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Friday, 9 June 2017

💰बरकाते ज़कात* #16
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_ज़कात देने के फवाइद_* #09

*_हाजत रवाई_*
     14वी फ़ज़ीलत ये है कि अल्लाह तआला ज़कात देने वालो की हाजत रवाई फ़रमाएगा। इस ज़िम्न में दो फरमाने मुस्तफा ﷺ मुलाहज़ा कीजिये :
     जिसने किसी तंगदस्त के लिये आसानी की, अल्लाह तआला उसके लिये दुन्या और आख़िरत में आसानी कर देगा।
     जो किसी मुसलमान को दुन्यवि तक्लिफ़ से रिहाई दे तो अल्लाह तआला उससे क़यामत के दिन की मुसीबत दूर फ़रमाएगा।

*_दुआए मिलती है_*
     15वा फायदा ये है कि ज़कात से गरीबो की दुआए मिलती है, जिससे रहमते खुदावन्दि और मददे इलाही हासिल होती है। जैसा कि हुज़ूर ﷺ ने इरशाद फ़रमाया :
     तुम को अल्लाह तआला की मदद और रिज़्क़ जईफ़ो की बरकत और उनकी दुआओ के सबब पहुचता है।
*✍🏼बरकाते ज़कात, स.15*

*तमाम मोमिनो के इसले षवाब के लिये*
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मिट जाये गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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Tuesday, 6 June 2017

*बरकाते ज़कात* #15
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_ज़कात देने के फवाइद_* #07

*_माल की बरकत_*
     ज़कात का 11वा फायदा ये है कि ज़कात देने वाले का माल कम नहीं होता, बल्कि दुन्या व आख़िरत में बढ़ता है। अल्लाह तआला पारह 22 सूरए सबा आयत 39 में फ़रमाता है :
_और जो चीज़ तुम अल्लाह की राह में खर्च करो वो इसके बदले और देगा और वो सब से बेहतर रिज़्क़ देने वाला है।_

     एक और मक़ाम पर पारह 3 सूरतुल बक़रह आयत 261-262 में इरशाद फ़रमाता है :
_उनकी कहावत जो अपने माल अल्लाह की राह में खर्च करते है उस दोनों की तरह जिस ने उगाई सात बाली, हर बाल में सो दाने और अल्लाह इस से भी ज़्यादा बढ़ाए जिस के लिये चाहे और अल्लाह वुसअत वाला इल्म वाला है, वो जो अपने माल अल्लाह की राह में खर्च करते है, फिर दिये पीछे न एहसान रखे न तकलीफ दे उनका नेग (इनआम) उन के रब के पास है और उन्हें न कुछ अंदेशा हो न कुछ गम।_

     मालुम हुवा कि ज़कात देने वाले को ये यक़ीन रखते हुवे खुश दिली से ज़कात देनी चाहिए कि अल्लाह तआला उसको बेहतर बदला अता फ़रमाएगा।
     हुज़ूर ﷺ का फरमाने अज़मत निशान है : सदके से माल कम नहीं होता।

बाक़ी कल की पोस्ट में..ان شاء الله
*✍🏼बरकाते ज़कात, स.13*

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*फैज़ाने खदीजतुल कुब्रा*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     आपرضي الله تعالي عنها की पाकीज़ा सिफ़ात और खुसुसिय्यात में है की आपرضي الله تعالي عنها ने औरतो में सब से पहले इस्लाम क़बूल किया। आपرضي الله تعالي عنها को हुज़ूरﷺ की सबसे पहली ज़ौजा होने का शरफ हासिल है।
     अल्लाह ने आपرضي الله تعالي عنها को जिब्राईले अमिन अलैहिस्सलाम के ज़रिए सलाम भेजा।
     आपرضي الله تعالي عنها ने हबिबे किब्रियाﷺ की सोहबते बा बरकत में कमो बेश 25 साल रहने की सआदत हासिल की। आप ने शिबे अबी तालिब में रसूलुल्लाहﷺ के साथ क़ैद रहकर रफ़ाक़त और महब्बत का मिसालि नमूना पेश किया।
     तारीख में आपرضي الله تعالي عنها को ताहिरा व सिद्दीक़ा जैसे अज़ीमुश्शान अल्क़बात से याद किया जाता है। आप सरवरे दो आलमﷺ की बहुत ही महबूब ज़ौजए मुतह्हरा है। आप की हयात में रसूलुल्लाहﷺ ने किसी और से निकाह न फ़रमाया और आप को जन्नत में शोरो गुल से पाक महल की बशारत सुनाई गई।

