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Thursday, 6 July 2017

*बैठने की सुन्नते और आदाब* #01
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     हमारा उठना बैठना भी सुन्नत के मुताबिक़ होना चाहिये। हुज़ूर صلى الله عليه وسلم अक्सर किबला शरीफ की तरफ रुए अनवर कर के बैठा करते थे। ज़हे नसीब हम भी कभी कभी किबला रु हो कर बैठे तो कभी मदीना की तरफ मुह कर के बैठे।

★ सुरीन ज़मीन पर रखे और दोनों घुटनो को खड़ा करके दोनों हाथो से घेर ले और एक हाथ से दूसरे को पकड़ ले, इस तरह बेठना सुन्नत है (लेकिन इस दौरान घुटनो पर कोई चादर वगैरा ओढ़ लेना बेहतर है।

★ चार जानू (यानि पालती मार कर) बेठना भी नबिय्ये करीम صلى الله عليه وسلم से साबित है।

★ जहां कुछ धूप और कुछ छाव हो वहा न बेठे। हज़रते अबू हुरैरा رضي الله عنه से रिवायत है की हुज़ूर صلى الله عليه وسلم ने फ़रमाया : जब तुम में से कोई साए में हो और उस पर से साया रुखसत हो जाए और वो कुछ धुप कुछ छाऊ में रह जाए तो उसे चाहिये की वहा से उठ जाए।

बाक़ी अगली पोस्ट में..أن شاء الله
*✍🏼सुन्नते और आदाब, 99*

*तमाम मोमिनो के इसले षवाब के लिये*
*___________________________________*
मिट जाये गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*बन्दों के हुक़ूक़* #16
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_बन्दों के हुक़ूक़ अदा करने के तरीके_* #02
★ *एहसासे जिम्मेदारी पैदा कीजिये :* अपने अंदर एहसासे जिम्मेदारी पैदा कीजिये और बन्दों के हुक़ूक़ को भी अपनी ज़िम्मेदारी समझिये, बन्दों के हुक़ूक़ अदा करना भी हर मुसलमान की ज़िम्मेदारी ही है। हमारे अस्लाफ भी इसे अपनी ज़िम्मेदारी समझते और इसी सोच में कुढ़ते रहते। हज़रते उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ رحمة الله عليه की ज़ौजा का बयान है की जब उन्हें मर्तबए खिलाफत फाइज़ किया गया तो घर आ कर मुसल्ले पर बैठ कर रोने लगे, यहाँ तक की दाढ़ी आसुओ से तर हो गई, मेरे पूछने पर इर्शाद फ़रमाया : मेरी गर्दन पर उम्मते सरकार का बोझ डाल दिया गया है, जब में भूके, फ़क़ीरों, मरीज़ों, मुसाफिरों, बुढो, बच्चों अल ग़रज़ ! तमाम दुन्या के मुसीबत ज़दो की खबर गिरी के मुतअल्लिक़ सोचता हु तो डरता हु की कहि इन के मुतअल्लिक़ अल्लाह बाज़ पूर्स न फरमाए और मुझ से जवाब न बन पड़े, बस इस भारी ज़िम्मेदारी का एहसास और इसी की फ़िक्र मुझे रुला रही है।

★ *नेकियों पर हरिस बन जाइये :* बन्दों के हुक़ूक़ की अदाएगी अपनाने का एक तरीक़ा ये भी है की मालो दौलत की हिर्स को छोड़ कर नेकियों पर खुद को हरिस बनाने की कोशिश की जाए, हमे नही मालुम की हमारी कौन सी नेकी अल्लाह की दाइमी रिज़ा का सबब बन जाए, इस लिये छोटी से छोटी नेकी भी न छोड़ी जाए। लोगो से अच्छा सुलूक करने के फ़ज़ाइल पढ़े जाए और षवाब की निय्यत से बन्दों के हुक़ूक़ की अदाएगी पर कमर बस्ता रहा जाए। फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : लोगो से अच्छा सुलूक करना सदक़ा है।

