के बाद मुहर्रम का रोज़ा अफज़ल है और फ़र्ज़ के बाद अफज़ल नमाज़ सलातुल्लैल (यानी रात के नवाफ़िल) है।
*✍🏽सहीह मुस्लिम, 591, हदिष : 1163*

*_एक महीने के रोज़ो के बराबर_*
     अल्लाह के हबीब ﷺ का फरमान है : मुहर्रम के हर दिन का रोज़ा एक महीने के रोज़ो के बराबर है।
*✍🏽अल-मुजमुल सगीर, 2/71*
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 316*
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*नींद या बेदारी*  #3
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*
 
     जो आदमी अमरे खुदावन्दी से बहोत ज़यादा हलाल खा ले, गोया उसने इबादत-व-कुव्वत की ख़ुशी में बहोत ही थोड़ा खाया क्यों के हलाल नूर ही नूर है। और हराम सरापा ज़ुलमत और हुकमे खुदावन्दी के बगैर महेज़ अपनी ख्वाहिश के ज़ेरे असर हलाल खानेमें भी कोई खैर नहीं और हराम चीज़ खाना नींद में इज़ाफेका बाइस होता है। इस लिये उसमें किसी तरह भी भलाइ नहीं।

*✍🏽फुतूहल ग़ैब*  पेज 113
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Sunday, 5 March 2017

*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #163
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_सूरतुल बक़रह, आयत ②①⑨_*
     तुमसे शराब  और जुए का हुक्म पूछते हैं, तुम फ़रमादो कि उन दोनों में बड़ा गुनाह है  और लोगों के कुछ दुनियावी नफ़े भी  और उनका गुनाह उनके नफ़े से बड़ा है(9) और  तुमसे पूछते हैं क्या ख़र्च करें (10) तुम फ़रमाओ जो फ़ाज़िल (अतिरक्त) बचे (11) इसी तरह अल्लाह तुमसे आयतें बयान फ़रमाता है कि कहीं सोचकर करो तुम.

*तफ़सीर*
     (9) हज़रत अली मुरतज़ा रदियल्लाहो अन्हु ने फ़रमाया, अगर शराब की एक बूंद कुंवें में गिर जाए फिर उस जगह एक मीनार बनाया जाए तो मैं उसपर अज़ान न कहूँ. और अगर नदी में शराब की बूंद पडे़, फिर नदी ख़ुश्क हो और वहाँ घास पैदा हो तो उसमें मैं अपने जानवरों को न चराऊं. सुब्हानअल्लाह ! गुनाह से किस क़द्र नफ़रत है. अल्लाह तआला हमें इन बुज़ुर्गों के रास्ते पर चलने की तौफ़ीक अता करे.
     शराब सन तीन हिजरी में ग़जवए अहज़ाब से कुछ दिन बाद हराम की गई. इससे पहले यह बताया गया था कि जुए और शराब का गुनाह उनके नफे़ से ज़्यादा है. नफ़ा तो यही है कि शराब से कुछ सुरूर पैदा होता है या इसकी क्रय विक्रय से तिजारती फ़ायदा होता है. और जुए में कभी मु्फ़्त का माल हाथ आता है और गुनाहों और बुराइयों की क्या गिनती, अक़्ल का पतन, ग़ैरत, शर्म, हया और ख़ुददारी का पतन, इबादतों से मेहरूमी, लोगो से दुश्मनी, सबकी नज़र में ख़्वार होना, दौलत और माल की बर्बादी.
     एक रिवायत में है कि जिब्रील अमीन ने हुज़ूर पुरनूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में अर्ज़ किया कि अल्लाह तआला को जअफ़रे तैयार की चार  विशेषताएं पसन्द हैं. हुज़ूर ने हज़रत जअफ़र तैयार से पूछा, उन्होंने अर्ज़ किया कि एक तो यह है कि मैंने शराब कभी नहीं पी यानी हराम हो जाने के हुक्म से पहले भी और इसकी वजह यह थी कि मैं जानता था कि इससे अक़्ल भ्रष्ट होती है और मैं चाहता था कि अक़्ल और भी तेज़ हो. दूसरी आदत यह है कि जाहिलियत के ज़माने में भी मैंने मूर्ति पूजा नहीं की क्योंकि मैं जानता था कि यह पत्थर है, न नफ़ा दे, न नुक़सान पहुंचा सके, तीसरी ख़सलत यह है कि मैं कभी ज़िना में मुब्तिला नहीं हुआ कि उसको मैं बेग़ैरती और निर्लज्जता समझता था, चौथी ख़सलत यह कि मैंने कभी झूट नहीं बोला क्योंकि मैं इसको कमीना-पन ख़याल करता था. शतरंज, ताश वग़ैरह हार जीत के खेल और जिन पर बाज़ी लगाई जाए, सब जुए में दाख़िल हैं, और हराम हैं. (रूहुल बयान)
     (10) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने मुसलमानों को सदक़ा देने की रग़बत दिलाई तो आपसे दर्याफ़त किया गया कि मिक़दार इरशाद फ़रमाएं कि कितना माल ख़ुदा की राह में दिया जाय. इस पर यह आयत उतरी (ख़ाज़िन)
     (11) यानी जितना तुम्हारी ज़रूरत से ज़्यादा हो. इस्लाम की शुरूआत में ज़रूरत से ज़्यादा माल का ख़र्च करना फ़र्ज़ था. सहाबएं किराम अपने माल में से अपनी ज़रूरत भर का लेकर बाक़ी सब ख़ुदा की राह में दे डालते थे. यह हुक्म ज़कात की आयत के बाद स्थगित हो गया.
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*कज़ा नमाज़ का तरीका* #01/15
*بِسْــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ*