*_अल्लाह का सलाम_*
     हज़रते खदीजतुल कुब्राرضي الله تعالي عنها की शान और अल्लाह के नज़दीक आप का मकामो मर्तबा किस क़दर अरफ़अ व आला है, इस का अंदाज़ा इस रिवायत से लगाइये।
     हज़रते अबू हुरैराرضي الله تعالي عنه से मरवी है कि एक दफा हज़रते जिब्राईल अलैहिस्सलाम ने रसूले अकरमﷺ की खिदमत में हाज़िर हो कर अर्ज़ की : या रसूलल्लाहﷺ ! ये खदीजा आ रही है, उन के पास बर्तन है जिसमे खाना है। जब वो आप के पास पहुचे तो उन्हें, उन के रब का और मेरा सलाम कहिये और जन्नत में खौल दार (यानी अंदर से खाली) मोती से बने हुए घर की बिशारत दीजिये, जिस में शोर है न कोई तकलीफ।
*✍🏽सहीह बुखारी, 2/565*

*_सलाम का जवाब_*
     हज़रते खदीजाرضي الله تعالي عنها ने सलाम का जवाब देते हुवे कहा : अल्लाह सलाम है और हज़रते जिब्राईल और आप पर सलामती, अल्लाह की रहमते और बरकतें नाज़िल हो।

*_हज़रते ख़दीजा की शाने फ़क़ाहत_*
     इस रिवायत से हज़रते खदीजाرضي الله تعالي عنها की दीनी मसाइल की मालूमात और इल्मी क़ाबिलिय्यत मालुम हुई क्यू की आपرضي الله تعالي عنها ने अल्लाह के सलाम के जवाब में इस तरह नही कहा : यानी उस पर सलामती हो। क्यू की आप ने अपनी बे मिसाल फहमो फिरासत से ये बात जान लि थी की अल्लाह के सलाम का जवाब इस तरह नही दिया जाएगा, जेसे मख्लूक़ को दिया जाता है। सलाम तो अल्लाह के नामो में से एक नाम है नीज़ इन अलफ़ाज़ के ज़रिए मुखातब को सलामती की दुआ दी जाती है।
     चुनांचे, आपرضي الله تعالي عنها ने अल्लाह के सलाम के जवाब में अल्लाह की हम्दो सना बयान की, फिर जिब्राईल और फिर हुज़ूरﷺ की बारगाह में जवाब सलाम अर्ज़ किया। इस से मालुम हुवा की सलाम भेजने वाले के साथ साथ सलाम पहुचाने वाले को भी सलाम का जवाब देना चाहिए।
*फुतूह अलबारी, 8/117*

     अपرضي الله تعالي عنهاने अपनी सारी दौलत हुज़ूरे अन्वरﷺ के क़दमो में ढेर कर दी, आप की क़ब्र में हादिये बर हक़ﷺ उतरे और अपने दस्ते अक़दस से आप को क़ब्र में उतारा।

     10-रमज़ान, आज आप رضي الله عنها का ज़ाहिरी विसाल का दिन है तो अपने घरो में फातिहा नियाज़ कर आपकी बारगाह में खिराजे अक़ीदत पेश करे और षवाब हासिल करे।

*तमाम मोमिनो के इसले षवाब के लिये*
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Monday, 5 June 2017

*बरकाते ज़कात* #13
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
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*_ज़कात देने के फवाइद_* #06

*_बुरी सिफ़ात से छुटकारा_*
     10वा फायदा ये है कि ज़कात न सिर्फ माल को पाकीज़ा बनाती है बल्कि नफ़्स को भी पाकीज़गी बख्शती है कि नफ़्स को लालच और बुख्ल जेसी बुरी सिफ़ात से नजात दिलाती है।
     क़ुरआने पाक में पारह 4 सूरए आले इमरान आयत 180 में बुख्ल की मज़म्मत इन अलफ़ाज़ में बयान की गई है :
_और जो बुख्ल करते है उस चीज़ में जो अल्लाह ने उन्हें अपने फ़ज़्ल से दी हरगिज़ उसे अपने लिये अच्छा न समजे बल्कि वो उनके लिये बुरा है अन क़रीब वो जिसमे बुख्ल किया था क़यामत के दिन उनके गले का तौक़ होगा।_