★ *खौफे खुदा का जाम पीजिये ! :* बन्दों के हुक़ूक़ की अदाएगी के साथ साथ दीगर अच्छे औसाफ को अपनाने और बुरी आदतो से पीछा छुड़ाने का एक अहम ज़रीआ खौफे खुदा भी है। हज़रते अबुल हसन ज़रीर رحمة الله عليه फ़रमाते है : किसी शख्स की सआदत मन्दी की अलामत ये है की उसे बद बख्ती का खौफ लाहिक़ रहे, क्यू की खौफे खुदा और बन्दे के दरमियान लगाम है, जब किसी बन्दे की लगाम टूट जाए तो वो हलाक होने वालो के साथ हलाकत का शिकार हो जाता है। लिहाज़ा इस नेमते उज़्मा के हुसूल की कोशिश की जाए, أن شاء الله इस की बरकत से बन्दों के हुक़ूक़ की अदाएगी के साथ साथ दीगर नेक काम भी हमारी ज़िन्दगी का हिस्सा बन जाएंगे।
*✍🏼बन्दों के हुक़ूक़, 23*

मुकम्मल

*तमाम मोमिनो के इसले षवाब के लिये*
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Wednesday, 5 July 2017

*नमाज़ के वाजिबात* #05
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

★ दोनों तरफ सलाम फेरते वक़्त लफ्ज़ "अस्सलामु" दोनों बार वाजिब है। लफ्ज़ "अलैकुम" वाजिब नहीं बल्कि सुन्नत है।

★ वित्र् में तकबीरे क़ुनूत कहना।
★ वित्र् में दुआए क़ुनूत पढ़ना।

★ इदैन की 6 तकबीरे।
★ इदैन में दूसरी रकअत की तकबीरे रूकू और इस तकबीर के लिए लफ़्ज़े "अल्लाहु अक्बर" होना।

★ जहरी नमाज़ मसलन मगरिब व ईशा की पहली और दूसरी रकअत और फ़ज्र, जुमुआ, इदैन, तरावीह और रमज़ान के वित्र् की हर रकअत में इमाम को जहर (यानि इतनी बुलंद आवाज़ की दूसरे लोग यानि वो कि सफे अव्वल में है सुन सके) से किराअत करना।

★ गैर जहरी (मसलन जोहर व असर) में आहिस्ता किराअत करना।

बाक़ी अगली पोस्ट में..ان شاء الله
*✍🏼नमाज़ के अहकाम, सफा  172-173*

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*चलने की सुन्नते और आदाब*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     हुज़ूर صلى الله عليه وسلم की हयाते तय्यिबा ज़िन्दगी के हर शोबे में हमारी रहनुमाई करती है। मुसलमान की चाल भी इम्तियाज़ी होनी चाहिये। गरीबान खोल कर, गले में ज़न्जीर सजाए, सीना तान कर, क़दम पछाड़ते हुए चलना अहमक़ो और और मगरुरो की चाल है। मुसलमानो को दर्मियाना और पुर वक़ार तरीके पर चलना चाहिये।

★ अगर कोई रुकावट न हो तो दरमियानी रफ़्तार से रस्ते के कनारे कनारे चले, न इतना तेज़ की लोगो की निगाहें आप पर जम जाए और न इतना आहिस्ता की आप बीमार महसूस हो।

★ लफंगों की तरह गरीबान खोल कर अकड़ते हुए हरगिज़ न चले की ये अहमक़ो और मगरुरो की चाल है बल्कि नीची नज़रे किये पुर वक़ार तरीके पर चले। हज़रते अनस رضي الله عنه से मरवी है की जब हुज़ूर صلى الله عليه وسلم चलते तो झुके हुए मालुम होते थे।

★ राह चलने में परेशान नज़री से बचे और सड़क उबूर करते वक़्त गाडियो वाली सम्त देख कर सड़क उबूर करे। अगर गाडी आ रही हो तो बे तहाशा भाग न पड़े बल्कि रुक जाए की इस में हिफाज़त का ज़्यादा इम्कान है।

     ऐ हमारे अल्लाह ! हमे प्यारे हबीब صلى الله عليه وسلم की सुन्नत के मुताबिक़ दर्मियाना, तकब्बुर से बिलकुल पाक चाल चलने की तौफ़ीक़ अता फरमा। और हमे रास्ते के एक तरफ इधर उधर ताके झांके बगैर, सर झुका कर शरीफाना चाल चलने की तौफ़ीक़ मर्हमत फरमा।
اٰمِيْن بِـجٙـاهِ النّٙـبِـىِّ الْاٙ مِيْن
*✍🏼सुन्नते और आदाब, 97*