     पारह 30 सूरतुल माऊन की आयत 4 व 5 में इरशाद होता है :
*तो उन नमाज़ियों की खराबी है जो अपनी नमाज़ से भूले बेठे है*

     हज़रत मुफ़्ती अहमद यार खान अलैरहमा आयत 5 के तहत फरमाते है :
कभी न पढ़ना, पाबंदी से न पढ़ना, सहीह वक़्त पर न पढ़ना, नमाज़ सहीह तरीके से अदा न करना, शौक़ से न पढ़ना, समझ बुझ कर अदा न करना, कसल व सुस्ती, बे परवाइ से पढ़ना।
*✍🏽नुरुल इरफ़ान 958*
*✍🏽नमाज़ के अहकाम 240*
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*फैजाने रोज़ा* #07
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
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*_नफ्ल रोज़े के मदनी फूल_*
     माँ बाप अगर बेटे को नफ्ल रोज़े से इस लिये मना करे की बिमारी का अंदेशा है तो वालिदैन की इताअत करे।
*✍🏽रद्दुल मोहतार, 3/478*

     शौहर की इजाज़त के बगैर बीवी नफ्ल रोज़ा नही रख सकती।
*✍🏽दुर्रे मुख्तार, रद्दुल मोहतार, 3/477*

     नफ्ल रोज़ा कसदन शुरू करने से पूरा करना वाजिब हो जाता है अगर तोड़ेगा तो क़ज़ा वाजिब होगी।
*✍🏽दुर्रे मुख्तार, 3/473*

     नफ्ल रोज़ा जान बुझ कर नही तोडा बल्कि बिला इख़्तियार टूट गया मसलन औरत को रोज़े के दौरान हैज़ आ गया तो रोज़ा टूट गया मगर क़ज़ा वाजिब है।
*✍🏽दुर्रे मुख्तार, 3/374*

     वालिदैन की ना राजग़ी के सबब असर से पहले तक नफ्ल रोज़ा तोड़ सकता है। बादे असर नही।
*✍🏽दुर्रे मुख्तार, रद्दुल मोहतार, 3/475*
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 313*
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*नींद या बेदारी*  #2
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      नींद हर हालतमें नुकसानदेह है। सब भलाइयां बेदारीमें और तमाम बुराइयां नींद में है, चुनान्चे जो आदमी ज़ुरुरतसे ज़यादा खुरदोनोश और नींदमें मशरूफ रेहता हो, तमाम नेकीयां और अच्छाइयां उससे दूर हो जाती है और जिसने बराए नामभी हराम खा लिया, गोया उसने अपनी ख्वाहिशके ज़ेरे असर बहोत ज़यादा हलाल खा लिया।
     इस लिये के हराम नूरे ज़ुलमातमें लपेट लेता है। जिस तरह शराब अकलको तारीकियों की नज़र कर देती है। और जब ईमान ही तारीकियों में गुम हो जाए तो नमाज़, इबादत, इख्लास सब बेसूद है।
बाक़ी कल की पोस्ट में... इंसा अल्लाह

*✍🏽फुतूहल ग़ैब*  पेज 113
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मिट जाए गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाये यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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Saturday, 4 March 2017

*मुसाफिर की नमाज़* 9/9
*بِسْــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ*

_*मुसाफिर तीसरी रकअत के लिये खड़ा हो जाए तो ?*_
     अगर मुसाफिर क़सर वाली नमाज़ की तीसरी रकअत शुरू कर दे तो इसकी दो सूरते है...