बाक़ी कल की पोस्ट में..ان شاء الله
*✍🏼बरकाते ज़कात, स.12*

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*नमाज़ का तरीका* #01
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     बा वुज़ू किब्ला रु इस तरह खड़े हो की दोनों पाउ के पन्जो में 4 उंगल का फ़ासिला रहे और दोनों हाथ कानो तक ले जाइये की अंगूठे कान की लौ से छु जाए और उंगलिया न मिली हुई हो न खूब खुली बल्कि अपनी हालत पर (normal) रखे और हथेलिया किबले की तरफ हो नज़रे सज्दे की जगह हो।

     अब नमाज़ पढ़ना है उस की निय्यत यानि दिल में उसका पक्का इरादा कीजिये साथ में ही ज़बान से भी कह लीजिये की ज्यादा अच्छा है।

     अब तकबीरे तहरीमा यानि "अल्लाहु अकबर" कहते हुए हाथ निचे लाइये और नाफ़ के निचे इस तरह बंधिये की सीधी हथेली की गद्दी उलटी हथेली के सिरे पर और बिच की 3 उंगलिया उलटी कलाई की पीठ पर और अंगूठा और छोटी ऊँगली कलाई के अगल बगल हो।

बाक़ी अगली पोस्ट में..ان شاء الله
*✍🏼नमाज़ के अहकाम, सफा 148*

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Sunday, 4 June 2017

*बरकाते ज़कात* #12
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
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*_ज़कात देने के फवाइद_ #05

*_मज़बूत भाई चारा_*
     8वा फायदा ये है कि ज़कात मुसलमानो के दरमियान भाई चारा मज़बूत बनाने में निहायत अहम किरदार अदा करती है, जिस से इस्लामी मुआशरे में इजतिमाइय्यत को फरोग मिलता है और इमदादे बाहमी की बुन्याद पर मुसलमान अपने प्यारे आक़ा صلى الله عليه وسلم के इस फरमाने अज़ीम का मिसदाक़ बन जाते है की: मुसलमानो की आपस में दोस्ती और रहमत व शफ़क़त की मिसाल जिसम् की तरह है, जब जिस्म का कोई उज़्व बीमार होता है तो बुखार और बे ख्वाबी में सारा जिस्म उस का शरीक होता है।

*_माल पाक हो जाता है_*
     ज़कात देने वाले को 9वा फायदा ये हासिल होता है कि उसका माल पाक हो जाता है, जैसा कि हज़रते अनस बिन मालिक رضي الله عنه से मरवी है कि हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया : अपने माल की ज़कात निकाल कि वो पाक करने वाली है, तुझे पाक कर देगी।

बाक़ी कल की पोस्ट में..ان شاء الله
*✍🏼बरकाते ज़कात, स.11*

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*नमाज़ का चोर*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
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     हज़रते अबू क़तादा رضي الله تعالي عنه से रिवायत है की सरकारे मदीना ﷺ का फरमाने बा करीना है : लोगो में बद तरीन चोर वो है जो अपनी नमाज़ में चोरी करे।
अर्ज़ की गई : या रसूलुल्लाह ﷺ ! नमाज़ का चोर कौन है ?फ़रमाया : वो जो नमाज़ के रूकू और सजदे पुरे न करे।
*✍🏼मस्नद इमाम अहमद हम्बल, जी.8 स.386 हदिष : 22705*

*_चोर की दो किस्मे_*
     हज़रते मुफ़्ती अहमद यार खा अलैरहमा इस हदिष के तहत फरमाते है : मालुम हुवा माल के चोर से नमाज़ का चोर बदतर है क्यू की माल का चोर अगर सज़ा भी पाता है तो कुछ न कुछ नफा भी उठा लेता है, मगर नमाज़ का चोर सज़ा पूरी पाएगा इसके लिये नफा की कोई सूरत नहीं।
     माल का चोर बन्दे का हक़ मारता है, जब की नमाज़ का चोर अल्लाह का हक़, ये हालत उनकी है जो नमाज़ को नाकिस पढ़ते है इससे वो लोग दरसे इबरत हासिल करे जो सिरे से नमाज़ पढ़ते ही नही।
*✍🏼मीरआत, जी.2 स.78*
*✍🏼नमाज़ के अहकाम, सफा 146-147*