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Tuesday, 4 July 2017

*बन्दों के हुक़ूक़* #15
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_बन्दों के हुक़ूक़ अदा करने के तरीके_* #01
     जो चीज़ जिस क़दर अहम हो, उस के हुसूल के लिये भी उतनी ही कोशिश की जाती है, अगर मुसलमान, बन्दों के हुक़ूक़ की अदाएगी करे, तो इस से दुन्या व आख़िरत सवर सकती है और इस की अदाएगी में कोताही से काम लिया तो दुन्या व आख़िरत दोनों ही बर्बाद हो सकती है। लिहाज़ा किसी भी ज़ी शऊर शख्स से इस की अहमिय्यत ढकी छुपी नही। बन्दों के हुक़ूक़ का ख्याल रखने, बन्दों के हुक़ूक़ अदा करने की आदत किस तरह बनाई जाए ? आइये ! इस के चन्द तरीके भी देखते है :

★ *हुक़ूक़ का इल्म हासिल कीजिये :* सब से पहले बन्दों के हुक़ूक़ का इल्म हासिल करना होगा, किसी भी चीज़ की सहीह मालूमात के बगैर उस और अमल पैरा होना तक़रीबन न मुमकिन होता है।

★ *हमेशा मुरबत सोचिये :* किसी के बारे में मन्फ़ी सोच को दिलो दिमाग में जगह देने और उस के ना पसन्दीदा औसाफ याद करने के बजाए मुस्बत सोच क़ाइम कीजिये और उस के अच्छे औसाफ को याद रखिये।
     मन्कुल है की एक शख्स अपनी बीवी की शिकायत करने के लिये हज़रते उमर رضي الله عنه के पास पहुचा, दरवाज़े पर पहुच कर उस ने आप की ज़ौजा की बुलन्द आवाज़ से गुफ्तगू सुनी, वो ये कहते हुवे लौट गया की आप खुद इस मसअले का शिकार है, बाद में आप ने उसे बुलवा कर आने और फिर लौट जाने की वजह पूछी, उसने मुकम्मल वाक़ीआ अर्ज़ किया तो आप رضي الله عنه ने फ़रमाया : बीवी के चन्द हुक़ूक़ के सबब में उस से दर गुज़र करता हु। (1) वो मुझे जहन्नम से बचाने का ज़रीआ है, उस की वजह से मेरा दिल हराम की ख्वाहिश से बचा रहता है। (2) मेरी घर से गैर मौजूदगी में वो मेरे माल की हिफाज़त करती है। (3) मेरे कपड़े धोती है। (4) मेरे बच्चों की परवरिश करती है। (5) मेरे लिये खाना पकाती है। उस ने कहा ये औसाफ तो मेरी बीवी में भी मौजूद है, लिहाज़ा अब में भी उस से दर गुज़र किया करूँगा।

बाक़ी अगली पोस्ट में..أن شاء الله
*✍🏼बन्दों के हुक़ूक़, 23*

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*नमाज़ के वाजिबात* #04
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

★ फ़र्ज़ वित्र् और सुन्नते मुअक्कदा में अत्तहिय्यात के बाद कुछ न पढ़ना।

★ दोनों क़ादो में अत्तहिय्यत मुकम्मल पढ़ना। अगर एक लफ्ज़ भी छूटा तो वाजिब तर्क हो जाएगा और सज्दए सहव वाजिब होगा।

★ फ़र्ज़, वित्र् और सुन्नते मुअक्क़दा के क़ादए ऊला में अत्तहिय्यत के बाद अगर बे ख्याली में "अल्लाहुम्म सल्ले आला मुहम्मदीन या अल्लाहुम्म सल्ले आला सय्यिदिना" कह लिया तो सज्दए सहव वाजिब हो गया और अगर जानबुझ कर कहा तो नमाज़ लैंटाना वाजिब है।

बाक़ी अगली पोस्ट में..ان شاء الله
*✍🏼नमाज़ के अहकाम, सफा 172*

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*पानी पिने की सुन्नते और आदाब*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