     1) ब क़दरे तशह्हुद क़ायद ए आख़िरा कर चूका था तो जब तक तीसरी रकअत का सज्दा न किया हो लौट आए और सज्दए सहव करके सलाम फेर दे अगर न लौटे और खड़े खड़े सलाम फेर दे तो भी नमाज़ हो जाएगी मगर सुन्नत तर्क हुई।
     अगर तीसरी रकअत का सज्दा कर लिया तो एक और रकअत मिला कर सज्दए सहव करके नमाज़ मुकम्मल करे ये आखरी दो रकअते नफ्ल शुमार होगी।

    2) क़ायदए आख़िरा किये बैगेर खड़ा हो गया था तो जब तक तीसरी रकअत का सज्दा न किया लोट आए और सज्दए सहव कर के सलाम फेर दे
     अगर तीसरी रकअत का सज्दा कर लिया फ़र्ज़ बातिल हो गए अब एक और रकअत मिला कर सज्दए सहव करके नमाज़ मुकम्मल करे चारो रकअत नफ्ल शुमार होगी। दो रकअत फ़र्ज़ अदा करने अभी जिम्मे बाक़ी है।
*✍🏽दुर्रेमुखतार मअ रद्दलमोहतार 2/550*
*✍🏽नमाज़ के अहकाम 235*
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मिट जाए गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
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*फैजाने रोज़ा* #06

*_जुमुआ के रोज़ो के मुतअल्लिक़ फ़ज़ाइल_*
     हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया : जिस ने जुमुआ का रोज़ा रखा तो अल्लाह उसे आख़िरत के दस दिनों के बराबर अज्र आता फ़रमाएगा और उन की तादाद अय्यामे दुन्या की तरह नही है।
*✍🏽शोएबुल ईमान, 3/393, हदिष :3862*

     मगर तन्हा जुमुआ का रोज़ा न रखा जाए इस के साथ जुमारात या सनीचर मिला लेना चाहिये।

*_तन्हा जुमुआ का रोज़ा रखने की मुमानअत की रिवायत_*
     हज़रते अबू हुरैरा رضي الله تعالي عنه रिवायत करते है, मेने हुज़ूर ﷺ को फरमाते हुए सुना, तुम में से कोई हरगिज़ जुमुआ का रोज़ा न रखे मगर ये की इस के पहले या बाद में एक दिन मिला ले।
*✍🏽बुखारी, 1/653, हदिष : 1985*

     हज़रते आमिर बिन लुदैन अशअरी رضي الله تعالي عنه से रिवायत है की में ने हुज़ू ﷺर को फरमाते हुए सुना, जुमुआ का दिन तुम्हारे लिये ईद है इस दिन रोज़ा मत रखो मगर ये की इस से पहले या बाद में भी रोज़ा रखो।
*✍🏽अल-तरगिब् वल-तरहिब, 2/81, हदिष :1592*
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 311*
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*नींद या बेदारी*  #1
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*
          
       हज़रत गौसुल आज़म رضي الله تعالي عنه ने फ़रमाया: जो आदमी बेदारी के बजाए नींद को इख्तियार करता है, वो निहायत नाकिस और अदना चीज़को पसन्द कर रहा है। और चूंके नींद मौत की बहेन है इस लिये गोया वो शख्स अपनी ज़ुरुरतों और मसलेहतों में मौत और गफलत का ख्वाहिशमंद है। इसी लिये ख़ुदातआला नींदसे मावरा है क्योंके वो तमाम नकाइससे पाक है। 
      मलाएकाभी कुर्बे खुदावन्दी के बाइस नींदसे दूर है। यही हाल जन्नतके बासियों का है। चूंके वो जन्नत के ऐसे आला मकाम के रेहनेवाले है। और उनके नफूस पाकीज़ा है, इसलिये उन पर भी नींद ग़ालिब नहीं आती। 
     नींद हर हालतमें नुकसानदेह है।

बाक़ी कल की पोस्ट में... इंसा अल्लाह

*✍🏽फुतूहल ग़ैब*  पेज 112
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Friday, 3 March 2017

*मुसाफिर की नमाज़* 8/9
*بِسْــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ*