*तमाम मोमिनो के इसले षवाब की निय्यत से*
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*अहकामे रोज़ा* #23
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
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*_रोज़े में क़ै होना_*
     बाज़ अवक़ात जब रोज़े में क़ै हो जाती है तो लोग परेशान हो जाते है बल्कि बाज़ तो समझते है की रोज़े में खुद ब खुद क़ै जो जाने से भी रोज़ा टूट जाता है। हालांकि ऐसा नही।
     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : जिस को माहे रमज़ान में खुद बखुद क़ै आई उसका रोज़ा न टुटा और जिस ने जान बुझ कर क़ै की उस का रोज़ा टूट गया।
*✍🏼कन्जुल उम्माल, 8/230, हदिष:23814*
     एक और मक़ाम पर इर्शाद फ़रमाया : जिस को खुद बखुद क़ै आई उस पर क़ज़ा नही और जिस ने जानबूझ कर क़ै की वो रोज़े की क़ज़ा करे।
*✍🏼तिर्मिज़ी, 2/173, हदिष:720*

     अगर रोज़ा याद होने के बा वुजूद क़सदन (यानि जानबूझ कर) क़ै की और अगर वो मुह भर है तो अब रोज़ा टूट गया।
     क़सदन मुह भर होने वाली क़ै से भी इस सूरत में रोज़ा टूटेगा जब की क़ै में खाना या (पानी) या कड़वा पानी या खून आए।

     अगर क़ै में सिर्फ बलगम निकला तो रोज़ा नही टूटेगा।

     मुह भर क़ै बिला इख़्तियार हो गई तो रोज़ा न टूटा अलबत्ता अगर इस में से एक चने के बराबर भी वापस लौटा दी तो रोज़ा टूट जाएगा। और एक चने से कम हो तो रोज़ा न टुटा।

*_मुह भर क़ै की तारीफ़_*
     मुह भर क़ै के माना ये है, "इसे बिला तकल्लुफ न रोका जा सके।
*✍🏼फ़ज़ाइले रमज़ान, 205*

*_ज़रूरी हिदायत_*
     मुह भर क़ै (इलावा बलगम के) नापाक है। इस का कोई छीटा कपड़े या जिस्म पर न गिरने पाए इस की एहतियात फरमाइये। आजकल लोग इस में बड़ी बे एहतियाती करते है, कपड़ो पर छीटे पड़ने की कोई परवाह नही करते और मुह वगैरा पर जो नापाक क़ै लग जाती है उस को भी बिला झिजक अपने कपड़ो से पूछ लेते है। अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त हमे नफासत से बचने का ज़हन इनायत फरमाए।

*📮षवाब की निय्यत से शेर करे*
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Saturday, 3 June 2017

*बुरे खतिमे का एक सबब*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     हज़रते इमाम बुखारी अलैरहमा फरमाते है, हज़रते हुजैफा बिन यमान رضي الله تعالي عنه ने एक शख्स को देखा जो नमाज़ पढ़ते हुए रूकू और सुजूद पुरे अदा नहीं करता था।
     तो उस से फ़रमाया : तुम ने जो नमाज़ पढ़ी अगर इसी नमाज़ की हालत में इन्तिकाल कर जाओ तो हज़रत मुहम्मद मुस्तफा के तरीके पर तुम्हारी मौत वाकेअ नहीं होगी।
*✍🏼सहीह बुखारी, जी.1 स.112*

     सुनने नसाई की रिवायत में ये भी है की आप ने पूछा तुम कब से इस तरह नमाज़ पढ़ रहे हो ? उसने कहा 40 साल से, फ़रमाया : तुमने 40 साल से बिलकुल नमाज़ ही नहीं पढ़ी और अगर इसी हालत में तुम्हे मौत आ गई तो दिने मुहम्मदी पर नही मरोगे।
*✍🏼सुनने नसाई, जी.2 स.57*
*✍🏼नमाज़ के अहकाम, सफा 146*

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*अहकामे रोज़ा* #22
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
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*_रोज़ा तोड़ने वाली बाते_* #02
★ सोते में (या नींद की हालत में) पानी पी लिया या कुछ खा लिया, या मुह खुला था, पानी का क़तरा या बारिश का ओला हल्क़ में चला गया तो रोज़ा टूट गया।

★ दूसरे का थूक निगल लिया या अपना ही थूक हाथ में ले कर निगल लिया तो रोज़ा टूट गया।
जब तक थूक बलगम मुह के अंदर मौजूद हो उसे निगल जाने से रोज़ा नही टूटता, बार बार थूकते रहना ज़रूरी नही।

★ मुह में रंगीन डोरा वगैरा रखा जिस से थूक रंगीन हो गया फिर वो रंगीन थूक निगल गए तो रोज़ा टूट गया।

★ आसु मुह में चला गया और आप उसे निगल गए। अगर क़तरा दो क़तरा है तो रोज़ा न गया और ज़्यादा था की उस की नमकिनी पुरे मुह में महसूस हुई तो रोज़ा टूट गया। पसीने का भी यही हुक्म है।