     पानी बैठ कर, उजाले में देख कर, सीधे हाथ से बिस्मिल्लाह पढ़ कर इस तरह पिये की हर मर्तबा ग्लास को मुह से हटा कर साँस ले, पहली और दूसरी बार एक एक घूंट पिये और तीसरी साँस में जितना चाहे पिये।
     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : पानी ऊंट की तरह एक ही घूंट में न पी जाया करो बल्कि दो या तिन बार पिया करो और जब पिने लगो तो बिस्मिल्लाह पढ़ा करो और जब पि चूको तो अल्हम्दु लिल्लाह कहा करो।
*✍🏼तिर्मिज़ी*

     हज़रते अनस رضي الله عنه से रिवायत है की हुज़ूर صلى الله عليه وسلم पिने में तीन बार साँस लेते थे और फ़रमाते थे : इस तरह पिने में ज़्यादा सैराबी होती है और सिह्हत के लिये मुफीद व खुश गवार है।
*✍🏼सहीह मुस्लिम*

      हज़रते इब्ने अब्बास رضي الله عنه से रिवायत है की हुज़ूर صلى الله عليه وسلم ने बर्तन में साँस लेने और फुंकने से मना फ़रमाया है।
*✍🏼अबू दाऊद*
*✍🏼सुन्नते और आदाब, 95*

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Monday, 3 July 2017

*बन्दों के हुक़ूक़* #14
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_हुक़ुक़ुल इबादत की अदाएगी के फ़वाइद_*
     बन्दों के हुक़ूक़ की अदाएगी से दुन्या व आख़िरत में कसीर फ़वाइद हासिल होते है और इस को तर्क करना दुन्या व आख़िरत में बे शुमार नुक्सानात का सबब बन सकता है। इस की अदाएगी से इन्सान को ज़ेहनी व क़ल्बी सुकून मिलता और यू बन्दा बहुत सी बीमारियो से बच जाता है।

◆ बन्दों के हुक़ूक़ की अदाएगी से हर शख्स को उस का हक़ मिलना शुरू हो जाता है, जिस से मुआशरे में अम्न व सुकून आम होता और लड़ाई झगड़ो का खातिमा हो जाता है।
◆ लोगो के हुक़ूक़ अदा करने वाला शख्स उन के दरमियान इज़्ज़त, वक़ार और पसन्दीदगी की निगाह से देख जाता है।
◆ हुक़ूक़ की अदाएगी से आपस की महब्बतो को फ़रोग़ मिलता है, जिस से रिश्ते मज़बूत होते है।
◆ अदाएगीये हुक़ूक़ से बन्दों के हुक़ूक़ की पामाली पर मिलने वाले गुनाहो से बचत होती है।
◆ इस गुनाहो के सबब होने वाले अज़ाब से भी छुटकारा हासिल हो जाता है।
◆ बन्दों के हुक़ूक़ की अदाएगी का सब से बड़ा फायदा ये होता है की बन्दे को अल्लाह और उसके हबीब صلى الله عليه وسلم की रिज़ा हासिल होती है।
*✍🏼बन्दों के हुक़ूक़, 21*

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*नमाज़ के वाजिबात* #03
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★ क़ादए ऊला वाजिब है अगर्चे नमाज़े नफ्ल हो।

★ (दर अस्ल दो नफ्ल का हर क़ादह "क़ादए आखिरह" है और फ़र्ज़ है, अगर क़ादह न किया और भूल कर खड़ा हो गया तो जब तक उस रकअत का सज्दा न कर ले लौट आए और सज्दए सहव करे)
*✍🏼बहारे शरीअत, ही.4 स.52*

★ अगर नफ्ल की तीसरी रकअत का सज्दा कर लिया तो चार पूरी कर के सज्दए सहव करे।

★ सज्दए सहव इस लिये वाजिब हुवा कि अगर्चे नफ्ल में हर दो रकअत के बाद क़ादह फ़र्ज़ है मगर तीसरी या पांचवी रकअत का सज्दा करने के बाद क़ादए ऊला फ़र्ज़ के बजाए वाजिब हो गया।

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*✍🏼नमाज़ के अहकाम, सफा 171-172*