_*क़सर के बदले चार की निय्यत बांध ली तो..?*_
     मुसाफिर ने क़सर के बजाए चार रकअत फ़र्ज़ की निय्यत बांध ली फिर याद आने पर दो पर सलाम फेर दिया तो नमाज़ हो जाएगी।
*✍🏽दुर्रेमुखतार मअ रद्दलमोहतार 2/97*

_*क्या मुसाफिर को सुन्नते मुआफ़ है ?*_
     सुन्नतो में क़सर नही बल्कि पूरी पढ़ी जाएगी, खौफ और घबराहट की हालत में सुन्नते मुआफ़ है और अम्न की हालत में पढ़ी जाएगी।
*✍🏽आलमगिरी 1/139*
*✍🏽नमाज़ के अहकाम 234*
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*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #161
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_सूरतुल बक़रह, आयत ②①⑦_*
     तुमसे पूछते हैं माहे हराम में लड़ने का हुक्म  (1) तुम फ़रमाओ इसमें लड़ना बड़ा गुनाह है  (2) और अल्लाह की राह से रोकना  और उसपर ईमान न लाना  और मस्जिदे हराम से रोकना और इसके बसने वालों को निकाल देना (3) अल्लाह के नज़्दीक ये गुनाह उससे भी बड़े हैं और उनका फ़साद (4) क़त्ल से सख़्ततर है (5) और हमेशा तुमसे लड़ते रहेंगे यहां तक कि तुम्हें तुम्हारे दीन से फेर दें अगर बन पड़े (6) और तुममें जो कोई अपने दीन से फिरे, फिर काफ़िर होकर मरे तो उन लोगों का किया अकारत गया दुनिया में और आख़िरत में (7) और वो दोज़ख़ वाले हैं उन्हें उसमें हमेशा रहना.

*तफ़सीर*
     (1) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने अब्दुल्लाह बिन जहश के नेतृत्व में मुजाहिदों की एक जमाअत रवाना फ़रमाई थी. उसने मुश्रिकों से जंग की. उनका ख़याल था कि वह दिन जमादियुल आख़िर का अन्तिम दिन है. मगर दर हक़ीक़त चाँद 29 को हो गया था, और वह रजब की पहली तारीख़ थी. इस पर काफ़िरों ने मुसलमानों को शर्म दिलाई कि तुमने पाबन्दी वाले महीने में जंग की और हुज़ूर से इसके बारे में सवाल होने लगे. इस पर यह आयत उतरी.
     (2) मगर सहाबा से यह गुनाह वाक़े नही हुआ, क्योंकि उन्हें चाँद होने की ख़बर ही न थी. उनके ख़याल में वह दिन माहे हराम, यानी पाबन्दी वाले महीने रजब का न था. पाबन्दी वाले महीनों में जंग न करने का हुक्म “उक़्तुलुल मुश्रिकीना हैसो वजद तुमूहुम” यानी मुश्रिकों को मारो जहां पाओ (9 : 5) की आयत द्वारा स्थगित हो गया.
     (3) जो मुश्रिकों से वाक़े हुआ कि उन्होंने हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और आपके सहाबा को, हुदैबिया वाले साल, काबए मुअज़्ज़मा से रोका और मक्के में आपके क़याम के ज़माने में आपको और आपके साथियों को इतनी तकलीफ़ें दीं कि वहाँ से हिजरत करना पडी.
     (4) यानी मुश्रिकों का, कि वह शिर्क करते हैं और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और मूमिनों को मस्जिदें हराम से रोकते हैं और तरह तरह के कष्ट देते हैं.
     (5) क्योंकि क़त्ल तो कुछ हालतों में जायज़ होता है, और कुफ़्र किसी हाल में जायज़ नहीं. और यहाँ तारीख़ का मशकूक यानी संदेह में होना मुनासिब वजह है. और काफ़िरों के कुफ़्र के लिये तो कोई वजह ही नहीं है.
     (6) इसमें ख़बर दी गई कि काफ़िर मुसलमानों से हमेशा दुश्मनी रखेंगे. कभी इसके ख़िलाफ़ न होगा. और जहाँ तक उनसे संभव होगा वो मुसलमानों को दीन से फेरने की कोशिश करते रहेंगे, “इनिस्तताऊ” (अगर बन पड़े) से ज़ाहिर होता है कि अल्लाह तआला के करम से वो अपनी इस मुराद में नाकाम रहेंगे.
     (7) इस आयत से मालूम हुआ कि दीन से फिर जाने से सारे कर्म बातिल यानी बेकार हो जाते हैं. आख़िरत में तो इस तरह कि उनपर कोई पुण्य, इनाम या सवाब नहीं. और दुनिया में इस तरह कि शरीअत मुर्तद यानी दीन से फिर जाने वाले के क़त्ल का हुक्म देती है. उसकी औरत उसपर हलाल नहीं रहती, वो अपने रिश्तेदारों की विरासत पाने का अधिकारी नहीं रहता, उसका माल छीना या लूटा या चुराया जा सकता है. उसकी तारीफ़ और मदद जायज़ नहीं. (रूहुल बयान वग़ैरह).
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*फैजाने रोज़ा* #05
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
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*_पिर और जुमारात के रोज़े के मुतअल्लिक़ रिवायत_*
     हज़रते अबू हुरैरा رضي الله تعالي عنه से मरवी है, हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया : पिर और जुमारात को आमाल पेश होते है तो में पसंद करता हु की मेरा अमल उस वक़्त पेश हो की में रोज़ादार हु।
*✍🏽तिर्मिज़ी, 2/187*