★ फुज़ले का मक़ाम बाहर निकल आया तो हुक्म ये है की खूब अच्छी तरह किसी कपड़े वगैरा से पूछ कर उठे ताकि तरी बाक़ी न रहे। अगर कुछ पानी उस पर बाक़ी था और खड़े हो गए जिस की वजह से पानी अन्दर चला गया तो रोज़ा फासिद हो गया। इसी वजह से फुकहाऐ किराम फ़रमाते है की रोज़ादार इस्तिन्ज़ा करने में सास न ले।
*✍🏼फ़ज़ाइले रमज़ान, 203*

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Friday, 2 June 2017

*बरकाते ज़कात* #11
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*_ज़कात देने के फवाइद_* #04
   
*मुसलमान के दिल में ख़ुशी दाखिल करना*
     छटा फायदा ये है कि ज़कात की अदाएगी से गरीबो की ज़रूरत पूरी हो जाती और उन के दिल में ख़ुशी दाखिल होती है। याद रहे कि मुसलमान के दिल में ख़ुशी दाखिल करने का भी बड़ा सवाब है।
     हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया : अल्लाह के नज़्दीक फराइज़ की अदाएगी के बाद सबसे अफज़ल अमल मुसलमान के दिल में ख़ुशी दाखिल करना है।

*इस्लामी मुआशरे का हुस्न*
     सातवी फ़ज़ीलत ये है कि ज़कात देने का अमल इस्लामी मुआशरे का हुस्न है कि एक गनी मुसलमान गरीब मुसलमानो को ज़कात दे कर उसे मुआशरे में सर उठा कर जीने का हौसला मुहय्या करता है। नीज़ फ्रिब का दिल किना व हसद की शिकार गाह बनने से महफूज़ रहता है, क्यूकी वो जनता है कि उसके गनी मुसलमान के माल में उस का भी हक़ है, चुनान्चे वो अपने भाई के जान, माल और अवलाद में बरकत के लिये दुआ गो रहता है,
     नबी ﷺ ने फ़रमाया : बेशक मोमिन के लिये मोमिन मिस्ले इमारत के है, बाज़ बाज़ को तक़्वीययत पहुचाता है।

बाक़ी कल की पोस्ट में..ان شاء الله
*✍🏼बरकाते ज़कात, स.11*

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*अहकामे रोज़ा* #21
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
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*_रोज़ा तोड़ने वाली बाते_* #01
★ खाने, पीने या हम बिस्तरी करने से रोज़ा जाता रहता है जब की रोज़ादार होना याद हो।
*✍🏼रद्दुल मुहतार, 3/365*

★ शकर वगैरा ऐसी चीज़े जो मुह में रखने से घुल जाती है मुह में रखी और थूक निगल गए रोज़ा जाता रहा।
*✍🏼बहारे शरीअत, 5/117*

★ दातो के दरमियान कोई चीज़ चने के बराबर या ज़्यादा थी उसे खा गए या कम ही थी मगर मुह से निकाल कर फिर खा ली तो रोज़ा टूट गया।
*✍🏼दुर्रे मुख्तार, 3/394*

★ दातो से खून निकल कर हल्क़ से निचे उतरा और खून थूक से ज़्यादा या बराबर या कम था मगर इस का मज़ा (टेस्ट) हल्क़ में महसूस हुवा तो रोज़ा जाता रहा और अगर कम था और मज़ा हल्क़ में महसूस न हुवा तो रोज़ा न गया।
*✍🏼दुर्रे मुख्तार, रद्दुल मुहतार, 3/368*

★ रोज़ा याद रहने के बा वुजूद हुक़्ना (यानि किसी दवा की बत्ती या पिचकारी पीछे के मक़ाम में चढ़ाना जिस से इजाबत हो जाए) लिया। या नाक के नथनों से दवाई चढ़ाई रोज़ा टूट गया।
*✍🏼आलमगिरी, 1/204*

★ कुल्ली कर रहे थे बिला क़स्द पानी हल्क़ से उतर गया या नाक में पानी चढ़ाया और दिमाग को चढ़ गया रोज़ा जाता रहा। यु ही रोज़ादार की तरफ किसी ने कोई चीज़ फेकी वो उस के हल्क़ में चली गई तो रोज़ा टूट गया।