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*खाने की सुन्नते और आदाब* #03
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★ *सीधे हाथ से खाए* हुज़ूर صلى الله عليه وسلم ने फ़रमाया जब तुम में से कोई खाना खाए तो सीधे हाथ से खाए और जब पिये तो सीधे हाथ से पिये की शैतान उलटे हाथ से खाता पीता है।

★ *अपने सामने से खाए* हुज़ूर صلى الله عليه وسلم ने फ़रमाया हर शख्स बर्तन की उसी जानिब से खाए जो उस के सामने हो।

★ *खाने में किसी किस्म का एब न लगाए* मसलन ये न कहे की मज़ेदार नही, कच्चा रह गया है, फीका रह गया है क्योंकि खाने में ऐब निकलना मकरूह व खिलाफे सुन्नत है बल्कि जी चाहे तो खाए वरना हाथ रोक ले।
     हज़रते अबू हुरैरा رضي الله عنه ने फ़रमाया की नूर के पैकर صلى الله عليه وسلم ने कभी किसी खाने को ऐब नही लगाया (यानी बुरा नही कहा) अगर ख्वाहिश होती तो खा लेते और ख्वाहिश न होती तो छोड़ देते।

*✍🏼सुन्नते और आदाब , 90*

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Sunday, 2 July 2017

*बन्दों के हुक़ूक़* #12
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_कमज़ोर और गरीबो से शफ़क़त_*
     गरीबो, नादरो और मिस्कीनों से भी हर मुसलमान को हुस्ने सुलूक से पेश आना चाहिये, उन की मुश्किल में मदद करने के साथ साथ मुमकिन हो तो मुस्तकिल उन के अखराजात भी उठाने चाहिये और हमेशा उन से शफ़क़त व प्यार का बर्ताव करना चाहिये।
     मन्कुल है की हमारे आक़ा صلى الله عليه وسلم ये दुआ माँगा करते : "ऐ अल्लाह ! मुझे मिस्कीन ज़िन्दा रख और मिस्कीनि की हालात में मौत अता फरमा और बरोज़े क़यामत मुझे मिस्कीनों के ज़ुमरे में उठा।"

*_छोटे बहन भाइयो से शफ़क़त_*
     इसी तरह बड़े बहन भाइयो को छोटो के हुक़ूक़ अदा करते हुवे, उन पर शफ़क़त करनी चाहिये। वालिदैन की वफ़ात के बाद छोटे बहन भाइयो की परवरिश करना, उन की मुश्किल घड़ी में उन का साथ देना और जितना हो सके उन की हाजत रवाई व दिल दारी करना, वालिदैन की हयात में भी उन से शफ़क़त व महब्बत से पेश आना, गीबत, चुगली, बद गुमानी और हसद आम मुसलमान से हराम है, तो उन से ब दर्जए औला नाजाइज़ है, ब तक़ाज़ाए बशरीययत उन से सरज़द होने वाली खताओं को मुआफ़ करना और हमेशा उन से नरमी का बर्ताव करना।
*✍🏼बन्दों के हुक़ूक़, 20*

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*नमाज़ के वाजिबात* #02
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اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

★ एक सज्दे के बाद बित्तरतिब दूसरा सज्दा करना।

★तादिले अरकान यानि रूकू, सुजूद, क़ौमा और जल्सा में कम अज़ कम एक बार "सुब्हान अल्लाह" कहने की मिक़दार ठहरना।

★ क़ौमा यानि रूकू से सीधे खड़े होना (बाज़ लोग कमर सीधी नहीं करते इस तरह उन का वाजिब छूट जाता है)

★ जल्सा यानि दो सजदों के दरमियान सीधा बैठना (बाज़ लोग जल्द बाज़ी की वजह से बराबर सीधे बैठने से पहले ही दूसरे सज्दे में चले जाते है इस तरह उन का वाजिब तर्क हो जाता है चाहे कितनी ही जल्दी हो सीधा बैठना लाज़िमी है वरना नमाज़ मकरुहे तहरीमि वाजीबुल इआदा होगी) यानि नमाज़ फिर से पढ़नी होगी।

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بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

★ फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم: खाना खाने बेठो तो जूते उतार लो, इस में तुम्हारे लिये राहत है।

★ खाने से पहले बिस्मिल्लाह पढ़ ले... फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : जिस खाने पर बिस्मिल्लाह न पढ़ी जाए उस खाने को शैतान अपने लिये हलाल समझता है।

★ जब तुम में से कोई खाना खाए तो उस3 चाहिये की पहले बिस्मिल्लाह पढ़े। अगर शुरू में बिस्मिल्लाह पढ़ना भूल जाए तो ये कहे بِسْمِ اللّٰهِ اٙوّٙلٙهُ وٙاٰخِرٙهُ.