     हुज़ूर ﷺ पिर और जुमारात को रोज़े रखा करते थे इस के बारे में आप ने फ़रमाया : इन दिनों में अल्लाह हर मुसलमान की मगफिरत फ़रमाता है मगर वो दो शख्स जिन्होंने बाहम जुदाई कर ली है उन की निस्बत मलाइका से फ़रमाता है इन्हें छोड़ दो यहाँ तक की सुलह कर ले।
*✍🏽इब्ने माजह, 2/344*

     हज़रते अबू क़तादा رضي الله تعالي عنه फरमाते है, हुज़ूर ﷺ से पीर के रोज़े का सबब दरयाफ़्त किया गया तो फ़रमाया, इसी में मेरी विलादत हुई, इसी में मुझ पर वही नाज़िल हुई।
*✍🏽सहीह मुस्लिम, 591, हदिष : 1162*
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 304*
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Thursday, 2 March 2017

*तर्जमए कन्ज़ुल ईमान व तफ़सीरे खज़ाइनुल इरफ़ान* #160
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
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*_सूरतुल बक़रह, आयत ②①⑥_*
     तुमपर फ़र्ज़ हुआ अल्लाह की राह में लड़ना और वह तुम्हें नागवार है (18) और क़रीब है कि कोई बात तुम्हें बुरी लगे और वह तुम्हारे हक़ में बेहतर हो और क़रीब है कि कोई बात तुम्हें पसन्द आए  और वह तुम्हारे हक़ में बुरी हो.  और अल्लाह जानता है और तुम नहीं जानते (19)

*तफ़सीर*
     (18) जिहाद फ़र्ज़ है, जब इसकी शर्ते पाई जाएं. अगर काफ़िर मुसलमानों के मुल्क पर चढ़ाई करें तो जिहाद अत्यन्त अनिवार्य हो जाता है. वरना फ़र्जे़ किफ़ाया यानी एक के करने से सब का फ़र्ज़ अदा हो गया.
     (19) कि तुम्हारे हक़ में क्या बेहतर है. तो तुम पर लाज़िम है, अल्लाह के हुक्म का पालन करो और उसी को बेहतर समझो, चाहे वह तुम्हारी अन्तरआत्मा पर भारी हो.
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*फैजाने रोज़ा* #04
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*_हड्डिया तस्बिह करती है_*
     हज़रते बुरैदा से मरवी है की हुज़ूर ने हज़रते बिलाल से फ़रमाया ऐ बिलाल ! आओ नाश्ता करे। तो हज़रते बिलाल ने अर्ज़ की, में रोज़े से हु। आप ने फ़रमाया : हम अपना रिज़्क़ खा रहे है और बिलाल का रिज़्क़ जन्नत में बढ़ रहा है। फिर फ़रमाया : ऐ बिलाल ! क्या तुम्हे मालुम है की जितनी देर तक रोज़ादार के सामने खाना खाया जाता है तो उस की हड्डिया तस्बिह करती है और मलाइका उस के लिये इस्तिग़फ़ार करते रहते है।
*✍🏽सुनन इब्ने माजाह, 2/348, हदिष : 1749*

*_रोज़े की हालत में मरने की फ़ज़ीलत_*
     उम्मुल मुअमिनिन आइशा सिद्दीक़ा से रिवायत है, हुज़ूर ने फ़रमाया : जो रोज़े की हालत में मरा, अल्लाह क़यामत तक के लिये उसके हिसाब में रोज़े लिख देगा।
*✍🏽फ़िरदौस, 3/504, हदिष : 5557*
*✍🏽मदनी पंजसुरह, 298*
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