बाक़ी अगली पोस्ट में..أن شاء الله
*✍🏼फ़ज़ाइले रमज़ान, 201*

*📮षवाब की निय्यत से शेर करे*
*___________________________________*
मिट जाये गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*नमाज़ पर नूर या तारीकी के अस्बाब*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     हज़रते उबादा बिन सामित رضي الله تعالي عنه से रिवायत हैं की हुज़ूर ﷺ का फरमाने आलिशान है, जो शख्स अच्छी तरह वुज़ू करे, फिर नमाज़ के लिये खड़ा हो, इसके रूकू, सुजूद और किरआत को मुकम्मल करे तो नमाज़ कहती है, अल्लाह तआला तेरी हिफाज़त करे जिस तरह तूने मेरी हिफाज़त की। फिर उस नमाज़ को आसमान की तरफ ले जाया जाता है और उस के लिये चमक और नूर होता है।
     पस उसके लिये आस्मां के दरवाज़े खोले जाते है हत्ता की उसे अल्लाह तआला की बारगाह में पेश किया जाता है और वो नमाज़ उस नमाज़ी की शफ़ाअत करती है,

     और अगर वो इस का रुकूअ, सुजूद और किरआत मुकम्मल न करे तो नमाज़ कहती है, अल्लाह तआला तुझे छोड़ दे जजस तरह तूने मुझे जाए किया। फिर उस नमाज़ को इस तरह आसमान की तरफ ले जाया जाता है की उस पर तारीकी छाई होती है और उस पर आसमान के दरवाज़े बंद कर दिये जाते है फिर उसको पुराने कपड़े की तरह लपेट कर उस नमाज़ी के मुह पर मारा जाता है।
*✍🏼कन्जुल अमाल, जी.7 स.129, हदिष:19049*
*✍🏼नमाज़ के अहकाम, सफा 145-146*

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*अहकामे रोज़ा* #20
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_इफ्तार के वक़्त दुआ क़बूल होती है_*
     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : बेशक रोज़ादार के लिये इफ्तार के वक़्त एक ऐसी दुआ होती है जो रद नही की जाती।
*अत्तरगिब् वत्तरहिब, 2/53, हदिष:29*

     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم :  तीन शख्स की दुआ रद नही की जाती...
1. रोज़ादार की बी वक़्ते इफ्तार
2. बादशाहे आदिल
3. मज़लूम
इन तीनो की दुआ अल्लाह बादलो से भी ऊपर उठा लेता है और आसमानों के दरवाज़े उस के लिये खुल जाते है और अल्लाह फ़रमाता है, मुझे मेरी इज़्ज़त की क़सम ! में तेरी ज़रूर मदद फरमाउंगा अगर्चे कुछ देर बाद हो।
*✍🏼सुनने इब्ने माजह, 2/349, हदिष:1752*

*_दुआ के तीन फ़वाइद_*
     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : दुआ बन्दे की तिन बातो से खाली नही होती (1) या उसका गुनाह बख्शा जाता है। यव(2) उसे फायदा हासिल होता है। या (3) उसके लिये आख़िरत में बलाई जमा की जाती है की जब बन्दा आख़िरत में अपनी दुआओ का षवाब देखेगा जो दुन्या में मक़बूल न हुई थी, तो तमन्ना करेगा, काश ! दुन्या में मेरी कोई दुआ क़बूल न होती और सब यही (यानी आख़िरत) के वासिते जमा हो जाती।
*✍🏼अत्तरगिब् वत्तरहिब, 2/315*
देखा आप ने, दुआ राएगा तो जाती ही नही। इस का दुन्या में अगर असर ज़ाहिर न भी हो तो आख़िरत में अज्र व षवाब मिल ही जाएगा। लिहाज़ा दुआ में सुस्ती करना मुनासिब नही।
*✍🏼फ़ज़ाइले रमज़ान, 186*

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*शदीद ज़ख़्मी हालत में नमाज़*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     जब हज़रते उमर फारुके आज़म رضي الله تعالي عنه पर क़ातिलाना हमला हुआ तो अर्ज़ की गई, ऐ अमीरुल मुअमिनीन ! नमाज़ का वक़्त है।

     फ़रमाया, जी हा, सुनिये ! जो शख्स नमाज़ को जाएअ करता है उसका इस्लाम में कोई हिस्सा नहीं।
     और आप ने शदीद ज़ख़्मी होने के बा वुज़ूद नमाज़ अदा फ़रमाई।
*✍🏼नमाज़ के अहकाम, सफा 145*