★ खाने से पहले ये दुआ पढ़ ली जाए तो अगर खाने में जहर भी होगा तो أن شاء الله असर नही करेगा,
بِسْمِ اللّٰهِ الّٙذِىْ لٙاٙيٙضُرُّ مٙعٙ اسْمِهِ شٙىْءٌ فِى الْاٙرْضِ وٙلٙاٙفِى السّٙمٙآءِ يٙاحٙيُّ يٙاقٙيُّوْمُ
"अल्लाह के नाम से शुरू करता हु जिस के नाम की बरकत से ज़मीन व आसमान की कोई चीज़ नुक़्सान नही पहुचा सकती। ऐ हमेशा से ज़िन्दा व क़ाइम रहने वाले।

बाक़ी अगली पोस्ट में..أن شاء الله
*✍🏼सुन्नते और आदाब, 90*

*तमाम मोमिनो के इसले षवाब के लिये*
*___________________________________*
मिट जाये गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
*___________________________________*
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Saturday, 1 July 2017

*बन्दों के हुक़ूक़* #11
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_मुलाज़िमीन से शफ़क़त_*
     अपने रिश्तेदारो से सीलए रहमी करने के साथ साथ दीगर मुसलमानो के हुक़ूक़ का भी ख़ास ख्याल रखिये, ख़ास तौर पर अपने मुलाज़िमीन के हुक़ूक़ की अदाएगी में हरगिज़ कोताही नही करनी चाहिये, उमुमन बाज़ लोग छोटी गलतियों पर अपने मुलाज़ीमीन को ज़लील करते, गालिया देते और बाज़ नादान तो मार पीट पर उतर आते है, ऐसे अफ़राद इस अहादिश से इबरत हासिल करे।
     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : खादिमो से बुरा सुलूक करने वाला जन्नत में दाखिल न होगा।
*✍🏼مسند احمد*
*✍🏼مسند أبى بكر صديق*

     मलाज़िमीन से हमेशा शफ़क़त से पेश आइये और जितना हो सके उन की खताओं को दर गुज़र कीजिये की जो दुसरो पर रहम करता है, अल्लाह भी उस पर रहम फ़रमाता है, नीज़ उन के हुक़ूक़ का ख़ास ख्याल रखते हुवे हुस्ने सुलूक से पेश आना, उन्हें हक़ीर न जानना, तेज़ मिज़ाजी और गाली गलोच से बाज़ रहना, मुक़र्ररा वक़्त पर उन को उज्रत देना, उज्रत में बिला इजाज़ते शरई कमी न करना, बिमारी में उन को उज्रत देना, मुमकिन हो तो इलाज़ पर अख़लाक़ी तौर पर ज़रूरी है।
*✍🏼बन्दों के हुक़ूक़, 17*

*तमाम मोमिनो के इसले षवाब के लिये*
*___________________________________*
मिट जाये गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*नमाज़ के वाजिबात* #01
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

★ तकबीरे तहरिमा में लफ्ज़ "अल्लाहु अक्बर" कहना।

★ फर्ज़ो की तीसरी और चौथी रकअत के इलावा बाक़ी तमाम नमाज़ों की हर रकअत में अलहम्द शरीफ पढना, सूरत मिलाना या क़ुरआने पाक की एक बड़ी आयत जो छोटी तिन आयतो के बराबर हो या तिन छोटी आयते पढ़ना।