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*अहकामे रोज़ा* #19
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
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*_क़र्ज़ से नजात का अमल_*
     हर नमाज़ के बाद 7 बार सूरए कुरैश (अव्वल आखिर दुरुद शरीफ) पढ़ कर दुआ मांगिये। पहाड़ जितना क़र्ज़ होगा तब भी أن شاء الله अदा हो जाएगा।
अमल ता हुसुले मुराद जारी रखिये।

*_कर्ज़ा उतारने का वज़ीफ़ा_*
اٙللّٰهُمّٙ اكْفِـنِىْ بِـحٙـلٙالِكٙ عٙنْ حٙرٙامِكٙ وٙاٙغْـنِـنِىْ بِـفٙـضْـلِكٙ عٙـمّٙـنْ سِوٙاكٙ

तर्जमा : या अल्लाह मुझे हलाल रिज़्क़ अता फरमा कर हराम से बचा और अपने फज़्लो करम से अपने सिवा गैरो से बे नियाज़ कर दे।
     हर नमाज़ के बाद 11 बार और सुबहो, शाम 100, 100 बार रोज़ाना (अव्वल आखिर दुरुद शरीफ) पढ़िये।

*_मदनी इल्तिज़ा_*
     अमल शुरू करने से क़ब्ल गुजुरे गौषे आज़म رضي الله عنه के ईसाले षवाब के लिये कम अज़ कम 11 रूपये की नियाज़ और काम हो जाने की सूरत में कम अज़ कम 25 रुपये की नियाज़ इमाम अहमद रज़ा खान رحمة الله عليه के ईसाले षवाब के लिये तक़सीम कीजिये।
*✍🏼फ़ज़ाइले रमज़ान, 165*

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*बरकाते ज़कात* #10
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
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*_ज़कात देने के फवाइद_* #03

*_कामयाबी का रास्ता_*
     ज़कात का चौथा फायदा ये है कि इससे बन्दा कामयाब लोगो की फेहरिस्त में शामिल हो जाता है। जैसा कि क़ुरआन में फलाह को पहुचने वालो का एक काम ज़कात भी बयान किया गया है, पारह 18 सूरतुल मुअमीनून आयत 1 से 4 में इरशाद होता है :
_बेशक मुराद को पहुचे ईमान वाले जो अपनी नमाज़ में गिड़ गिड़ाते है और वो जो किसी बेहूदा बात को तरफ इलतिफ़ात नहीं करते और वो कि ज़कात देने का काम करते है।_

*_नुसरते इलाही का मुस्तहिक़_*
     पाचवी फ़ज़ीलत ये है कि अल्लाह ज़कात अदा करने वाले की मदद फ़रमाता है. चुनान्चे पारह 17 सूरतुल हज आयत 40-41 में इरशाद होता है :
_और बेशक अल्लाह ज़रूर मदद फ़रमाएगा उसकी जो उस के दिन की मदद करेगा, बेशक ज़रूर अल्लाह कुदरत वाला ग़ालिब है, वो लोग कि अगर हम उन्हें ज़मीन में क़ाबू दे तो नमाज़ बरपा रखे और ज़कात दे और भलाई का हुक्म करे और बुराई से रोके और अल्लाह ही के लिये सब कामो का अंजाम।_

बाक़ी कल की पोस्ट में..ان شاء الله
*✍🏼बरकाते ज़कात, स.10*

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Thursday, 1 June 2017

*अहकामे रोज़ा* #18
*بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ*
*اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ*

*_सहरी करना सुन्नत है_*
     अल्लाह का करोड़ हा एहसान की उस ने हमे रोज़े जेसी अज़ीमुश्शान नेअमत अता फ़रमाई और साथ ही कुव्वत के लिये सहरी की न सिर्फ इजाज़त फ़रमाई बल्कि इस में हमारे लिये ढेरो षवाब भी रख दिया।
     हमारे प्यारे आक़ा صلى الله عليه وسلم अगर्चे खाने, पीने के हमारी तरह मोहताज नही। ता हम हमारे प्यारे आक़ा صلى الله عليه وسلم हम गुलामो की खातिर सहरी फ़रमाया करते ताकि महब्बत वाले गुलाम अपने आक़ा की सुन्नत समज कर सहरी कर लिया करे। यु उन्हें दिन के वक़्त रोज़े में कुव्वत के साथ साथ सुन्नत पर अमल करने का षवाब भी हाथ आए।
     बाज़ इस्लामी भाइयो को देखा गया है की कभी सहरी करने से रह जाते है तो फिख्रिया बाते बनाते है और कहते है, हमने तो सहरी के बगैर ही रोज़ा रख लिया। सहरी के बगैर रोज़ा रखना कोई कमाल तो नही जिस पर फख्र किया जा रहा है। बल्कि सहरी की सुन्नत छूटने पर नदामत होनी चाहिये, अफ़सोस करना चाहिये की हुज़ूर صلى الله عليه وسلم की एक अज़ीम सुन्नत छूट गई।

*_हज़ार साल की इबादत से बेहतर_*
     हज़रते शैख़ शरफुद्दीन अल मारूफ़ बाबा बुलबुल शाह رحمة الله عليه फ़रमाते है, अल्लाह ने मुझे अपनी रहमत से इतनी ताक़त बख्शी है की में बगैर खाए, पिये और बगैर साज़ो सामान के अपनी ज़िन्दगी गुज़ार सकता हु। मगर चुकी ये उमूर हुज़ूर صلى الله عليه وسلم की सुन्नत नही है इस लिये में इन से बचत हु, _मेरे नज़दीक सुन्नत की पैरवी हज़ार साल की इबादत से बेहतर है।_
*✍🏼फ़ज़ाइले रमज़ान*

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Wednesday, 31 May 2017

*बरकाते ज़कात* #09
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
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*_ज़कात देने के फवाइद_* #02

*_रहमते इलाही की बरसात_*
     ज़कात देने वाले को दूसरी सआदत ये मिलती है कि उस पर रहमते इलाही की छमा छम बारिश होती है। चुनान्चे पारह 9 सूरतुल आराफ़ आयत 156 में है :
_और मेरी रहमत हर चीज़ को घेरे है तो अन क़रीब में नेमतों को उन के लिये लिख दूंगा जो डरते और ज़कात देते है।_

*_तक़वा व परहेज़गारी का हुसूल_*
    ज़कात देने का तीसरा फ़ायदा ये है कि इस से तक़वा हासिल होता है। चुनान्चे पारह 1 सूरतुल बक़रह आयत 3 में मुत्तक़ीन की अलामत में से एक अलामत ये भी बयान की गई है :
_और हमारी दी हुई रोज़ी में से हमारी राह में उठाए।_

बाक़ी कल की पोस्ट में.. ان شاء الله
*✍🏼बरकाते ज़कात, स.9*

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*_सोने के बाद सहरी की इजाज़त न थी_*
     रात को उठ कर सहरी करने की इजाज़त नही थी. रोज़ा रखने वाले को गुरुबे आफ़ताब के बाद सिर्फ उस वक़्त तक खाने पिने की इजाज़त थी जब तक वो सो न जाए. अगर सो गया तो अब बेदार हो कर खाना पीना ममनुअ था। मगर अल्लाह ने अपने प्यारे बन्दों पर एहसान अज़ीम फ़रमाते हुए सहरी की इजाज़त दी और इस का सबब यु हुवा....

*_सहरी की इजाज़त की हिकायत_*
     हज़रते सरमा बिन क़ैस رضي الله عنه मेहनती शख्स थे। एक दिन बी हालते रोज़ा अपनी ज़मीन में दिन भर काम कर के शाम को घर आए। अपनी ज़ौजा से खाना तलब किया, वो पकाने में मसरूफ़ हुई। आप थके हुए थे, आँख लग गई। खाना तैयार कर के जब आप को जगाया गया तो आप ने खाने से इनकार कर दिया। क्यू की उन दिनों (गुरुबे आफ़ताब के बाद) सो जाने वाले के लिये खाना पीना ममनुअ हो जाता था। चुनान्चे खाए पाई बगैर आप ने दूसरे दिन भी रोज़ा रख लिया। आप कमज़ोरी के सबब बेहोश हो गए।
*तफ्सिरल ख़ाज़िन, 1/126*
     तो इन के हक़ में ये आयते मुक़द्दसा नाज़िल हुई : और खाओ और पियो यहा तक की तुम्हारे लिये ज़ाहिर हो जाए सपेदी का डोरा सियाही के डोरे से पो फट कर। फिर रात आने तक रोज़े पुरे करो।
पारहा, 2 अल बक़रह, 187

     इससे ये मालुम हुवा की रोज़े का अज़ान फज्र से कोई तअल्लुक़ नही यानी फज्र की अज़ान के दौरान खाने पिने का कोई जवाज़ ही नही। अज़ान हो या न हो आप तक आवाज़ पहुचे या न पहुचे सुब्हे सादिक़ होते ही आप को खाना पीना बिल्कुल ही बन्द करना होगा।
*✍🏼फ़ज़ाइले रमज़ान, 155*

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