★ अलहम्द शरीफ का सूरत से पहले पढ़ना।

★ अलहम्द शरीफ और सूरत के दरमियान "आमीन" और बिस्मिलाह के इलावा कुछ और न पढ़ना।

★ किराअत के फौरन बाद रूकू करना।

बाक़ी अगली पोस्ट में..ان شاء الله
*✍🏼नमाज़ के अहकाम, सफा 171*

*तमाम मोमिनो के इसले षवाब के लिये*
*___________________________________*
मिट जाये गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*खाने की सुन्नते और आदाब* #01
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_हर खाने से पहले अपने हाथ पहुचो तक धो ले_*
     फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : जो ये पसन्द करे की अल्लाह उस के घर में बरकत ज़्यादा करे तो उसे चाहिये की जब खाना हाज़िर किया जाए तो वुज़ू करे और जब उठाया जाए तब भी वुज़ू करे।
*✍🏼सुनने इब्ने माजह*

     मुफ़्ती अहमद यार खान नईमी عليه رحما लिखते है : खाने के वुज़ू के माना है हाथ व मुह की सफाई करना की हाथ धोना और कुल्ली कर लेना।
*✍🏼मीरआतुल मनाजिह्, 6/32*

     जब भी खाना खाए तो उल्टा पाउ बिछा दे और सीधा खड़ा रखे या सुरीन पर बैठ जाए और दोनों घुटने खड़े रखे।
*✍🏼बहारे शरीअत, 16/19*
*✍🏼सुन्नते और आदाब, 89*

*तमाम मोमिनो के इसले षवाब के लिये*
*___________________________________*
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Friday, 30 June 2017

*बन्दों के हुक़ूक़* #10
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_रिश्तेदारो के साथ सीलए रहमी_*
     बन्दों के हुक़ूक़ में यु तो तमाम ही लोगो के हुक़ूक़ अहमिय्यत के हामिल है और सब की अदाएगी भी ज़रूरी है, लेकिन इन में सब से अहम रिश्तेदारो के हुक़ूक़ है, जब एक आम मुसलमान के साथ हुस्ने सुलूक करने और उस के हुक़ूक़ अदा करने की तरगिब् है, तो वो अफ़राद जिन के साथ खून के रिश्ते हो, उन से तो हुस्ने सुलूक करने और उन के हुक़ूक़ अदा करने की अहमिय्यत और ज़्यादा बढ़ जाती है। यही वजह है की अपने दिने इस्लाम ने हमे सीलए रहमी की तरगिब् दिलाई है। सीलए रहमी का मतलब ये है की अपने अज़ीज़ों और रिश्तेदारो से अच्छा सुलूक करना।

     हदिष में है की बेशक अल्लाह ने एक क़ौम की वजह से दुन्या को आबाद रखा है और उन की वजह से माल में इज़ाफ़ा करता है और जब से उन्हें पैदा फ़रमाया है, उन की तरफ ना पसन्दीदा नज़र से नही देखा। अर्ज़ की गई या रसुलूल्लाह صلى الله عليه وسلم ! वो कैसे ? इर्शाद फ़रमाया उन के अपने रिश्तेदारो के साथ तअल्लुक़ जोड़ने की वजह से।
*✍🏼المعجم الكبير، ١٢/٦٧، ١٢٥٥٦*

     सीलए रहमी के सब से ज़्यादा हक़दार वालिदैन और बहन-भाई होते है, इन के बाद हस्बे मरातिब दीगर रिश्तेदार सीलए रहमी के मुस्तहिक़ है। रिश्तेदारो के साथ सीलए रहमी करना, उन का हक़ है, क़ुरआन और अहादीस में इस की बहुत तरगिब् दिलाई गई है और "सारी उम्मत का इस पर इत्तिफ़ाक़ है की सीलए रहमी वाजिब है और क़तए रहम हराम है।"
*✍🏼बहारे शरीअत, 3/558*
*✍🏼बन्दों के हुक़ूक़, 17*

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*नमाज़ के 7 फराइज़* 10
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_6 क़ादए आखिरह_*
     नमाज़ की रकअते पूरी करने के बाद इतनी देर तक बैठना की पूरी अत्तहिय्यात पढ़ ली जाए फ़र्ज़ है।
*✍🏼आलमगिरी, जी.1 स.70*

     4 रकअत वाले फ़र्ज़ में चौथी रकअत के बाद क़ादह न किया तो जब तक पांचवी का सज्दा न किया हो बैठ जाए, और अगर पाचवी का सज्दा कर लिया या फ़ज्र में दूसरी पर नहीं बैठा तीसरी का सज्दा कर लिया या मगरिब में तीसरी पर नहीं बैठा और चौथी का सज्दा कर लिया
     इन सब सूरतो में फ़र्ज़ बातिल हो गए। मगरिब के इलावा और नमाज़ों में एक रकअत मज़ीद मिला ले।

*_7 खुरूजे बिसुनईहि_*
     यानी क़ादए आखिरह के बाद सलाम या बातचीत वगैरा कोई ऐसा फेल इरादतन करना जो नमाज़ से बाहर कर दे। मगर सलाम के इलावा कोई फेल कसदन पाया गया तो नमाज़ वाजीबुल ईआदा होगी। और अगर बिला क़स्द इस तरह का फेल पाया गया तो नमाज़ बातिल।
*✍🏼नमाज़ के अहकाम, सफा 170*

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*खुशबु लगाने की सुन्नते ओर आदाब* #03
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_कौन कैसी खुशबु इस्तिमाल करे ?_*

     हज़रते अबू हुरैरा رضي الله عنه से रिवायत है की हुज़ूर صلى الله عليه وسلم ने इर्शाद फ़रमाया : मर्दाना खुशबु वो है की उस की खुशबु तो ज़ाहिर हो मगर रंग ज़ाहिर न हो और ज़नाना खुशबु वो है की उसका रंग तो ज़ाहिर हो मगर खुशबु ज़ाहिर न हो।

     मर्दों को अपने लिबास पर ऐसी खुशबु इस्तिमाल करनी चाहिये जिस की खुशबु फेले मगर रंग के धब्बे वगैरा नज़र न आए।
     औरत के लिये महक की मुमनअत इस सूरत में है जब की वो खुशबु अजनबी मर्दों तक पहुचे, अगर वो घर में इत्र लगाए जिस की खुशबु खाविन्द या औलाद या माँ बाप तक ही पहुचे तो हरज नही।

     मालुम हुआ की इस्लामी बहनो को ऐसी खुशबु नही लगानी चाहिये जिस की खुशबु उड़ कर गैर मर्दों तक पहुच जाए। चुनान्चे हज़रते अबू मूसा अशअरी رضي الله عنه से रिवायत है की हुज़ूर صلى الله عليه وسلم ने इर्शाद फ़रमाया : औरत जब खुशबु लगा कर किसी मजलिस के पास से गुज़रती है तो वो ऐसी और ऐसी है यानी ज़ानीया है।
*✍🏼सुन्नते और आदाब, 85*

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Thursday, 29 June 2017

*बन्दों के हुक़ूक़* #09
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

*_अल्लाह वालो का खौफे खुदा_*
     अल्लाह का खौफ रखने वाले उस के नेक बन्दे, बन्दों के हुक़ूक़ के ब ज़ाहिर मामूली नज़र आने वाले मुआमलात में भी ऐसी एहतियात करते है की हैरत में डाल देते है।

     मन्कुल है की हज़रते अब्दुल्लाह बिन मुबारक رحمة الله عليه को सफर पर रवाना होते वक़्त किसी ने दूसरे को पहुचाने के लिये खत पेश किया, आप ने फ़रमाया : ऊंट किराए पर लिया है, सुवारी वाले से इजाज़त लेनी होगी, क्यूकी में ने उस को सारा सामान दिखा दिया है और ये खत ज़ाइद शै है।
*✍🏼माख़ज़ इहयाउल उलूम, 1/353*

     देखा आप ने हज़रते अब्दुल्लाह बिन मुबारक رحمة الله عليه का हुक़ूक़ल अब्द की अदाएगी का जज़्बा सद करोड़ मरहबा ! की ऊंट वाले को सारा सामान दिखाने के बाद मामूली से कागज़ का वज़न रखने के लिये भी ऊंट वाले से इजाज़त लेने का ज़ेहन रखते है ताकि उस की हक़ तलफी न हो जाए।
*✍🏼बन्दों के हुक़ूक़, 11*

*तमाम मोमिनो के इसले षवाब के लिये*
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